November 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-127 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय गजानन-अवतार के प्रसंग में ब्रह्माजी की जँभाई से सिन्दूर की उत्पत्ति, ब्रह्माजी द्वारा उसे अनेक वरदानों की प्राप्ति, वरदानों की परीक्षा के लिये सिन्दूर का ब्रह्माजी को ही लक्ष्य बनाना और ब्रह्माजी का भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना अथः सप्तविंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः सिन्दूरोत्पत्तिवर्णनं व्यासजी बोले — हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! हे देवेश ! आपने गुणेश के शुभ चरित का विस्तार से वर्णन किया। फिर भी हे देव! उसके सुनने से मुझे तृप्ति नहीं हुई है। मनुष्य अमृत के पान से तो तृप्त हो सकता है, किंतु कथा के श्रवण से तृप्त नहीं हो सकता। मैंने त्रेतायुग में हुए गुणेश के अवतार की सम्पूर्ण कथा सुन ली है ॥ १-२ ॥ तदनन्तर द्वापरयुग में गजानन नाम से उन्होंने कहाँ अवतार लिया और हे महाप्रभु ! मूषक उनका वाहन किस प्रकार हुआ ? हे कमलासन ब्रह्माजी ! आप मेरे इस संशय को दूर करने की कृपा करें ॥ ३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे वत्स ! हे मुने! मेरे मन में जो बात थी, उसे पूछकर आपने बहुत अच्छा किया है, क्योंकि श्रोता, वक्ता तथा पूछनेवाला – ये तीनों ही सिद्धि को प्राप्त करते हैं। हे मुने! मैं विनायकचरित की उस कथा को आपसे कहूँगा, जो चरित देव विनायक ने द्वापर युग में किया था, उसे आप इस समय सुनें ॥ ४-५१/२ ॥ जिस प्रकार से वे देव गजानन रक्तवर्णवाले, चार भुजाओं वाले, गज के मुख वाले एवं मूषक के वाहन वाले हुए, वह सब मैं आपसे कहता हूँ ॥ ६१/२ ॥ किसी समय की बात है, भगवान् शंकर संयोगवश ब्रह्मलोक में पहुँचे। तब उन्होंने शयन कर रहे ब्रह्माजी को जगाया। उस समय वे क्रुद्ध होकर उठे और उन्होंने दीर्घ जँभाई ली ॥ ७-८ ॥ उस जँभाई से एक महाभयानक पुरुष उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते ही उस पुरुष ने सभी को भयभीत कर देने वाला तीव्र ध्वनियुक्त शब्द किया, उस ध्वनि से समुद्र, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। दिशाओं के रक्षक, सभी दिक्पाल आश्चर्यचकित हो उठे। क्षुब्ध होकर शेषनाग विष उगलने लगे ॥ ९-१० ॥ सभी पर्वत चूर-चूर होकर गिर पड़े और समस्त प्राणी व्याकुल हो उठे। तीनों लोकों में निवास करने वाले मनुष्यों के लिये कल्पान्त में होने वाले प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। वह अपने मस्तक से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करता हुआ-सा खड़ा हो गया। उसके शरीर से निकलने वाली सुन्दर गन्ध तीनों लोकों में फैल गयी ॥ ११-१२ ॥ उस पुरुष के जपाकुसुम के समान कान्तियुक्त देह की प्रभा से सभी दिशाएँ अरुणिम वर्ण की हो उठीं। क्या ब्रह्माजी द्वारा यह कोई दूसरा कामदेव उत्पन्न हो गया है, यह विचारकर कामदेव उस पुरुष के सौन्दर्य को देखकर तत्क्षण ही लज्जित हो उठा। अपने सामने स्थित उस पुरुष को देखकर कमलयोनि ब्रह्मा विस्मित हो गये और उससे बोले — तुम किसके पुत्र हो ? कहाँ से उत्पन्न हुए हो? तुम्हारी क्या करने की इच्छा है? वह सब मुझे बताओ ॥ १३–१४१/२ ॥ पुरुष बोला — हे सुरेश्वर ! आप अनेकों ब्रह्माण्डों की रचना करने वाले होने पर भी तथा सब कुछ जानने वाले होने पर भी भ्रम में पड़े हुए की भाँति मुझसे क्यों पूछ रहे हैं ? आपकी जँभाई से ही उत्पन्न मुझे आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं ? ॥ १५-१६ ॥ आप अपने पुत्र मुझ पर कृपा करें और अपनी बुद्धि के अनुसार मेरा नाम रखें। हे नाथ! मुझे रहने के लिये स्थान प्रदान करें, साथ ही मेरा भोजन क्या होगा तथा मुझे कौन-सा कार्य करना है, यह सब मुझे बतायें। उस पुरुष के इस प्रकार के वचनों को सुनकर चतुरानन ब्रह्माजी बोले — चूँकि तुम्हारा शरीर रक्तवर्ण का है, इसलिये तुम ‘सिन्दूर’ नाम से प्रसिद्ध होओगे ॥ १७-१८ ॥ तुम्हारी सामर्थ्य महान् होगी और तुम तीनों लोकों को वश में करने में सक्षम होओगे। तुम क्रोध के आवेश में जिसका भी आलिंगन करोगे, वह सौ टुकड़ों में विभक्त हो जायगा ॥ १९ ॥ तुम्हें पाँच भूतों—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश से भी कभी कोई भय नहीं होगा। देवता, दानवों, यक्षों तथा मनुष्यों से तुम्हें भय नहीं होगा। इन्द्र आदि लोकपालों तथा साक्षात् काल से भी कोई तुम्हें भय नहीं होगा । नागों, राक्षसों से भी कोई भय नहीं होगा, तुम्हें न तो दिन में भय रहेगा और न रात्रि में कोई भय रहेगा ॥ २०-२१ ॥ हे सिन्दूर! तुम्हें न तो सजीव प्राणियों से भय होगा और न निर्जीव प्राणियों से । तीनों लोकों में जहाँ भी तुम्हारा रहने को मन करे, वहाँ रहो ॥ २२ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजी के मुख से उत्पन्न वह सिन्दूर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया। तब वह अपनी आवाज के द्वारा चराचरसहित तीनों लोकों को कँपाते हुए दहाड़ा ॥ २३ ॥ उस तीव्र ध्वनि से समुद्र क्षुब्ध हो उठे, सभी लोकपाल भाग उठे। तदनन्तर उस सिन्दूर ने पितामह ब्रह्माजी को प्रणाम करके कहा ॥ २४ ॥ सिन्दूर बोला — हे अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी ब्रह्माजी! आपके वचनरूपी अमृत से मैं अत्यन्त प्रसन्न हो गया हूँ । आप ही सत्त्व-रज तथा तम — इन तीनों गुणों के द्वारा इस विश्व की रचना करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और अन्त में उसका लय भी कर देते हैं ॥ २५ ॥ आपके सो जाने पर यह समस्त संसार भी सो जाता है और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त हो जाता है । हे विभो ! मेरा यह महान् अहोभाग्य है कि बिना तपस्या किये, बिना दानों को दिये और बिना व्रत, उपवास किये आप मुझ पर पुत्र का स्नेह प्रकट करके प्रसन्न हैं, अन्यथा आप प्रसन्न नहीं होते। हे प्रभो ! करोड़ों कल्पों तक तपस्या के परिणामस्वरूप ही आप प्रसन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कहने के अनन्तर उन्हें प्रणामकर और उनकी प्रदक्षिणा करके वह सिन्दूर अपने मन को अनुकूल लगने वाले स्थान की ओर चल पड़ा। मार्ग में वह यह तर्क-वितर्क करने लगा कि न तो मैंने कोई तपस्या की है, न ध्यान किया है, न किसी मन्त्र का जप किया है और न ही शास्त्रों का स्वाध्याय किया है, तो फिर क्यों उन ब्रह्माजी ने मुझे इतने वर प्रदान किये हैं, क्या उनके दिये वरदान सत्य हैं अथवा मिथ्या हैं ? वहाँ पिता ब्रह्मा के पास जाकर ही इन वरदानों की परीक्षा करूँगा। ऐसा कहकर वह सिन्दूर पितामह ब्रह्माजी के पास गया। उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर भयंकर गर्जना की ॥ २८-३० ॥ उसने ब्रह्माजीका आलिंगन करना चाहा, तब पितामह ब्रह्माजी उससे बोले, मैंने तुम्हें पुत्रस्नेह के कारण ही वर प्रदान किये हैं, जो अन्य के लिये दुर्लभ हैं, किंतु दुर्भावनावश तुम मेरा ही अपकार करने के लिये यहाँ आये हो, निश्चित ही सर्प को दिया गया दूध विष ही हो जाता है। तुम दुष्ट भावना से ग्रस्त हुए हो, अतः जाओ, तुम दैत्य हो जाओगे। परमात्मा गजानन शीघ्र ही अवतार लेकर तुम्हारा वध कर डालेंगे ॥ ३१–३३ ॥ अपने अंगों में उस सुगन्धित सिन्दूर का लेप भी करेंगे। तुम्हारे शरीर में सुगन्ध है, यह जानकर देव गजानन इसी से उन गजानन की देह भी अरुणिम वर्ण की हो जायगी, वे गजानन ‘सिन्दूरप्रिय’ हो जायँगे और वे देव गजानन ‘सिन्दूरवधकर्ता’ के नाम से प्रसिद्ध हो जायँगे। ऐसा कहकर भयभीत हो कमलयोनि वे ब्रह्माजी वहाँ से शीघ्र ही चल पड़े ॥ ३४-३५ ॥ वे ब्रह्मा मन की गति तथा वायु के वेग के समान वहाँ से पलायित हुए थे, अतः तीव्रतावश श्वास लेने तथा छोड़ने के कारण वे हाँफने लगे। शाप सुनकर क्रुद्ध हुआ वह दैत्य सिन्दूर भी उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा ॥ ३६ ॥ दौड़ने के कारण पसीने से भीगे शरीर वाला वह दुष्ट दैत्य सिन्दूर जहाँ-जहाँ वे ब्रह्माजी जाते थे, उनको देखते हुए वह उनके पीछे-पीछे जाने लगा। अगला चरण रखते ही मैं इन्हें पकड़ लूँगा यह कहते हुए वह दैत्य पीछे दौड़ने लगा। काँपते हुए ब्रह्माजी शीघ्रता से वैकुण्ठ में जा पहुँचे ॥ ३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सिन्दूर की उत्पत्ति का वर्णन’ नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२७ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe