अग्निपुराण – अध्याय 053 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तिरपनवाँ अध्याय लिङ्ग [^1]  आदि का लक्षण का वर्णन लिङ्गलक्षणम् श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं — कमलोद्भव ! अब मैं लिङ्ग आदि का लक्षण बताता हूँ, सुनो। लंबाई के आधे में आठ से भाग देकर आठ भागों में से तीन भाग… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 052 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ बावनवाँ अध्याय चौंसठ योगिनी आदि की प्रतिमाओं के लक्षण का वर्णन देवीप्रतिमालक्षणम् श्रीभगवान् बोले — ब्रह्मन् ! अब मेँ चाँसठ योगिनियों का वर्णन करूँगा। इनका स्थान क्रमशः पूर्वदिशा से लेकर ईशानपर्यन्त है। इनके नाम इस प्रकार हैं — १. अक्षोभ्या,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 051 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ इक्यावनवाँ अध्याय सूर्यादि ग्रहों तथा दिक्पाल आदि देवताओं की प्रतिमाओं के लक्षणों का वर्णन सूर्य्यादिप्रतिमालक्षणम् श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! सात अश्वों से जुते हुए एक पहिये वाले रथ पर विराजमान सूर्यदेव की प्रतिमा को स्थापित करना चाहिये… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 050 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ पचासवाँ अध्याय चण्डी आदि देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के लक्षण मत्स्यादिदशावतारप्रतिमालक्षणवर्णनम् श्रीभगवान् बोले — चण्डी बीस भुजाओं से विभूषित होती है। वह अपने दाहिने हाथों में शूल, खड्ग, शक्ति, चक्र, पाश, खेट, आयुध, अभय, डमरू और शक्ति धारण करती है। बायें… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 049 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ उनचासवाँ अध्याय मत्स्यादि दशावतारों की प्रतिमाओं के लक्षणों का वर्णन मत्स्यादिदशावतारप्रतिमालक्षणवर्णनम् भगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं तुम्हें मत्स्य आदि दस अवतार विग्रहों का लक्षण बताता हूँ। मत्स्य भगवान्‌ की आकृति मत्स्य के समान और कूर्म भगवान्‌… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 048 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ अड़तालीसवाँ अध्याय चतुर्विंशति मूर्तिस्तोत्र एवं द्वादशाक्षर स्तोत्र चतुर्विंशतिमूर्तिस्तोत्रकथनम् श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! ओंकारस्वरूप केशव अपने हाथों में पद्य, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले हैं ।[^1]  नारायण शङ्ख, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं, मैं… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 047 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ सैंतालीसवाँ अध्याय शालग्राम-विग्रहों की पूजा का वर्णन शालग्रामादिपूजाकथनम् भगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख पूर्वोक्त चक्राङ्कित शालग्राम-विग्रहों की पूजा का वर्णन करता हूँ, जो सिद्धि प्रदान करने वाली है। श्रीहरि की पूजा तीन प्रकार की… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 046 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ छियालीसवाँ अध्याय शालग्राम-मूर्तियों के लक्षण शालग्रामादिमूर्तिनां लक्षणानि भगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं शालग्रामगत भगवन् मूर्तियों का वर्णन आरम्भ करता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। जिस शालग्राम शिला के द्वार में दो चक्र… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 045 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ पैंतालीसवाँ अध्याय पिण्डिका आदि के लक्षण का वर्णन पिण्डिकालक्षणकथनम् भगवान् हयग्रीव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं पिण्डिका का लक्षण बता रहा हूँ। पिण्डिका लंबाई में प्रतिमा के समान ही होती है, परंतु उसकी ऊँचाई प्रतिमा से आधी होती… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 044 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ चौवालीसवाँ अध्याय वासुदेव आदि की प्रतिमाओं के लक्षण का वर्णन वासुदेवादिप्रातिमालक्षणविधिः भगवान् हयग्रीव बोले — ब्रह्मन् ! अब मैं तुम्हें वासुदेव आदि की प्रतिमा के लक्षण बताता हूँ सुनो। मन्दिर के उत्तर भाग में शिला को पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखकर… Read More