श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -080
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
अस्सीवाँ अध्याय
देवताओं का कैलासपुरी आकर वहाँ विराजमान उमासहित भगवान् शिव के दर्शन करना तथा भगवान् शिव द्वारा देवताओं को पाशुपतव्रत का उपदेश प्रदान करना
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अशीतितमोऽध्यायः
पाशुपतव्रतमाहात्म्यं

ऋषिगण बोले —  [ हे सूतजी ! ] पशुपति का दर्शन करके पशुपाश से मुक्ति किस प्रकार होती है; देवताओं ने पशुत्व का कैसे त्याग किया ? इसे आप कृपा करके हम लोगों को बतायें ॥ १ ॥

सूतजी बोले —  पूर्वकाल में कैलास-शिखर पर भोग्य नामक अपने पुर में स्थित सर्वज्ञ शिव के पास सभी देवता उनकी कृपा से एक साथ मिलकर आये। सभी देवताओं के हित के लिये जनार्दन पुरुषोत्तम विष्णु भी गरुड़ के स्कन्ध पर बैठकर ब्रह्मा तथा सभी देवताओं के साथ देवदेव शिव के पास पहुँचे ॥ २-३१/२

इन्द्र, साध्यगण तथा यमसहित सभी लोगों ने एक साथ शिव के गिरिश्रेष्ठ, शुभ तथा उत्तम पर्वतश्रेष्ठ मेरु पर आकर उस गिरि को प्रणाम किया। वे गरुड़ध्वज भगवान् वासुदेव गरुड़ से उतरकर उत्तम देवताओं के साथ मेरु पर्वत पर चढ़ गये; वह समस्त पापों से रहित, सब कुछ देने वाला, उत्तम भोगों से युक्त, आनन्दित कुरर पक्षियों से समन्वित, हाथियों की ध्वनियों से निनादित, मधुर गीतों से गुंजित, अन्य पर्वतों के पृष्ठभाग को अपने छायारूपी अन्धकार से युक्त करने वाला, पदचिह्नों से युक्त वन-प्रदेश वाला, सुन्दर हवाओं तथा जल से परिपूर्ण, सूर्य के समान प्रदीप्त सैकड़ों-हजारों भवनों से युक्त, मनोहर गति वाले हंससमूहों से मण्डित, धव- खदिर-पलाश-चन्दन आदि वृक्षों से परिपूर्ण, उत्तम पक्षियों के समूहों से युक्त, कोकिल आदि तथा भौंरों से शोभायमान, कहीं-कहीं बहुत-से दिव्य वृक्षों से भरा हुआ, कुरबक-प्रियक-तिलक पुष्पवृक्षों से सम्पन्न, बहुत-से कदम्ब-तमाल-लताओं से घिरा हुआ तथा अनेक प्रकार के शिखरों से युक्त श्रेष्ठ पर्वत है ॥ ४–८ ॥

[इस ] पर्वत के पृष्ठ पर देवदेव परमेश्वर शिव के विहार के लिये विश्वकर्मा ने एक शिवपुर का निर्माण किया है । इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित सभी देवताओं ने उस पुर को ध्यानपूर्वक देखा और शिवजी के प्रभाव से दूर से ही उसे प्रणाम किया ॥ ९-१० ॥

महात्मा आदिदेव [विष्णु] मेरु के एक भाग में [स्थित] हजारों सूर्यों के समान देदीप्यमान, हजारों तरह से महान्, सभी गुणों से युक्त कैलासगिरि पर गये । तदनन्तर ब्रह्मा तथा देवशत्रुओं का विनाश करने वाले विष्णु उस महान् पुर के द्वार पर पहुँचे; जो स्त्रियों, हाथियों, घोड़ों, अनेक रथों, गणों तथा गणेश्वरों से भरा हुआ था और महापर्वत के समान प्रतीत हो रहा था ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर सुवर्णमय भवनों, मणिभूषित विमानों तथा अनेक आकार वाले प्राकारों (चहारदीवारियों ) – से घिरे हुए शिव के बाहरी पुर को देखकर प्रसन्नमुख होकर विष्णु ने ब्रह्मासहित सभी देवताओं के साथ देवदेव के उस दूसरे पुर में प्रवेश किया; जो विशाल भवनों तथा महलों से अवरुद्ध, ऊँची अट्टालिकाओं से समन्वित, चार द्वारों वाला, परम सुन्दर, हीरा – वैडूर्य-माणिक्य-मणियों के जालों से आवृत, आन्दोलित हो रहे हिण्डोलों से समन्वित, घण्टा तथा चामर से विभूषित, मृदंग-मुरज आदि वाद्ययन्त्रों से परिपूर्ण, वीणा – वेणु से निनादित, नृत्य करती हुई अप्सराओं तथा भूतगणों से घिरा हुआ और दृष्टि को मोह लेने वाले देवेन्द्रभवन के आकार वाले भवनों से मण्डित था ॥ १३-१७ ॥

