श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -024
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
चौबीसवाँ अध्याय
श्वेतवाराहकल्प के अट्ठाईस द्वापरों के अन्त में प्रकट होने वाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियों का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुर्विंशोऽध्यायः
विविधव्यासावतारवर्णनं

सूतजी बोले —  [हे मुनियो ! ] शिव के द्वारा कथित सम्पूर्ण वचनों को सुनकर प्रजापति ब्रह्मा ने उन देवाधिदेव शिव को प्रणाम करके पुनः उनसे कहा —  ॥ १॥

हे भगवन्! हे देवदेवेश ! हे विश्वरूप ! हे महेश्वर ! हे उमापते ! हे महादेव ! हे लोकवन्द्य ! आपको नमस्कार है ॥ २ ॥ हे विश्वरूप ! हे महाभाग ! हे महेश्वर ! हे महादेव! आपके ये जो लोकवन्द्य अवतार हैं, वे किस काल में तथा किस युग में द्विजातियों के द्वारा इस लोक में देखे जा सकेंगे ? ॥ ३१/२

हे देव ! हे महादेव! आपको नमस्कार है । द्विजातिगण किस तप या ध्यान योग के द्वारा आपका दर्शन कर पाने में समर्थ हो सकते हैं ? ॥ ४१/२

ब्रह्माजी का यह वचन सुनकर ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद से प्रादुर्भूत महादेव रुद्र अपने सम्मुख -स्थित उन पितामह को देखकर मुसकराते हुए उनसे बोले — ॥ ५१/२

भगवान् शिव बोले —  मानव मुझे न तो केवल तप से, न आचार से, न दान से, न धर्मफल से, न तीर्थाटन से, न योग से, न पुष्कल दक्षिणा वाले यज्ञों से, न वेदों के अध्ययन से, न धन से तथा न तो शास्त्रों के परिशीलन मात्र से ही देख सकने में समर्थ हैं, मेरा दर्शन ध्यान रहित साधना के द्वारा नहीं किया जा सकता है ॥ ६-७१/२

हे पितामह! वाराहकल्प के सातवें मन्वन्तर में सभी लोकों को प्रकाशित करने वाला और कल्प का स्वामी मेरा अवताररूप वैवस्वत मनु आपके पौत्र के रूप में अवतरित होगा ॥ ८-९ ॥ उसी कल्प के द्वापर युग के अन्त में लोकों पर अनुग्रह तथा ब्राह्मणों के हित के लिये मैं अवतार ग्रहण करूँगा । पुनः हे ब्रह्मन् ! युगप्रवृत्ति के अनुसार इसी प्रथम द्वापर युग के अन्त में जब स्वयं प्रभु व्यास होंगे, उस समय ब्राह्मणों के हितार्थ मेरा अवतार होगा। इसके अनन्तर उसी युग की समाप्ति पर कलि में मैं शिखाधारी ‘श्वेत’ नामक महामुनि के रूप में अवतीर्ण होऊँगा और पर्वतों में उत्तम हिमालय के छागल नाम वाले शिखर पर निवास करूँगा ॥ १०-१३ ॥ वहाँपर उस समय श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित नामक शिखायुक्त मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। ये चारों महात्मा, ब्रह्मनिष्ठ और वेदों के पारगामी विद्वान् होंगे। तदनन्तर ध्यानयोग में पूर्ण तत्पर शिष्य ब्रह्म की परम गति को जानकर मेरा सान्निध्य वे ब्रह्मभूयिष्ठ प्राप्त करेंगे ॥ १४-१५१/२

हे ब्रह्मन् ! इसके बाद द्वितीय द्वापर के अन्त में पुन: जब ‘सद्य’ नामक प्रजापतिरूप प्रभु व्यास होंगे,  उसके अनन्तर कलि में अपने शिष्यों के अनुग्रह की कामना से तथा लोक के कल्याणार्थ मैं सुतार नाम से अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँ भी दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक तथा केतुमान् नाम से प्रसिद्ध मेरे शिष्य प्रकट होंगे। वे योग तथा ध्यान को पूर्णतः प्राप्त होकर भूतल पर ब्रह्मज्ञान स्थापित करके शिवलोक को प्राप्त होंगे और सदा मेरे सान्निध्य में रहेंगे ॥ १६-१९१/२

