अग्निपुराण – अध्याय 173 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय अनेकविध प्रायश्चित्तों का वर्णन प्रायश्चित्तानि अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ब्रह्मा के द्वारा वर्णित पापों का नाश करने वाले प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। जिससे प्राणों का शरीर से वियोग हो जाय, उस कार्य को ‘हनन’… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 172 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय समस्त पापनाशक स्तोत्र सर्वपापप्रायश्चित्ते पापनाशनस्तोत्रं ॥ पुष्कर उवाच ॥ परदारपरद्रव्यजीवहिंसादिके यदा । प्रवर्तते नृणां चित्तं प्रायश्चित्तं स्तुतिस्तदा ॥ १ ॥ पुष्कर कहते हैं —जब मनुष्यों का चित्त परस्त्रीगमन, परस्वापहरण एवं जीवहिंसा आदि पापों में प्रवृत्त होता… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 171 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय गुप्त पापों के प्रायश्चित्त का वर्णन रहस्यादिप्रायश्वित्तं पुष्कर कहते हैं —अब मैं गुप्त पापों के प्रायश्चित्तों का वर्णन करता हूँ, जो परम शुद्धिप्रद है । एक मास तक पुरुषसूक्त का जप पाप का नाश करने वाला… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 170 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सत्तरवाँ अध्याय विभिन्न प्रायश्चित्तों का वर्णन प्रायश्चित्तानि पुष्कर कहते हैं — अब मैं महापातकियों का संसर्ग करने वाले मनुष्यों के लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ । पतित के साथ एक सवारी में चलने, एक आसन पर बैठने, एक साथ… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 169 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय ब्रह्महत्या आदि विविध पापों के प्रायश्चित्त प्रायश्चित्तानि पुष्कर कहते हैं — अब मैं आपको इन सब पापों का प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। ब्रह्महत्या करने वाला अपनी शुद्धि के लिये भिक्षा का अन्न भोजन करते हुए एवं मृतक… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 168 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अड़सठवाँ अध्याय महापातकों का वर्णन महापातकादिकथनम् पुष्कर कहते हैं — जो मनुष्य पापों का प्रायश्चित्त न करें, राजा उन्हें दण्ड दे। मनुष्य को अपने पापों का इच्छा से अथवा अनिच्छा से भी प्रायश्चित्त करना चाहिये। उन्मत्त, क्रोधी और… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 167 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सड़सठवाँ अध्याय ग्रहों के अयुत-लक्ष-कोटि हवनों का वर्णन अयुतलक्षकोटिहोमाः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं शान्ति, समृद्धि एवं विजय आदि की प्राप्ति के निमित्त ग्रहयज्ञ का पुनः वर्णन करता हूँ। ग्रहयज्ञ ‘अयुतहोमात्मक’, ‘लक्षहोमात्मक’ और ‘कोटिहोमात्मक’ के भेद… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 166 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ छाछठवाँ अध्याय वर्णाश्रम धर्म आदि का वर्णन वर्णधर्मादिकथनं पुष्कर कहते हैं — अब मैं श्रौत और स्मार्त-धर्म का वर्णन करता हूँ। वह पाँच प्रकार का माना गया है। वर्णमात्र का आश्रय लेकर जो अधिकार प्रवृत्त होता है, उसे… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 165 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पैंसठवाँ अध्याय विभिन्न धर्मो का वर्णन नानाधर्माः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! हृदय में जो सर्वसमर्थ परमात्मा दीपक के समान प्रकाशित होते हैं, मन, बुद्धि और स्मृति से अन्य समस्त विषयों का अभाव करके उनका ध्यान करना… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 164 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौंसठवाँ अध्याय नवग्रह हवन का वर्णन नवग्रहहोमः पुष्कर कहते हैं — परशुरामजी! लक्ष्मी, शान्ति पुष्टि, वृद्धि तथा आयुकी इच्छा रखनेवाले वीर्यवान् पुरुष को ग्रहों की भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा… Read More