श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-097
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सत्तानबेवाँ अध्याय
माता कद्रू का अपने पुत्र शेषनाग के पास पाताल में जाना और विनता तथा गरुड़ द्वारा हुए अपने अपमान का बदला लेने के लिये कहना, वासुकि आदि नागों तथा गरुड़ आदि पक्षियों का घनघोर युद्ध, नागों द्वारा विनता और उनके पुत्रों को बन्धन में डालना, विनता द्वारा मुनि कश्यप को अपना दुःख निवेदित करना और कश्यप द्वारा उसे एक अभेद्य अण्ड की उत्पत्ति का आश्वासन देना
अथः सप्तनवतितमोऽध्यायः
कद्रूविनिताकलहप्रसङ्गे कश्यपद्वारा विनतायां गर्भाधानं

मुनि व्यास बोले — [ हे ब्रह्मन्!] पहले आपने मयूरेश्वर नाम वाले देव विनायक की, तदनन्तर गुणेश नाम से प्रसिद्ध उन विनायक की महिमा बतायी है ॥ १ ॥ हे विश्व की सृष्टि करने वाले विभो ! अब यह भी मुझे बताने की कृपा करें कि उन विनायक ने मयूरेश्वर नाम कैसे प्राप्त किया और उन्होंने कौन-सा महान् कार्य किया था? ॥ २ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे मुनिवर व्यासजी !] उन विनायकदेव ने जिस प्रकार महान् कार्य किया और जैसे उन्होंने ‘मयूरेश्वर’ यह नाम प्राप्त किया, वह सब मैं आपको बतलाऊँगा ॥ ३ ॥

एक बार की बात है, पातालभवन में शेषनाग अपनी सभा के मध्य में विराजमान थे, उस समय वे चारों ओर से वासुकि आदि सर्पों से घिरे हुए थे ॥ ४ ॥ उसी समय वहाँ नागमाता कद्रू उपस्थित हुईं, वे अत्यन्त तेजोमयी और सुन्दर रूपवाली थीं। उन्होंने मुक्तामणियों से जटित अत्यन्त सुन्दर और शुभ उत्तरीय वस्त्र धारण किया हुआ था ॥ ५ ॥ उनके ओष्ठ विम्बाफल के समान लालवर्ण के थे, उनका मुख चन्द्रमा के समान उज्ज्वल था और वे दिव्य वस्त्र एवं आभूषणों को धारण किये हुई थीं । उन माता का दर्शन करके शेषनाग तथा वासुकि आदि जो प्रधान नाग थे, उन्होंने माता को प्रणाम किया और कहा — हे माता ! बहुत दिनों के बाद आपका दर्शन प्राप्त हुआ है, यहाँ सभी नाग आपका निरन्तर दर्शन करना चाहते हैं, किंतु आप अत्यन्त निष्ठुर हो गयी हैं ॥ ६-७ ॥

ऐसा कह करके उन्होंने माता का हाथ पकड़ा और उन्हें पिता के लिये बनाये गये आसन पर बैठाया । अत्यन्त भक्तिभाव के साथ उनका पूजन किया, तदनन्तर शेषनाग उनसे बोले — ॥ ८ ॥

शेष बोले — हे माता ! आप तो उन महर्षि कश्यप की अत्यन्त सुन्दर एवं पतिपरायणा पत्नी हैं, जो सभी विद्याओं के निधान हैं, सृष्टि-स्थिति तथा संहार करने वाले हैं और जिनके वास्तविक स्वरूप को ब्रह्मा आदि देवता भी जानने में समर्थ नहीं हैं। आप भी उन्हीं के समान सहसा ही शाप देने तथा कृपा करने में समर्थ हैं ॥ ९-१० ॥ हे माता! हम सभी आपके पुत्र हैं, जो तीनों लोकों को ग्रास बनाने का साहस रखते हैं, फिर आप किस उद्देश्य को लेकर यहाँ चली आयी हैं ? ॥ ११ ॥

कद्रू बोलीं — हे पुत्र ! बिना प्रयोजन के कोई भी किसी के पास नहीं आता । हे आत्मज ! मैं अपने आने का प्रयोजन बताऊँगी, तुम आदरभाव से उसका श्रवण करो। हे पुत्र ! विनता मेरी सौत है, जो पक्षियों की माता है। एक बार की बात है कि मुझे उसे देखने की इच्छा हुई ॥ १२-१३ ॥ मैं एकाएक उसके घर गयी तो उसने मेरा अपमान किया। उसने न तो मुझे बैठने के लिये आसन दिया, और न ही कोई स्वागत-सत्कार किया ॥ १४ ॥ पूर्व समय के वैर का स्मरण करते हुए उसने अपने पुत्र जटायु को आदेश दिया। तदनुसार जटायु ने मेरी बालों की गूँथी हुई चोटी को खींचा और मुझे क्षणभर में ही वस्त्ररहित कर डाला ॥ १५ ॥ वह मुझसे बोला, अरी महादुष्टे! तुम्हारा मुख देखने योग्य नहीं है। पूर्वकाल में तुमने मेरी माता को अपनी दासी बनाया था, तब उस समय तुम्हारे मन में लेशमात्र भी करुणा नहीं आयी, अरी महादुष्टे! तुम यहाँ से चली जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा ॥ १६-१७ ॥