पुनः तीसरे द्वापर के अन्त में जब ‘भार्गव’ नामक व्यास होंगे, तब मैं दमन नाम से अवतीर्ण होऊँगा और उस समय भी विकोश, विकेश, विपाश तथा शापनाशन नाम वाले मेरे चार शिष्य होंगे। उसी पूर्वोक्त ध्यान-योग के द्वारा वे महान् ओजस्वी शिष्य भी शिव-लोक को प्राप्त होंगे, जहाँ से जीव का पुनः आगमन नहीं होता है ॥ २०-२२१/२

चौथे द्वापर के अन्त में जब ‘अंगिरा’ नामक व्यास होंगे, तब मैं भी सुहोत्र नाम से अवतीर्ण होऊँगा और उस समय भी मेरे चार पुत्र प्रकट होंगे। सुमुख, दुर्मुख, दुर्दर तथा दुरतिक्रम नाम वाले मेरे वे सभी पुत्र तपस्वी, द्विजश्रेष्ठ, योगात्मा एवं दृढ़ व्रत वाले होंगे ॥ २३–२५ ॥ विशुद्ध मन तथा महान् ओजस्वी नष्टपाप वाले, योगयुक्त और वे पुत्र भी उसी मार्ग से योग की सूक्ष्म गति को प्राप्त होकर रुद्रलोक को जायँगे, जहाँ से जीव का पुनर्जन्म नहीं होता है ॥ २६१/२

पाँचवें द्वापर के अन्त में जब ‘सविता’ नामक व्यास होंगे; उस समय भी लोकों के अनुग्रहार्थ योगात्मा, एककलागति वाला तथा महान् तपोव्रती मैं ‘कंक’ नाम  से अवतार ग्रहण करूँगा ॥ २७-२८ ॥ उस समय सनक, सनन्दन, प्रभु सनातन तथा विभु सनत्कुमार नामक मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। महाभाग्यशाली, विशुद्ध चित्तवाले, शुद्धयोनि, योगात्मा, दृढव्रती, ममतारहित तथा अहंकारशून्य वे शिष्य पुनर्जन्म से मुक्ति प्राप्त कराने वाले मेरे सान्निध्य को प्राप्त होंगे ॥ २९-३०१/२

पुनः छठे द्वापर के अन्त में जब ‘मृत्यु’ नामक महान् ऐश्वर्यशाली व्यास का अवतार होगा, तब मैं लोगाक्षि सुधामा, नाम से आविर्भूत होऊँगा । उस समय भी विरजा, शंखपाद तथा रज नामक मेरे चार शिष्य होंगे। वे योगात्मा, दृढ़ व्रत वाले, महाभाग्यवान् एवं लोकविश्रुत होंगे ॥ ३१–३३ ॥ योगात्मा, महान् आत्मा वाले तथा ध्यानयोग से सम्पन्न वे सभी शिष्य उसी मार्ग का आश्रय लेकर मेरे समीप पहुँचेंगे, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता है ॥ ३४१/२

पूर्वजन्म विभु नाम से प्रख्यात महातेजस्वी शतक्रतु नामक व्यास जब सातवें द्वापर के अन्त में होंगे, उस समय भी मैं उस द्वापर की समाप्ति पर कलि में सभी योगियों में श्रेष्ठ विभु जैगीषव्य नाम से प्रसिद्ध होऊँगा। उस युग में भी सारस्वत, मेघ, मेघवाह तथा सुवाहन नामक मेरे चार पुत्र होंगे। ध्यानयोग में परायण वे महात्मा उसी योगमार्ग पर चलकर निर्विकार शिवलोक को प्राप्त होंगे ॥ ३५–३८१/२

