December 2, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-145 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजी का राजा वरेण्य को अपने विराट्रूप का दर्शन कराना अथः पञ्चचत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः गणेशगीता – “विश्वरूपदर्शनन्नाम” अष्टमोऽध्यायः वरेण्य बोले — हे भगवन्! नारदजी के मुख से मैंने आपकी अनेक विभूतियों का श्रवण किया है, उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन (विभूतियों में कुछ)- को जानता हूँ, समस्त विभूतियों को तो वे (गजानन) ही जानते हैं ॥ १ ॥ हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्व से जानते हैं, इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे दिखाइये ॥ २ ॥ श्रीगणेशजी बोले — अकेले मुझमें ही तुम यह चराचर संसार देखो और अनेक प्रकार के दिव्य आश्चर्य देखो, जो पूर्वकाल में किसी ने नहीं देखे हैं ॥ ३ ॥ मैं अपने प्रभाव से तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ; क्योंकि मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्यय को चर्मचक्षु नहीं देख सकते ॥ ४ ॥ व्यासजी बोले — तब वे राजा वरेण्य दिव्य दृष्टि को प्राप्तकर भगवान् गणेशजी के महान् अद्भुत परमरूप को देखने में समर्थ हुए ॥ ५ ॥ असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य सूँड़ एवं हाथ और सुगन्धि से लिप्त, दिव्य भूषण, वसन और माला से शोभित, असंख्य नेत्र, करोड़ों सूर्यो की किरणों के समान प्रकाशित आयुध धारण किये उन गजाननदेव के शरीर में राजा ने अलग-अलग तीनों लोक देखे ॥ ६-७ ॥ ईश्वर का यह परम रूप देखने के बाद प्रणाम करके राजा (वरेण्य) बोले — हे भगवन्! मैं आपकी इस देह में देवता-ऋषिगण और पितरों को देख रहा हूँ । हे विभो ! मैं सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात महर्षि और अनेक पदार्थों के समूह देख रहा हूँ ॥ ८-९ ॥ मैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, देवता और अनेक प्रकार के जन्तुओं को देख रहा हूँ ॥ १० ॥ मैं अनादि, अनन्त, लोकादि, अनन्त भुजा और सिरों से युक्त तथा जलती हुई अग्नि के समान प्रकाशमान अप्रमेय पुरातन आपको देख रहा हूँ ॥ ११ ॥ मैं किरीट-कुण्डल धारण किये, कठिनाई से देखने योग्य, आनन्ददायक तथा विशाल वक्षःस्थलयुक्त आप प्रभु का दर्शन कर रहा हूँ। देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सराओं और गान करते हुए गन्धर्वों से आपका स्वरूप सेवित है ॥ १२-१३ ॥ आठ वसु, बारह आदित्यों के गण, सिद्ध, साध्य- ये सब प्रसन्नतापूर्वक महाभक्ति से आपकी सेवा कर रहे हैं और विस्मय को प्राप्त होकर आपको देख रहे हैं ॥ १४ ॥ ये आपको ज्ञाता, अक्षर, वेद्य, धर्म के रक्षक, पाताल, दिशा, स्वर्ग और पृथ्वी में व्यापक और ईश्वर के रूप में जानते हैं। आपके रूप को देखकर सम्पूर्ण लोक तथा मैं भी डर गया हूँ, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढ़ों से भयंकर है तथा आप अनेक विद्याओं के पारगामी हैं ॥ १५-१६ ॥ प्रलयकी अग्नि के समान दीप्तिमान् आपका मुख है, आपका रूप जटिल एवं नभःस्पर्शी है । हे गणेशजी ! आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त – सा हो गया हूँ ॥ १७ ॥ देवता, मनुष्य, नागादि और खग तुम्हारे उदर में शयन करते हैं, वे अनेक योनियों को भोगकर अन्त में आपमें ही उसी प्रकार प्रवेश करते हैं, जैसे सागर से उत्पन्न हुए मेघ जलबिन्दु फिर उसी में लीन होते हैं ॥ १८ ॥ इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, सोम, सूर्य और सम्पूर्ण जगत् – यह सब आप ही हैं, हे स्वामिन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरे ऊपर अब कृपा करें ॥ १९-२० ॥ आप मेरे द्वारा पूर्व में देखा हुआ अपना सौम्य रूप मुझे दिखाइये, हे भूमन्! अपनी इच्छा से क्रीडा करने वाले आपकी लीला को कौन जान सकता है ? आपकी कृपा से मैंने इस प्रकार का ऐश्वर्यशाली रूप देखा; क्योंकि आपने प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये थे ॥ २१-२२ ॥ श्रीगणेशजी बोले — हे महाबाहु! योग न करने वाले लोग मेरे इस रूप का कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि तथा नारदादि मेरे अनुग्रह से इस रूप का दर्शन करते हैं। चारों वेदों के अर्थ के तत्त्व को जानने वाले, सम्पूर्ण शास्त्रों में कुशल, यज्ञ, दान और तप करने वाले भी मेरे रूप को [यथार्थतः] नहीं जानते ॥ २३-२४ ॥ मैं भक्तिभाव से जानने, दीखने, प्राप्त होने के योग्य हूँ, अब तुम भय और मोह को त्यागकर मेरे सौम्य रूप को देखो ॥ २५ ॥ हे राजन्! जो भक्त मेरे परायण एवं सर्वसंगत्यागी होकर सब कर्म मुझमें ही समर्पित करते हैं और क्रोध त्यागकर सभी प्राणियों में समान दृष्टि रखते हैं, वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘विश्वरूपदर्शन’ नामक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४५ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe