February 5, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -010 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ दसवाँ अध्याय उमापति शिव के माहात्म्य का वर्णन तथा शिव के आदेश से ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्यों का संचालन श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे दशमोऽध्यायः उमापतेर्महिमवर्णनं सनत्कुमार बोले — हे शिवभक्त ! हे महाप्राज्ञ ! हे भगवन्! हे नन्दिकेश्वर ! आप उमापति शिवजी की महिमा का पुनः वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ शैलादि बोले — हे सनत्कुमार! मैं परमेष्ठी भगवान् महेश्वर की सम्पूर्ण महिमा को आपसे संक्षेप में ही कहूँगा । इन शिवजी को प्रकृति का बन्धन तथा बुद्धि का बन्धन कभी नहीं हुआ, इसी प्रकार अहंकारबन्धन तथा मनोबन्धन भी इन्हें नहीं हुआ। उन्हें न तो चित्त का बन्ध हुआ और न तो श्रोत्र का बन्ध हुआ, उन्हें त्वचा और नेत्र का भी बन्ध कभी नहीं हुआ। हे सुव्रत ! उन शिव को जिह्वा, घ्राण, पाद, हाथ, वाणी, जननेन्द्रिय और शब्द आदि पाँच गुणों का भी कोई बन्धन नहीं हुआ। तत्त्ववेत्ता मुनियों ने नित्य शुद्ध स्वभाव के कारण उन शिव को नैसर्गिकरूप से नित्यबुद्ध तथा नित्यमुक्त बतलाया है ॥ २–६१/२ ॥ आदि, मध्य तथा अन्त से रहित परमेष्ठी पुरुषरूप शिव की आज्ञा से प्रकृति बुद्धि को उत्पन्न करती है और पुनः उन्हीं शिव के आदेश से इस प्रकृति की बुद्धि अहंकार की उत्पत्ति करती है । अन्तर्यामीरूप से देह में स्थित रहने वाले प्रसिद्ध स्वयम्भू परमेष्ठी शिव के आदेश से अहंकार दस इन्द्रियों, मन तथा शब्द आदि तन्मात्राओं को उत्पन्न करता है। उन्हीं धीमान् प्रभु महादेव के आदेश से ये तन्मात्राएँ आकाशादि महाभूतों को उत्पन्न करती हैं। तदनन्तर शिव की आज्ञा से ये सब महाभूत ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त देहधारियों के देह को उत्पन्न करते हैं। उन्हीं सर्वव्यापी शिव की आज्ञा से बुद्धि समस्त अर्थों का निश्चय करती है ॥ ७–१२ ॥ देहों में अन्तर्यामीरूप से प्रसिद्ध स्वयम्भू ऐश्वर्य स्वभावसिद्ध है और उनकी विभूतियाँ भी शिव का स्वभाव से ही हैं। उन्हीं शिव की आज्ञा से अहंकार सभी अर्थों का स्वायत्तीकरण करता है, चित्त स्मरण कराता है और मन संकल्प करता है। कान उन्हीं की शक्ति से श्रवण करता है। उन्हीं परमेष्ठी प्रभु शम्भु के आज्ञाबल से ही शब्द – स्पर्श आदि जो भी हैं, वे अपने-अपने विषयों में व्यवहार करते हैं। उन्हीं भगवान् शिव के आदेश से सभी देहधारियों की वाणी बोलने का काम करती है; वह ग्रहण आदि का कार्य कभी नहीं करती। उन्हीं शिव के [ बनाये गये] नियम से ही सभी प्राणियों का हाथ ग्रहण का कार्य करता है, वह चलने-फिरने का कार्य कभी नहीं कर सकता। शिव के आदेश से सभी प्राणि समुदाय का पैर गमन कार्य करता है, वह [मल आदि का] उत्सर्जन कभी नहीं कर सकता। उन परमेश्वर के आदेश से सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय का गुदास्थल उत्सर्जन – कार्य करता है, वह बोलने का कार्य कभी नहीं करता। उन्हीं सर्वव्यापी ईश्वर के वचन तथा आदेश से सभी प्राणियों की जननेन्द्रिय सदा आनन्द प्रदान करती है ॥ १३–२० ॥ उन्हीं परमेश्वर के आदेश से आकाश सभी प्राणियों को अवकाश प्रदान करता है। उन्हीं शिव के निर्देश से अपने प्राण आदि भेदों से प्रभंजन (वायु) सभी प्राणियों के शरीर को धारण करता है । सात स्कन्धों वाला मरुत् उन्हीं देवदेव के निर्देश पर अपने आवह आदि भेदों से स्थित होकर लोकयात्रा करता है। यही वायु परम प्रभु शिव की आज्ञा से नाग आदि पाँच भेदों से शरीरों में विद्यमान रहता है ॥ २१-२४ ॥ शंकर की आज्ञा से ही अग्नि देवताओं के लिये हव्य तथा पितरों के लिये कव्य का वहन करती है और भोजन का परिपाक करती है । उदर में स्थित अग्नि उन विश्वेश्वर के ही आदेश से प्राणियों के द्वारा ग्रहण किये गये सम्पूर्ण आहार को पचाती है। जल उन्हीं की आज्ञा से सभी प्राणियोंको जीवन प्रदान करता है। उनकी श्रेष्ठ आज्ञा सबके लिये अनुल्लंघनीय है । पृथ्वी उन्हीं की आज्ञा से चराचर जीवों को धारण करती है और उन्हीं देव शिव की आज्ञा से इन्द्र भी सभी प्राणियों का पालन करते हैं । यमराज भी उन्हीं शिव की आज्ञा से जीवित प्राणियों को व्याधियों से तथा मृत लोगों को सैकड़ों प्रकार की यातनाओं से कष्ट प्रदान करते हैं। तीनों लोकों में हर समय विद्यमान रहकर भगवान् विष्णु उन्हीं शिव की सभी लोगों के द्वारा अनुल्लंघ्य आज्ञा से देवताओं की रक्षा करते हैं और असुरों का संहार करते हैं तथा उन्हीं शिव के शासन से अधार्मिकों का नाश करते हैं ॥ २५-३० ॥ उन्हीं शिव की आज्ञा से वरुणदेव अपने जल से सभी लोकों को सन्तुष्ट करते हैं और उन्हीं की आज्ञा से असुरों को अपने पाशों से बाँधते हैं तथा बाद में जल में डुबा देते हैं। उन परमेष्ठी शिव के ही आदेश से धन के स्वामी कुबेर समस्त प्राणियों को उनके पुण्य के अनुसार धन प्रदान करते हैं। उन्हीं शाश्वत तथा सत्यस्वरूप परमात्मा की आज्ञा से सूर्यदेव उदय तथा अस्तरूप कार्य को करते हुए काल-निर्धारण करते हैं। काल के भी काल शिव के ही आदेश से कलाधार चन्द्रमा पुष्पों, औषधियों तथा जीवों को आनन्दित करते हैं ॥ ३१-३४ ॥ सभी आदित्य, वसुगण, समस्त रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण तथा अन्य समस्त देवता उन्हीं शिव के शासन से विनिर्मित हैं। गन्धर्व, देवसमुदाय, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच शिव के ही शासन में स्थित हैं । ग्रह, नक्षत्र, तारा, यज्ञ, वेद, तप तथा ऋषिगण — ये सब उन्हीं के शासन में अधिष्ठित हैं । पितरों के समूह, सातों समुद्र, पर्वत, नदियाँ, वन तथा सरोवर भी उन्हीं के शासन में रहते हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतु, वर्ष, पक्ष तथा मास उन्हीं के अनुशासन में अधिष्ठित हैं; उसी प्रकार युग, मन्वन्तर, पर, परार्ध तथा दूसरे अन्य कालभेद भी इन्हीं शम्भु के शासन से प्रवर्तित होते हैं ॥ ३५–४० ॥ उन्हीं बुद्धिसम्पन्न देवदेव के शासन से देवताओं की [विद्याधर आदि] आठ जातियाँ, पशु-पक्षियों की पाँच जातियाँ तथा मनुष्य प्रवर्तित होते हैं। सभी लोकों में रहने वाले इन देवता आदि चौदह योनियों में उत्पन्न सभी प्राणीसमूह इन्हीं शिव के शासन में रहते हैं। चौदह लोकों में स्थित रहने वाली सभी प्रजाएँ उन्हीं परमेश्वर प्रभु शिव के शासन के अधीन रहती हैं ॥ ४१-४३ ॥ पाताल आदि समस्त भुवन तथा [ जल आदि ] आवरणों से युक्त ब्रह्माण्ड इन्हीं के शासन से स्थित हैं । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी से युक्त समस्त वर्तमान ब्रह्माण्ड सब प्रकार से उन्हीं की आज्ञा से स्थित हैं; उन्हीं की आज्ञा से असंख्य ब्रह्माण्ड अनेक पदार्थों सहित उत्पन्न हुए और समाप्त भी हो गये। इसी प्रकार आगे होने वाले अनेक ब्रह्माण्ड होंगे और वे अपने सभी पदार्थों तथा आवरणों के साथ शिव की आज्ञा का पालन करेंगे ॥ ४४-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘उमापतिमहिमावर्णन ‘ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥ Content is available only for registered users. 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