पुनः आठवें द्वापर के अन्त में जब ‘वसिष्ठ’ नामक व्यास होंगे, तब दधिवाहन नाम से मैं अवतरित होऊँगा । उस समय भी कपिल, आसुरि, पंचशिखमुनि तथा महायोगी बाष्कल – ये मेरे परम योगात्मा एवं दृढव्रती चार पुत्र होंगे, जिनके सदृश महान् योगी भूतल पर कोई नहीं होगा। वे धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी पुत्र भी माहेश्वर योग में सिद्ध होकर ज्ञानसम्पन्न और पापमुक्त हो मेरे सान्निध्य को प्राप्त होंगे, जहाँ से जीव का पुनः आगमन (जन्म) नहीं होता है ॥ ३९-४२१/२

नौवें द्वापर के अन्त में जब ‘सारस्वत’ नाम के व्यास होंगे, तब मैं भी ऋषभ नाम से अवतीर्ण होऊँगा । उस समय भी पराशर, गर्ग, भार्गव तथा अंगिरा नाम वाले मेरे चार पुत्र होंगे, जो महान् ओजस्वी, ब्रह्मनिष्ठ, वेदों के पारगामी विद्वान् एवं महान् आत्मा वाले होंगे। वे भी उसी प्रकार ध्यानमार्ग को प्राप्त होकर इस लोक से प्रस्थान करेंगे। तपोबल में उत्कृष्ट, शाप – अनुग्रह के पूर्ण विद्वान् एवं तपोव्रती वे सभी पुत्र भी पूर्वोक्त उसी योगमार्ग का आश्रय लेकर रुद्रलोक को प्राप्त होंगे, जहाँ से पुनः आगमन नहीं होता है ॥ ४३-४७ ॥ दसवें द्वापर के अन्त में जब त्रिपाद् नामक विप्ररूप व्यास होंगे, तब मैं भृगु मुनि के रूप में पर्वतों में उत्तम हिमालय के रमणीक भृगुतुंग नामक श्रेष्ठ पर्वत-शिखर पर अवतीर्ण होऊँगा । वह शिखर मेरे ही नाम पर ‘भृगुतुंग’ नाम से प्रसिद्ध होगा तथा देवताओं द्वारा पूजित होगा ॥ ४८-४९ ॥ उस समय भी बलबन्धु, निरामित्र, केतुभृंग तथा तपोधन – ये मेरे चार पुत्र होंगे, जो दृढव्रती, योगात्मा, महात्मा एवं तपोयोग से युक्त होंगे। वे अपनी तपस्या से पापों को दग्ध करके रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ ५०-५१ ॥

ग्यारहवें द्वापर के अन्त में जब ‘त्रिव्रत’ नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं कलि में गंगाद्वार क्षेत्र में अवतीर्ण होऊँगा तथा महातेजस्वी मैं उग्र नाम से सभी लोकों में विख्यात होऊँगा । उस समय भी लम्बोदर, लम्बाक्ष, लम्बकेश एवं प्रलम्बक नाम वाले मेरे चार महातेजस्वी पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोग को प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे ॥ ५२-५४ ॥ बारहवें द्वापरयुग के अन्त में जब मुनि ‘शततेजा’ नामक महातेजस्वी तथा कविश्रेष्ठ व्यास होंगे, उस समय भी युगान्त में इस लोक में कलि में मैं हैतुकवन में अवतीर्ण होऊँगा और ‘अत्रि’ नाम से विख्यात होऊँगा ॥ ५५-५६ ॥ उस समय भी सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य तथा सर्व नामक मेरे चार पुत्र होंगे, जो रुद्रलोक की प्राप्ति के लिये तत्पर, महान् योगी तथा सदा भस्म से अनुलिप्त शरीर वाले होंगे। वे भी माहेश्वरयोग को प्राप्त होकर शिवलोक को प्रस्थान करेंगे ॥ ५७-५८ ॥ पुनः क्रम से तेरहवें द्वापरयुग का अन्त आने पर जब धर्मरूप ‘नारायण’ नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं गन्धमादन पर्वत पर पवित्र बालखिल्य आश्रम में महामुनि ‘बालि’ नाम से अवतरित होऊँगा ॥ ५९-६० ॥उस समय भी सुधामा, काश्यप, वासिष्ठ तथा विरजा नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् तपस्वी, महायोग से सम्पन्न, विशुद्धात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे और माहेश्वरयोग को प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे ॥ ६१-६२ ॥

चौदहवें द्वापर के अन्त में जब ‘तरक्षु’ नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं अंगिरामुनि के उत्तम वंश में गौतम नाम से अवतार ग्रहण करूँगा और वह स्थान परम पवित्र ‘गौतमवन’ नाम से प्रसिद्ध होगा ॥ ६३-६४ ॥ उस कलि में भी अत्रि, देवसद, श्रवण तथा श्रविष्ठक नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे सभी योगात्मा, महान् आत्मा वाले और योगयुक्त पुत्र माहेश्वरयोग में सिद्ध होकर रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ ६५-६६ ॥ पुनः क्रम से पन्द्रहवें द्वापर का अन्त होने पर जब ‘त्रैय्यारुणि’ नामक व्यास होंगे, उस समय भी द्विजरूप ‘वेदशिरा’ नाम से मैं अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँ मैं ‘वेदशिरा’ नामक अति दिव्य पारमेश्वर अस्त्र प्रकट करूँगा और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय के पृष्ठदेश में सरस्वती के तट पर वेदशीर्ष नामक पर्वत मेरा आश्रयस्थल होगा ॥ ६७-६९ ॥ उस समय भी कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर तथा कुनेत्रक नाम वाले मेरे तपस्वी पुत्र प्रकट होंगे। योगात्मा, महात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करने वाले वे सभी पुत्र माहेश्वरयोग की सिद्धि करके शिवलोक को प्राप्त होंगे ॥ ७०-७१ ॥

सोलहवें द्वापर के अन्त में जब देव नामक व्यास होंगे, तब भक्तों तथा संयत आत्मा वाले जनों को योग प्रदान करने के निमित्त मैं गोकर्ण नाम से अवतार लूँगा और वह स्थान परम पवित्र गोकर्णवन के नाम से प्रसिद्ध होगा ॥ ७२-७३ ॥ उस समय भी काश्यप, उशना, च्यवन तथा बृहस्पति नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे। वे भी उसी मार्ग से ध्यानयोग से युक्त होकर माहेश्वर योग प्राप्त करके रुद्रलोक जायँगे ॥ ७४-७५ ॥ पुनः क्रम से सत्रहवें द्वापर के अन्त में जब देवकृतंजय नामक व्यास होंगे, तब भी मैं हिमालय के अति उच्च महालय नामक रमणीक शिखर पर गुहावासी नाम से अवतीर्ण होऊँगा । वह महालयस्थल परम पवित्र तथा सिद्धक्षेत्र माना जायगा । वहाँ पर भी उतथ्य, वामदेव, महायोग एवं महाबल नाम वाले मेरे चार पुत्र होंगे। वे योगवेत्ता, ब्रह्मवादी, महात्मा, मोहरहित तथा अहंकारशून्य होंगे ॥ ७६–७९ ॥ कलियुग में उन पुत्रों के ध्यानयोग करने वाले हजारों शिष्य होंगे। ध्यान करने वाले तथा योगाभ्यासपरायण वे सभी शिष्य महेश्वर को हृदय में धारण करके महालय- क्षेत्र में मेरे चरणों का दर्शन करके शिवपद को प्राप्त होंगे ॥ ८०-८१ ॥ इनके अतिरिक्त अन्य जो भी महात्मा उस द्वापर के अन्त में कलि में अपना मन ध्यान में लगाकर निर्मल आत्मा तथा शुद्ध बुद्धि वाले हो जायँगे, वे शोकरहित होकर मेरे अनुग्रह से रुद्रलोक को प्राप्त होंगे। पुण्यप्रद महालयक्षेत्र में जाकर माहेश्वर पद का दर्शन करके प्राणी अपनी दस पूर्व की तथा दस बाद की और अपनी स्वयं – इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है । इस प्रकार महालयक्षेत्र में पहुँचकर लोग अपने वंश का उद्धार करके मेरी कृपा से कष्ट से रहित होकर रुद्रलोक को प्राप्त करेंगे ॥ ८२–८४१/२

