January 11, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -021 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ इक्कीसवाँ अध्याय ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकविंशोऽध्यायः ब्रह्मविष्णु कृतं महेश्वरस्तुतिः सूतजी बोले — तदनन्तर ब्रह्मा को आगे करके वे गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु अतीत, भविष्य तथा वर्तमान कल्पों से सम्बन्धित महादेवजी के वेदप्रतिपादित नामों से इस स्तोत्र का वाचन करने लगे ॥ ११/२ ॥ विष्णुजी बोले — हे सुव्रत ! आप अनन्त तेजसम्पन्न भगवान् को नमस्कार है। क्षेत्राधिपति, बीजी तथा त्रिशूलधारी को नमस्कार है । सुमेंद्र ( सुन्दर लिङ्ग वाले), अर्च्यमेंद्र ( पूजनीय लिङ्ग वाले), दण्डी तथा रूक्षरेता ( रूक्ष वीर्य वाले) – को नमस्कार है ॥ २-३ ॥ ज्येष्ठ को, श्रेष्ठ को, पूर्व को तथा प्रथम को नमस्कार । मान्य को पूज्य को तथा सद्योजात को नमस्कार है। गह्वर (अगम्य ) – को, घटेश (चेष्टमान जीवों के स्वामी) – को तथा आकाश एवं वृक्ष की छाल को अम्बर (वस्त्र) – के रूप में धारण करने वाले तथा हम जैसे प्राणियों कें स्वामी को नमस्कार है ॥ ४-५ ॥ वेदों के स्वामी तथा स्मृतियों के स्वामी को नमस्कार है । कर्मों तथा दान आदि के स्वामी और द्रव्यों के स्वामी को नमस्कार है ॥ ६ ॥ योग के प्रभु को नमस्कार है और सांख्य के प्रभु को नमस्कार है। ध्रुव से सम्बन्धित ऋषियों अर्थात् सप्तर्षियों के प्रभु को नमस्कार है ॥ ७ ॥ नक्षत्रों के स्वामी को नमस्कार है, ग्रहों के स्वामी को नमस्कार है, आपको नमस्कार है। विद्युताग्नि से युक्त मेघों की गर्जना के स्वामी को नमस्कार है ॥ ८ ॥ महासागरों के स्वामी तथा द्वीपों के स्वामी को नमस्कार है। पर्वतों तथा भारत आदि नौ वर्षों के स्वामी को नमस्कार है। नदियों तथा नदों के स्वामी को नमस्कार है । महौषधियों तथा वृक्षों के स्वामी को नमस्कार है ॥ ९-१० ॥ अनेकविध धर्मों के कारणरूप धर्मवृक्ष को नमस्कार है, धर्म को नमस्कार है तथा स्थितियों के स्वामी को नमस्कार है । परार्ध के स्वामी तथा पर के स्वामी को नमस्कार है ॥ ११ ॥ सभी रसों के स्वामी तथा रत्नों के स्वामी को नमस्कार है । क्षणों के स्वामी तथा लवों ( क्षणांश) – के स्वामी को नमस्कार है। दिन रात, अर्धमास (पक्ष) तथा मासों के स्वामी को नमस्कार है। ऋतुओं के स्वामी तथा संख्याओं के स्वामी आप शिव को नमस्कार है ॥ १२-१३ ॥ अपरार्ध तथा परार्ध के स्वामी को नमस्कार है । पुराणों के स्वामी को नमस्कार है । सर्गों के स्वामी को नमस्कार है । मन्वन्तरों के स्वामी तथा योग के स्वामी को नमस्कार है । ( जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्जरूप) चार प्रकार की सृष्टि के स्वामी को नमस्कार है । अनन्त ज्योति को नमस्कार है ॥ १४-१५ ॥ कल्प के उदय में प्रणीत धर्मशास्त्रों तथा वार्ताओं (कृषि एवं वाणिज्यशास्त्रों ) – के स्वामी को नमस्कार है । विश्व के स्वामी को नमस्कार है । ब्रह्माधिपति को नमस्कार है। विद्याओं के स्वामी तथा विद्याधिपति को नमस्कार है। व्रतों के स्वामी को नमस्कार है । व्रताधिपति को नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ मन्त्रों के स्वामी तथा मन्त्रों के अधिपति आपको नमस्कार है । पितरों के पति तथा पशुओं के पति को नमस्कार है। श्रेष्ठ वाणी वाले तथा पुराणश्रेष्ठ आप शिव को नमस्कार है। पशुओं के पति तथा गोवृषेन्द्रध्वज को नमस्कार है ॥ १८-१९ ॥ प्रजाओं के पति तथा सिद्धियों के पति को नमस्कार है। दैत्य, दानव तथा राक्षससमूहों के पति को नमस्कार है। गन्धर्वों तथा यक्षों के पति को नमस्कार है। गरुड़, उरग, सर्प तथा पक्षियों के पति को नमस्कार है ॥ २०-२१ ॥ सभी गुप्त पिशाचों के गुह्याधिपति को नमस्कार है। गोकर्ण, गोप्ता तथा शंकुकर्ण को नमस्कार है । वाराह को, अप्रमेय को, ऋक्ष को तथा विरज को नमस्कार । देवताओं के पति तथा गणों के पति को नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ जलों के पति तथा ओजों के पति को नमस्कार है। लक्ष्मीपति, लक्ष्मी के रक्षक तथा पृथ्वी के पालन- कर्ता को नमस्कार है । शक्तिमान् तथा शक्तिहीन प्राणियों के समुच्चयरूप शिव को नमस्कार है। अक्षोभ्यक्षोभण को नमस्कार है। दीप्तभृंग, एकशृंग, वृषभ तथा ककुद्मी को नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥ स्थैर्य, तेजोमयवपु तथा अनुव्रत को नमस्कार अतीत, भविष्य तथा वर्तमानरूप शिव को नमस्कार है। सुवर्चा, वीर्य, शूर, अजित, वरद, वरेण्य, पुरुष तथा महात्मा को नमस्कार है ॥ २६-२७ ॥ भूत, भव्य, महत् तथा प्रभव को नमस्कार है । जन, तप तथा वरद को नमस्कार है; आपको नमस्कार अणु (परम सूक्ष्म), महत् (महा – आकारसम्पन्न) तथा सर्वगत (सर्वत्र व्याप्त रहने वाले) को नमस्कार है। बन्ध (जन्म-मरण-बन्धन), मोक्ष, स्वर्ग तथा नरकरूप को नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥ भव, देव, इज्य (देवताओं के आचार्य) तथा याजक (यज्ञ कराने वाले) को नमस्कार है । प्रत्युदीर्ण (महान्), दीप्त (आलोकयुक्त), तत्त्व तथा अतिगुण (गुणातीत)-को नमस्कार है। पाश, शस्त्र तथा आभरण को नमस्कार है। हुत (हविद्रव्यरूप), उपहूत (यज्ञ आदि में आवाहन किये जाने वाले), प्रहुतप्राशित (भक्तिपूर्वक दी गयी आहुतिको भोज्यरूप में ग्रहण करने वाले) शिव को नमस्कार है ॥ ३०-३१ ॥ इष्ट (यज्ञकर्म आदि), पूर्त (कूप-तड़ागादि- निर्माण), अग्निष्टोमद्विजरूप शिव को नमस्कार है। सदस्यरूप, दक्षिणारूप तथा अवभृथ (यज्ञ की समाप्ति के अनन्तर शुद्धि के लिये किये जाने वाले स्नान ) – रूप शिव को नमस्कार है। अहिंसा – अप्रलोभ- पशुमन्त्रौषधरूप, पुष्टिप्रदायक, सुशील तथा सदाचारी को नमस्कार है ॥ ३२-३३ ॥ अतीत, भविष्य तथा वर्तमानकालरूप अर्थात् सर्वकालव्यापी शिव को नमस्कार है। सुवर्चा ( महान् शक्तिमान् ), वीर्य, शूर, अजित, वरद, वरेण्य, पुरुष, महात्मा, भूत, भव्य, महत् तथा अभयरूप शिव को नमस्कार है ॥ ३४-३५ ॥ जरासिद्ध (नित्य तरुणरूप), सुवर्णरूप तथा वरदानी शिव आपको नमस्कार है । अधोरूप, महानुरूप तथा निद्रितों के पति को नमस्कार है ॥ ३६ ॥ इन्द्रियरूप वाहन वाले, आस्वादनरूप, हार धारण करने वाले, विश्व, विश्वरूप तथा सभी ओर से सिर वाले शिव को नमस्कार है। सभी दिशाओं में हाथों तथा पैरों वाले, अप्रतिम, हव्य, कव्य तथा हव्यवाहरूप रुद्र को नमस्कार है ॥ ३७-३८ ॥ सिद्ध, पवित्रात्मा, यज्ञरूप, यज्ञपरायण, सुवीर, सुघोर, अक्षोभ्यका भी क्षोभण करने वाले, सुन्दर प्रजाओं वाले, तीव्र मेधा वाले, दीप्त, भास्कर, बुद्ध, शुद्ध, प्रतिष्ठित तथा विस्तृत शिव को नमस्कार है ॥ ३९-४० ॥ स्थूल, सूक्ष्म, दृश्य, अदृश्य, वृष्टि, ताप, वायु तथा शिशिर (ठंड ) – रूप शिव को नमस्कार है । वक्रकेश (टेढ़े बालों वाले) तथा उन्नत ऊरुप्रदेश एवं वक्षःस्थल वाले शिव को नमस्कार है । सुन्दर वर्ण वाले तथा तप्त स्वर्ण के तुल्य आभा वाले शिव को बार-बार नमस्कार है ॥ ४१-४२ ॥ विरूपाक्ष, लिङ्गरूप, पिंगल, महान् ओज से सम्पन्न, वृष्टि का अवरोध करने वाले तथा सौम्य दृष्टि वाले शिव को नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४३ ॥ धूम्र, श्वेत, कृष्ण, लोहित, पिशित, पिशंग तथा पीतरूप धनुर्धर शिव को नमस्कार है । विशेषतायुक्त तथा विशेषतारहित शिव को नमस्कार है। ईज्य, पूज्य त उपजीव्य को नमस्कार है ॥ ४४-४५ ॥ क्षेम्य, वृद्ध, वत्सल को बार- बार नमस्कार है। भूत, सत्य तथा सत्य-असत्यरूप शिव को नमस्कार है। पद्मवर्ण, मृत्यु के विनाशक तथा मृत्युरूप शिव को नमस्कार है। गौर, श्याम, कद्रू ( भूरावर्ण) तथा लोहितवर्ण शिव को नमस्कार है ॥ ४६-४७ ॥ महासन्ध्याकालीन बादलों के समान वर्ण वाले, सुन्दर दीप्ति वाले, दीक्षा प्रदान करने वाले, हाथ में कमल धारण करने वाले, दिग्वास (दिशाओं में वास करने वाले अथवा दिगम्बर) तथा जटाजूटधारी शिव को नमस्कार है। अप्रमाणरूप (इयत्तारहित), समग्ररूप, अव्यय, मरणरहित, रूप, गन्ध, नित्य तथा अविनाशी शिव को नमस्कार है ॥ ४८-४९ ॥ उपस्थित होकर पालन-पोषण करने वाले, अस्थिर, कर्मरूप, दुर्गम, महेश, क्रोधरूप, कपिल, तर्क – अतर्क से परे विग्रह वाले, बलवान्, वेगरूप, बालुका में विराजमान, प्रवाहरूप, स्थित, व्यापक, उत्तम मेधासम्पन्न, पृथिवी का लालन-पालन करने वाले, चन्द्रकला धारण करने वाले, चित्ररूप, विचित्र वेष धारण करने वाले, विचित्र वर्ण वाले तथा यज्ञरूप शिव आपको नमस्कार है ॥ ५०-५२ ॥ चेकितान (विशिष्ट ज्ञान वाले), संतोषरूप तथा निहित (अत्यन्त हितकारक) आपको नमस्कार है। क्षमाशील, इन्द्रियजित् तथा वज्र के समान आघात करने वाले शिव को नमस्कार है ॥ ५३ ॥ राक्षसों का विनाश करने वाले, विष का शमन करने वाले, शुभ्र ग्रीवा वाले, क्रुद्ध प्रतीत होते हुए भी सौम्य रूप वाले, सर्परूप, यमराजस्वरूप, तीक्ष्ण शस्त्र धारण करने वाले, आनन्दस्वरूप, मोदसदृश, संन्यासियों के द्वारा ज्ञेय आप शिव को नमस्कार है । रोगविकार से रहित, सर्वरूप महाकाल को नमस्कार है ॥ ५४-५५ ॥ ओंकार, ओंकारेश्वर, भग नामक देवता के नेत्र का नाश करने वाले, मृगव्याधरूप, दक्षरूप, दक्षप्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने वाले, सभी प्राणियों के आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, अतिशयस्वरूप, त्रिपुर के संहर्ता, सुन्दर शस्त्र धारण करने वाले, धनुर्धर, कुठार धारण करने वाले, दक्ष यज्ञ में पूषा नामक देवता का दाँत तोड़ने वाले तथा भग नामक देवता को नेत्रविहीन करने वाले, मनोरथ पूर्ण करने वाले, वरिष्ठ, कामदेव का शरीर दग्ध करने वाले, रणभूमि में विकराल वक्त्र वाले, गजाननरूप, दैत्यों के संहारक हम ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं के भी स्वामी, दैत्यों को क्रन्दित करने वाले, शीत का निवारण करने वाले, तीक्ष्ण रूप वाले, मृदुचर्म धारण करने वाले, नित्य श्मशान से अनुराग रखने वाले तथा हाथ में प्रज्वलित काष्ठ धारण करने वाले भगवान् शिव को नमस्कार है ॥ ५६-६० ॥ प्रिय भक्तों का पालन करने वाले, मुण्ड की माला धारण करने वाले, शोकरहित, अनेकविध भूतों से घिरे रहने वाले शिव को नमस्कार है। नर-नारी का विग्रह धारण करने वाले (अर्धनारीश्वर ), देवी पार्वती का सदा प्रिय करने वाले, जटाधारी, मुण्डी, सर्पों का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, नृत्य में अभिरुचि रखने वाले, नृत्यशाला के प्रति प्रीति रखने वाले, क्रोधरूप, गीतप्रिय तथा मुनियों के द्वारा स्तुत्य शिव को नमस्कार है ॥ ६१–६३ ॥ हाथी का मस्तक काटने वाले अर्थात् सिंहरूप, तीक्ष्ण, अप्रिय, प्रिय, अति भयानक, प्रचण्ड, भग का प्रमथन करने वाले, सिद्धसमुदाय द्वारा नित्य अनुगीत महाभाग को नमस्कार है । मुक्तरूप से अट्टहास करने वाले, क्रोधावस्था में सिंहगर्जना करके प्रकम्पित शरीर वाले शिव को नमस्कार है ॥ ६४-६५ ॥ तीव्र नाद करने वाले, कूदने – फाँदने वाले तथा प्रमुदित आत्मा वाले शिव को नमस्कार है। श्वास लेने वाले, दौड़ने वाले, अधिष्ठाता तथा आनन्दरूप शिव को नमस्कार है। ध्यान करने वाले, जम्भाई लेने वाले, रुदन करने वाले तथा द्रवित होने वाले शिव को नमस्कार है । छलाँग लगाने वाले, क्रीड़ा करने वाले तथा लम्बे उदरयुक्त शरीर वाले शिव को नमस्कार है ॥ ६६-६७ ॥ विधि-निषेधरूप (कृत्य-अकृत्य), मुण्ड, विकटरूप शिव को नमस्कार है । उन्मत्त देहवाले तथा किंकिणी से शोभायमान शरीर वाले शिव को नमस्कार है । विकृत वेष धारण करने वाले, क्रूर, कोपाविष्ट, अप्रमेय, रक्षा करने वाले, दीप्त तथा सगुणरूप शिव को नमस्कार है ॥ ६८-६९ ॥ वामभाग में अपनी प्रिया गौरी से विभूषित, सुन्दर, चूड़ामणि धारण करने वाले, बालरूप विग्रह वाले तथा अप्रमेय गुणों से सम्पन्न शिव को नमस्कार है ॥ ७० ॥ सद्गुणों से युक्त, निगूढ़ तथा अगम्य गति वाले शिव को नमस्कार । सदाचारीजनों द्वारा सेवित आपके दोनों चरण लोकधात्री इस पृथ्वी के तुल्य हैं। सभी सिद्धियों तथा योगों का अधिष्ठानस्वरूप मध्यस्थित आपका उदर तारासमूहों से विभूषित विस्तृत अन्तरिक्ष के समान है। आपके वक्षःस्थल पर शोभायमान श्रीयुक्त हार तारापुंजों के मार्ग की भाँति प्रतीत होता है। केयूर तथा अंगद से विभूषित आपके दस हाथ दसों दिशाओं के तुल्य हैं ॥ ७१–७३ ॥ नीले अंजन के समूह के तुल्य विस्तृत परिधि वाला आपका श्रीयुक्त कण्ठ स्वर्णसूत्र से सुशोभित है। विकराल दाँतों वाला आपका मुख अत्यन्त भयावह तथा अनुपमेय है। पद्ममाला तथा पगड़ी से शोभायमान आपका सिर आकाश की भाँति अत्यधिक शोभा को प्राप्त हो रहा है ॥ ७४-७५ ॥ सूर्य में प्रकाश, चन्द्रमा में कान्ति, पर्वत में स्थिरता, वायु में शक्ति, अग्नि में उष्णता, जल में शीतलता तथा आकाश में शब्दरूप विद्यमान — ये गुण अविनाशी शिव के निष्पन्द अर्थात् अल्पांश से उत्पन्न हुए हैं — ऐसा मनीषी लोग मानते हैं । जप, जप्य, महादेव, महायोग, महेश्वर, पुरेशय, गुहावासी (गुफा में निवास करने वाले), खेचर ( आकाश में विचरणशील), रजनीचर (रात्रि में भ्रमण करने वाले), तपोनिधि, कार्तिकेय के गुरु, आनन्दरूप, आनन्द की वृद्धि करने वाले, हयशीर्ष (घोड़े के सिर वाले