श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-128
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय
ब्रह्माजी का नारायण को सिन्दूरदैत्य के विषय में बताना, उसी समय सिन्दूर का वहाँ आना, भगवान् विष्णु के कहने पर सिन्दूर का भगवान् शिव से युद्ध करने कैलास पर जाना, शिव को ध्यानस्थ देखकर सिन्दूर का पार्वती का हरण करना, मयूरेश का द्विजरूप से उपस्थित होकर सिन्दूर को समझाना, सिन्दूर का वापस लौट जाना, मयूरेश द्वारा माता पार्वती को अपने गजानन-अवतार का स्मरण दिलाना
अथः अष्टाविंशत्युत्तरशततमोऽध्यायः
गजाननदर्शनं

ब्रह्माजी बोले —  ब्रह्माजी ने वैकुण्ठलोक में जाकर देखा कि भगवान् नारायण निर्विकार भाव से रत्नों तथा सुवर्ण से सुशोभित कमल के आसन पर विराजमान हैं ॥ १ ॥ भगवान् विष्णु ने भी अपने सामने म्लान मुखवाले ब्रह्माजी और उनके पीछे आकाश से स्पर्धा करने वाले मस्तक से युक्त महादैत्य सिन्दूर को आता हुआ देखा ॥ २ ॥ यह देखकर दयालु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु सहसा शीघ्र ही उठ पड़े और उन्होंने ब्रह्माजी का हाथ पकड़कर एवं उनका आलिंगनकर उन्हें अपने आसन पर बैठाया ॥ ३ ॥ उनकी सेवा-पूजा करके भगवान् विष्णु ने उनसे पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य आपके समक्ष आ उपस्थित हुआ है, आपका मुख क्यों मुरझाया हुआ है, आप क्यों लम्बी-लम्बी साँस ले रहे हैं और प्रभाहीन क्यों दिखायी दे रहे हैं? हे पितामह! आपकी ऐसी स्थिति देखकर मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ४१/२

भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर कमलयोनि ब्रह्माजी बोले ॥ ५ ॥

ब्रह्माजी बोले —  मैं अपने भवन में प्रगाढ़ निद्रा में सोया हुआ था, उसी समय भगवान् शिव ने मुझे जगाया, तब जँभाई लेने पर मेरे मुख से एक विशाल पुरुष प्रकट हुआ। उसका मस्तक इतना ऊँचा था कि उस ऊँचे मस्तक के टकराने से आकाश से ग्रह-नक्षत्र नीचे भूमि पर गिरने लगे। उसके शरीर से निकलने वाली सुगन्धित वायु से सभी देवता विस्मित हो उठे ॥ ६-७ ॥ वह इतना सुन्दर था कि उसके लावण्य को देखने मात्र से कामदेव लज्जित हो गये। उसके चिल्लाने के शब्द से तीनों लोक कम्पित हो उठे। हे देव ! वह पुरुष मुझे नमस्कार करके विनीत भाव से मेरे सामने खड़ा हो गया । हे माधव! तब मैंने उसे अपना पुत्र समझकर पुत्रस्नेह के कारण अनेक वर प्रदान किये ॥ ८-९ ॥

मैंने वर देते हुए उससे कहा कि तुम जिस-जिसका आलिंगन करोगे, वह निश्चित ही मृत्यु को प्राप्त हो जायगा, साक्षात् काल भी युद्ध में तुम्हारे सामने खड़ा होने में समर्थ नहीं हो सकेगा ॥ १० ॥ हे देव! तदनन्तर मैंने उसे रहने के लिये उसकी इच्छा के अनुरूप ही स्थान दिया । तब वह मुझे नमस्कार करके कुछ ही दूर गया था कि कुछ सोच-विचारकर पुनः वापस आया। फिर वह मुझे आलिंगन करने के लिये मेरे समीप आया। उसके भय से मैं भाग उठा । मैं अपने हंस पर आरूढ़ हुआ और वेग से उड़ता हुआ आपके पास आ पहुँचा हूँ ॥ ११-१२ ॥ उसे अपने पीछे-पीछे आता देख-देखकर मेरा शरीर काँपने लगा और मैं हाँफने लगा । हे सर्वसुरेश्वर ! आपके बिना मैं और दूसरे किसकी शरण में जाऊँ ? तब उन शरण में आये हुए ब्रह्माजी से भगवान् महाविष्णु कहने लगे ॥ १३१/२

