श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-126
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
विवाह के अनन्तर मयूरेश का अपनी पुरी को प्रस्थान, मयूरेशपुरी का वर्णन, भाद्रपदमास के गणेशव्रत की विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेश का द्वापरयुग में सिन्दूरवध के लिये पुनः अवतरित होने का आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजी का एक सुन्दर प्रासाद को निर्मितकर उसमें गजानन प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना, मयूरेश चरित्र श्रवण की महिमा
अथः षड्विंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः
मयूरेशान्तर्न्धानवर्णनं

ब्रह्माजी बोले — सिद्धि तथा बुद्धि के साथ विवाह सम्पन्न हो जाने के अनन्तर देव मयूरेश ने अपने वाहन मोर पर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपनी नगरी के लिये प्रस्थान किया ॥ १ ॥ उसी समय सभी देवता भी अपने-अपने वाहनों पर विराजमान होकर उन मयूरेश के आगे-आगे चलने लगे और मुनिगण उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ २ ॥ चक्रपाणि के साथ नगर के सभी निवासी, स्त्रियाँ तथा बालक बड़े ही आनन्द के साथ सहसा बाहर निकलकर उनके पीछे चलने लगे। उस समय सभी प्रकार के वाद्य बज रहे थे, अप्सराओं के समूह के समूह नृत्य कर रहे थे। उन सभी से घिरे हुए मयूरेश जैसे ही युद्धभूमि में पहुँचे, त्यों-ही स्कन्द आदि वीर उन विभु मयूरेश से प्रार्थना करते हुए कहने लगे ॥ ३-४१/२

वीर बोले — युद्धभूमि में जिन सेनानियों को दैत्यों की सेना ने मार डाला था, वे सभी आपके दृष्टिपातरूप अमृत से सिंचित होकर उठ खड़े हुए हैं। मयूरेश के द्वारा उनको जीवित किया गया देखकर सभी देवता तथा नगरनिवासीजन अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गये और ‘साधु- साधु’ इस प्रकार से कहने लगे ॥ ५-६१/२

योजनमात्र मार्ग तय करने पर देवेश्वर मयूरेश मार्ग में ठहर गये और चक्रपाणि के सिर पर अपना मंगलमय हाथ रखकर तथा शत्रुपक्ष के वीरों को भय पहुँचाने वाले अपने दसों हाथों से राजा का आलिंगनकर उनसे बोले ॥ ७-८ ॥

देव बोले — मेरे कथनानुसार तुम शीघ्र ही सभी नागरिकों के साथ अपने गण्डकीपुर की ओर प्रस्थान करो ॥ ८१/२

ब्रह्माजी बोले — मयूरेश के इस प्रकार के वचन सुननेमात्र से तत्काल ही चक्रपाणि की आँखों में आँसू आ गये । सभी नगरनिवासी उन मयूरेश को प्रणाम करके शोकाकुल होते हुए उच्चस्वर में यह बात कहने लगे। आप जहाँ जा रहे हैं, हम सभी को भी वहीं ले चलें। आपका हम लोगों को इस प्रकार यहाँ छोड़ना ठीक नहीं है ॥ ९-१० ॥ यदि आप पहले यहाँ न आये होते, तो हम लोगों को दुःख नहीं होता। ऐसा कहकर उन मयूरेश को प्रणाम करके और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी चले गये ॥ ११ ॥

राजा चक्रपाणि ने भी उन्हें प्रणामकर अपने नगर को प्रस्थान किया। उन मयूरेश के बहुत से अद्भुत गुणों का वर्णन करते हुए वे सभी नगर निवासी क्षणभर में ही अपनी नगरी में पहुँच गये और चक्रपाणि से आज्ञा प्राप्तकर अपने-अपने घरों को चले गये। चक्रपाणि भी अपने घर चले गये ॥ १२-१३ ॥ राजा चक्रपाणि ने अपने नगर में सूर्य, गणेश, विष्णु, शिव तथा दुर्गा — इन पंचदेवों के लिये पाँच मन्दिर बनवाये और उनमें एक-एक मूर्ति की स्थापनापूर्वक प्रतिष्ठा करवायी ॥ १४ ॥ राजा चक्रपाणि भक्तिभावपूर्वक उन पंचदेवों की नित्य पूजा किया करते थे। इधर मयूरेश भी क्षणभर में अपनी मयूरेशपुरी में पहुँच गये ॥ १५ ॥

