श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -100
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
सौवाँ अध्याय
वीरभद्र द्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वर का दक्ष प्रजापति पर अनुग्रह
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शततमोऽध्यायः
शिवकृद्दक्षयज्ञविध्वंसन

ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी !] परमेश्वर भगवान् महेश्वर ने दधीच के कहने से विष्णुसहित सबको जीतकर पुनः यज्ञ का सेवन कैसे किया ? ॥ १ ॥

सूतजी बोले — [ हे ऋषियो !] भगवान् रुद्र ने दक्ष के अति महान् यज्ञ में विष्णु आदि प्रमुख देवताओं तथा सभी मुनियों को जला दिया। हे सुव्रतो! देवी के असहनीय वियोग के कारण उन शिवजी ने [अपने] भद्र नामक गण को भेजा। उस वीरभद्र ने अपने रोमों से उत्तम गणेश्वरों को उत्पन्न किया। तब गणेश्वरों के साथ रथ पर सवार होकर प्रतापशाली वीरभद्र ने प्रस्थान करने का निश्चय किया; जिनके सारथि भगवान् ब्रह्मा थे। हाथों में विविध आयुध लिये हुए वे सभी गणेश्वर तथा देवता शुभ विमानों पर आरूढ़ होकर सभी ओर से उन वीरभद्र के पीछे-पीछे चले। हे द्विजो ! हिमवान् के रमणीय तथा परम सुन्दर सुवर्णमय शिखर पर गंगाद्वार के समीप कनखल नामक शुभ तथा विख्यात स्थान है; उसी स्थान में उन दक्ष की यज्ञशाला थी ॥ २-७ ॥

जब शिवजी ने भगवान् वीरभद्र को [ यज्ञ को] दग्ध करने के लिये भेजा, उस समय लोकों को भयभीत करने वाला उत्पात होने लगा। पर्वत फटने लगे, पृथ्वी काँप उठी, वायु घूर्णित हो गये, समुद्र क्षुब्ध हो गया, अग्नि ने जलना बन्द कर दिया, सूर्य दीप्तिरहित हो गया, ग्रह प्रकाशहीन हो गये और देवता तथा दानव कोई भी प्रसन्न नहीं थे ॥ ८-१० ॥ उसी क्षण दूसरी कालाग्नि के समान भगवान् वीरभद्र ने अपने रोमों से उत्पन्न किये गये गणेश्वरों के साथ महात्मा [दक्ष]-के यज्ञस्थल में प्रवेश करके अमित तेज वाले दक्ष से कहा —  ‘हे दक्ष ! आज पिनाकधारी शिव ने मुनियों, देवताओं तथा मुनीश्वरों सहित आपको केवल स्पर्शमात्र से दग्ध करने के लिये मुझको भेजा है । ‘ — ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ गण ने उस यज्ञशाला को जला डाला ॥ ११-१३ ॥

अत्यन्त क्रुद्ध गणेश्वरों ने [ यज्ञ के] यूपों (स्तम्भों ) – को उखाड़कर फेंक दिया। गणेश्वरों ने प्रस्तोता तथा होतासहित सबको जला दिया। उन गणेश्वरों ने सभी को पकड़कर गंगा की धारा में फेंक दिया। महातेजस्वी तथा अदीन आत्मा वाले वीरभद्र ने उठे हुए इन्द्र के वज्र- युक्त हाथ को स्तम्भित कर दिया और अन्य देवताओं के हाथों को भी स्तम्भित कर दिया। उन्होंने लीलापूर्वक अपने नाखूनों के अग्रभाग से भग के नेत्रों को निकालकर पुनः मुष्टिका से प्रहार करके पूषा के दाँतों को तोड़कर गिरा दिया ॥ १४- १६१/२

इसके बाद प्रतापी भगवान् वीरभद्र ने [ अपने ] पैर के अँगूठे से बिना प्रयास के चन्द्रदेव को घर्षित कर दिया और उन प्रभु इन्द्र के सिर को काट दिया। महाबली वीरभद्र ने लीलापूर्वक अग्निदेव के दोनों हाथों को काटकर तथा जीभ उखाड़कर पैर से उनके सिर पर प्रहार किया ॥ १७-१९ ॥ तत्पश्चात् प्रभु भगवान् वीरभद्र ने स्वयं यम के दण्ड को काट दिया और महाबली ईशानदेव को त्रिशूल से मारा। उन्होंने [वसु, रुद्रादित्यरूप] तैंतीस देवताओं तथा इन्हीं तीनों के तीन सौ तथा तीन हजार भेदों को लीलापूर्वक अनायास ही मार करके [ इन्द्र, अग्नि, सोमरूप] तीन प्रधान देवों, मुनीश्वरों तथा युद्ध के लिये सन्नद्ध अन्य सभी देवताओं को भी मार डाला ॥ २०-२२१/२

इसके बाद महातेजस्वी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु [ अपना ] चक्र उठाकर आवेशयुक्त होकर उन रुद्र के साथ युद्ध करने लगे; उन दोनों के बीच अतिभयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उन विष्णु के योगबल से हाथों में शंख-चक्र-गदा धारण किये हुए, दिव्य देह वाले तथा परम दारुण असंख्य योद्धा उत्पन्न हो गये ॥ २३–२५१/२