[तीसरे पुर में प्रवेश करने पर ] महलों के शिखरों पर विराजमान हजारों पुरस्त्रियाँ [अपने] हाथों से सभी ओर से शिव की भाँति विष्णु के मस्तकपर भी पुष्प, फल, अक्षत आदि की वर्षा करने लगीं। उस समय विष्णु को देखकर मद से घूर्णित नेत्रों वाली तथा विशाल जाँघों वाली स्त्रियाँ शीघ्र ही आनन्दमग्न हो गयीं और वे नाचने तथा गाने लगीं। विष्णु को देखकर कुछ स्त्रियों का मुखमण्डल मन्द मुसकान से भर गया, कुछ के वस्त्र शिथिल हो गये और कुछ की करधनी ढीली पड़ गयी; वे सब गीत गाने लगीं ॥ १८-२०१/२

हे महाभागो! तदनन्तर चौथे, पाँचवें, छठें, सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें उत्तम पुरों को क्रम से पार करके शुभ कैलास शिखर पर [स्थित] देवदेव गोपति परमेश्वर भगवान् शिव के परम सुन्दर; पूर्ण गोलाकार; सूर्यमण्डल के समान भवनों से विभूषित; स्फटिक के शुभ्र मण्डपों से शोभायमान; सभी दिशाओं में सुवर्णमय तथा विविध रत्नमय फाटकों से विभूषित; विविध आभूषणों से अलंकृत, अनेक सर्वतोभद्रों से युक्त; अनेक आकार वाले रत्नजटित अट्ठाईस प्राकारों (चहारदीवारियों)-से घिरे हुए; उपदिशाओं में अनेक प्रकार के दृढ़ उपद्वारों तथा महाद्वारों से युक्त; गुह (कार्तिकेय) – के गुप्त भवनों तथा गुप्त कक्षों से सुशोभित; दृष्टि को मोह लेने वाले मोती के बने हुए अन्य सुन्दर ग्राम्य भवनों से युक्त; पद्मराग से बने हुए दिव्य गणेश्वर मन्दिरों से विभूषित; चन्दन के वृक्षोंसहित अनेक आकार वाले सुन्दर पुष्प-उद्यानों से सुशोभित; सोने की सीढ़ियों की पंक्तियों से युक्त और स्त्रियों की चाल को तिरस्कृत करने वाले हंसों से सभी ओर से सेवित सरोवरों तथा बावलियों से विभूषित; मयूर, कारण्ड, कोकिल तथा चक्रवाक से सुशोभित और दिव्य अमृतमय जल से युक्त वापियों से विभूषित; वार्तालाप में कुशल, सभी आभूषणों से अलंकृत, वक्षःस्थल के भार से झुकी हुई, मद से घूर्णित नेत्रों वाली, गाने-बजाने में तल्लीन तथा नृत्य करती हुई देवदुर्लभ दिव्य हजारों रुद्र-कन्याओं एवं अप्सराओं से सुशोभित; विकसित कमल आदि से युक्त; उत्तम पक्षियों से परिपूर्ण; रुद्रस्त्रीगणों से भरे हुए; जलक्रीड़ा में रत, रतोत्सव में तल्लीन, प्रत्येक पद पर ललित, संगीत में अनुरक्त तथा पद्मराग के समान कान्ति वाली स्त्रियों से सुशोभित पुर को देखकर सभी देवता पूर्णरूप से आश्चर्यचकित होकर वहीं खड़े हो गये ॥ २१–३५ ॥

वहीं पर देवताओं ने रुद्रगणों, हजारों वीर गणेश्वरों, हीरे तथा वैडूर्यमणि से जटित सुवर्णमय सीढ़ियों और देवदेव के स्फटिकनिर्मित भवनों को देखा ॥ ३६-३७ ॥ उन [भवनों ] -के शिखरों पर हृष्ट, कमल के समान नेत्रों वाली तथा विशाल जाँघों वाली स्त्रियाँ, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ, किन्नरियाँ, किन्नर, नाग, कन्याएँ, सिद्धगणों की तथा अन्य स्त्रियाँ विराजमान थीं; वे अनेक वेष धारण की हुई थीं, अनेक आभूषणों से अलंकृत थीं, अनेक हाव-भावों से युक्त थीं, अनेक भोग तथा रति से प्रेम करने वाली थीं, नील कमल के पत्र के समान शोभा वाली थीं, कमल-पत्र के समान विशाल नेत्रों वाली थीं, कमल की पंखुड़ी के समान [कोमल] वस्त्रों से सुशोभित थीं, कंकण-नूपुर-हार-रंग-बिरंगे छत्र तथा वस्त्रों से भूषित थीं, अन्य प्रकार के आभूषणों से मण्डित थीं और सजावट से प्रीति करने वाली थीं ॥ ३८-४१ ॥ देवताओं की सुन्दर स्त्रियों तथा गणेश्वरों की सुन्दर स्त्रियों को देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता त्रिपुर के शत्रु गणाधीश के पुर में गये ॥ ४२ ॥ [उस ] पुर के मध्य में स्थित परमेश्वर शिव के हजारों उगते हुए सूर्य के समान आभा वाले भवन को देखकर इन्द्रसहित देवता तथा सिद्धगण वहाँ रुक गये ॥ ४३ ॥ इसके बाद इन्द्र आदि सभी देवताओं ने उस भवन के द्वार पर स्थित गणेश्वर नन्दी को देखा ॥ ४४ ॥

उन गणेश्वर नन्दी को देखकर सभी देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया और कहा — ‘जय हो’ । तब गणेश्वर ने भी उन्हें देखकर कहा — ‘हे महाभाग्यशाली देवताओ ! सुव्रतो ! निष्पाप तथा सभी लोकों के स्वामी आपलोग किसलिये आये हैं; कृपा करके बतायें ॥ ४५-४६ ॥

तत्पश्चात् देवताओं ने उनसे कहा — ‘पशुपाश (जीवभाव)-से मुक्ति के लिये आप हम लोगों को गजराज (ऐरावत) के समान शुभ्र कान्ति वाले एवं वर प्रदान करने वाले हे देव महेश्वर का दर्शन कराइये ॥ ४७ ॥ सुव्रत ! पूर्वकाल में तीनों पुरों को दग्ध करने के लिये पशुत्व स्वीकार किया गया था; उस पशुत्व के विषय में हमलोग शंकाग्रस्त हैं ॥ ४८ ॥ परमेश्वर शिव के द्वारा पाशुपतव्रत कहा गया है; हे भूतेश! इस व्रत के करने से पशुत्व नहीं रहता है। बारह वर्षों तक, बारह महीनों तक अथवा बारह दिनों तक भी उस उत्तम व्रत को करके समस्त पशु [ भगवान् ] शिव के पशुपाशों से मुक्त हो जाते हैं ॥ ४९-५०१/२

तदनन्तर सभी भूतगणों में अग्रणी शिलादपुत्र नन्दी ने नारायण आदि उन देवताओं को [शिव का] दर्शन कराया। तब उमा तथा गणोंसहित उन सनातन प्रभु ईशान का दर्शन करके प्रीति के कारण रोमांचित देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की तथा [उन] शितिकण्ठ (शिव)-से पशुपाश से मुक्ति का निवेदन करके बार-बार प्रणामकर उन शम्भु के सामने वे खड़े हो गये ॥ ५१-५३१/२

तत्पश्चात् उन सबकी ओर देखकर देवदेव, वृषभध्वज, परमेश्वर भगवान् महेश्वर उन देवताओं तथा मुनियों के पशुत्वभाव का शोधनकर उन्हें पाशुपतव्रत का स्वयं उपदेश करके उमा के साथ बैठ गये। तभी से वे सब देवता पाशुपत कहे जाने लगे। वे शिव उन पशुओं के साक्षात् पति हैं, अतः देवता पाशुपत कहे गये हैं। इसके बाद उन सबने पुनः तपस्या की । तदनन्तर बारह वर्ष के अन्त में सभी श्रेष्ठ देवता पशुपाश से मुक्त हो गये और जैसे आये थे, वैसे ही ब्रह्मा तथा विष्णु के साथ वापस लौट गये ॥ ५४-५८ ॥

[हे मुनियो !] मैंने आप लोगों से यह सब कह दिया; पूर्वकाल में इसे सनत्कुमार ने ब्रह्माजी के मुख से तथा बुद्धिमान् व्यासजी ने उन [ सनत्कुमार] – से सुना था। जो मनुष्य शुद्ध होकर इसे ब्राह्मणों को सुनाता है अथवा शुद्ध होकर [स्वयं] सुनता है, वह दूसरा शरीर प्राप्त करके पशुपाशों से मुक्त हो जाता है ॥ ५९-६० ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘पाशुपतव्रतमाहात्म्य’ नामक अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८० ॥

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