उस नगरी को देखकर सभी गण बड़े ही आश्चर्य में पड़ गये। उस पुरी के स्तम्भ रत्नों से बने हुए थे और उसकी दीवारें सोने से निर्मित थीं ॥ १६ ॥ उन रत्नमय तथा स्वर्णिम दीवारों में अपना प्रतिविम्ब अकेला नहीं दिखता था, अपितु असंख्य जनों से समन्वित दिखता था। उस रमणीय सभामण्डप में ब्रह्मा आदि देवों को बैठाकर मयूरेश ने सभा के मध्य में प्रवेश किया और सभी ओर दृष्टि दौड़ायी। उन्होंने उस सभा पूर्वभाग में रति के साथ कामदेव को तथा मार्जारी नामवाली लोक में प्रसिद्ध देवी को देखा, जो सुख प्रदान करने वाली हैं। सभा की दक्षिण दिशा में उन्होंने भगवान् शिव और पार्वती को देखा ॥ १७–१९ ॥ उनके आगे देवी विरजा को देखा, जो भक्तों की सकल कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं। पश्चिम दिशा में धरणीदेवी से समन्वित भगवान् वाराह को और सब प्रकार के विघ्नों का नाश करने वाली आश्रया नामवाली मंगलकारिणी देवी को देखा ॥ २०१/२

उत्तर दिशा में श्रीहरि का और प्रसिद्ध मुक्तादेवी का दर्शन किया, वे देवी सब प्रकार की मुक्ति को प्रदान करने वाली हैं। तैंतीस करोड़ देवता भी उन मयूरेश का दर्शन करने की इच्छा से वहाँ आकर स्थित हो गये ॥ २१-२२ ॥

[इसी प्रसंग में ब्रह्माजी भाद्रपद चतुर्थी-व्रतानुष्ठान का निरूपण करते हुए कहते हैं — हे व्यासजी ! ] भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि को स्नान करने के अनन्तर सर्वप्रथम गजानन की पूजा करे, तदनन्तर पूर्व दिशा में जाकर वहाँ मार्जारी देवी का पूजन करे ॥ २३ ॥ पूजन के अनन्तर ब्राह्मणों को विविध प्रकार के दान प्रदान करे और गजानन का स्मरण तथा ध्यान करके मौनव्रत से रहे। इस प्रकार से धीरे-धीरे चले कि चलते समय पैरों से होने वाली आवाज न सुनायी दे ॥ २४ ॥ कृमि, कीट तथा पतंग आदि की हिंसा न करे, प्रयत्नपूर्वक पवित्रता एवं संयम से रहे । तदनन्तर पुनः स्नान करके देवाधिदेव गजानन की (सायंकालीन) पूजा करे। इसी प्रकार दूसरे दिन तथा तीसरे दिन भी पहले दिन की भाँति क्रमशः पूजन आदि करे, दूसरे दिन दक्षिण द्वार पर देवी विरजा की पूजा मार्जारीदेवी के समान ही करे ॥ २५-२६ ॥

तीसरे दिन पश्चिम द्वार पर आश्रया नाम वाली देवी को नमस्कार करके पूर्ववत् उनका पूजन करे, चतुर्थी तिथि को व्यक्ति को चाहिये कि वह उत्तर द्वार पर पूर्वोक्त विधि के अनुसार देवी मुक्ता का पूजन करे और फिर मयूरेश का पूजन करे। महोत्सव मनाये तथा रात्रि में जागरण करे ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार से जो उपवासपूर्वक चारों द्वारों में स्थित देवियों का भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह भगवान् मयूरेश के कृपाप्रसाद से अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। यदि समर्थ हो तो चतुर्थी तिथि को ही चारों द्वारों पर पूर्व की भाँति मार्जारी आदि देवियों और मयूरेश का पूजन करे। इन देवियों के पूजन के आदि और अन्त में जो स्नान करके देवेश्वर मयूरेश का दर्शन करता है, तो उसका फल देव गजानन प्रसन्न होकर तुरन्त ही प्रदान करते हैं ॥ २९-३०१/२

अतः भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ करके ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए चतुर्थी तिथि के दिन ऊषाकाल में स्नान करके तथा विधिपूर्वक सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न करने के अनन्तर विधि-विधान से मयूरेश्वर का पूजन करे ॥ ३१-३२ ॥ पूजन के अनन्तर इक्कीस बार प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। तदनन्तर शीघ्रता से पूर्व द्वार में जाकर मार्जारी को नमस्कार करे। फिर दक्षिण दिशा में विरजा, पश्चिम द्वार में आश्रया, उत्तर द्वार में जाकर श्रेष्ठ मुक्तादेवी को प्रणाम करे। इसके पश्चात् किंचित् दिन शेष रहने पर मयूरेश्वर की पूजा का आरम्भ करे। पूजक व्यक्ति अत्यन्त ध्यानपूर्वक सोलह उपचारों द्वारा मयूरेश्वर का पूजन करे और रात्रि में गीत तथा वाद्यों की ध्वनि के साथ जागरण करे ॥ ३३–३५ ॥