श्रीविष्णु बोले — हे देव! आपने पहले तो जानबूझकर उसे वर प्रदान किये और अब संकट आ गया है तो चिन्ता करने से क्या लाभ! जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा ॥ १४१/२

ब्रह्माजी बोले —  वह तो तीनों लोकों को पीड़ित करने के लिये उद्यत हो गया है ॥ १५ ॥

जब इस प्रकार से ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु चिन्ता से व्याकुल हो रहे थे कि उसी समय उन दोनों को अपने सामने वह महादैत्य खड़ा दिखायी दिया ॥ १६ ॥ वह अत्यन्त जोर से गरजा और अपनी तीव्र गर्जना से उसने तीनों लोकों को निनादित कर डाला। उस दुष्ट दैत्य ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्मा को भी कम्पित कर डाला। तब ब्रह्माजी तीनों लोकों की रक्षा करने वाले भगवान् विष्णु से ‘रक्षा करो’, ‘रक्षा करो’ इस प्रकार से कहने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णु ने अत्यन्त मधुर वाणी में उससे कहा ॥ १७-१८ ॥

श्रीहरि बोले —  ब्रह्माजी के द्वारा वर प्राप्तकर उन्मत्त हुए तुम्हारे साथ मैं युद्ध करने का साहस नहीं करता । मैं तो सत्त्वगुण का आश्रय लेकर जीवों के पालन में ही सदा लगा रहता हूँ। ये ब्रह्माजी ब्राह्मण हैं, अतः इनके साथ भी तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, तुम्हारे साथ युद्ध करने में भगवान् शिव ही समर्थ हैं, उन्होंने कामदेव को भी भस्म कर डाला है। तुम उन्हीं शिव के साथ युद्ध करो, इससे तुम्हारी महान् कीर्ति तीनों लोकों में फैल जायगी ॥ १९-२० ॥

ब्रह्माजी बोले —  भगवान् विष्णु के इस प्रकार के बचनों को सुनकर दैत्य सिन्दूर प्रसन्न हो उठा। तदनन्तर वह सहसा तीनों लोकों को कँपाता हुआ, पर्वतों को गिराता हुआ और वृक्षों को चूर-चूर करता हुआ तत्क्षण ही उड़कर चल पड़ा ॥ २१-२२१/२

उसके भय से दिशाओं के सभी हाथी इधर-उधर दिशाओं- विदिशाओं में चले गये। इस प्रकार से जाता हुआ वह दैत्य सिन्दूर महान् पर्वत कैलास की तलहटी में जा पहुँचा। उस दुष्ट ने वहाँ पर्वत की चोटी पर ध्यान में निमग्न भगवान् शिव को देखा । नन्दी तथा भृंगी आदि गण उनके चारों ओर स्थित थे और माता पार्वती उन प्रभु की सेवा कर रही थीं ॥ २३-२४ ॥ भगवान् शिव ने व्याघ्रचर्म धारण किया हुआ था, उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र विभूषण के रूप में शोभित था। उन्होंने भस्म का अंगराग लगाया था, जिससे उनकी शोभा और भी अधिक हो रही थी, उन्होंने गजचर्म को उत्तरीय वस्त्र के रूप में धारण किया था ॥ २५ ॥

भगवान् शंकर को देखकर वह दैत्य सहसा उनकी निन्दा करने लगा। उसने कहा — इस तपस्वी के साथ मैं क्या युद्ध करूँ। मैं इसकी सुन्दर भार्या को लेकर यथारुचि यथास्थान को चला जाता हूँ। ऐसा मन में निश्चयकर वह गौरी पार्वती के समीप में आया ॥ २६-२७ ॥ उस समय गिरिजा उसी प्रकार कम्पित हो उठीं, जैसे कल्पान्त प्रलय में संसार काँप उठता है । उन्होंने अपने नेत्रों को बन्द कर लिया। भय से विह्वल होकर वे क्षणभर में ही मूर्च्छित हो गयीं ॥ २८ ॥ कुत्सित विचार वाले दैत्य सिन्दूर ने. पार्वती केशपाश को पकड़ा और वह उड़कर वेग से चल पड़ा। तब पार्वती अत्यन्त शोक करने लगीं। वह दैत्य उन्हें उसी प्रकार ले जा रहा था, जैसे कि दशानन रावण के द्वारा जगज्जननी सीता का हरण हुआ था ॥ २९१/२

