January 28, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -079 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ उन्यासीवाँ अध्याय शिवपूजा से सभी का कल्याण, शिवपूजा की विधि एवं शिवमन्दिर में दीपदान की महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकोनाशीतितमोऽध्यायः शिवार्चनविधि ऋषिगण बोले — हे महामते ! मन्दबुद्धि वाले, अल्प आयु वाले, अल्प पराक्रम वाले तथा अल्प सामर्थ्य वाले मनुष्यों को प्रजापति महादेव की पूजा किस प्रकार करनी चाहिये ? हजार वर्षों तक तपस्या के द्वारा शंकर की पूजा करके देवता भी उनका दर्शन नहीं कर पाते; तो फिर वे [मनुष्य] भगवान् शिव की पूजा कैसे करें ? ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले — हे श्रेष्ठ मुनियो ! आप लोगों ने यथार्थ बात कही है, फिर भी श्रद्धापूर्वक [ शिवकी ] पूजा करने पर उनका दर्शन हो सकता है और उनसे सम्भाषण किया जा सकता है । हे द्विजो ! प्रसंगवश भक्तिहीन लोगों के द्वारा भी पूजित होकर वे भगवान् उनके भाव के अनुरूप फल देने वाले कहे गये हैं ॥ ३-४ ॥ हे द्विजो ! उच्छिष्ट अधम ब्राह्मण शिव की पूजा करके पिशाचलोक को जाता है और क्रोध में भरकर पूजन करने वाला मूढबुद्धि राक्षस का स्थान (लोक) प्राप्त करता है । अभक्ष्य [ भोजन ] का भक्षण करने वाला दुष्ट मनुष्य [शिव की ] पूजा करके यक्षलोक प्राप्त करता है और नृत्य-गान करने वाला उनकी पूजा करके गन्धर्वलोक प्राप्त करता है । प्रसिद्धि का इच्छुक और स्त्रियों में आसक्त नराधम बुधलोक प्राप्त करता है । मदोन्मत्त व्यक्ति रुद्र की पूजा करता हुआ सोमलोक प्राप्त करता है ॥ ५-७ ॥ [ रुद्र ] गायत्री [ मन्त्र ] द्वारा शिव का पूजन करके मनुष्य प्रजापतिलोक को और प्रणव के द्वारा पूजन करके ब्रह्मलोक तथा विष्णुलोक को प्राप्त करता है। श्रद्धापूर्वक एक बार भी पहुँचकर महेश्वर का पूजन करके मनुष्य रुद्रलोक में रुद्रों के साथ आमोद-प्रमोद करता है ॥ ८-९ ॥ देवताओं तथा असुरों से पूजित शुभ लिङ्ग को पवित्र जल से स्वच्छ करके पीठ में भक्तिपूर्वक शिव का आवाहन करके उन्हें देखकर विधिपूर्वक प्रणाम करके धर्मज्ञानमय, उत्तम, वैराग्य – ऐश्वर्य से सम्पन्न, सभी लोगों से नमस्कृत, ओंकार पद्म से युक्त मध्यभाग वाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्नि से उत्पन्न कल्पित आसन पर स्थापित करके रुद्र शम्भु को पाद्य-आचमन-अर्घ्य प्रदान करके उन्हें दिव्य जलों से स्नान कराना चाहिये । पुनः घी, दूध तथा दही से रुद्र को स्नान कराना चाहिये एवं विधिपूर्वक स्वच्छ करना चाहिये। तत्पश्चात् शुद्ध जल से स्नान कराकर चन्दन आदि से पूजन करना चाहिये; पुनः रोचन आदि से पूजन करके दिव्य पुष्पों, अखण्ड बिल्वपत्रों, अनेक प्रकार के पद्मों, नीलकमलों, रक्तकमलों, नन्द्यावर्तपुष्पों, मल्लिका, चम्पक, जातिपुष्पों, बकुलों, कनैर के पुष्पों, शमीपुष्पों, बृहत्पुष्पों, धतूर के पुष्पों, अगस्त्य के उदित होने पर खिलने वाले पुष्पों, अपामार्ग-कदम्ब के गुच्छों तथा सुन्दर आभूषणों से पूजन करके पाँच प्रकार के धूप प्रदान करके पायस (खीर) निवेदित करना चाहिये। तदनन्तर दधिमिश्रित भात, मधु- घृत मिला हुआ भात, पका हुआ अन्न और मूँग का पका हुआ अन्न — यह छः प्रकार का अन्न निवेदित करे; अथवा पाँच प्रकार का घृतमिश्रित अन्न निवेदित करे; अथवा केवल एक आढ़क (चार प्रस्थ) शुद्ध चावल पकाये और उसे निवेदित करे । अन्त में प्रदक्षिणा करके बार-बार नमस्कार कर देवता ईशान की स्तुति करके पुनः शंकरजी की विधिवत् पूजा करके ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात मन्त्रों [^1] का जप करते हुए इन पाँच मन्त्रों से शिव की पूजा करे। इस विधि से [पूजा करने पर ] देव महेश्वर प्रसन्न होते हैं ॥ १०- २२ ॥ श्रेष्ठद्व ! शिवपूजन में उपयोग किये गये पुष्प, पत्र आदि के साथ वृक्ष और गायें — ये सब परम गति को प्राप्त होते हैं । जो एक बार भी शिव, रुद्र, शर्व, भव, अज की पूजा करता है; वह पुनर्जन्मरहित शिवसायुज्य को प्राप्त कर लेता है। एक बार अथवा प्रसंगवश भी पूजित परमेश्वर, भव, उमापति का दर्शन करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पूजित किये गये अथवा पूजित होते हुए महादेव का दर्शनकर मनुष्य ब्रह्मलोक को जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २३-२६ ॥ जो [शिव के सम्बन्ध में ] कुछ भी सुनकर उसका अनुमोदन करता है, वह परमगति प्राप्त करता है। जो शिव के समक्ष एक बार भी घृत का दीपक अर्पित करता है, वह वर्णाश्रमी लोगों के लिये दुर्लभ स्थिर गति प्राप्त करता है। शिवालय में मिट्टी अथवा लकड़ी का बना हुआ दीपवृक्ष (दीवट) प्रदान करके मनुष्य आगे के सौ कुलों सहित शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । जो विधान के अनुसार भक्तिपूर्वक लोहे, ताँबे, चाँदी अथवा सोने का बना हुआ दीपक शिव को समर्पित करता है, वह दस हजार सूर्यों के समान देदीप्यमान विमानों से शिवलोक को जाता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो कार्तिक महीने में शिव के सामने घृत का दीपक समर्पित करता है अथवा विधान के साथ पूजित होते हुए परमेश्वर का दर्शन श्रद्धापूर्वक करता है, वह ब्रह्मलोक को जाता है ॥ २७–३११/२ ॥ [शिव का] आवाहन, उत्तम सान्निध्य, स्थापन तथा पूजन रुद्रगायत्री [ मन्त्र ]“ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्”। – द्वारा और आसन प्रणव-द्वारा बताया गया है । [ सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रों से तथा विशेषरूप से रुद्रमन्त्रों से उनका स्नान बताया गया है। इस प्रकार देवदेव उमापति की पूजा नित्य करे । उनके दक्षिण में ब्रह्मा की पूजा प्रणव से करे और उत्तर में देवदेवेश विष्णु की पूजा गायत्री [मन्त्र ] – से करे । विधि के अनुसार [सद्योजात आदि] पाँच मन्त्रों से तथा प्रणव से अग्नि में होम करे । इस प्रकार शंकर की भलीभाँति पूजा करके वह [ मनुष्य ] शिवसायुज्य प्राप्त करता है । [हे ऋषियो ! ] मैंने संक्षेप में लिङ्गार्चनविधि का क्रम बता दिया; पहले स्वयं रुद्र के मुख से इसे सुनकर व्यासजी ने मुझको बताया था ॥ ३२-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘शिवार्चनविधि’ नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥ [^1]: ये सद्योजातादि पाँच मन्त्र इस प्रकार हैं — (१) ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम् ॥ (२) ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ (३) ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ (४) ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बल-प्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ (५) ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः । भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ Content is available only for registered users. 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