प्रातः काल होने पर निर्मल जल में स्नान करने के अनन्तर पुनः देवेश्वर मयूरेश का पूजन करे । तदनन्तर यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी व्रत की पारणा करे ॥ ३६ ॥ उन ब्राह्मणों को सुवर्ण, वस्त्र, धान्य तथा गो आदि प्रदान करे। इस प्रकार से जो व्यक्ति व्रत करता है, वह जो कुछ असाध्य है, उसे भी सिद्ध कर लेता है । वह पुत्र-पौत्रों की सम्पदा से सम्पन्न होता है और विविध सुखों का उपभोग करने के अनन्तर अन्त में स्वर्गलोक प्राप्त करता है। वहाँ इन्द्र, यम, कुबेर आदि लोकपाल उस मनुष्य की पूजा करते हैं ॥ ३७-३८ ॥ आठों प्रकार की नायिकाएँ उस व्रती व्यक्ति के चरणकमलों की सेवा करती हैं। अन्धे को दृष्टि प्राप्त हो जाती है, मूक व्यक्ति अवश्य ही वाणी प्राप्त कर लेता है। जो भार्या की अभिलाषा करता है, वह भार्या प्राप्त प्राप्त कर लेता है और जो विद्यार्थी है, वह उत्तम बुद्धि को कर लेता है। चारों द्वारों में उपवास करने पर भी यही फल कहा गया है ॥ ३९-४०१/२

[इस प्रकार चतुर्थी व्रतानुष्ठान का निरूपण करके ब्रह्माजी पुनः पूर्ववर्ती प्रसंग का वर्णन करते हैं —] तदनन्तर किसी दिन की बात है, देवेश्वर मयूरेश विष्णु ब्रह्मा तथा शिव आदि सभी देवताओं से अत्यन्त स्निग्ध वाणी में कहने लगे ॥ ४११/२

मयूरेश बोले — हे देवो ! जिस कार्य को सम्पन्न करने के लिये मैं अवतरित हुआ था, वह कार्य मैंने पूर्ण कर लिया है। मैंने बहुत-से दैत्यों का वध किया और पृथ्वी के भार को हलका कर दिया । दैत्य सिन्धु के कारागृह से सभी देवताओं को मुक्त किया है ॥ ४२-४३ ॥ अब स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार आदि अर्थात् देवपूजन, यज्ञ तथा पितृकर्म – श्राद्धादि पहले की भाँति होने लगेंगे। हे देवो! आप सबसे आज्ञा लेकर अब मैं अपने धाम को जाना चाहता हूँ ॥ ४४ ॥

मयूरेश के इस प्रकार के वचनों को सुनकर सभी देवता शोक में पड़ गये। आँसू बहाते हुए तथा एक-दूसरे का मुख देखते हुए वे कहने लगे — ॥ ४५ ॥

हे मयूरेश! हम लोगों को छोड़ करके आप कहाँ जाना चाहते हैं? आप स्नेह का परित्यागकर इस प्रकार से अत्यन्त निष्ठुर कैसे हो गये हैं ? तदनन्तर देवी पार्वती भी यह सब सुनकर एकाएक शोक से व्याकुल हो उठीं। मूर्च्छित होकर वे भूमि पर गिर पड़ीं। एक मुहूर्त के बाद चेतना लौटने पर वे कहने लगीं — ॥ ४६-४७ ॥

हे दीनानाथ! हे दयासागर ! हे जगन्नाथ ! हे सिन्धुदैत्य का विमर्दन करने वाले! मुझ अपनी माता का परित्यागकर तुम कहाँ जाओगे ? हे सुरेश्वर ! आपके चले जाने पर मेरे प्राण भी नहीं रहेंगे ॥ ४८१/२

देव बोले — हे शुभे! द्वापर युग आने पर मैं पुनः आपकी पुत्रता को प्राप्त होऊँगा। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा। आप कुछ भी चिन्ता न करें। आपके वियोग से मुझे भी अतुलनीय दुःख हो रहा है ॥ ४९-५० ॥ हे माता ! सुहृज्जनों का एक स्थान पर रहना सर्वदा के लिये सम्भव नहीं होता है। आगे अत्यन्त भयंकर सिन्दूर नामक एक दैत्य उत्पन्न होगा। वह सभी देवताओं के लिये अवध्य होगा, तब मैं आपके पुत्र के रूप में उत्पन्न होऊँगा । हे शिवप्रिये ! मैं स्मरणमात्र करने से ही आपके समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा ॥ ५१-५२ ॥