तब उन वीरभद्रदेव ने नारायण के समान प्रभा वाले उन सबको भी मार करके रणभूमि में ही गदा से लीलापूर्वक विष्णुदेव के सिर पर प्रहार किया; इसके बाद उनके वक्ष:स्थल पर प्रहार किया, तब वे पुरुषोत्तम (विष्णु) अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इसके बाद उठ करके उन [वीरभद्र ] को मारने के लिये चक्र उठाकर वे श्रीमान् पुरुषश्रेष्ठ प्रभु क्रोध से लाल नेत्रों वाले होकर खड़े हो गये ॥ २६-२८१/२

उन [विष्णु] का भयानक तथा कालादित्य के समान तेजवाला जो चक्र था, उसको अदीन आत्मा वाले वीरभद्र ने स्तम्भित कर दिया; वह हाथ में पड़ा ही रह गया और हिला तक नहीं और वीरभद्र के द्वारा स्तम्भित कर दिये गये वे विष्णु भी पर्वत की भाँति स्थिर होकर खड़े रहे ॥ २९-३० ॥ इसके बाद वीरभद्र ने तीन बाणों से विष्णु के शार्ङ्ग [नामक ] धनुष को काट दिया और वह तीन टुकड़ों में हो गया एवं शार्ङ्ग धनुष के सिरे से लग जाने के कारण विष्णु का सिर कट गया। उनका कटा हुआ सिर शीघ्र ही [ भगवान् ] शंकर की नि:श्वास वायु से प्रेरित होकर रसातल में चला गया। तत्पश्चात् वहाँ उनकी आहवनीय अग्नि ने प्रवेश किया। ध्वस्त कलश वाले तथा तोरणों सहित टूटे हुए यूपवाले उस जलते हुए यज्ञवाट को देखकर यज्ञदेव भी भाग गये। तब मृग के रूप से आकाश की ओर भागते हुए उस यज्ञदेव को पकड़कर वीरभद्र ने उसे सिरविहीन कर दिया । तत्पश्चात् महाबली वीरभद्र ने प्रजापति, धर्म, जगद्गुरु कश्यप, अरिष्टनेमि, मुनीश्वर बहुपुत्र, मुनि अंगिरा और कृष्णाश्व के सिर पर पैर से प्रहार किया; हे श्रेष्ठ द्विजो ! उसने यशस्वी दक्ष के सिर पर भी पैर से प्रहार किया और उनके सिर को काट लिया तथा उसे अग्नि में जला दिया। तदनन्तर प्रतापशाली वीरभद्र अपने नाखून के अग्रभाग से देवमाता सरस्वती की नासिका का अग्रभाग काटकर ऐश्वर्ययुक्त होकर सबके बीच उसी तरह स्थित हुए जैसे श्मशान में [भगवान्] भव ॥ ३१–३८१/२

इसी समय महातेजस्वी प्रभु ब्रह्माजी प्रार्थना करते हुए प्रणत होकर वीरभद्र से बोले — ‘हे भद्र! क्रोध मत कीजिये, देवतागण नष्ट हो गये हैं, हे सुव्रत ! प्रसन्न होइये और अपने रोमों से उत्पन्न गणेश्वरों सहित सबको क्षमा कीजिये ‘ ॥ ३९-४०१/२

तब वे वीरभद्र भी परमेष्ठी ब्रह्मा के प्रभाव से धीरे-धीरे शान्ति को प्राप्त हुए; उनकी आज्ञा से शान्त होकर वे खड़े हो गये । उस समय भगवान् महादेव वृषभध्वज अन्तरिक्ष में स्थित थे; देव ब्रह्मा ने गणोंसहित उन सर्वदाता, शर्व, सभी लोकों के स्वामी भगवान् भव से प्रार्थना की। तब उन्होंने मारे गये उन सभी को पूर्व की भाँति शरीर प्रदान कर दिया। महेश्वर ने इन्द्र, महात्मा विष्णु, दक्ष, मुनीन्द्र तथा अन्य लोगों को सिर प्रदान कर दिया, देवमाता सरस्वती को नासिका प्रदान कर दी, नष्ट हुए लोगों को जीवन प्रदान कर दिया; साथ ही उन्होंने विविध वर भी प्रदान किये। भगवान् महाप्रभु भव ने लीलापूर्वक ध्वस्तमुख वाले दक्ष का सिर सहित मुख बना दिया ॥ ४१–४६१/२

तब चेतनाप्राप्त दक्ष ने भी उठकर हाथ जोड़ करके देवदेवेश वृषभध्वज शंकर की स्तुति की। उनके द्वारा स्तुत होकर महातेजस्वी शिव ने उत्तम कर्म वाले उन दक्ष को विविध वर प्रदान करके उन्हें गाणपत्य [पद] प्रदान किया ॥ ४७-४८१/२

तब सभी देवताओं ने देवेश परमेश्वर की स्तुति की। भगवान् नारायण ने भी हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। ब्रह्मा तथा सभी मुनियों ने भी ब्रह्मा की सृष्टि करने वाले देवदेवेश नीलकण्ठ वृषभध्वज की पृथक्- पृथक् स्तुति की। इसके बाद उन देवताओं पर अनुग्रह करके शिवजी भी अन्तर्धान हो गये ॥ ४९-५१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवकृत दक्षयज्ञविध्वंसन’ नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०० ॥

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