गिरिजा बोलीं — हे देव! आप तो सम्पूर्ण अर्थों के ज्ञाता हैं, फिर मेरे प्रति आप क्यों ऐसी उदासीनता दिखा रहे हैं? आपके अंक में बैठी आपकी अर्धांगिनी का हरण हो चुका है, फिर भी आप ध्यान में कैसे मग्न हैं? मैंने आपकी अल्प भी सेवा नहीं की है, इसी कारण आप ऐसी निष्ठुरता दिखा रहे हैं ॥ ३०-३१ ॥ इस समय कौन ऐसा मित्र है, जो मुझे इस दैत्य के चंगुल से छुड़ायेगा, कौन मेरा प्राणरक्षक होगा और कौन ऐसा बलशाली होगा, जो पुनः मुझे शंकर का दर्शन करायेगा ?॥ ३२ ॥

ब्रह्माजी बोले —  तदनन्तर उन देवी पार्वती को शोक से व्यथित देखकर गण उनसे कहने लगे। इस समय तीनों लोकों का विनाश करने वाले इस सिन्दूर के साथ युद्ध करने की हमारी शक्ति नहीं है ॥ ३३ ॥ भगवान् शिव ध्यान में निमग्न हैं, दैववश इस दैत्य को अनुकूल अवसर प्राप्त हो गया है। फलतः यह दैत्य सृष्टि, स्थिति तथा अन्त करने वाली हमारी माता पार्वती को हर ले गया है। ये देवी सभी देवताओं को मोहित करने वाली हैं, सभी के सब प्रकार के दुःखों का हरण करने वाली हैं, सौन्दर्य की लहरी हैं और सब प्रकार से शुभ करने वाली तथा सभी स्त्रियों में श्रेष्ठ हैं, इन्हें यह दैत्य हर ले गया है ॥ ३४-३५ ॥ श्रेष्ठ रत्नरूपा उन देवी पार्वती को वह दैत्य कैसे ले गया और कैसे वे पुनः वापस आयेंगी ? इस समय जबकि अपने नेत्र की अग्नि से सभी का विनाश करने वाले भगवान् शंकर ध्यान में स्थित हैं ॥ ३६ ॥

गणों के द्वारा इस प्रकार से शोक करने पर, हाहाकार करके रोने पर भगवान् महेश्वर क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने शीघ्र ध्यान भंग किया ॥ ३७ ॥ वे अपनी क्रोधाग्नि से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा दसों दिशाओं को जलाने लगे। तब उन्होंने उन गणों से पूछा कि कौन-सा संकट आ उपस्थित हुआ है ? ॥ ३८ ॥ जिसने तुम्हें कष्ट पहुँचाया है, उसे मैं भस्म कर डालूँगा। भगवान् शंकर के इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उस समय वे गण बोले —  ॥ ३९ ॥

हे देव! आप जब ध्यान में स्थित थे, उसी समय एक महान् दैत्य यहाँ आ उपस्थित हुआ, वह मन्दराचल-पर्वत के समान आकृति वाला था और साक्षात् काल के समान ही उसका स्वरूप था ॥ ४० ॥ उसकी श्वासरूपी वायु के प्रवाह से अचल होने पर भी पर्वत चलित हो गये । हे शंकर ! उसको देखने मात्र से ही देवता सम्मोहित हो गये । तब उस महाबली ने गिरिजा पार्वती के बाल पकड़कर उन्हें उठा लिया और वह शीघ्र ही आकाशमार्ग से हमारी माता को हर ले गया ॥ ४१-४२ ॥ उसके द्वारा ले जायी जाती हुई माता पार्वती ‘दौड़ो-जल्दी दौड़ो’ इस प्रकार से कह रही थीं, फिर वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं और हम सभी भी मूर्च्छित हो गये । वैसी स्थिति वाली शिवा को वह दुष्ट मनोवृत्ति वाला दैत्य लेकर चला गया ॥ ४३१/२