तदनन्तर कार्तिकेय बोले — आप जहाँ जा रहे हैं, मुझे भी वहाँ ले चलें । बालक, असहाय तथा दीन की उपेक्षा करना ठीक नहीं है ॥ ५३ ॥

देव बोले  — हे बन्धु ! आप चिन्ता न करें, मैं यहाँ पुनः आऊँगा। मुझ अन्तर्यामी का आपसे कभी भी वियोग नहीं होगा। तदनन्तर मयूरेश्वर ने अपने भाई कार्तिकेय को अपना वाहन मयूर प्रदान किया और उसी समय उनका मयूरध्वज यह नाम रखा ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर बन्धु गुणेश्वर की आज्ञा से कार्तिकेय उस मयूर के ऊपर [जैसे ही] आरूढ़ हुए, उसी क्षण वे देव मयूरेश्वर अन्तर्धान हो गये ॥ ५६ ॥ उन मयूरेश्वर के अन्तर्धान हो जाने पर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने सर्वदा ही उन्हें अपने हृदयदेश में प्रतिष्ठित देखा। तदनन्तर ब्रह्माजी ने एक अत्यन्त मनोहर प्रासाद बनवाया और बालुका से गजानन की मूर्ति बनाकर उस मन्दिर में विधिवत् स्थापित की। सभी लोगों ने विविध उपचारों के द्वारा यथाविधि उन गजानन का पूजन किया। वसिष्ठ आदि मुनिगणों ने ब्रह्मकमण्डलु नामक नदी में स्नान किया और सन्ध्यावन्दनादि सम्पूर्ण कर्म सम्पन्न करने के अनन्तर वे गजानन की उस अत्यन्त सुन्दर मूर्ति के समीप गये ॥ ५७–५९ ॥

कुछ मुनियों ने व्रत करके गजानन के धाम को प्राप्त करने के लिये मन्दिर के चारों ओर चार द्वार बनाये । कुछ स्नान करने के अनन्तर उन गजानन को प्रणाम करके दौड़ते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे ॥ ६० ॥ उस समय सभी देवता तथा मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर परस्पर कहने लगे कि इस प्रकार का पुण्यक्षेत्र अन्य कहीं देखा नहीं गया है, जहाँ कि साक्षात् देव गजानन स्थित हों। ये मयूरेश विघ्नों का निवारण करने वाले हैं और भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। इस प्रकार कहकर तथा उन गजानन का पूजन करके वे सभी मुनिगण अपने-अपने आश्रमों की ओर चले गये ॥ ६१-६२ ॥

तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने-अपने स्थानों पर चले गये। भगवान् शंकर अपने परिवार के साथ आनन्दित होते हुए कैलास को चले गये। तब स्वधा, स्वाहा और वषट्कार होने लगा, जिससे इन्द्र आदि देवता बड़े प्रसन्न हो गये ॥ ६३१/२

ब्रह्माजी बोले — हे मुनि व्यासजी ! त्रेतायुग में मयूरेश्वर ने जो कुछ भी किया था, वह सम्पूर्ण चरित्र आपको बता दिया है। देव मयूरेश के चरित का श्रवण सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। मयूरेश की कथा सुनने से कृतार्थता प्राप्त होती है, यश तथा आयुष्य की प्राप्ति होती है और यह आख्यान मनुष्यों के सभी प्रकार के पापों का विनाश करने वाला है ॥ ६४-६५ ॥ इस मयूरेश-चरित का श्रवण पुत्र देने वाला, धन प्रदान करने वाला, विद्या प्रदान करने वाला तथा समस्त दुःखों का निवारण करने वाला है। यह शारीरिक तथा मानसिक सभी बाधाओं को दूर करने वाला और कुष्ठ आदि दुष्ट रोगों का विनाश करने वाला है ॥ ६६ ॥ यह मयूरेश का आख्यान पढ़ने तथा सुनने वाले पुरुषों के लिये अत्यन्त मंगलकारी है और भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करने वाला है। यह मनुष्यों को विजयश्री का अधिष्ठान है। क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों – सभी को लक्ष्मी प्रदान करने वाला और पुष्टि को बढ़ाने वाला है ॥ ६७१/२

[ब्रह्माजी बोले — ] हे मुनि व्यासजी ! जो-जो आपने पूछा, वह सब मैंने बता दिया। अब आप मेरे मुख से पुनः गजानन के चरित्र का श्रवण करेंगे ॥ ६८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘द्वारमहिमा का वर्णन’ नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२६ ॥

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