November 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-132 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सिन्दूर का गजानन को ले जाकर नर्मदा में फेंकना, गजानन के रक्त से रंजित शिलाओं की ‘नार्मद गणेश’ संज्ञा, उमामहेश्वर का कैलास-गमन अथः द्वात्रिंशोत्तरशततमोऽध्यायः कैलासाभिगमनं ब्रह्माजी बोले — एक बार की बात है, दैत्यराज सिन्दूर सभा में बैठा और अपने उन्मद अहंकार में भरकर कहने लगा कि मेरा पराक्रम तो व्यर्थ ही है; क्योंकि जब इन्द्रादि देवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र भी मुझसे युद्ध करने में अक्षम हैं, तब पृथ्वी पर रहने वाले राजाओं की तो बात ही क्या है!॥ १-२ ॥ जिस प्रकार पति के बिना कुलवती महिला का यौवन व्यर्थ होता है, वैसे ही योद्धाओं के अभाव में आज मेरा पराक्रम व्यर्थ हो गया है। तब (उसके ऐसा कहते ही) आश्चर्यमयी आकाशवाणी उसे सुनायी पड़ी ॥ ३१/२ ॥ आकाशवाणी बोली — अरे मूढ ! किसलिये तू चपलता दिखा रहा है, तुझसे लड़ने वाला तो जन्म ले चुका है। पार्वती के उदर से समुद्भूत वह गर्भ (शिशु) इस समय वरेण्य के भवन में स्थित है और अनन्त लीलाएँ करने वाला वह शिशु वहाँ पर शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की भाँति बढ़ रहा है ॥ ४-५ ॥ ब्रह्माजी बोले — एकाएक इस प्रकार की आकाशवाणी को सुनकर सिन्दूर मूर्च्छित हो गया और [ चेतना प्राप्त करके ] वह शोक से व्याकुल हो उठा और सोचने लगा कि यह क्या है तथा किसने कहा है ? ॥ ६ ॥ यदि [ऐसी बात कहने वाला] आँखों के सामने आ जाय तो मैं उसे पूरा-का-पूरा चबा डालूँ। मैं तो स्वयं ही सबका काल हूँ, पश्चिम दिशा में हुए सूर्योदय के समान मेरी कैसे मृत्यु हो सकती है? ॥ ७ ॥ ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशा- विदिशाओं को [अपनी गर्जना से] ध्वनित करता हुआ सहसा उड़ने लगा और भगवान् शंकर के निवास स्थान कैलास पर्वत की ओर चल पड़ा ॥ ८ ॥ उस समय वह अपने शरीर (के उड़ने से उत्पन्न हुई)-वायु से पर्वतों को चूर्ण करता और वृक्षों को उखाड़ता हुआ जा रहा था। उसके कारण [ भूतल के आधार देवता] कूर्म तथा शेषनाग चलायमान हो गये और पृथिवी काँपने लगी। [कैलास पहुँचकर जब] उसने वहाँ शिव को नहीं देखा तो पुनः पृथ्वीलोक में आ गया और शिव को खोजता हुआ वेगपूर्वक समस्त भूतल पर भटकने लगा। क्रोध में भरा हुआ [ वह भटकते-भटकते] ‘पर्यली’ नामक विशाल जंगल में आ पहुँचा और तब वहाँ उसने दूर से ही पार्वतीजी के साथ स्थित भगवान् शंकर को देखा ॥ ९–११ ॥ उसने वहाँ आवास मण्डप, सरोवर, उनमें खिले कमल और शिवगणों को देखा। इसके बाद वह सहसा पार्वतीजी के लिये बनाये गये सूतिकागृह की ओर चल पड़ा। जब वहाँ उसने बालक को नहीं देखा तो जलती हुई अग्नि के समान कुपित हो उठा। इसके बाद वह सोचने लगा कि आकाशवाणी असत्य नहीं हो सकती। [आकाशवाणी ने कहा है कि] इसका पुत्र मुझे मारेगा, किंतु हो सकता है कि अभी वह उत्पन्न ही न हुआ हो । अतः इस समय मैं इसी (पार्वती) को मार डालता हूँ, जिससे [शत्रु का] मूल ही नष्ट हो जायगा ॥ १२–१४ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार का मन में सोच-विचार करके उसने [पार्वती को ] मारने के लिये शस्त्र उठाया और जबतक कि वह उमा की हत्या कर पाता, तबतक उस दुष्ट को अपने समक्ष एक शिशु दिखायी पड़ा ॥ १५ ॥ चार भुजाओं से युक्त वह मनोहर शिशु मुकुट तथा बाजूबन्द से विभूषित था। उस बालक ने परशु, कमल तथा माला को धारण कर रखा था। उसके कटिदेश में शेषनाग [लिपटे थे] और कण्ठ में हार तथा चरणों में नूपुर [शोभायमान] थे ॥ १६१/२ ॥ यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर और पार्वतीजी को सोयी हुई जानकर वह तत्काल ही पार्वती के वध से विरत हो गया ॥ १७ ॥ उसने बालक को हाथ में उठा लिया और उसे महासागर में फेंकने की कामना करने लगा। इस प्रकार का निश्चित संकल्प करके वह आगे चल पड़ा। तभी वह बालक अपने आपको बढ़ाने लगा और मानो दूसरे हिमालय की भाँति [ भार वाला] हो गया। तब क्षणभर में ही उसके अतिशय भार से व्याकुल सिन्दूर काँप उठा ॥ १८-१९ ॥ उसकी साँसें बढ़ने लगीं तथा वह अपनी शक्ति से [तनिक भी ] आगे चल पाने में सक्षम नहीं रहा, तब व्याकुल होकर दैत्य ने उस बालक को छोड़ दिया ॥ २० ॥ जब तीव्र रव करता हुआ वह बालक भूतल पर गिरा तो पर्वत हिलने लगे और उस घोष के कारण पृथ्वी काँप उठी । नाना प्रकार से चीत्कार करते हुए पक्षीगण आकाश में घूमने लगे, सातों महासागर क्षुब्ध हो गये तथा ब्रह्माण्ड भी मानो विदीर्ण-सा होने लगा ॥ २१-२२ ॥ वह बालक मुनिजनों के समीप, नर्मदा के जल में जा गिरा, तब वहाँ एक श्रेष्ठ तीर्थ प्रकट हुआ, जिसे गणेशकुण्ड कहा जाता है ॥ २३ ॥ इस तीर्थ का स्मरण करते ही जीवनभर में किया गया पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है तथा इसका दर्शन करने से दस जन्मों का और स्नान करने से सौ जन्मों का पाप नष्ट होता है। अनुष्ठान परायण होकर अर्थात् क्षेत्रसंन्यास लेकर इस तीर्थ का जो लोग सेवन करते हैं, यह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है ॥ २४१/२ ॥ [उस तीर्थ में गिरे हुए] बालक गणपति के देह से जो रुधिर निकला, उसके कारण वहाँ की शिलाएँ रक्तवर्ण हो गयीं और वे ही पापनाशक शिलाएँ ‘नार्मद गणेश’ के नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे शिलाएँ दर्शन-पूजन आदि के द्वारा आराधित होने पर भक्तों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं। इन नार्मद गणपतिशिलाओं की समग्र महिमा का वर्णन हो पाना सम्भव नहीं है ॥ २५-२६१/२ ॥ तब अर्थात् उन गौरीनन्दन को फेंक देने के पश्चात् वह दैत्य हर्षित हो उठा कि मेरा शत्रु तो विनष्ट हो गया है। तभी उस कुण्ड से विशाल और भयानक एक पुरुष प्रकट हुआ, जो अपनी जटाओं से आच्छादित होने के कारण ऐसा जान पड़ता था कि मानो लताओं से आवृत कोई वटवृक्ष हो ॥ २७-२८ ॥ दाढ़ों के कारण उसका मुख अत्यन्त भयानक प्रतीत हो रहा था और नागिन के जैसी उसकी जिह्वा थी । उसके हाथ-पैर बड़े ही लम्बे थे तथा [वेगपूर्वक ] श्वास लेने के कारण उस पुरुष के नेत्र चलायमान थे ॥ २९ ॥ वैसे आकार-प्रकार वाले पुरुष को देखकर क्रोध से विह्वल नेत्रों वाला वह सिन्दूर दैत्य कहने लगा कि यह मेरी किस गिनती में है ! ॥ ३० ॥ क्रोधपूर्वक ऐसा कहकर हाथ में खड्ग ले वह दैत्य उस पुरुष को मारने चला और जबतक वह खड्ग प्रहार करता, तबतक वह पुरुष [ वहाँ से अदृश्य होकर ] आकाश में दीख पड़ा तथा उस दैत्य से बोला कि अरे दैत्य ! तूने तो मुझे व्यर्थ ही भूतल पर फेंका है। रे मूढ़ ! तुझे मारने वाला तो कहीं और ही वृद्धि को प्राप्त कर रहा है। सत्पुरुषों की रक्षा में तत्पर वह अवश्य ही तेरा वध करेगा। इस प्रकार से कहने के उपरान्त वह भयानक पुरुष अन्तर्धान हो गया ॥ ३१–३३ ॥ तब अत्यन्त क्रोध के कारण उस दैत्य ने सेवकों से कहा कि [अरे!] उसे पकड़ लो, पकड़ लो, जिसने ऐसे कठोर वाक्य कहे हैं ॥ ३४ ॥ [इसके उपरान्त] जब वह दैत्य उस पुरुष को कहीं भी न देख सका तो अपने स्थान पर लौट आया और मन में सोचने लगा कि जब उसे देखूँगा, तब जीत लूँगा । उस (बालक) – का यह जो इतना चरित्र था, उसे पार्वतीजी जान नहीं सकीं; क्योंकि उसकी मोहकारिणी माया के कारण वे अत्यधिक मोहित हो चुकी थीं ॥ ३५-३६ ॥ तदुपरान्त पार्वतीजी ने भगवान् शिव से विनयपूर्वक कहा कि हे जगदीश्वर! इस स्थान पर दैत्यकृत उपद्रव आरम्भ हो गये हैं, अतएव अब मैं कैलास जाना चाहती हूँ, यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे वहीं ले चलिये ॥ ३७१/२ ॥ उनकी ऐसी बात सुनकर शंकरजी को भी प्रसन्नता हुई और वे नन्दी पर तत्काल आरूढ़ होकर, सात करोड़ गणों से घिरे हुए, उसी क्षण पार्वतीसहित कैलास जा पहुँचे। अपने भवन में प्रविष्ट होकर पार्वतीजी को [उस समय] अति प्रसन्नता हुई ॥ ३८-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्डके अन्तर्गत ‘कैलासाभिगमन का वर्णन’ नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३२ ॥ Content is available only for registered users. 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