विष्णुरूप), पयोधाता (जल धारण करने वाले इन्द्ररूप), विधाता (ब्रह्मारूप ), भूतभावन, बोद्धव्य (बोध करने योग्य), बोधिता (बोध कराने वाले), नेता, दुर्धर्ष (अपराजेय), दुष्प्रकम्पन, बृहद्रथ ( विशाल रथवाले), भीमकर्मा (भयंकर कर्मवाले), बृहत्कीर्ति (महान् यश वाले), धनंजय, घण्टाप्रिय, ध्वजी ( ध्वज धारण करने वाले), छत्री (छत्र धारण करने वाले), पिनाकी (धनुर्धर), ध्वजिनीपति ( सेनापति), कवची (कवच धारण करने वाले), पट्टिशी (एक प्रकार का तीक्ष्ण लौह- दण्डरूप शस्त्र धारण करने वाले), खड्गी (तलवार धारण करने वाले), धनुर्हस्त ( हाथ में धनुष धारण करने वाले), परश्वधी (परशु धारण करने वाले), अघस्मर (सबके पापकर्मों को स्मृति में रखने वाले), निष्पाप, पराक्रमी, देवताओं के स्वामी तथा शत्रुओं का संहार करने वाले सब कुछ आप ही हैं ॥ ७६–८१ ॥ पूर्वकाल में आपको प्रसन्न करके हम देवताओं ने अपने शत्रुओं का युद्ध में संहार किया था। अग्निरूप आप सदा महासागर का जल पीते हुए भी कभी तृप्त नहीं होते हैं ॥ ८२ ॥ आप क्रोधमय भावाकृति वाले, प्रसन्न आत्मा वाले, मनोरथों को पूर्ण करने वाले, अपनी इच्छा से विचरण करने वाले, प्रिय, ब्रह्मचारी, दुस्तर, ब्रह्मण्य, शिष्टजनों द्वारा पूजित तथा देवताओं की अक्षय निधि हैं । आपने ही यज्ञों का विधान किया है। अग्निदेव आपके ही वेदोक्त हव्य का वहन करते हैं। हे महादेव! आपके प्रसन्न होने पर हम देवता लोग प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ८३-८४ ॥ आप भवानी के ईश हैं तथा आदि से रहित हैं । सभी लोकों के ब्रह्मरूप कर्ता आप ही हैं । आप ही आदि सृष्टि हैं। क्षीण ध्यान वाले सांख्यशास्त्री आपको प्रकृति से परे जानकर अमृत्युरूप आपको ही प्राप्त होते हैं ॥ ८५ ॥ ध्यानपरायण योगी अपने योगबल से नित्य-सिद्ध आपको जानकर पुनः उन योगों का परित्याग कर देते हैं। और भी अन्य जो प्रसन्नचित्त तथा विशुद्ध मन वाले लोग हैं, वे अपने उत्तम कर्मों के द्वारा आपको जानकर दिव्य भोगों की प्राप्ति करते हैं ॥ ८६ ॥ गणनातीत तत्त्वों वाले तथा सीमारहित आप महात्मा का जैसा माहात्म्य हम जानते हैं, वैसा अपनी सामर्थ्य के अनुसार हमने कह दिया। आप हमारे लिये सर्वत्र कल्याणकारी हों। आप जो कुछ भी हैं, आपको नमस्कार है ॥ ८७१/२ ॥ सूतजी बोले — [ हे ऋषियो ! ] जो प्राणी एकाग्र होकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा तथा विष्णु के द्वारा की गयी इस शिवस्तुति को कहता है, सुनता है अथवा द्विजों तथा विद्वानों को सुनाता है; वह दस हजार अश्वमेध यज्ञ करके जो फल मिलता है, उस फल को प्राप्त कर लेता है ॥ ८८-८९ ॥ घोर पापकर्म करने वाला जो कोई भी प्राणी शिव के समीप इस स्तुति का पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है ॥ ९० ॥ जो सज्जनों के बीच में, श्राद्धकर्म में, देवकर्म में, यज्ञधर्मादि अनुष्ठानों के बाद किये जाने वाले स्नान के अनन्तर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है ॥ ९९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘ब्रह्मविष्णुस्तुति’ नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥ Content is available only for registered users. 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