हे फणीश्वर! मैं उस जटायु के वचनों को सुनकर अत्यन्त दुखी हुई। मैंने तब अत्यन्त विलाप किया और प्राणों का त्याग करने का निश्चय कर लिया ॥ १८ ॥ अत्यन्त दुखी होने के कारण ही मैं तुम लोगों को देखने तुम्हारे पास आयी हूँ, यदि तुम लोगों की मुझमें भक्ति है तो मेरी सहायता करो ॥ १९ ॥ हे श्रेष्ठ पुत्रो ! यदि तुम लोग मुझे मानते हो तो मेरी उस सपत्नी विनता का वध कर डालो, तभी मेरे हृदय में सुख होगा ॥ २० ॥

ब्रह्माजी बोले — माता कद्रू के इस प्रकार के वचनों को सुनकर शेषनाग सहसा वैसे ही रोषसमन्वित हो प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अग्नि में घी पड़ने पर वह और भी अधिक प्रदीप्त हो उठती है । ‘यदि विनता के पुत्रों ने मेरी माता कद्रू को पीड़ा पहुँचायी है, तो निश्चित ही मैं उसका बदला लूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है’ ॥ २१-२२ ॥

ऐसा कहकर उन शेषनाग ने वासुकि आदि प्रमुख नागों के साथ वहाँ जाने का मन बनाया, जहाँ कि विनता रह रही थी ॥ २३ ॥

वासुकि बोला — हे निष्पाप ! करोड़ों नागों को लेकर मैं वहाँ जाऊँगा और विनता को यहाँ ले आऊँगा । हे नागराज ! आप यहाँ पर स्थित रहिये ॥ २४ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहने के अनन्तर वासुकि नाग शीघ्र ही विनता के आश्रम की ओर निकल पड़ा। असंख्य नागों को देखकर उस समय विनता भयभीत हो उठी। उसी क्षण दुष्ट स्वभाव वाले क्रूर सर्पों ने उसे चारों ओर से लपेट लिया और वे उसे शेषनाग के समीप में ले गये । उस समय वह विनता उन नागों से बोली —॥ २५-२६ ॥

विनता बोली — अरे पापिष्ठो ! तुम लोग मुझे शीघ्र ही बतलाओ कि क्यों मुझे बन्धन में डालकर ले जाना चाहते हो, मैंने तो कोई अपराध भी नहीं किया है? मेरे पुत्र गरुड़ का स्वभाव तो सभी सर्पों को विदित ही है, अतः मुझे छोड़ दो, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मेरा वह पुत्र गरुड़ तुम्हारा संहार कर डालेगा ॥ २७-२८ ॥

ब्रह्माजी बोले — उन सर्पों की धृष्टता को देखकर उसने गरुड़ का स्मरण किया। वह गरुड़ भी ‘माता के द्वारा मेरा स्मरण किया जा रहा है’, यह जानकर पक्षियों के साथ वहाँ चला आया ॥ २९ ॥ गरुड़ के साथ बाज पक्षी, सम्पाति तथा पक्षिश्रेष्ठ जटायु भी था, जिनके पंखों की हवा से तीनों लोक काँप उठे। इधर वे सभी सर्प भी विषकणों का वमन करने लगे। उस समय नागराजों तथा पक्षियों में घनघोर युद्ध होने लगा ॥ ३०-३१ ॥

तदनन्तर वे नाग जटायु, सम्पाति तथा बाज पक्षी को बन्धन में डालकर ले गये। माता के द्वारा स्मरण किये जाने पर वह गरुड़ भी अपने पंखों की हवा से सम्पूर्ण जगत्‌ को कँपाता हुआ तथा वृक्षों और पर्वतों को गिराता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उसकी गन्ध को सूँघकर सभी सर्प भाग गये ॥ ३२-३३ ॥ दूसरे सर्प गरुड़ के पंखों की हवा से आकाश में चक्कर काटने लगे । विनता सर्पों के बन्धन से मुक्त हो गयी और वह अपने स्थान पर जाने के लिये उत्सुक हो उठी। विनता को जाने के लिये उद्यत देखकर वासुकि नाग अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और आकाश को दग्ध करता हुआ विष उगलने लगा। यह देखकर गरुड़ ने उसे अपने पंखों के आघात से जमीन पर पटक दिया ॥ ३४-३५ ॥

उस समय स्वस्थ होकर विनता बड़े वेग से अपने श्रेष्ठ स्थान को निकल पड़ी। वासुकि नाग का वैसा पराक्रम देखकर गरुड ने सूक्ष्मरूप बना लिया और वह विनता की रक्षा के लिये गया, उसके जाने पर वासुकि नाग अत्यन्त क्रुद्ध हो गया तथा उसने संसार को जलाते हुए बहुत सारा विष उगल डाला ॥ ३६-३७ ॥ वह वासुकि नाग उन (जटायु आदि पक्षियों)- को बन्धन में डालकर शीघ्र ही नागलोक को ले गया और उन्हें एक विवर में छोड़ दिया । तदनन्तर उस विवर के द्वार को ढककर वह माता कद्रू के पास चला आया ॥ ३८ ॥ वासुकि नाग ने वह सारा वृत्तान्त माता कद्रू तथा शेषनाग को बताया। इधर विनता अपने उन पुत्रों को बाँधकर ले जाने का समाचार सुनकर अत्यन्त शोक में पड़ गयी ॥ ३९ ॥

वे शीघ्र ही महर्षि कश्यप के पास गयीं और उन्हें प्रणामकर इस प्रकार कहने लगीं — यह एक ऐसी ही विपरीत घटना हो गयी है, जो पश्चिम से सूर्य उदय होने के समान है ॥ ४० ॥ मैं घर में स्थित थी, किंतु एकाएक ही शत्रु वासुकि नाग ने मेरा हरण कर लिया। मुझे छुड़ाने के लिये बाज, जटायु और सम्पाति मेरे पीछे-पीछे आये । उन्होंने अपने बल-पराक्रम से उन सर्प-समूहों को मारा, परंतु हे मुने! बहुत-से सर्पों के द्वारा शीघ्र ही उन बाज, जटायु तथा सम्पाति को पराजित कर दिये जाने पर मैंने गरुड़ का स्मरण किया। गरुड़ ने वहाँ अणु (के समान सूक्ष्म) – रूप में आकर उन सभी सर्पगणों को जीतकर मुझे उनके बन्धन से मुक्त किया और वह स्वयं भी मेरे साथ वापस आया ॥ ४१-४३ ॥तदनन्तर उस वासुकि नाग ने जटायु, सम्पाति तथा बाज को बलपूर्वक ले जाकर पाताल के एक विवर में छिपाकर दृढ़तापूर्वक उस बिल को बन्द कर दिया है ॥ ४४ ॥ हे मुने! उनके बिना मेरे प्राण निश्चित ही चले जायँगे। प्रभो! आप-जैसे स्वामी के होने पर भी मैंने इतना दुःख प्राप्त किया है ॥ ४५ ॥

ब्रह्माजी बोले — प्रिया विनता के इस प्रकार के वचनों को सुनकर मुनि कश्यप उनसे बोले ॥ ४५१/२

मुनि बोले — हे कल्याणि ! तुम चिन्ता मत करो, तुम्हारा मानसिक सन्ताप दूर हो जायगा । मैं तुम्हें ऋतुदान प्रदान करूँगा, जिससे तुम्हें अन्य पुत्र की प्राप्ति हो जायगी। अण्ड के रूप में उत्पन्न तुम्हारा वह गर्भ वज्र के द्वारा भी अभेद्य होगा, किंतु जब पार्वती का पुत्र खेल-खेल में उस अण्डे का भेदन कर डाले, तभी तुम्हें उस अण्डे में से एक पुत्र की प्राप्ति होगी ॥ ४६-४७१/२

उसका कण्ठ नीले वर्ण का होगा, वह बलवान् होगा और दूसरे नीलकण्ठ भगवान् शिव के समान होगा । उसकी केवल शब्दध्वनि को सुनकर ही वे सभी सर्प पराजित हो जायँगे और गुणेश भी उस नीलकण्ठ पक्षी पर सवार होकर पृथ्वी के भार का हरण करेंगे। तब तुम्हारे पुत्र भी नागों के बन्धन से मुक्त हो जायँगे। ऐसा कहने के अनन्तर एकान्त में ले जाकर मुनि कश्यप ने विनता को ऋतुदान दिया ॥ ४८-५० ॥

इसके पश्चात् वह विनता प्राणियों से रहित एक कानन में चली गयी और यथासमय उसने एक अण्ड को उत्पन्न किया, जो वज्र तथा पर्वतों के प्रहार से भी अभेद्य था ॥ ५१ ॥ विनता ने वृक्ष के पत्तों तथा छाल से लपेटकर उस अण्डे को एक मिट्टी के पात्र में छिपा दिया और वह उस पात्र के ऊपर उसी प्रकार बैठ गयी, जिस प्रकार कि भूमि में गाड़े हुए द्रव्य के ऊपर कोई अत्यन्त बलवान् सर्प बैठा रहता है ॥ ५२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘मयूरोपाख्यान में अभेद्य अण्ड की उत्पत्ति का वर्णन’ नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९७ ॥

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