हे विभो ! पुनः अठारहवें द्वापर के अन्त में जब ऋतंजय मुनि नामक व्यास होंगे, तब मैं सिद्धिप्रदायक, पुण्यप्रद तथा देव-दानवों से पूजित रमणीक हिमालय- शिखर पर शिखण्डी नाम से अवतार ग्रहण करूँगा और वह शिखर मेरे नाम से शिखण्डी पर्वत तथा वह क्षेत्र शिखण्डी का वन कहा जायगा, जहाँ सिद्ध महात्मा निवास करेंगे ॥ ८५–८७१/२

वहाँपर भी वाच श्रवा ऋचीक, श्यावाश्व तथा यतीश्वर नामक मेरे पुत्र होंगे। वे सब परम तपस्वी, योगात्मा, महात्मा तथा वेदों के पारगामी विद्वान् होंगे, जो माहेश्वर योग में सिद्ध होकर रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ ८८-८९१/२

तदनन्तर क्रम से उन्नीसवें द्वापर के अन्त में महामुनि भरद्वाज तो व्यास होंगे और उस समय मैं हिमालय के शिखर पर विराजमान रमणीक जटायु पर्वतपर जटामाली नामसे अवतीर्ण होऊँगा । उस समय भी हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षी तथा कुथुमि नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महाप्रतापी, ऐश्वर्ययुक्त, योग-ध्यानपरायण और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे। वे सब माहेश्वरयोग को प्राप्त होकर रुद्रलोक को प्रस्थान करेंगे ॥ ९०-९३१/२

पुनः जब बीसवें द्वापर का अन्त होगा, तब उस समय महामुनि गौतम तो व्यास होंगे और मैं भी उसी समय हिमालय-क्षेत्र में अट्टहास नाम से अवतरित होऊँगा । तभी से लोगों की अट्टहास के प्रति महान् प्रीति हो जायगी । वह क्षेत्र महागिरि अट्टहास के नाम से विख्यात होगा और देवता, दानव, यक्ष, इन्द्र, सिद्ध- महात्मा तथा चारण वहाँ सदा निवास करेंगे ॥ ९४–९६१/२

वहीं पर सुमन्तु, बर्बरी, विद्वान् कबन्ध तथा कुशिकन्धर – ये मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् ओजस्वी, योगात्मा, महात्मा, ध्यानपरायण एवं दृढ़व्रती होंगे, जो माहेश्वरयोग में सिद्ध होकर रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ ९७-९८१/२

पुनः क्रम से इक्कीसवें द्वापर के अन्त में जब ऋषिप्रवर वाचश्रवा व्यास होंगे, तब मैं भी दारुक नाम से आविर्भूत होऊँगा; इसलिये वह स्थान कल्याणप्रद तथा पुण्यकर होगा और मेरे नाम पर वह देवदारुवन के नाम से प्रसिद्ध होगा। वहाँपर भी प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान् तथा गौतम नाम वाले मेरे चार पुत्र होंगे; जो महाप्रतापी, योगात्मा, महात्मा, संयत आत्मा वाले एवं ब्रह्मचारी होंगे। वे सब निष्ठापूर्वक योगव्रत का पालन करके रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ ९९- १००१/२

बाईसवें द्वापर के अन्त में जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, उस समय मैं महामुनि ‘भीम’ नाम से हल धारण किये काशी में अवतार ग्रहण करूँगा, जहाँपर उस कलि में इन्द्र सहित सभी देवतागण अस्त्ररूप में हल धारण करने वाले हलायुध मुझ शिव का दर्शन प्राप्त करेंगे ॥ १०३-१०४१/२

वहाँपर भी भल्लवी, मधुपिंग, श्वेतकेतु तथा कुश नामक मेरे चार पुत्र होंगे। अतिशय धर्मनिष्ठ, ध्यानपरायण, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मभाव को प्राप्त वे पुत्र भी माहेश्वरयोग में सिद्ध होकर शिवलोक को प्राप्त होंगे ॥ १०५-१०६१/२

