May 27, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-47 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः सैंतालीसवाँ अध्याय भगवती मंगलचण्डी तथा भगवती मनसा का आख्यान मङ्गलचण्डीमनसयोरुपाख्यानवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे ब्रह्मपुत्र ! आगमशास्त्र के अनुसार मैंने षष्ठीदेवी का आख्यान कह दिया, अब भगवती मंगलचण्डी का आख्यान और उनका पूजा- विधान आदि सुनिये, जिसे मैंने धर्मदेव के मुख से सुना था । यह उपाख्यान श्रुतिसम्मत है तथा सभी विद्वानों को अभीष्ट है ॥ १-२ ॥ कल्याण करने में सुदक्षा जो चण्डी अर्थात् प्रतापवती हैं तथा मंगलों के मध्य में जो प्रचण्ड मंगला हैं, वे देवी ‘मंगलचण्डिका’ नाम से विख्यात हैं । अथवा भूमिपुत्र मंगल भी जिन चण्डी की पूजा करते हैं तथा जो भगवती उन मंगल की अभीष्ट देवी हैं, वे ‘मंगलचण्डिका’ नाम से प्रसिद्ध हैं ॥ ३-४ ॥ मनुवंश में उत्पन्न मंगल नामक एक राजा सात द्वीपोंवाली सम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी थे । ये भगवती उनकी पूज्य अभीष्ट देवी थीं, इससे भी वे ‘मंगलचण्डिका’ नाम से विख्यात हैं ॥ ५ ॥ वे ही मूर्तिभेद से मूलप्रकृति भगवती दुर्गा हैं। कृपारूपिणी होकर वे देवी साक्षात् प्रकट होने वाली हैं और स्त्रियों की अभीष्ट देवता हैं ॥ ६ ॥ सर्वप्रथम भगवान् शंकर ने विष्णु की प्रेरणा से तथा ब्रह्माजी के उपदेश से उन परात्परा भगवती की पूजा की थी । ब्रह्मन् ! त्रिपुरासुर के घोर वध के समय जब शिवजी संकट में पड़ गये थे और उस दैत्य के द्वारा रोषपूर्वक उनका विमान आकाश से नीचे गिरा दिया गया था, तब ब्रह्मा और विष्णु का उपदेश मानकर दुर्गति को प्राप्त भगवान् शंकर ने भगवती दुर्गा की स्तुति की। वे मंगलचण्डी ही थीं; जिन्होंने केवल रूप बदल लिया था, वे शिवजी के सामने प्रकट होकर बोलीं — हे प्रभो ! अब आपको कोई भय नहीं है, सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि वृषरूप में आपका वाहन बनेंगे और मैं युद्ध में शक्तिस्वरूपा होकर आपकी सहायता करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है । हे वृषध्वज ! तब मायास्वरूप भगवान् श्रीहरि की सहायता से आप देवताओं को पदच्युत कर देने वाले अपने शत्रु उस त्रिपुरदैत्य का वध कर डालेंगे ॥ ७– १११/२ ॥ हे मुनिवर ! ऐसा कहकर वे भगवती अन्तर्धान हो गयीं और उसी क्षण वे भगवान् शिव की शक्ति बन गयीं। तत्पश्चात् उमापति शंकर ने विष्णुजी के द्वारा दिये गये शस्त्र से उस दैत्य को मार डाला । उस दैत्य के धराशायी हो जाने पर सभी देवता तथा महर्षिगण भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाकर भगवान् शिव की स्तुति करने लगे ॥ १२-१३१/२ ॥ उसी क्षण भगवान् शिव के सिर पर पुष्पों की वर्षा होने लगी । ब्रह्मा तथा विष्णु ने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया ॥ १४१/२ ॥ तत्पश्चात् हे मुने! ब्रह्मा तथा विष्णु का उपदेश मानकर भगवान् शंकर ने विधिवत् स्नान करके पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, अनेक प्रकार के वस्त्र, पुष्प, चन्दन, भाँति-भाँति के नैवेद्य, वस्त्रालंकार, माला, खीर, पिष्टक, मधु, सुधा, अनेक प्रकार के फल आदि उपचारों, संगीत, नृत्य, वाद्य, उत्सव तथा नामकीर्तन आदि के द्वारा भक्तिपूर्वक उन देवी मंगलचण्डिका का पूजन किया ॥ १५-१८१/२ ॥ हे नारद! माध्यन्दिनशाखा में बताये गये ध्यानमन्त्र के द्वारा भगवती मंगलचण्डी का भक्तिपूर्वक ध्यान करके उन्होंने मूल मन्त्र से ही सभी द्रव्य अर्पण किये। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके हुं हुं फट् स्वाहा’ यह इक्कीस अक्षरों वाला मन्त्र पूजनीय तथा भक्तों को समस्त अभीष्ट प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष ही है। दस लाख जप करने से इस मन्त्र की सिद्धि निश्चितरूप से हो जाती है ॥ १९–२११/२ ॥ हे ब्रह्मन्! अब वेदोक्त तथा सर्वसम्मत ध्यान का श्रवण कीजिये — देवीं षोडशवर्षीयां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् । बिम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ॥ २३ ॥ श्वेतचम्पकवर्णाभां सुनीलोत्पललोचनाम् । जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ॥ २४ ॥ संसारसागरे घोरे ज्योतीरूपां सदा भजे । ‘सोलह वर्ष की अवस्थावाली, सर्वदा सुस्थिर यौवन से सम्पन्न, बिम्बाफल के समान होठों वाली, सुन्दर दन्तपंक्ति वाली, शुद्धस्वरूपिणी, शरत्कालीन कमल के समान मुखवाली, श्वेत चम्पा के वर्ण की आभावाली, विकसित नीलकमल के सदृश नेत्रों वाली, जगत् का पालन-पोषण करने वाली, सभी को सम्पूर्ण सम्पदाएँ प्रदान करने वाली और घोर संसारसागर में पड़े हुए प्राणियों के लिये ज्योतिस्वरूपिणी भगवती की मैं सदा आराधना करता हूँ ।’ हे मुने! यह भगवती मंगलचण्डिका का ध्यान है, अब उनका स्तवन सुनिये ॥ २२–२५ ॥ ॥ महादेव उवाच ॥ रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मङ्गलचण्डिके । हारिके विपदां राशेर्हर्षमङ्गलकारिके ॥ २६ ॥ हर्षमङ्गलदक्षे च हर्षमङ्गलदायिके । शुभे मङ्गलदक्षे च शुभे मङ्गलचण्डिके ॥ २७ ॥ मङ्गले मङ्गलार्हे च सर्वमङ्गलमङ्गले । सतां मङ्गदे देवि सर्वेषां मङ्गलालये ॥ २८ ॥ पूज्ये मङ्गलवारे च मङ्गलाभीष्टदेवते । पूज्ये मङ्गलभूपस्य मनुवंशस्य सन्ततम् ॥ २९ ॥ मङ्गलाधिष्ठातृदेवि मङ्गलानां च मङ्गले । संसारमङ्गलाधारे मोक्षमङ्गलदायिनि ॥ ३० ॥ सारे च मङ्गलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् । प्रतिमङ्गलवारे च पूज्ये मङ्गसुखप्रदे ॥ ३१ ॥ महादेवजी बोले — जगत् की माता, विपत्ति राशि का नाश करने वाली, हर्ष तथा मंगल उत्पन्न करने वाली, हर्ष तथा मंगल देने में प्रवीण, हर्ष तथा मंगल प्रदान करने वाली, कल्याणकारिणी, मंगल करने में दक्ष, शुभस्वरूपिणी, मंगलरूपिणी, मंगल करने में परम योग्यता-सम्पन्न, समस्त मंगलों की भी मंगलरूपा, सज्जनों को मंगल प्रदान करने वाली, सभी मंगलों की आश्रय- स्वरूपिणी, मंगलवार के दिन पूजी जाने वाली, मंगलग्रह की अभीष्ट देवी, मनुवंश में उत्पन्न राजा मंगल के लिये सदा पूजनीया, मंगल की अधिष्ठात्री देवी, मंगलों के लिये भी मंगल, संसार के समस्त मंगलों की आधारस्वरूपा, मोक्षरूप मंगल प्रदान करने वाली, साररूपिणी, मंगलाधार, सभी कर्मों की फलस्वरूपिणी तथा मंगलवार को पूजित होने पर सबको महान् सुख प्रदान करने वाली हे देवि मंगलचण्डिके ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ २६-३१ ॥ भगवान् शिव इस स्तोत्र से देवी मंगलचण्डिका की स्तुति करके तथा प्रत्येक मंगलवार को उनकी पूजा करके वहाँ से [ अपने लोक] चले गये ॥ ३२ ॥ इस प्रकार सर्वप्रथम भगवान् शिव के द्वारा वे सर्वमंगला देवी मंगलचण्डिका पूजित हुईं। दूसरी बार मंगलग्रह ने उनकी पूजा की, तीसरी बार राजा मंगल ने उन कल्याणमयी देवी की पूजा की । चौथी बार मंगलवार के दिन भद्र महिलाओं ने उनकी पूजा की। तत्पश्चात् पाँचवीं बार अपने कल्याण की कामना रखने वाले पुरुषों ने देवी मंगलचण्डिका का पूजन किया। इस तरह विश्वेश्वर शिव के द्वारा पूजित ये भगवती सभी लोकों में पूजी जाने लगीं । हे मुने! तदनन्तर सभी देवताओं, मुनियों, मानवों तथा मनुओं के द्वारा भगवती मंगलचण्डिका सर्वत्र पूजित हो गयीं ॥ ३३-३६ ॥ जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर भगवती मंगलचण्डिका के इस मंगलमय स्तोत्र का श्रवण करता है, उसका सदा मंगल होता है और उसका अमंगल कभी नहीं होता, पुत्र-पौत्रोंसहित उसके मंगल की दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती रहती है ॥ ३७ ॥ श्रीनारायण बोले — हे ब्रह्मपुत्र ! मैंने आगमशास्त्र के अनुसार देवी षष्ठी और मंगलचण्डिका — इन दोनों के उपाख्यान का वर्णन कर दिया; अब आप भगवती मनसा का आख्यान सुनिये, जिसे मैंने धर्मदेव के मुख से सुना है ॥ ३८ ॥ वे भगवती कश्यप की मानसी कन्या हैं तथा वे मनसे ध्यान करने पर प्रकाशित होती हैं; इसीलिये ‘मनसा’ देवी नाम से विख्यात हैं । वे मनसे परब्रह्म परमात्मा का ध्यान करती हैं तथा उसी ध्यानयोग के द्वारा प्रकाशित होती हैं, इसीलिये वे देवी ‘मनसा’ — इस नाम से प्रसिद्ध हैं ॥ ३९-४० ॥ आत्मा में रमण करने वाली तथा सिद्धयोगिनी उन वैष्णवी देवी ने तीन युगों तक तप करके परमात्मा श्रीकृष्ण का दर्शन प्राप्त किया । उस समय गोपीपति भगवान् श्रीकृष्ण ने उनके वस्त्र और शरीर को जीर्ण देखकर उनका नाम ‘जरत्कारु’ रख दिया । कृपानिधि श्रीकृष्ण ने उन देवी को कृपापूर्वक वाञ्छित वर प्रदान किया। उन प्रभु ने उनकी स्वयं पूजा की तथा और लोगों से भी उनकी पूजा करायी ॥ ४१-४३ ॥ ब्रह्मलोक से लेकर स्वर्ग में, पृथ्वीलोक में तथा नागलोक में सर्वत्र ये पूजित होने लगीं। सम्पूर्ण जगत् में ये अत्यधिक गौरवर्णा, सुन्दरी तथा मनोहारिणी हैं, अतः ये साध्वी ‘जगद्गौरी’ — इस नाम से विख्यात होकर पूजित हैं । वे देवी भगवान् शिव की शिष्या हैं, इसलिये ‘शैवी’ कही गयी हैं । वे सदा भगवान् विष्णु की परम भक्ति में संलग्न रहती हैं, इसलिये ‘वैष्णवी’ कही गयी हैं ॥ ४४-४५१/२ ॥ परीक्षित् पुत्र राजा जनमेजय के यज्ञ में उन्होंने नागों की प्राणरक्षा की थी, अतः वे ‘नागेश्वरी’ तथा ‘नागभगिनी’ नाम से विख्यात हुईं। वे विष का हरण करने में समर्थ हैं, अतः ‘विषहरी’ कही गयी हैं। उन्होंने भगवान् शिव से सिद्धयोग प्राप्त किया था, इसलिये वे ‘सिद्धयोगिनी’ कही जाती हैं। साथ ही शिवजी से उन्होंने महाज्ञान, योग तथा परम मृतसंजीवनीविद्या प्राप्त की थी, अतः विद्वान् पुरुष उन्हें ‘महाज्ञानयुता’ कहते हैं ॥ ४६–४८१/२ ॥ वे तपस्विनी देवी मुनीश्वर आस्तीक की माता हैं, इसलिये ‘आस्तीकमाता’ नाम से विख्यात होकर जगत् में सुप्रतिष्ठित हैं । वे भगवती विश्ववन्द्य, परम योगी तथा मुनियों में श्रेष्ठ महात्मा जरत्कारु की प्रिय पत्नी थीं, इसलिये ‘जरत्कारुप्रिया’ कहलाती हैं ॥ ४९-५०१/२ ॥ जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरा और महाज्ञानयुता — इन नामों से वे भगवती विश्व में पूजी जाती हैं। जो मनुष्य पूजा के समय देवी के इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजों को नागों का भय नहीं रहता ॥ ५१–५३१/२ ॥ जिस शयनागार में नागों का भय हो, जिस भवन में नाग रहते हों, जो स्थान नागों से युक्त होने के कारण अत्यन्त दारुण बन गया हो तथा जो नागोंसे वेष्टित हो, उन स्थानों पर इस स्तोत्र का पाठ करके मनुष्य सर्पभय से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५४-५५ ॥ जो मनुष्य इसे नित्य पढ़ता है, उसे देखकर नागोंका समुदाय भाग जाता है। दस लाख पाठ करने से यह स्तोत्र मनुष्योंके लिये सिद्ध हो जाता है। जिस मनुष्य को स्तोत्रसिद्धि हो जाती है, वह विषभक्षण करने में समर्थ हो जाता है। वह नागों को भूषण बनाकर नागों पर सवारी करने में सक्षम हो जाता है । वह व्यक्ति नागों पर आसन लगाने वाला, नागोंपर शयन करने वाला तथा महासिद्ध हो जाता है और अन्त में भगवान् विष्णु के साथ दिन-रात क्रीडा करता है ॥ ५६-५८ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘नारायण-नारद- संवाद में मंगलचण्डी और मनसादेवी के उपाख्यानों का वर्णन’ नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥ Content is available only for registered users. 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