May 11, 2019 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्भागवतमहापुराण – द्वादशः स्कन्ध – अध्याय २ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दूसरा अध्याय कलियुग के धर्म श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! समय बड़ा बलवान् है; ज्यों-ज्यों घोर कलियुग आता जायगा, त्यों-त्यों उत्तरोत्तर धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, बल और स्मरणशक्ति का लोप होता जायगा ॥ १ ॥ कलियुग में जिसके पास धन होगा, उसको लोग कुलीन, सदाचारी और सद्गुणी मानेंगे । जिसके हाथ में शक्ति होगी वहीं धर्म और न्याय की व्यवस्था अपने अनुकूल करा सकेगा ॥ २ ॥ विवाह-सम्बन्ध के लिये कुल-शील-योग्यता आदि की परख-निरख नहीं रहेगी, युवक-युवती को पारस्परिक रुचि से ही सम्बन्ध हो जायगा । व्यवहार की निपुणता, सच्चाई और ईमानदारी में नहीं रहेगी; जो जितना छल-कपट कर सकेगा, वह उतना ही व्यवहारकुशल माना जायगा । स्त्री और पुरुष की श्रेष्ठता का आधार उनका शील-संयम न होकर केवल रति-कौशल ही रहेगा । ब्राह्मण की पहचान उसके गुण-स्वभाव से नहीं यज्ञोपवीत से हुआ करेगी ॥ ३ ॥ वस्त्र, दण्ड-कमण्डलु आदि से ही ब्रह्मचारी, संन्यासी आदि आश्रमियों की पहचान होगी और एक-दुसरे का चिह्न स्वीकार कर लेना ही एक से दूसरे आश्रम में प्रवेश का स्वरूप होगा । जो घूस देने या धन खर्च करने में असमर्थ होगा, उसे अदालत का ठीक-ठीक न्याय न मिल सकेगा । जो बोल-चाल में जितना चालाक होगा, उसे उतना ही बड़ी पण्डित माना जायगा ॥ ४ ॥ असाधुता की — दोषी होने की एक ही पहचान रहेगी — गरीब होना । जो जितना अधिक दभ-पाखण्ड कर सकेगा, उसे उतना ही बड़ा साधु समझा जायगा । विवाह के लिये एक-दूसरे की स्वीकृति ही पर्याप्त होगी, शास्त्रीय विधि-विधान की संस्कार आदि की कोई आवश्यकता न समझी जायगी । बाल आदि सँवारकर कपड़े-लते से लैस हो जाना ही स्नान समझा जायगा ॥ ५ ॥ लोग दूर के तालाब को तीर्थ मानेंगे और निकट के तीर्थ गङ्गा-गोमती, माता-पिता आदि की उपेक्षा करेंगे । सिर पर बड़े-बड़े बाल — काकुल रखाना ही शारीरिक सौन्दर्य का चिह्न समझा जायगा और जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा — अपना पेट भर लेना । जो जितनी ढिठाई से बात कर सकेगा, उसे उतना ही सच्चा समझा जायगा ॥ ६ ॥ योग्यता-चतुराई का सबसे बड़ा लक्षण यह होगा कि मनुष्य अपने कुटुम्ब का पालन कर ले । धर्म का सेवन यश के लिये किया जायगा । इस प्रकार जब सारी पृथ्वी पर दुष्टों का बोलबाला हो जायगा, तब राजा होने का कोई नियम न रहेगा; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रों में जो बली होगा, वहीं राजा बन बैठेगा । उस समय के नीच राजा अत्यन्त निर्दय एवं क्रूर होंगे; लोभी तो इतने होंगे कि उनमें और लुटेरों में कोई अन्तर न किया जा सकेगा । वे प्रजा की पूँजी एवं पत्नियों तक को छीन लेंगे । उनसे डरकर प्रजा पहाड़ों और जंगलों में भाग जायगी । उस समय प्रजा तरह-तरह के शाक, कन्द-मूल, मांस, मधु. फल-फूल और बीज-गुठली आदि खा-खाकर अपना पेट भरेगी ॥ ७-९ ॥ कभी वर्षा न होगी — सूखा पड़ जायगा; तो कभी कर-पर-कर लगाये जायेंगे । कभी कड़ाके की सर्दी पड़ेगी, तो कभी पाला पड़ेगा, कभी आंधी चलेगी, कभी गरमी पड़ेगी, तो कभी बाढ़ आ जायगी । इन उत्पातों से तथा आपस के सङ्घर्ष से प्रज्ञा अत्यन्त पीड़ित होगी, नष्ट हो जायगी ॥ १० ॥ लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकार की चिन्ताओं से दुखी रहेंगे । रोगों से तो उन्हें छुटकारा ही न मिलेगा । कलियुग में मनुष्यों की परमायु केवल बीस या तीस वर्ष की होगी ॥ ११ ॥ परीक्षित् ! कलिकाल के दोष से प्राणियों के शरीर छोटे-छोटे, क्षीण और रोगग्रस्त होने लगेंगे । वर्ण और आश्रमों का धर्म बतलानेवाला वेद-मार्ग नष्टप्राय हो जायगा ॥ १२ ॥ धर्म में पाखण्ड की प्रधानता हो जायेगी । राजे-महाराजे डाकू-लुटेरों के समान हो जायेंगे । मनुष्य चोरी, झूठ तथा निरपराध हिंसा आदि नाना प्रकार के कुकर्मों से जीविका चलाने लगेंगे ॥ १३ ॥ चारों वर्णों के लोग शूद्रों के समान हो जायेंगे । गौएँ बकरियों की तरह छोटी-छोटी और कम दूध देनेवाली हो जायेंगी । वानप्रस्थी और संन्यासी आदि विरक्त आश्रमवाले भी घर-गृहस्थी जुटाकर गृहस्थों का-सा व्यापार करने लगेंगे । जिनसे वैवाहिक सम्बन्ध हैं, उन्हीं को अपना सम्बन्धी माना जायगा ॥ १४ ॥ धान, जौ, गेहूं आदि धान्यों के पौधे छोटे-छोटे होने लगेंगे । वृक्षों में अधिकांश शमी के समान छोटे और कँटीले वृक्ष ही रह जायेंगे । बादलों में बिजली तो बहुत चमकेगी, परन्तु वर्षा कम होगी । गृहस्थों के घर अतिथि-सत्कार या वेदध्वनि से रहित होने के कारण अथवा जनसंख्या घट जाने के कारण सूने-सूने हो जायंगे ॥ १५ ॥ परीक्षित् ! अधिक क्या कहें — कलियुग अन्त होते-होते मनुष्यों का स्वभाव गधों-जैसा दुःसह बन जायगा, लोग प्रायः गृहस्थी का भार ढोनेवाले और विषयी हो जायेंगे । ऐसी स्थिति में धर्म की रक्षा करने के लिये सत्त्वगुण स्वीकार करके स्वयं भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे ॥ १६ ॥ प्रिय परीक्षित् ! सर्वव्यापक भगवान् विष्णु सर्वशक्तिमान हैं । वे सर्वस्वरूप होने पर भी चराचर जगत् के सच्चे शिक्षक — सद्गुरु हैं । वे साधु-सज्जन पुरुषों के धर्म की रक्षा के लिये, उनके कर्म का बन्धन काटकर उन्हें जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने के लिये अवतार ग्रहण करते हैं ॥ १७ ॥ उन दिनों शम्भल-ग्राम में विष्णुयश नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे । उनका हृदय बड़ा उदार एवं भगवद्भक्ति से पूर्ण होगा । उन्हीं के घर कल्कि भगवान् अवतार ग्रहण करेंगे ॥ १८ ॥ श्रीभगवान् ही अष्टसिद्धियों के और समस्त सदगुणों के एकमात्र आश्रय हैं । समस्त चराचर जगत् के वे ही रक्षक और स्वामी हैं । वे देवदत्त नामक शीघ्रगामी घोड़े पर सवार होकर दुष्टों को तलवार के घाट उतारकर ठीक करेंगे ॥ १९ ॥ उनके रोम-रोम से अतुलनीय तेज की किरणें छिटकती होंगी । वे अपने शीघ्रगामी घोड़े से पृथ्वी पर सर्वत्र विचरण करेंगे और राजा के वेष में छिपकर रहनेवाले कोटि-कोटि डाकुओ का संहार करेंगे ॥ २२ ॥ प्रिय परीक्षित् ! जब सब डाकुओं का संहार हो चुकेगा, तब नगर की और देश की सारी प्रजा का हृदय पवित्रता से भर जायगा, क्योंकि भगवान् कल्कि के शरीर में लगे हुए अङ्गराग का स्पर्श पाकर अत्यन्त पवित्र हुई वायु उनका स्पर्श करेगी और इस प्रकार वे भगवान् के श्रीविग्रह की दिव्य गन्ध प्राप्त कर सकेंगे ॥ २१ ॥ उनके पवित्र हृदयों में सत्त्वमूर्ति भगवान् वासुदेव विराजमान होंगे और फिर उनकी सन्तान पहले की भाँति हृष्ट-पुष्ट और बलवान् होने लगेगी ॥ २२ ॥ प्रजा के नयन-मनोहारी हरि ही धर्म के रक्षक और स्वामी हैं । वे ही भगवान् जब कल्कि के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे, उसी समय सत्ययुग का प्रारम्भ हो जायगा और प्रजा की सन्तान-परम्परा स्वयं ही सत्त्वगुण से युक्त हो जायगी ॥ २३ ॥ जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय एक ही साथ पुष्य नक्षत्र के प्रथम पल में प्रवेश करते हैं, एक राशि पर आते हैं, उसी समय सत्ययुग का प्रारम्भ होता हैं ॥ २४ ॥ परीक्षित् ! चन्द्रवंश और सूर्यवंश में जितने राजा हो गये हैं या होंगे, उन सबका मैंने संक्षेप से वर्णन कर दिया ॥ २५ ॥ तुम्हारे जन्म से लेकर राजा नन्द के अभिषेक तक एक हजार, एक सौ पंद्रह वर्ष का समय लगेगा ॥ २६ ॥ जिस समय आकाश में सप्तर्षियों का उदय होता है, उस समय पहले उनमें से दो ही तारे दिखायी पड़ते हैं । उनके बीच में दक्षिणोत्तर रेखा पर समभाग में अश्विनी आदि नक्षत्रों में से एक नक्षत्र दिखायी पड़ता हैं ॥ २७ ॥ उस नक्षत्र के साथ सप्तर्षिगण मनुष्यों की गणना से सौ वर्ष तक रहते हैं । वे तुम्हारे जन्म के समय और इस समय भी मघा नक्षत्र पर स्थित हैं ॥ २८ ॥ स्वयं सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् भगवान् ही शुद्ध सत्त्वमय विग्रह के साथ श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुए थे । जिस समय अपनी लीला संवरण करके परमधाम को पधार गये, उसी समय कलियुग ने संसार में प्रवेश किया । उसके कारण मनुष्यों की मति-गति पाप की ओर ढुलक गयी ॥ २९ ॥ जब तक लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलों से पृथ्वी को स्पर्श करते रहे, तब तक कलियुग पृथ्वी पर अपना पैर न जमा सका ॥ ३० ॥ परीक्षित् ! जिस समय सप्तर्षि मघा-नक्षत्र पर विचरण करते रहते हैं, उसी समय कलियुग का प्रारम्भ होता है । कलियुग की आयु देवताओं की वर्षगणना से बारह सौ वर्षों की अर्थात् मनुष्यों की गणना के अनुसार चार लाख, बत्तीस हजार वर्ष की है ॥ ३१ ॥ जिस समय सप्तर्षि मघा से चलकर पूर्वाषाढा नक्षत्र में जा चुके होंगे, उस समय राजा नन्द का राज्य रहेगा । तभी से कलियुग की वृद्धि शुरू होगी ॥ ३२ ॥ पुरातत्ववेत्ता ऐतिहासिक विद्वानों का कहना है कि जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने परमधाम को प्रयाण किया, उसी दिन, उसी समय कलियुग का प्रारम्भ हो गया ॥ ३३ ॥ परीक्षित् ! जब देवताओं की वर्षगणना के अनुसार एक हजार वर्ष बीत चुकेंगे, तब कलियुग के अन्तिम दिनों में फिर से कल्किभगवान् की कृपा से मनुष्यों के मन में सात्त्विकता का सञ्चार होगा, लोग अपने वास्तविक स्वरूप को जान सकेंगे और तभी से सत्ययुगका प्रारम्भ भी होगा ॥ ३४ ॥ परीक्षित् ! मैंने तो तुमसे केवल मनुवंश का, सो भी संक्षेप से वर्णन किया है । जैसे मनुवंश की गणना होती है, वैसे ही प्रत्येक युग में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रों की भी वंशपरम्परा समझनी चाहिये ॥ ३५ ॥ राजन् ! जिन पुरुषों और महात्माओं का वर्णन मैंने तुमसे किया है, अब केवल नाम से ही उनकी पहचान होती हैं । अब वे नहीं हैं, केवल उनकी कथा रह गयी हैं । अब उनकी कीर्ति ही पृथ्वी पर जहाँ-तहाँ सुनने को मिलती है ॥ ३६ ॥ भीष्मपितामह के पिता राजा शन्तनु के भाई देवापि और इक्ष्वाकुवंशी मरु इस समय कलापग्राम में स्थित हैं । वे बहुत बड़े योगबल से युक्त हैं ॥ ३७ ॥ कलियुग के अन्त में कल्किभगवान् की आज्ञा से वे फिर यहाँ आयेंगे और पहले की भाँति ही वर्णाश्रमधर्म का विस्तार करेंगे ॥ ३८ ॥ सत्ययुग, त्रेता द्वापर और कलियुग — ये ही चार युग हैं, ये पूर्वोक्त क्रम के अनुसार अपने-अपने समय में पृथ्वी के प्राणियों पर अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं ॥ ३९ ॥ परीक्षित् ! मैंने तुमसे जिन राजाओं का वर्णन किया है, वे सब और उनके अतिरिक्त दूसरे राजा भी इस पृथ्वी को ‘मेरी-मेरी’ करते रहे, परन्तु अन्त में मरकर धूल में मिल गये ॥ ४० ॥ इस शरीर को भले ही कोई राजा कह ले परन्तु अन्त में यह कीड़ा, विष्ठा अथवा राख के रूप में ही परिणत होगा, राख ही होकर रहेगा । इसी शरीर के या इसके सम्बन्धियों के लिये जो किसी भी प्राणी को सताता हैं, वह न तो अपना स्वार्थ जानता है और न तो परमार्थ; क्योंकि प्राणियों को सताना तो नरक का द्वार हैं ॥ ४१ ॥ वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दादा-परदादा इस अखण्ड़ भूमण्डल का शासन करते थे; अब यह मेरे अधीन किस प्रकार रहे और मेरे बाद मेरे बेटे-पोते, मेरे वंशज किस प्रकार इसका उपभोग करें ॥ ४२ ॥ वे मूर्ख इस आग, पानी और मिट्टी के शरीर को अपना आपा मान बैठते हैं और बड़े अभिमान के साथ डींग हाँकते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है । अन्त में वे शरीर और पृथ्वी दोनो को छोड़कर स्वयं ही अदृश्य हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ प्रिय परीक्षित् ! जो-जो नरपति बड़े उत्साह और बल-पौरुष से इस पृथ्वी के उपभोग में लगे रहे, उन सबको काल ने अपने विकराल गाल में धर दबाया । अब केवल इतिहास में उनकी कहानी ही शेष रह गयी है ॥ ४४ ॥ ॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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