हे ब्रह्मन् ! पुनः तेईसवें द्वापर के अन्त में जब मुनि तृणबिन्दु नामक व्यास होंगे, उस समय मैं धर्मनिष्ठ तथा महाकाय मुनिपुत्र के रूप में ‘श्वेत’ नाम से अवतीर्ण होऊँगा । वहाँ उत्तम पर्वत पर मैं काल को जीर्ण (व्यतीत) करूँगा, अतः वह पर्वत ‘कालंजर’ नाम से विख्यात होगा। वहाँ पर भी उशिक, बृहदश्व, देवल तथा कवि नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। वे माहेश्वर योग को प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे ॥ १०७-११०१/२

हे विभो! चौबीसवें द्वापर के अन्त में जब ऋक्षमुनि व्यास होंगे, तब उस युगान्त तथा कलि के प्रारम्भ में देववन्द्य नैमिषारण्य में महान् योगी के रूप में ‘शूली’ नाम से अवतार लूँगा। वहाँ भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व एवं शरद्वसु नामक मेरे चार तपोधन शिष्य होंगे। वे भी उसी योगमार्ग से रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ १११-११३१/२

पुनः क्रमिक रूप से पचीसवें द्वापर के अन्त में जब वसिष्ठजी के पुत्र शक्तिमुनि व्यास होंगे, उस समय जगत्प्रभु मैं दण्ड धारण किये हुए मुण्डीश्वर नाम से अवतार ग्रहण करूँगा । उस समय भी छगल, कुण्डकर्ण, कुभाण्ड तथा प्रवाहक नामक मेरे चार तपोव्रती पुत्र होंगे। माहेश्वरयोग में सिद्ध होकर वे अमरत्व को प्राप्त होंगे ॥ ११४–११६१/२

छब्बीसवें द्वापर के अन्त में जब पराशर नामक व्यास होंगे, उस समय भी उस युगान्त में मैं कलि के प्रारम्भ में भद्र-वटक्षेत्र में सहिष्णु नाम से अवतीर्ण होऊँगा । वहाँ भी उलूक, विद्युत, शम्बूक तथा आश्वलायन नामक अत्यन्त धर्मपरायण मेरे चार पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोग को प्राप्त होकर रुद्रलोक को प्रस्थान करेंगे ॥ ११७–११९१/२

पुन: क्रमिक रूप से सत्ताईसवें द्वापर के अन्त में जब तपस्वी जातूकर्ण्य व्यास होंगे, तब मैं योगविश्रुत तथा योगात्मा द्विजश्रेष्ठ सोमशर्मा के रूप में प्रभासक्षेत्र में अवतरित होऊँगा । वहाँ पर भी अक्षपाद, कुमार, उलूक एवं वत्स नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। योगात्मा, महात्मा, निर्विकारहृदय तथा शुद्ध बुद्धि वाले वे शिष्य माहेश्वरयोग प्राप्त करके अन्त में रुद्रलोक जायँगे ॥ १२०-१२३१/२

पुनः क्रम से अट्ठाईसवें द्वापर के आने पर जब श्रीमान् लोकपितामह विष्णु अपने छठे अंश से पराशरपुत्र ‘कृष्णद्वैपायन’ नामक व्यास होंगे, तब यदुश्रेष्ठ पुरुषोत्तम वासुदेव कृष्ण वसुदेव से उत्पन्न होंगे। उस समय योगात्मा मैं लोकों को विस्मित करने के उद्देश्य से योगमाया से एक ब्रह्मचारी का शरीर धारणकर प्रकट होऊँगा और योगमाया के प्रभाव से ब्राह्मणों के कल्याणार्थ श्मशान में मृत पड़े एक अनाथ ब्राह्मण का शरीर देखकर उसमें प्रवेश करूँगा। दिव्य तथा पुण्य प्रदान करने वाली मेरुगुहा में आपके एवं विष्णु के साथ मैं निवास करूँगा । हे ब्रह्मन् ! उस समय मैं लकुली नाम से विख्यात होऊँगा और मेरा अवतार-स्थल जबतक भूमि की सत्ता रहेगी, तबतक एक सिद्धक्षेत्र के रूप में कायावतार – इस नाम से विख्यात रहेगा ॥ १२४–१३० ॥ वहाँपर भी कुशिक, गर्ग, मित्र तथा कौरुष्य नामक मेरे चार तपस्वी, योगात्मा, ब्रह्मज्ञानी और वेदों के पारगामी विद्वान् पुत्र होंगे। विशुद्ध आत्मा वाले तथा नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रत धारण करने वाले वे पुत्र माहेश्वरयोग में सिद्ध होकर पुनरागमन से मुक्ति दिलाने वाले रुद्रलोक को प्राप्त होंगे ॥ १३१-१३२१/२

