श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-71 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-71 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ इकहत्तरवाँ अध्याय भगवती गङ्गा का पाताललोक में प्रवेश कर सगरपुत्रों का उद्धार करना अथः एकसप्ततितमोऽध्यायः श्रीगङ्गाविवरस्थलद्वारात्पातालप्राप्तिः श्रीमहादेवजी बोले — महामुने ! तब भगवती गङ्गा समुद्र के साथ संयुक्त हो विवर से होकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक पाताल पहुँचकर कपिलमुनि के निकट गयीं ॥ ११/२ ॥ कपिलमुनि ने… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-70 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-70 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ सत्तरवाँ अध्याय भगवती भागीरथी का हरिद्वार, प्रयाग होते हुए काशी- आगमन, जह्नुऋषि के आश्रम में जाना और फिर समुद्रतट पर पहुँचना अथः सप्ततितमोध्यायः श्रीजह्नुतनयासमुद्रतीरप्राप्तिः श्रीमहादेवजी बोले — इस प्रकार महादेवी गङ्गा बहुत योजन दूरी को पारकर उन महात्मा राजा भगीरथ के साथ हरिद्वार आ गयीं… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-69 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-69 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उनहत्तरवाँ अध्याय भगवान् शंकर के जटाजूट से निकलकर गङ्गा का भूतल पर आगमन, मेना और हिमालय द्वारा उनका पूजन अथः एकोनसप्ततितमोऽध्यायः शम्भोर्जटाजूटं निर्भिद्य मेनाहिमाचलदर्शनपूजनानन्तरं भूपृष्ठागमनं श्रीमहादेवजी बोले — ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को महापापी जनों के भी उद्धार के लिये भगवती गङ्गा प्रकट… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-68 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-68 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ अड़सठवाँ अध्याय भगवती गङ्गा का भगवान् विष्णु के चरणकमलों से निकलकर सुमेरु पर्वत पर आना, पृथ्वी द्वारा गङ्गा की स्तुति, इन्द्र की प्रार्थना पर गङ्गा की एक धारा का स्वर्ग में प्रतिष्ठित होना तथा दूसरी धारा का सुमेरु के दक्षिण शिखर का भेदन करना अथः… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-67 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-67 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ सड़सठवाँ अध्याय भगीरथ द्वारा अनेक नामों से भगवान् शिव का स्तवन तथा मनोभिलषित वर की प्राप्ति, शिवसहस्रनाम स्तोत्र पाठ का माहात्म्य अथः सप्तषष्टितमोऽध्यायः श्रीशिवनारदसंवादे गङ्गाया आगमनोपाख्यानं भगीरथमुखनिर्गत शिवसहस्रनाम कथनं भगीरथ बोले — पार्वतीनाथ, देवदेव, परात्पर, अच्युत, अनघ, पञ्चास्य, भीमास्य, रुचिरानन, ओङ्कारस्वरूप आपको नमस्कार है ।… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-66 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-66 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ छाछठवाँ अध्याय ब्रह्माजी द्वारा भगवती गङ्गा की प्रार्थना करना तथा गङ्गा द्वारा पुनः तीनों लोकों में आने का आश्वासन देना, भगीरथ द्वारा भगवान् विष्णु, भगवती गङ्गा और भगवान् शिव की आराधना अथः षट्षष्टितमोऽध्यायः भगीरथगङ्गासंवादे श्रीशिवदर्शनप्राप्तिः श्रीमहादेवजी बोले — मुनि श्रेष्ठ ! देववन्दित पितामह ब्रह्माजी ने… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-65 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-65 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ पैंसठवाँ अध्याय भगवान् विष्णु का वामनरूप में अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि का दान लेना, तीन पगों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नापकर बलि को पाताल भेज देना अथः पञ्चषष्टितमोऽध्यायः वामनावतारप्रस्तावे बलिपातालयात्राकथनं श्रीमहादेवजी बोले — विरोचनपुत्र धर्मात्मा दैत्यराज बलि ने देवराज इन्द्र से… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-64 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-64 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ चौंसठवाँ अध्याय भगवान् शंकर के गायन से विष्णु का द्रवीभूत होना, ब्रह्माजी द्वारा उस द्रवरूप गङ्गा को अपने कमण्डलु में धारण करना, भगवती गङ्गा का द्रवमयी हो पृथ्वी पर आना अथः चतुःषष्टितमोऽध्यायः शिवनारदसंवादे गङ्गाया द्रवरूपवर्णनं श्रीनारदजी बोले — परमेश्वर ! आपने कृपापूर्वक महापापनाशक, पुण्यप्रद, धन्य… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-63 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-63 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ तिरसठवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिव का महाकाली के दर्शन करना, ब्रह्मा और विष्णु द्वारा भगवती महाकाली की स्तुति, भगवती का इन्द्र को दर्शन देना तथा इन्द्र का ब्रह्महत्याजनित पाप से मुक्त होना अथः त्रिषष्टितमोऽध्यायः श्रीभगवतीद्वारगमनाद्देवराजब्रह्म-हत्याहरणोपाख्यानं श्रीमहादेवजी बोले — कुछ समय बाद पुष्प चुनने वाली… Read More
श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-62 श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-62 ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ बासठवाँ अध्याय भगवान् विष्णु का इन्द्र से महाकाली के लोक के विषय में अनभिज्ञता व्यक्त करना; ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र का शिवलोक जाना तथा भगवान् शिव के साथ भगवती महाकाली के लोक में जाना अथः द्विषष्टितमोऽध्याय ब्रह्मादीनां देवराजेन सह भगवतीस्थानगमनं श्रीमहादेवजी बोले — नारदजी !… Read More