उन गणों के वचनों को सुनकर भगवान् शिव अत्यन्त क्रोध से प्रज्वलित हो उठे ॥ ४४ ॥ वे लोकों को भस्म करते हुए-से अपने वाहन वृष पर आरूढ़ हो गये और उन्होंने अपनी दसों भुजाओं में त्रिशूल आदि आयुधों को धारण कर लिया ॥ ४५ ॥ वे दिशाओं तथा विदिशाओं को निनादित करते हुए आकाशमार्ग से होते हुए तत्क्षण ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ वह सिन्दूर नामक दैत्य स्थित था ॥ ४६ ॥ भगवान् शिव ने उसकी पीठ पर प्रहार किया, तब वह दैत्य उनके सामने खड़ा हो गया। भगवान् शिव ने उससे कहा — अरे महादुष्ट! तुम मेरी भार्याको छोड़ दो। प्रसन्न होकर तुम कहाँ जा रहे हो ? ॥ ४७ ॥

शिव द्वारा इस प्रकार से कहा गया वह दैत्य क्रोध के वशीभूत हो गया और तीनों लोकों को जलाता हुआ-सा और बाहुओं से प्रहार करता हुआ-सा वह शिव के समीप आ पहुँचा ॥ ४८ ॥

अभिमान के मद से मोहित वह महादैत्य बोला — समस्त लोकों का स्वामी मैं तुम जैसे मच्छर के वाक्यों से भयभीत होने वाला नहीं हूँ। जिसकी श्वासवायु के निकलने से सुमेरुपर्वत भी तत्क्षण काँप उठता है, इस प्रकार की शक्ति-सामर्थ्यवाले मेरे सामने तुम्हारी क्या गणना ! तुम मुझे अपना मुख मत दिखलाओ ॥ ४९-५० ॥ यदि तुममें मेरे साथ युद्ध करने की सामर्थ्य है, तभी युद्ध करो, यदि ऐसा नहीं तो तुम किसी दूसरी स्त्री के साथ विवाह कर लो, ऐसा करने से तुम सुख प्राप्त करोगे । अरे तुच्छ! मच्छर के समान तुम मेरे साथ क्या युद्ध करोगे ? ॥ ५११/२

ऐसा कहकर वह दैत्य सिन्दूर बाहुयुद्ध करने के लिये भगवान् शंकर के समीप आया ॥ ५२ ॥ उस समय देवी पार्वती ने अपने मन में मयूरेश का स्मरण किया। तब उन दोनों भगवान् शंकर तथा दैत्य सिन्दूर के मध्य तत्क्षण ही देवेश्वर मयूरेश प्रकट हो गये । वे ब्राह्मण का रूप बनाये हुए थे, उनकी प्रभा करोड़ों सूर्यों के समान थी, उनके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे और वे नाना प्रकार के आभूषणों से भलीभाँति अलंकृत थे ॥ ५३-५४ ॥ उन मयूरेश ने अपना अस्त्र परशु उन दोनों के बीच में करके दैत्यराज सिन्दूर को रोका और फिर वे द्विजश्रेष्ठ अत्यन्त मधुरवाणी में उस सिन्दूर से कहने लगे ॥ ५५ ॥

तुम तीनों लोकों की माता इन पार्वती को शीघ्र ही मेरे समीप में रख दो और फिर शंकर के साथ तबतक युद्ध प्राप्त करो, जबतक कि किसी एक की जय-पराजय नहीं हो जाती, इस युद्ध में जो जीतेगा, वही इन पार्वती को प्राप्त करेगा। मेरा वचन झूठा नहीं होगा ॥ ५६१/२

ब्रह्माजी बोले —  द्विजरूपधारी मयूरेश की बात सुनकर सिन्दूर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गया और युद्ध की विशेष लालसा रखने वाले उस दैत्य सिन्दूर ने पार्वती को उनके पास रख दिया। उन द्विजरूपधारी मयूरेश तथा पार्वती के देखते-देखते वे दोनों — शिव और सिन्दूर युद्ध करने लगे ॥ ५७-५८ ॥ सिन्दूर और शिव-दोनों ही युद्ध की विविध कलाओं में पारंगत थे, उस समय क्रोध से उन दोनों के नेत्र रक्तवर्ण के हो गये थे । उन दोनों का तेज और पराक्रम बराबर का था। उस दैत्य सिन्दूर ने ज्योंही अपने बाहुपाश में शंकर को आबद्ध करना चाहा, उसी समय मयूरेश के परशु नामक अस्त्र ने अदृश्य होकर उस दैत्य की छाती में बलपूर्वक प्रहार किया ॥ ५९-६० ॥ उस प्रहार से दैत्य सिन्दूर की शक्ति जाती रही, तदुपरान्त भगवान् शिव ने त्रिशूल से उसपर आघात किया। तब शक्तिहीन हुए उस सिन्दूर से द्विजश्रेष्ठ मयूरेश ने उसके लिये हितकर बात करते हुए कहा — ॥ ६१ ॥