ये पाशुपतयोग में सिद्ध, भस्म से विभूषित शरीरवाले, नित्य शिवलिङ्ग के अर्चन में तत्पर रहने वाले, बाहर एवं भीतर से भक्तिपूर्वक योग के द्वारा मुझमें स्थित रहने वाले, ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होंगे ॥ १३३-१३४ ॥ ज्ञानमार्ग का प्रकाशक यह पाशुपतयोग सांसारिक बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने तथा आत्मज्ञान सिद्ध करने के लिये एक महान् उपाय है ॥ १३५ ॥ इस जगत् में अनेक योगमार्ग हैं तथा अनेक ज्ञानमार्ग हैं; किंतु पंचाक्षरी विद्या ( नमः शिवाय ) – के बिना प्राणी सांसारिक बन्धन से मुक्त नहीं हो सकते ॥ १३६ ॥ जो मनुष्य सभी द्वन्द्वों से रहित होकर तप करता है, वह पके फल की भाँति मुक्ति के लिये उपस्थित रहता है ॥ १३७ ॥ जो पुरुष मात्र एक दिन भलीभाँति पाशुपतव्रत धारण करता है, वह उस गति को प्राप्त कर लेता है, जो उसे सांख्य तथा पञ्चरात्र से कभी नहीं मिलती ॥ १३८ ॥ इस प्रकार मैंने युगक्रम से मनु से लेकर कृष्णद्वैपायन पर्यन्त अट्ठाईस अवतारों का वर्णन आपसे कर दिया। उस कल्प में जब धर्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास होंगे, तब वे ही वेदसमूहों का विभाग करेंगे ॥ १३९-१४० ॥

सूतजी बोले — इस प्रकार महादेव के द्वारा कही गयी रुद्रावतार की बातें सुनकर महातेजस्वी भगवान् ब्रह्मा ने प्रणामपूर्वक प्रिय वाणी से महेश्वर शिव की स्तुति की और पुनः उनसे कहा ॥ १४११/२

पितामह बोले — सभी देवता तथा सभी गण विष्णु से ही व्याप्त हैं। विष्णु के समान कोई अन्य गति हो ही नहीं सकती। ऐसा वेद निरन्तर गाते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १४२-१४३ ॥ वे देवाधिदेव भगवान् विष्णु आपके लिङ्गार्चन में निरन्तर रत क्यों रहते हैं तथा जगत्पति होकर भी सदा आपको प्रणाम क्यों करते हैं ? ॥ १४४ ॥

सूतजी बोले — परमेष्ठी ब्रह्माजी का वचन सुनकर हर्षातिरेक से युक्त नेत्रों वाले भगवान् शंकर उनके इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें लिङ्गपूजा – प्रकरण के विषय में बताया। भगवान् विष्णु, साक्षात् सुरश्रेष्ठ इन्द्र तथा मुनियों ने विधिविधान से लिङ्ग की पूजा करके ही अपने-अपने पद प्राप्त किये हैं । हे विभो ! इसीलिये वे लिङ्ग पूजन में तत्पर रहते हैँ ॥ १४५–१४७ ॥ लिङ्ग के अर्चन के बिना निष्ठा की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये जगत्पति भगवान् विष्णु श्रद्धापूर्वक मेरे लिङ्ग का पूजन करते हैं ॥ १४८ ॥

देवेश ब्रह्माजी से ऐसा कहकर तथा पुनः उनके ऊपर कृपादृष्टि डालकर महेश्वर वहीं पर अन्तर्धान हो गये ॥ १४९ ॥ तत्पश्चात् उन शिव को हाथ जोड़कर प्रणाम करके और उनसे आज्ञा प्राप्त करके वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टि की रचना करने में प्रवृत्त हो गये ॥ १५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘विविधव्यासावतारवर्णन’ नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

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