August 4, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-38 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ अड़तीसवाँ अध्याय भगवान् श्रीराम की ऐश्वर्य-लीलाएँ, विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, जनकपुरी जाकर शिवधनुष को तोड़ना तथा विवाह, श्रीराम का वनवास, भरत द्वारा नन्दिग्राम में मुनिवृत्ति से निवास करना, लक्ष्मण का शूर्पणखा के नाक-कान काटना, रावण द्वारा सीता का हरण अथः अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः महादेवनारदसंवादे श्रीजानकीहरणं श्रीमहादेवजी बोले — नारदजी ! मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ जी ने महाबाहु राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न को देवी के मन्त्र की दीक्षा दी। वे चारों भाई भी सभी शास्त्रों में प्रवीण हो गए ॥ १-२ ॥ एक बार महामुनि विश्वामित्रजी आए और अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को पिता से माँगकर तपोवन में ले आए। वहाँ महाबाहु श्रीराम ने भयंकर राक्षसी ताड़का का वध करके मुनि को संतुष्ट किया और उनके दिव्य अस्त्र प्राप्त किए। मुनिवर ! फिर घने जंगल में जाकर यज्ञ में विघ्न करने वाले सुबाहु नामक राक्षस को उन महाबली ने एक बाण से भस्म कर दिया। एक दूसरे बाण से युद्ध के लिए उन्मत्त मारीच नामक राक्षस को अपने बाहुबल से उत्साहित भगवान् राम ने समुद्र में फेंक दिया, तब मुनिवर विश्वामित्र के साथ रघुनन्दन राम मिथिला नगरी को गए और मार्ग में ब्रह्मा की पुत्री अहल्या का शीघ्र ही उद्धार किया। महामुने ! तब जनकपुरी में जाकर महाबली श्रीराम ने भगवान् शिव का अत्यन्त कठोर धनुष तोड़ा ॥ ३-८१/२ ॥ तब राजा जनक संतुष्ट हुए और उन्होंने वयोवृद्ध राजा दशरथ को पुत्रों सहित अपने नगर में सम्मानपूर्वक बुलाया तथा महान् उत्सव सहित उनके चारों पुत्रों को अपनी चारों कन्याएँ समर्पित कर दीं ॥ ९-१० ॥ मुनिवर ! उन्होंने श्रीराम को सीता, लक्ष्मण को उर्मिला, भरत को माण्डवी और शत्रुघ्न को श्रुतकीर्ति नाम की सुमुखी कन्याएँ प्रदान कीं। उनमें सीता यज्ञ भूमि के शोधन में प्राप्त हुई थीं, उर्मिला उनकी औरस पुत्री थी और अन्य दो – माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति – उनके भाई की कन्याएँ थीं ॥ ११-१३ ॥ महामति नारदजी ! विवाहोपरान्त अपनी पत्नियों सहित चारों भाई अपने पिता दशरथजी के साथ शीघ्र ही अयोध्या नगरी की ओर चले। मार्ग में उन्हें बलाभिमानी भृगुपुत्र परशुराम मिले और महाबलि श्रीराम ने उनका अभिमान चूर-चूर कर दिया ॥ १४-१५ ॥ महामते ! अयोध्या नगरी में आकर राजा दशरथ ने अपने मन्त्रियों के साथ श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां प्रारम्भ कीं ॥ १६ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! इस अवसर पर देवताओं ने विघ्न रचा, जिससे रानी कैकेयी ने अपने पुत्र के लिए राजा दशरथ से राज्य माँग लिया और चौदह वर्षों के लिए श्रीराम का वनवास भी माँगा। सत्यप्रतिज्ञ राजा दशरथ ने उसको वे वर दिए ॥ १७-१८ ॥ अतः सत्यपराक्रमी श्रीराम ने राज्य का त्याग करके सीता और लक्ष्मण सहित दण्डकारण्य की ओर प्रस्थान किया ॥ १९ ॥ मुनिवर ! रावण के वध के निमित्त जगदम्बा भवानी का मन में स्मरण कर उन्हें बारम्बार प्रणाम करके आश्विन शुक्ल दशमी को रघुवर श्रीराम ने माता-पिता और गुरु वसिष्ठ के चरणों में प्रणाम करके यात्रा प्रारम्भ की ॥ २०-२१ ॥ नारदजी ! पुत्र के वियोग से दुःखी होकर राजा दशरथ उच्च स्वर से रोने लगे। मन्त्री सुमन्त्र के साथ रथ में बैठकर श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और सीताजी को साथ लेकर अयोध्या नगरी से बाहर निकले। शोक से व्याकुल प्रजाजन उनके पीछे-पीछे निकल पड़े ॥ २२-२३ ॥ बुद्धिमान् राम पुरजनों को छोड़कर शृङ्गवेरपुर आए और मन्त्री सुमन्त्र को रथ के साथ वापिस भेज दिया। नारदजी ! वहाँ श्रीराम और लक्ष्मण ने अपने सिर पर जटायें बनाई और सीताजी के साथ नाव में चढ़कर गङ्गाजी को पार करके वे भारद्वाज आश्रम में आए और वहाँ से चित्रकूट चले गए ॥ २४-२५१/२ ॥ मुने ! इधर राजा दशरथ ने सुमन्त्र के मुख से श्रीराम का वनगमन सुनकर दुःख के आवेग में प्राणों का त्याग कर दिया ॥ २६१/२ ॥ तत्पश्चात् अपने मामा के घर से वापिस आकर भरत ने राजा दशरथ के मरणोपरान्त की समस्त क्रियाएं सम्पन्न की। अपनी माता को बार-बार धिक्कारते हुए वे अपने भाई शत्रुघ्न और अमात्यों को साथ लेकर भगवान् श्रीराम के पास गए ॥ २७-२८ ॥ तब भरत जी ने श्रीराम को वापिस लौटाने का बहुत यत्न किया, किंतु उन्होंने वह बात नहीं मानी और देवताओं का कार्य सम्पन्न करने हेतु भरत को बार-बार सान्त्वना देकर श्रीराम घोर दण्डकारण्य की ओर चले गए। तदनन्तर उनकी आज्ञा से वे भरत भी वापस लौट आए ॥ २९-३० ॥ मुने ! भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न और परिजनों के साथ नन्दिग्राम में रहे। वे भरत, श्रीराम का मन से स्मरण करते हुए जटा धारण कर राज्यसुख का परित्याग करके भूमि पर शयन करते हुए चौदह वर्षों तक उनके वन से आने की प्रतीक्षा करने लगे ॥ ३१-३२ ॥ महामते ! उधर श्रीराम ने दण्डकारण्य में विराध नामक भयंकर राक्षस का वध करके पञ्चवटी में पर्णकुटी बनाकर राक्षसों का विनाश करने के लिए कुछ काल तक निवास किया ॥ ३३-३४ ॥ वहाँ शूर्पणखा नाम की स्वेच्छा रूप धारण करने वाली राक्षसी काम के वशीभूत होकर श्रीराम को पति बनाने की इच्छा से उनके पास आयी। मुनिश्रेष्ठ ! भाई की आज्ञा से लक्ष्मण जी ने उसे दुष्टा राक्षसी जानकर उसके नाक और कान खड्ग से काट डाले। तब वह भयानक राक्षसी रोती हुई अपने भाई खर और दूषण के पास जाकर क्रोधपूर्वक कहने लगी —॥ ३५-३७ ॥ शूर्पणखा बोली — भाई ! अयोध्या के राजा श्रीराम अपने भाई के साथ दण्डकारण्य में आए हैं, उनकी दूर्वादल के समान श्याम छवि है। उनकी पत्नी भी उनके साथ आयी है। वह जैसी रूपवती है वैसी स्वर्ग, मृत्युलोक या पाताललोक में कहीं देखी-सुनी नहीं जाती। मैं उसे आपके लिए ला रही थी, लेकिन श्रीराम के भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले। इसीलिए मैं आपके पास आयी हूँ ॥ ३८-४१ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — उसकी ये बाते सुनकर राक्षस खर और दूषण चौदह हजार राक्षसों के साथ उस जंगल में गए, जहां श्रीराम विराजमान थे। श्रीराम ने अपनी बाण-वृष्टि से उन सभी आए हुए राक्षसों को मार डाला ॥ ४२-४३ ॥ महामति नारदजी ! तब शूर्पणखा ने लङ्का में जाकर शोकातुर हो सारा वृतान्त रावण को कह सुनाया। उसने उसकी बातें तथा सीता के अनुपम सौन्दर्य के बारे में सुनकर काल के वशीभूत होकर उनका हरण करने का निश्चय किया ॥ ४४-४५ ॥ तदनन्तर ताड़का के बेटे मारीच को सहायक बनाकर सीता के हरण की इच्छा से वह रावण उस वन में गया ॥ ४६ ॥ मारीच ने श्रीराम के द्वारा अपनी मृत्यु निश्चित जानकर माया से स्वर्ण-मृग का रूप बनाया और वह श्रीराम को अपने आश्रम से बहुत दूर ले गया। मुने ! श्रीराम ने उस पर शरसंधान किया और उससे घायल होकर वह राक्षस पृथ्वी पर गिर पड़ा तथा ‘हे लक्ष्मण !’ ऐसा पुकारने लगा। जनकनन्दिनी सीता ने उस आवाज को श्रीराम की पुकार समझकर लक्ष्मण को तुरंत उसी ओर भेजा ॥ ४७-४९ ॥ इसी बीच उस दशानन रावण ने भी वहाँ आकर भगवती लक्ष्मी की अवतार जानकी का बलपूर्वक हरण कर लिया ॥ ५० ॥ यद्यपि वे महादेवी उसे उसी समय भस्म करने में समर्थ थीं, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया; क्योंकि रावण उनकी देवीरूप में सदा उपासना करता था ॥ ५१ ॥ पक्षी श्रेष्ठ जटायु ने राक्षस द्वारा हरण कर ले जायी जाती हुई उन सीता को बचाने के लिए दुष्ट रावण के साथ युद्ध किया। देवर्षिश्रेष्ठ ! राक्षस श्रेष्ठ रावण ने बलपूर्वक उसके दोनों पंख काट डाले और वह सीता को लेकर रात्रि में लङ्का को चला गया। उसने भगवती सीता को सुन्दर अशोक वाटिका में रखा। जलती हुई अग्नि के समान तेजस्विनी उस सती पर बलप्रयोग करने में वह समर्थ नहीं हुआ ॥ ५२-५४ ॥ इसके पश्चात अपनी स्थिति से रावण के लिए कल्याणकारिणी लङ्केश्वरी देवी ने लङ्का से अन्तर्धान होने का मन बना लिया ॥ ५५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीजानकीहरण’ नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ Content is available only for registered users. 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