तीनों लोकों के स्वामी भगवान् शिव के साथ तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, अतः पार्वती की प्राप्ति की आशा छोड़कर तुम शीघ्र ही अपने घर को चले जाओ। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो ये शिव तुम्हें इस समय भस्म कर डालेंगे ॥ ६२१/२

द्विज मयूरेश के द्वारा इस प्रकार कहा गया वह दैत्य सिन्दूर पार्वती की अभिलाषा छोड़कर पृथ्वीलोक को चल पड़ा ॥ ६३ ॥ तदनन्तर भगवान् शिव को विजय की प्राप्ति होने पर वे पार्वती उन द्विजरूपधारी मयूरेश से बोलीं — हे मुनिश्रेष्ठ ! आप कौन हैं, जिनके द्वारा मैं उस दुष्ट से मुक्त करायी गयी हूँ? आप मुझे अपना यथार्थ स्वरूप दिखायें, यह मुनि का वेश आपका स्वाभाविक वेश नहीं है। आप मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, आपने मुझे जीवन प्रदान किया है, अतः आप मेरे सखारूप हैं । हे द्विजश्रेष्ठ ! प्राणोंका दान करने पर भी आपके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता ॥ ६४-६५१/२

पार्वती के इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे मुनीश्वर मयूरेश उनसे बोले — हे माता ! मैंने यहाँ कुछ भी नहीं किया है, भगवान् महेश्वर ने ही दैत्य पर विजय प्राप्त की है और आपको दैत्य के बन्धन से भी भगवान् शिव ने ही छुड़ाया है ॥ ६६-६७ ॥

ऐसा कह करके वे विनायक द्विजरूप को छोड़कर अपने पूर्वरूप में हो गये । उनका शरीर दस भुजाओं से सुशोभित होकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उनके कान कुण्डलों से मण्डित थे। उनके मस्तक पर कस्तूरी का तिलक लगा हुआ था। वे रत्नों तथा मोतियों की मालाओं से विभूषित थे। नाना प्रकार के अलंकारों से वे मनोहर लग रहे थे। उन्होंने कण्ठ में शेषनाग को धारण कर रखा था, जिसकी मणि की प्रभा से वे सुशोभित हो रहे थे ॥ ६८-६९ ॥ तब इस प्रकार के स्वरूपवाले परमात्मा को देखकर पार्वतीजी अत्यन्त प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम किया तो उन मयूरेश ने उन्हें उठाकर उनसे कहा — ॥ ७० ॥

विनायक बोले —  त्रेतायुग में मैंने आपसे कहा था कि मैं आपको पुनः दर्शन दूँगा और द्वापरयुग में आपके घर में गजानन नाम से अवतार धारण करूँगा तथा अपने ओज से दैत्य सिन्दूर का वध करूँगा ॥ ७११/२

ब्रह्माजी बोले —  मुनि का रूप धारण किये हुए वे देव मयूरेश इस प्रकार देवी पार्वती से कहकर अन्तर्धान हो गये। तब वे देवी पार्वती सोच में पड़ गयीं और अत्यन्त मूर्च्छित हो गयीं। तब भगवान् विश्वनाथ उनसे बोले — हे प्रिये ! अपने मन को स्वस्थ करो ॥ ७२-७३ ॥ तुम अपने हृदय में उन अविकारी विनायक का दर्शन करो, उनका कहा हुआ मिथ्या नहीं होता है, उन्होंने
जैसा कहा है, वे वैसा ही करेंगे ॥ ७४ ॥

इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव देवी पार्वती के साथ वृष पर आरूढ़ हुए और अत्यन्त प्रसन्नता के साथ पर्वतराज कैलास पर चले आये ॥ ७५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘पार्वती की बन्धन से मुक्ति का वर्णन’ नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२८ ॥

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