November 24, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-129 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ उनतीसवाँ अध्याय सिन्दूर के अत्याचार से पीड़ित देवताओं तथा ऋषियों द्वारा विनायक की स्तुति, दुःखप्रशमनस्तोत्र और उसका माहात्म्य, विनायक द्वारा सिन्दूर के वध का आश्वासन दिया जाना, माता पार्वती के गर्भ में तेजःपुंज का प्रकट होना, उस तेज से सन्तप्त पार्वती का भगवान् शिव तथा गणों के साथ पर्यली नामक वन में जाना और वहाँ सखियों के साथ निवास करना अथः एकोनत्रिंशोत्तरशततमोऽध्यायः गौरीदोहदवर्णनं ब्रह्माजी बोले — सिन्दूर नामक वह दैत्य कैलास से मृत्युलोक में आया और बड़े ही गर्व से उसने गर्जना की। उस भीषण ध्वनि से सभी पर्वत कम्पित हो उठे और वृक्ष भूमि पर गिर पड़े ॥ १ ॥ पक्षी, सिंह और अन्य हिंसक जीव-जन्तु वन में भ्रमण करने लगे। तदनन्तर उस महादैत्य सिन्दूर ने सभी राजाओं और सभी वीरों को जीत लिया ॥ २ ॥ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसके द्वारा जीत लिये गये थे, भला उसके साथ सामान्य राजागण कैसे युद्ध करते ! कुछ राजाओं को काटकर उसने दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया और कुछ आकाश में चक्कर काटने लगे ॥ ३ ॥ कुछ राजा जो उसके सामने युद्ध कर रहे थे, वे वीरगति प्राप्त कर स्वर्ग चले गये। कुछ राजा उसकी शरण में आ गये और उन्होंने उसकी सेवा करना स्वीकार कर लिया ॥ ४ ॥ कुछ राजा अपने अधिकार से वंचित हो गये तो उन्होंने उसका सेवक होना स्वीकार नहीं किया और वे अभिमानपूर्वक वन चले गये। इस प्रकार सभी राजाओं को जीत लेने के पश्चात् उस दैत्य सिन्दूर ने मुनियों पर आक्रमण करने का विचार किया। उस दुष्ट बुद्धि वाले दैत्य सिन्दूर ने एकाएक मुनियों को बन्धन में डाल दिया। उस समय कुछ मुनिजन अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये ॥ ५-६ ॥ कुछ मुनिगण मेरु की कन्दरा में चिन्तारहित होकर रहने लगे। कुछ मुनियों को उसने मार डाला और किन्हीं-किन्हीं को अत्यन्त प्रताड़ित किया ॥ ७ ॥ उसने सभी मन्दिरों को ध्वस्त कर डाला और देव- प्रतिमाओं को खण्डित कर दिया। इस प्रकार प्रलय समान स्थिति हो जाने पर सभी यज्ञ-यागादि वैदिक क्रियाएँ लुप्त हो गयीं ॥ ८ ॥ स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार अर्थात् देवपूजन, हवन, यज्ञयागादि, श्राद्ध-तर्पण आदि के लुप्त हो जाने से सर्वत्र हाहाकार मच गया । तदनन्तर पर्वतों की गुफाओं में जो देवता छिपे हुए थे; उन्होंने, मुनियों ने, यक्षों ने तथा किन्नरों ने इस संकट से उबरने के लिये देवगुरु बृहस्पतिजी का आमन्त्रण किया। देवगुरु बृहस्पति ने वहाँ उपस्थित देवताओं से कहा कि इस समय जो-जो भी देवता हैं, उन सभी से उस दैत्य को किंचित् भी भय नहीं है, अतः आप लोग देव विनायक की प्रार्थना करें। हे विप्रो ! जब वे विनायक भगवान् शिव के घर में ‘गजानन’ इस नाम से अवतार लेंगे, तो वे निश्चित ही बलपूर्वक उस सिन्दूर का वध कर डालेंगे — इसमें कोई संशय नहीं है। हे देवो! तब सम्पूर्ण जगत् सभी प्रकारकी बाधाओं से रहित हो जायगा ॥ ९-१२१/२ ॥ आचार्य बृहस्पति द्वारा इस प्रकार से कहे गये वे देवता, मुनिगण आदि सभी परम श्रद्धा- भक्तिपूर्वक उन विनायक की स्तुति करने लगे ॥ १३१/२ ॥ ॥ दुःखप्रशमन-स्तोत्र ॥ ॥ देवा ऊचुः ॥ जगतः कारणं योऽसौ रविनक्षत्रसम्भवः ॥ १४ ॥ सिद्धसाध्यगणाः सर्वे यत एव च सिन्धवः । गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मनुष्योरगराक्षसाः ॥ १५ ॥ यतश्चराचरं विश्वं तं नमामि विनायकम् । मनवो लोकपालश्च सरितो वृक्षसञ्चयाः ॥ १६ ॥ एकविंशतिस्वर्गाश्च पञ्चभूतानि यानि च । पातालानि च सप्तैव तं नमाम् यतो भवत् ॥ १७ ॥ यतो ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च महर्षयः । यतो गुणास्त्रयो जातास्तं नमामि विनायकम् ॥ १८ ॥ यतो नानावताराश्च यश्च सर्वहृदि स्थितः । यं स्तोतुं नैव शक्नोति शेषस्तं गणपं भजेत् ॥ १९ ॥ देव बोले — जो इस जगत् के कारण हैं, सूर्य तथा नक्षत्रों को उत्पन्न करने वाले हैं, जिनसे सिद्ध, साध्यगण, समुद्र, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मनुष्य, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण चराचर जगत् का प्रादुर्भाव हुआ है और जिनसे मनुगण, लोकपाल, सरिताएँ, वृक्षराशि, इक्कीस प्रकार के स्वर्ग (आदि दिव्य) लोक, पंचमहाभूत तथा सात पाताल उत्पन्न हुए हैं, हम उन्हें प्रणाम करते हैं। जिनसे ब्रह्मा आदि देवता, मुनिगण तथा महर्षिजन उत्पन्न हुए हैं, उन देव विनायक को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४-१७१/२ ॥ जिनसे सत्त्व, रज तथा तम—इन तीन गुणों की उत्पत्ति हुई है, उन भगवान् विनायक को मैं नमस्कार करता हूँ । जिनसे नाना प्रकार के अवतार हुए हैं और जो सभी प्राणियों के हृदयदेश में विराजमान हैं, जिनकी स्तुति करने में सहस्र मुखों वाले शेषनाग भी समर्थ नहीं हो पाते, उन गणाधिप विनायक का भजन करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ विश्व का संहार करने वाले महादैत्य सिन्दूर को ब्रह्माजी ने उत्पन्न किया है। आप जैसे स्वामी के विद्यमान होने पर भी उस महादैत्य ने जगत् को अत्यन्त प्रताड़ित कर रखा है, अब हम अन्य किस देव की शरण में जायँ, हम सभी की रक्षा करने वाला दूसरा और कौन है ? [हे देव !] आप भगवान् शिव के यहाँ अवतीर्ण होकर इस दुष्टबुद्धि सिन्दूर का वध करने की कृपा करें ॥ २०-२११/२ ॥ इस प्रकार से देव विनायक की स्तुति करने के पश्चात् वे (देवता आदि) विविध अनुष्ठानों में तत्पर होकर तपस्या करने लगे। कुछ निराहार रहकर, कुछ नियत आहार लेकर प्राणायाम में संलग्न हो गये। कुछ एक पाँव में खड़े होकर तथा कुछ जल में स्थित होकर तपस्या करने लगे। कुछ लोग धुआँ पीकर तो कुछ लोग बिना पलक झपकाये ही तपोनिरत थे ॥ २२-२३ ॥ कुछ अपने हाथों को ऊपर करके साधना करने लगे। कुछ योगपरायण हो गये। कुछ ने अपने शरीर के अंगों को काट दिया, तो कुछ अपने मस्तकों को ही काट दे रहे थे। इस प्रकार से उन सबकी अत्यन्त कठोर तपस्या और साधना देखकर गणराज विनायक प्रकट हो गये। उनकी आभा करोड़ों सूर्यो के समान दीप्तिसम्पन्न और प्रलयाग्नि के समान थी ॥ २४-२५ ॥ विनायक के उस तेजोमय स्वरूप का दर्शनकर वे सभी देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे। वे कहने लगे — प्रभु के स्वरूप का जैसा हमने ध्यान किया था, वे ही अखिल विश्व के स्वामी ये [उसी रूपमें] हमारे सामने प्रकट हो गये हैं, ये हमारे दुःख को अवश्य ही दूर करेंगे, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है ॥ २६१/२ ॥ तदनन्तर चिन्ता में पड़े हुए उन देवों से भगवान् विनायक बोले — हे देवो ! आप लोग बिलकुल भी चिन्ता न करें, मैं उस दैत्य सिन्दूर को मार डालूँगा । आपने जो मेरी स्तुति की है, वह स्तुति दुःख का शमन करने के कारण दुःखप्रशमन-स्तोत्र के नाम से प्रसिद्ध हो जायगी ॥ २७-२८ ॥ इस स्तोत्र के पाठ करने से मेरे अनुग्रह के कारण आप लोगों का कष्ट दूर हो जायगा। जो एक समय अथवा प्रातः-सायं-दो समय अथवा प्रात:- मध्याह्न एवं सन्ध्या- तीनों कालों में इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे कभी भी तीनों प्रकार का अर्थात् आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक — दुःख अणुमात्र भी नहीं होगा ॥ २९१/२ ॥ हे देवो ! अब मैं भगवान् शिव के घर में अवतार लेकर गजानन नाम से प्रसिद्ध होऊँगा, और सभी प्रकार के अर्थों की सिद्धि देने वाला बनूँगा । मैं सिन्दूर आदि बड़े-बड़े दैत्यों का वध करूँगा और विविध प्रकार की लीलाओं को दिखाते हुए माता पार्वती की सेवा करूँगा ॥ ३०-३११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — देवताओं से इस प्रकार कहकर देव विनायक अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होने के अनन्तर भगवान् शिव के अनुग्रह से हिमवान् की पुत्री देवी पार्वती ने गर्भ धारण किया। वह गर्भ दिन- प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा कला-प्रतिकला बढ़ता रहता है ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर उस गर्भ के तेज से सन्तप्त हुई पार्वती को गर्भकालीन इच्छा जाग्रत् हुई। तब वे भगवान् शंकर से बोलीं — हे शंकर! मैं अपने गर्भ के तेज से अत्यन्त सन्तप्त हो गयी हूँ, अतः जहाँ पर्याप्त ठण्डक हो, ऐसे स्थान पर मुझे ले चलिये। तदनन्तर भगवान् शंकर वृष पर आरूढ़ हुए और उन्हें भी वृषभ की पीठ पर बैठाया ॥ ३४-३५ ॥ देवी पार्वती महान् तेज के पुंज से समन्वित होने के कारण समस्त दिशाओं तथा विदिशाओं को द्योतित कर रही थीं। उनके जाते समय सभी प्रकार के वाद्य बज रहे थे। भगवान् शिव पार्वती के साथ विविध गणों से समन्वित होकर भूलोक को गये और उन्होंने बहुत-से वनों में भ्रमण किया। इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने पर्यली नामक एक विशाल वन देखा ॥ ३६-३७ ॥ पार्वती के मन को सुन्दर लगने वाले उस पर्यली नामक वन में उन्होंने विश्राम किया। वह वन विविध प्रकार के पुष्पों से समन्वित तथा नाना प्रकार के फलों से युक्त वृक्षों-वाला था। वह वन अनेक सरोवरों तथा वापियों से युक्त था। वहाँ वृक्षों की घनी छाया व्याप्त थी । वह वन अत्यन्त रमणीय था। वहाँ पर उष्णता (सूर्य की प्रतप्त किरणों ) – का प्रवेश नहीं हो पाता था । वह वन कैलासशिखर के समान शीतलता प्रदान करने वाला था ॥ ३८-३९ ॥ वह पर्यली नामक वन नन्दनवन तथा चैत्ररथ वन से भी अधिक शोभा से सम्पन्न था। उस वन को देखकर गिरिजा कहने लगीं — हे शिव! मुझे मेरी इच्छा के अनुकूल वन प्राप्त हो गया है। हे विभो ! हम यहाँ पर चिरकाल तक क्रीड़ा करेंगे। गणों का भी उस समय उस वन से प्रेम हो गया था ॥ ४०-४१ ॥ तदनन्तर गणों ने देवी पार्वती की प्रसन्नता के लिये वहाँ एक मण्डप का निर्माण कर दिया। वह मण्डप विविध वेदियों तथा गृहों से युक्त था और गृहस्थ-सम्बन्धी विविध सामग्रियों से सम्पन्न था ॥ ४२ ॥ भगवान् शिव ने देवी पार्वती से कहा कि तुम गणों के साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें जो-जो भी अभीष्ट होगा, ये वे सभी वस्तुएँ मेरे अनुग्रह से तुम्हें प्रदान करेंगे ॥ ४३ ॥ तब भगवान् शिव वहाँ से शीघ्र ही चल पड़े और हिमालय पर आकर ध्यान में निमग्न हो गये। वे पार्वती अपनी सखियों के साथ उस पर्यली नामक वन में यथेच्छ विहार करने लगीं। उन पार्वती को चारों ओर से घेरकर करोड़ों गण उनकी रक्षा किया करते थे । वे सभी गण माता पार्वती की आज्ञा के अधीन थे और कन्द-मूल तथा फल का भक्षण करने वाले थे ॥ ४४-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘गौरी के दोहद का वर्णन’ नामक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe