श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -106
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
एक सौ छठा अध्याय
दारुकासुर के विनाश के लिये भगवान् शिव द्वारा अपने शरीर से काली तथा अष्टभैरवों को प्रकट करना एवं शिवताण्डव नृत्य की कथा
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे षडधिकशततमोऽध्यायः
शिवताण्डवकथनं

ऋषिगण बोले —  [ हे सूतजी!] हम लोगों ने स्कन्द के अग्रज का प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हम लोगों को यथार्थरूप से यह बतायें कि शम्भु के नृत्य का आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ ? ॥ १ ॥

सूतजी बोले —  दारुक नामक एक दैत्य असुरों में उत्पन्न हुआ। तपस्या से पराक्रम प्राप्त करके कालाग्नि के समान वह [असुर] देवताओं तथा उत्तम द्विजों को पीड़ित करने लगा ॥ २ ॥ उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, यम, इन्द्र आदि के पास पहुँचकर उन देवताओं को सताने लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए । ‘यह असुर स्त्रीवध्य है’ — ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्ध के लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदि के साथ वह असुर युद्ध करने लगा ॥ ३-४ ॥

हे द्विजो ! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [देवतागण] ब्रह्मा के पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुन: उन [ ब्रह्मा के] साथ उमापति के यहाँ जाकर पितामह को आगे करके [ शिव की ] स्तुति करने लगे। इसके बाद देवेश के निकट जाकर अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्मा ने कहा —  ‘हे भगवन् ! दारुक महाभयंकर है; हम लोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं। स्त्री के द्वारा वध्य उस दैत्य दारुक का संहार करके आप हम लोगों की रक्षा कीजिये ‘ ॥ ५–७ ॥

ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर भग के नेत्रों को नष्ट करने वाले भगवान् देवेश ने देवी गिरिजा से हँसते हुए कहा — ‘हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकों के हित के लिये इस स्त्रीवध्य दारुक के वध हेतु आज आपसे प्रार्थना करता हूँ’॥ ८-९ ॥

तब उनका वचन सुनकर संसार को उत्पन्न करने वाली उन देवेश्वरी ने जन्म के लिये तत्पर होकर शिव के शरीर में प्रवेश किया। वे [पार्वती ] देवताओं में श्रेष्ठ देवेश्वर में अपने सोलहवें अंश से प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये । मंगलमयी पार्वती को पूर्ववत् शम्भु के समीप स्थित देखकर सब कुछ जानने वाले ब्रह्मा भी उनकी माया से मोहित हो गये थे ॥ १०-१२ ॥ उन देवदेव के शरीर में प्रविष्ट हुईं उन पार्वती ने उनके कण्ठ में स्थित विष से अपने शरीर को बनाया ॥ १३ ॥ इसके बाद उन पार्वती को विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव] – ने अपने तीसरे नेत्र से कालकण्ठी (कृष्णवर्ण के कण्ठ वाली) कपर्दिनी काली को उत्पन्न किया ॥ १४ ॥

जब विष के कारण कृष्णवर्ण के कण्ठ वाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुईं। अब असिद्धि के कारण दैत्यों की पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [ शिव] – को प्रसन्नता हुई ॥ १५ ॥ विष से अलंकृत कृष्णवर्ण के कण्ठ वाली तथा अग्नि के सदृश स्वरूप वाली उस प्रादुर्भूत काली को देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु – ब्रह्मा- इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भय के कारण भागने लगे ॥ १६ ॥ उनके ललाट में शिव की भाँति [ तीसरा ] नेत्र था, मस्तक पर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठ में [कालकूट ] विष था, हाथ में विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पों के हार-कुण्डल आदि ] आभूषण धारण किये हुए थीं ॥ १७ ॥ काली के साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणों से विभूषित देवियाँ, सिद्धों के स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥ तब उन पार्वती की आज्ञा से परमेश्वरी [काली ]- ने सुराधिपों को मारने वाले असुर दारुक का वध कर दिया ॥ १९ ॥

हे श्रेष्ठ विप्रो ! उनके अतिशय वेग तथा क्रोध की अग्नि से यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब ईश्वर भव भी माया से बालरूप धारणकर उन काली की क्रोधाग्नि को पीने के लिये [काशी में] श्मशान में [जाकर ] रोने लगे ॥ २०-२१ ॥ हे द्विजो ! उन बालरूप ईशान को देखकर उनकी माया से मोहित उन काली ने उन्हें उठाकर मस्तक सूंघकर अपना वक्षस्थित स्तन ग्रहण कराया ॥ २२ ॥ तब वे बालरूप शिव दूध के साथ उनका क्रोध भी पी गये और इस प्रकार वे इस क्रोध से क्षेत्रों की रक्षा करने वाले हो गये। उन बुद्धिमान् क्षेत्रपाल [भैरव]-की भी आठ मूर्तियाँ हो गयीं। इस प्रकार वे काली उस बालक के द्वारा क्रोधमूर्च्छित (नष्ट संज्ञावाली) कर दी गयीं ॥ २३-२४ ॥

इसके बाद प्रीतियुक्त देवदेव शिव ने इन [काली]- की प्रसन्नता के लिये सन्ध्याकाल में श्रेष्ठ भूतों तथा प्रेतों के साथ ताण्डव [ नृत्य] किया ॥ २५ ॥ शम्भु के नृत्यामृत का कण्ठपर्यन्त पान करके वे परमेश्वरी [उस] श्मशान में सुखपूर्वक नाचने लगीं और योगिनियाँ भी उनके साथ नाचने लगीं ॥ २६ ॥ वहाँ पर ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र सहित सभी देवताओं ने सभी ओर से काली को तथा पुनः देवी पार्वती को प्रणाम किया और उनकी स्तुति की ॥ २७ ॥

[हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेप में शूलधारी प्रभु के ताण्डवनृत्य का वर्णन कर दिया; ‘योग के आनन्द के कारण विभु [वि] – का ताण्डव होता है’ – ऐसा अन्य लोग कहते हैं ॥ २८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवताण्डवकथन’ नामक एक सौ छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०६ ॥

See Also:-

1. दारुकावन में राक्षसों के उपद्रव एवं सुप्रिय वैश्य की शिवभक्ति का वर्णन

2. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति एवं उसके माहात्म्य का वर्णन

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