December 6, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-153 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ तिरपनवाँ अध्याय राजा सोमकान्त का विमान से उतरकर पुत्र तथा नागरिकों से मिलना और उन सभी के साथ गणपतिलोक को जाना अथः त्रिपञ्चाशदुत्तरशततमोऽध्यायः सोमकान्तस्य देवपदप्राप्तिवर्णनं सूतजी बोले — राजा के वे चारों अमात्य महाराज सोमकान्त के सामने उपस्थित हुए और [ वहाँ विद्यमान ] सभी लोगों को प्रणामकर कहने लगे — हे नृप ! आपका पुत्र आया हुआ है । समस्त वीरों और नागरिकों से वह वैसे ही घिरा है, जैसे इन्द्र देवताओं से घिरे रहते हैं। उसने हर्ष तथा विषाद दोनों ही भावों से विमान को देखा है ॥ १-२ ॥ इस प्रकार जबतक अमात्यों ने सोमकान्त से निवेदन किया, तबतक वह हेमकण्ठ भी बालक, स्त्री, वृद्ध तथा सेवकादि से घिरा हुआ त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचा। विमान की शोभा का अवलोकन कर वे सभी ( नगरवासी आदि) आनन्दविह्वल हो गये । वहाँ पर महाराज सोमकान्त अपनी सुन्दरी पत्नी और गणपति के दूतों के साथ बैठे थे । उस (विमान) – के मध्यभाग में अवस्थित सोमकान्त को देखकर उन्होंने (हेमकण्ठ आदि ने) पृथ्वी पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। तब यान से उतरकर सोमकान्त ने प्रीतिपूर्वक पुत्र का आलिंगन किया ॥ ३-५ ॥ वे दोनों (पिता-पुत्र) प्रसन्नता के आँसू बहाते हुए रोमांचित हो रहे थे और क्षणभर के लिये तो उन्हें शरीर का भान तक न रहा । वे आपस में कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे ॥ ६ ॥ वर्षभर बाद मिले पुत्र से पिता सोमकान्त स्नेहपूर्वक कहने लगे कि [वत्स!] मेरे वंश को विभूषित करने वाले तुझ सत्पुत्र का ही मैं नित्य चिन्तन करता था। लोगों के बहुत-से पुत्र हैं, किंतु उनमें मैं तुम्हारे जैसा एक भी पुत्र नहीं देख पाता। इसी बीच में स्नेहमयी रानी सुधर्मा दौड़ती हुई पुत्र के निकट आ पहुँचीं। रानी ने वात्सल्यपूर्वक पुत्र का आलिंगन किया। उस समय माता और पुत्र की आँखों से आँसू झर रहे थे । माता ने पुत्र से कहा — बालक! लम्बे समय के बाद तुमको देख सकी हूँ ॥ ७–९ ॥ मेरा मन तुम्हारे लिये उत्कण्ठित रहता था, इसलिये मुझे तनिक भी सुख का अनुभव नहीं होता था। इस समय तुम्हारा मुख देखकर मेरा मन आह्लादित हो गया है। [देखो!] तुम्हारे वियोग के कारण मैं कितना अधिक दुर्बल हो गयी हूँ ॥ १०९१/२ ॥ इसके उपरान्त नगरवासियों तथा नामधारक अर्थात् सेनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष आदि विभिन्न पदों पर अधिष्ठित राजकीय कर्मचारियों ने राजा का आलिंगन किया। उस समय उनमें कुछ लोग राजा की परिक्रमा कर रहे थे, कुछ लोग चरणस्पर्श करने लगे और कुछ उनका दर्शन करके ही नगर की ओर लौट गये ॥ ११-१२ ॥ इसके उपरान्त राजा ने उन सभी से कहा कि भृगु मुनि ने कृपा करके जो मुझे पापनाशक गणेशपुराण सुनाया है, उससे मैं पापहीन तथा दिव्य देह वाला हो गया और अब विमान के द्वारा [ गणपतिधाम को] जा रहा हूँ । [मैं आप सबको देखना चाहता था और गणेशजी की कृपा से] मैंने सबको देख भी लिया, अब मैं विमान पर आरूढ़ होकर जा रहा हूँ ॥ १३-१४ ॥ हे पुत्र! मैंने स्वेच्छानुसार राज्य तथा सम्पत्तियों का उपभोग किया। कृपालु गणपति ने मेरे निमित्त भूतल पर विमान भेजा। अब मैं [कृतकृत्य होकर ] भृगु मुनि के अनुग्रह से परमधाम को जा रहा हूँ ॥ १५१/२ ॥ जब उन लोगों ने सोमकान्त के द्वारा कही गयी ये बातें सुनीं तो वे सभी उच्च स्वर से रोने लगे और कुछ लोग तो [शोकवश] भूमि पर गिर पड़े। तदुपरान्त [नगर के] प्रमुख व्यापारी एवं गणमान्यजन दयानिधि राजा सोमकान्त से कहने लगे — ‘ हे जगतीपाल ! हम लोगों के बिना आप उस परमधाम को क्यों जा रहे हैं ? हे नृप ! [यदि आप ऐसा करेंगे तो ] हम सभी लोग प्राण त्यागकर आपके पीछे-पीछे चले आयेंगे। ऐसी दशा में हमारी हत्या का पाप आपके सिर पर आयेगा । हमारे पास वैसा पुण्य तो है नहीं कि हम गणेश्वर का दर्शन कर सकें, किंतु आप यदि कृपा करें तो हम लोग भी गणपति- देव के उत्तम लोक को प्राप्त कर सकेंगे। इस संसार में तो तनिक भी सुख नहीं है, अपितु व्यर्थ में ही यहाँ आयु का नाश होता रहता है। इसके अतिरिक्त, हम लोगों से कोई साधना-उपासना भी तो नहीं हो सकती, जो गणपतिधाम की प्राप्ति का साधन बन सके’ ॥ १६–२०१/२ ॥ इसके बाद हेमकण्ठ भी अपने पिता राजा सोमकान्त से आदरपूर्वक कहने लगा — हे तात! अपने बालक को छोड़कर गजानन के दर्शनार्थ आप किसलिये जा रहे हैं? मेरा राज्य से क्या प्रयोजन हो सकता है, मैंने तो केवल आपकी आज्ञा से वर्षपर्यन्त समग्र राज्य का परिपालन किया। अब मेरी भी राज्य करने की इच्छा नहीं है। राजन्! अब मेरी भी आपको शपथ है, इसलिये आपको मुझे भी साथ ले चलना चाहिये ॥ २१–२३ ॥ सोमकान्त ने कहा — हे जनो (नगरवासियो एवं बन्धु-बान्धवो) ! आप सभी लोगों की इच्छा गजाननदेव के चरणारविन्दों को देखने की है, किंतु मैं तो स्वयं ही पराधीन हूँ, तब मैं कैसे आपकी इच्छापूर्ति कर सकता हूँ? आप लोगों के स्नेह के कारण और विशेषरूप से पुत्र के प्रति वात्सल्यवश चिन्तित था, इसीलिये ऊपर-ऊपर जा रहे विमान को [आग्रहपूर्वक ] उतारकर मैं देखने के लिये चला आया ॥ २४-२५ ॥ सूतजी बोले — तदुपरान्त (राजा की बातें सुनने के बाद) नगरनिवासी शोकाकुल हो गये और [स्वयं राजा] सोमकान्त तथा उनका पुत्र हेमकण्ठ — ये दोनों रोने लगे, तब देवदूतों (के मन ) – में दया आ गयी। वे राजा सोमकान्त से कहने लगे — ‘हे राजन्! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी प्रजा आपके लिये वैसे ही प्राण न्योछावर कर चुकी है, जैसे कि आपने अपने-आपको जगदीश्वर गजानन को समर्पित किया है। अतः हम गजानन के समीप सबको लेकर शीघ्र ही चलेंगे’ ॥ २६–२७१/२ ॥ राजा ने कहा — यदि सारे नगर को [गणपतिधाम] ले जाया जा रहा है, तो निश्चय ही मेरी कीर्ति भूतल पर स्थिर रहेगी, ऐसा न होने पर [कीर्ति भी ] नहीं रहेगी ॥ २८१/२ ॥ सूतजी बोले — ऐसा कहने के बाद राजा ने गणेशपुराण के श्रवण का जो पुण्यफल था, उसे दूतों की आज्ञा से [धाम जाने के इच्छुक ] लोगों के हाथों में जल के रूप में छोड़ दिया। जैसे ही [पुण्यफल का प्रतीकरूप] जल उनके हाथों में गिरा, वैसे ही वे लोग पापों से रहित तथा पुण्यशाली हो गये ॥ २९-३० ॥ तदुपरान्त स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभी लोग उस उत्तम विमान पर आरूढ़ हुए और वे गणपतिदूत ऊपर (आकाश-) मार्गसे चल पड़े। उस समय कुछ ऐसे पापात्मा भी थे, जिन्होंने हाथ में जल नहीं लिया। वे पुनः नगर को लौट गये और जो लोग वहाँ बचे थे, उनसे सारा समाचार कह सुनाया। तब उन [बचे हुए ] लोगों ने ऊपर आकाश में जाते हुए विमान का बहुत [उत्कण्ठावश ] अवलोकन किया ॥ ३१-३२१/२ ॥ इसके उपरान्त [गये हुए लोगों के] धन को पाकर सन्तुष्ट हुए वे शेष नागरिक परस्पर वार्तालाप करने लगे और प्रसन्न चित्त से नानाविध क्रियाकलापों में निरत हो गये। [विमान में आरूढ़ कुछ लोग] भागना चाह रहे थे, उन्हें गणपतिदूतों ने दण्ड से ताड़ित करते हुए पकड़ लिया और बलपूर्वक विमान के भीतर बैठा दिया। यह बड़े कौतुक की बात थी! जो लोग भाँति-भाँति के बहाने बनाकर निकल पड़े थे, उन्हें भी दूतों ने वैसे ही बैठा दिया ॥ ३३–३५ ॥ विमान के मध्यभाग में राजा सोमकान्त, पत्नी सुधर्मा और पुत्र हेमकण्ठ आदि विराजमान हुए, उनके चारों ओर अमात्यगण तथा [यथास्थान] सुखपूर्वक नागरिक बैठे। वे लोग ‘मयूरेश ! तुम्हारी जय हो, मयूरेश ! तुम्हारी जय हो’ इस प्रकार का जयघोष कर रहे थे। वहाँ अप्सराएँ नाच रही थीं, देववाद्य बज रहे थे और इसके कारण दिशामण्डल प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ३६-३७१/२ ॥ अतिशय वेगपूर्वक वे सभी गणपति के मंगलमय धाम में जा पहुँचे और वहाँ की सुन्दरता को निहारते हुए विस्मयपूर्वक कहने लगे — ‘अहो ! इन (महाराज सोमकान्त)-का महान् पुण्य है, जिसके कारण हम गजाननदेव का साक्षात्कार कर सके।’ [गणपति- धाम में गये हुए] उन सभी लोगों ने सामीप्यमुक्ति प्राप्त की और राजा को [गणपति का] सायुज्य प्राप्त हुआ ॥ ३८–३९१/२ ॥ सूतजी बोले — हे विप्रो ! इस प्रकार से मैंने गणेशपुराण की कथा आप लोगों को सुनायी, जो श्रवण की जाने पर सभी लोगों के पापों का ध्वंस कर देती है । है विप्रो ! अब उसे सुनो, जो राजा ने [विमान में] देवदूतों से पूछा था। मैं उस समस्त कथानक का आप लोगों से वर्णन करता हूँ ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘सोमकान्त को देवपद की प्राप्ति का वर्णन’ नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५३ ॥ Content is available only for registered users. 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