August 7, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-52 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ बावनवाँ अध्याय प्रजापति दक्ष और प्रसूति की उग्र तपस्या तथा वरप्राप्ति, दक्ष और प्रसूति का गोकुल में नन्द और यशोदा के रूप में जन्म लेना अथः द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीमहादेवनारदसंवादे दक्षप्रसूतिनन्दयशोदाजन्मवर्णनं श्रीनारद जी बोले — देवकी के गर्भ से बालकरूप में प्रादुर्भूत होकर साक्षात् भगवती गोकुल में नन्दगोप के घर में किस कारण से निवास करती थीं? पूर्व जन्म में ये नन्द जी कौन थे और इनकी पत्नी यशोदा जी कौन थीं? इन्होंने पूर्वकाल में ऐसा कौन-सा तप किया था, जिससे श्यामसुन्दर-रूपवाली महेश्वरी काली को बालक रूप से प्राप्त किया? यशोदा के गर्भ से अपने अंश से उत्पन्न ये देवी भगवती दुर्गा पैदा होते ही क्यों चली गईं? उन्हें न तो माता यशोदा ने देखा और न तो पिता नन्द ने जाना। प्रभो ! वे जिस तरह से उत्पन्न हुईं और उन्होंने जैसी लीला की; इन सबके पीछे क्या कारण है? पार्वतीनाथ ! जगत्पते ! यह सब मुझे बताइए ॥ १-५ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — वत्स ! महामते ! आपने जो पूछा है, वह सब मैं आपको यथावत कहूँगा, मुनिश्रेष्ठ ! आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ ६ ॥ पूर्वकाल में दक्ष प्रजापति ने सती के विरह से दुःखी होकर उन्हें पराप्रकृति जानकर मन में ऐसा सोचा कि मैंने उग्र तप से जिन आद्या पराशक्ति को कन्या रूप में प्राप्त किया था, उन्हें अपने अविवेक के कारण न जानते हुए तथा शिवनिन्दा करने के कारण मैं उनसे वञ्चित हो गया। मैं तपस्या करके पुनः वैसा प्रयत्न करूँगा, जिससे वे भगवती पुनः मेरे यहाँ आविर्भूत हों ॥ ७-९ ॥ मन में ऐसा निश्चय करके दक्ष प्रजापति ने हिमालय के उत्तम शिखर पर जाकर एक सौ दिव्य वर्षों तक भगवती की आराधना की। मुनिश्रेष्ठ ! उनकी पत्नी प्रसूति ने भी दीर्घकाल तक उसी प्रकार भक्तिपूर्वक परमेश्वरी से प्रार्थना की। उन दोनों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती परमेश्वरी प्रसन्न हो गयी और बोलीं — ‘तुम दोनों का जो अभीष्ट हो, उसे माँग लो’ ॥ १०-१११/२ ॥ तब प्रजापति दक्ष ने कहा — माता ! शिवे ! आप कृपापूर्वक मेरे यहाँ फिर से जन्म लीजिए। महेश्वरी ! मेरी आपसे यही प्रार्थना है। प्रसूति ने कहा — माता ! शिवे ! मैं वात्सल्य स्नेह से युक्त होकर आपका पालन करूँ। इसी अभीष्ट के लिये यही मेरी प्रार्थना है ॥ १२-१३१/२ ॥ देवी जी बोलीं — प्रजापते ! मैं द्वापर के अन्त में पृथ्वी तल पर आपसे जन्म लेकर आपकी कन्या होऊँगी; इसमें संदेह नहीं है, किन्तु भगवान् शिव के प्रति पूर्व में आपके द्वारा किए गये अत्यन्त निन्दापरक कृत्य का स्मरण कर कन्या स्वरूपिणी मैं आपके घर में नहीं रहूँगी। मेरे जन्म की घटना को न जानने वाले मेरे पितारूप आपके घर से मैं देवताओं का कार्य सिद्ध करने के बहाने शीघ्र ही स्वर्ग चली जाऊँगी। माता प्रसूति ! आपने मुझसे यह जो प्रार्थना की है, वह भी निश्चित रूप से पूर्ण होगी; इसमें संशय नहीं है। मैंने प्रजापति कश्यप और अदिति को भी वर प्रदान किया था की मैं द्वापर के अन्त में आप दोनों के घर में स्वयं पुत्र रूप में जन्म लूँगी। उस समय मैं आपके उस तपस्या का फल प्रदान करने के लिये कुछ दिन लीलापूर्वक आपके घर में निवास करूँगी ॥ १४-१९१/२ ॥ श्रीमहादेव जी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर सृष्टि, पालन और संहार करने वाली वे भगवती उन दोनों के देखते-देखते अचानक अन्तर्धान हो गयीं। वे ही दक्ष नन्द हुए और उनकी पत्नी भी यशोदा हुईं। इसी कारण से यशोदा के गर्भ से उत्पन्न वे देवी भगवती जन्म लेते ही अन्तरिक्ष में चली गईं। महामुने ! साथ ही देवकी के गर्भ से उत्पन्न होकर भी श्याम-सुन्दररूप वाली उन भगवती ने कुछ समय तक सुरम्य गोकुल में निवास किया था ॥ २०-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्री महा भागवत महा पुराण के अन्तर्गत ‘दक्षप्रसूतिनन्दयशोदाजन्मवर्णन’ नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe