श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -108
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
एक सौ आठवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्ण का गुरु उपमन्यु के आश्रम में जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रत का माहात्म्य
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टोत्तरशततमोऽध्यायः
पाशुपातव्रत माहात्म्य वर्णनं

ऋषिगण बोले —अक्लिष्ट कर्म वाले वासुदेव श्रीकृष्ण ने धौम्य के ज्येष्ठ भ्राता [ उपमन्यु ] -का दर्शन किया था और उनसे दिव्य पाशुपतव्रत ग्रहण किया था । हे सूतजी ! बुद्धिमान् श्रीकृष्ण ने उनसे यह ज्ञान कैसे प्राप्त किया; उस पापनाशिनी कथा को बताने की कृपा कीजिये ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले —  [ हे ऋषियो !] सनातन वासुदेव अपनी इच्छा से अवतीर्ण हुए थे, फिर भी उन्होंने मानवरूप की निन्दा करते हुए देहशुद्धि की थी ॥ ३ ॥ भगवान् [ श्रीकृष्ण ] पुत्र-प्राप्ति हेतु तप करने के लिये उपमन्यु के आश्रम में गये और उन्होंने वहाँ उन मुनि का दर्शन किया । हे द्विजो ! उन धौम्याग्रज को देखकर अत्यन्त सम्मान के साथ उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्ण ने उन्हें नमस्कार किया ॥ ४-५ ॥ उन मुनि के अवलोकनमात्र से बुद्धिमान् श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण देहजनित तथा कर्मजनित मल नष्ट हो गया ॥ ६ ॥

हे विप्रेन्द्रो ! महातेजस्वी उपमन्यु ने भस्मोद्धूलन करके प्रसन्नचित्त होकर क्रम से अग्नि, वायु आदि मन्त्रों के द्वारा उन्हें दिव्य पाशुपत ज्ञान प्रदान किया ॥ ७१/२

द्विजो ! मुनि की कृपा से वे श्रीकृष्ण पाशुपतव्रत में मान्य हो गये । [ अपनी] तपस्या से एक वर्ष के अन्त में पार्वती तथा गणोंसहित अव्यग्र देव महेश्वर का दर्शन करके उन्होंने अपना पुत्र प्राप्त किया। उसी समय से प्रशस्त व्रत वाले दिव्य मुनिगण तथा पशुपति के सभी भक्त सदा उन कृष्ण को घेरकर स्थित रहने लगे ॥ ८-१० ॥

[ हे ऋषियो !] सदा सभी प्राणियों की मुक्ति के लिये मैं अन्य व्रत को भी बताऊँगा । सुवर्णमयी मेखला (परिनालिका) बनाकर उसके आधार, दण्डधारण (जलनिवारक बाहरी भाग), पिण्डिक (लिङ्ग), व्यजन, दीक्षादण्ड – यह सब सोने का बनाना चाहिये; साथ ही मषीपात्रयुक्त लेखनी, छुरी सहित कैंची तथा जलपात्र भी स्वर्णमय बनाकर इन सभी सामग्रियों को भस्म से उद्धूलित शरीर वाले पुरुषों के द्वारा या स्त्री के द्वारा किसी पशुपति- भक्त को दे दिया जाना चाहिये । बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अपने धन-सामर्थ्य के अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबे की ही सामग्री समर्पित करे और उस योगी की पूजा करे ॥ ११–१४ ॥ [ऐसा दान करने वाले] वे सभी लोग सम्पूर्ण कुलसहित पापमुक्त होकर दिव्य रुद्रपद को जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः गृहस्थ इस दान के द्वारा संसार [चक्र ] – से छूट जाता है । योगियों के लिये यह दान करने से शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई उत्तम मोक्ष चाहता हो, तो उसे भव्य राज्य, पुत्र, धन, अश्व, यान – यहाँ तक कि सर्वस्व का दान कर देना चाहिये। [इस ] अनित्य शरीर से भव्य, नित्य ( शाश्वत) तथा संसार – सागर से पार करने वाले पाशुपतव्रत को प्रयत्नपूर्वक अवश्य सिद्ध करना चाहिये ॥ १५–१८ ॥

[हे ऋषियो ! ] मैंने संक्षेप में आप लोगों को यह सब बता दिया। जो इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह विष्णुलोक को जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ १९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन’ नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०८ ॥
॥ समाप्तश्चायं पूर्वभागः ॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराणका पूर्वभाग पूर्ण हुआ ॥

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