अग्निपुराण – अध्याय 303 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तीनवाँ अध्याय अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि विधि अङ्गाक्षरार्च्चनम् अग्निदेव कहते हैं — जब चन्द्रमा जन्म-नक्षत्र पर हों और सूर्य सातवीं राशि पर हो तो उसे ‘पूषा का काल’ (पौष्णः कालः) समझना चाहिये। उस समय श्वास की परीक्षा… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 302 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ दोवाँ अध्याय नाना प्रकार के मन्त्र और औषधों का वर्णन नाना मन्त्राः अग्निदेव कहते हैं — ‘ऐं कुलजे ऐं सरस्वति स्वाहा’ — यह ग्यारह अक्षरों का मन्त्र मुख्य ‘सरस्वती विद्या’ है। जो क्षारलवण से रहित आहार ग्रहण करते… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 301 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ एकवाँ अध्याय सिद्धि-गणपति आदि मन्त्र तथा सूर्य देव की आराधना सूर्य्यार्च्चनम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! शार्ङ्गी (गकार), दण्डी (अनुस्वारयुक्त) हो, उसके साथ पद्येश — विष्णु (ईकार) और पावक (रकार) हो तो इन चार अक्षरों के मेल… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 300 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अध्याय ग्रहबाधा एवं रोगों को हरने वाले मन्त्र तथा औषध आदि का कथन ग्रहहृन्मन्त्रादिकम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ग्रहों के उपहार और मन्त्र आदि का वर्णन करूँगा, जो ग्रहों को शान्त करने वाले हैं। हर्ष,… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 299 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय बालादिग्रहहर बालतन्त्र बालग्रहहरबालतन्त्रम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं बालादि ग्रहों को शान्त करने वाले ‘बालतन्त्र’ को कहता हूँ । शिशु को जन्म के दिन ‘पापिनी’ नाम वाली ग्रही ग्रहण कर लेती है ।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 298 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय गोनसादि-चिकित्सा गोनसादि चिकित्सा अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख गोनस आदि जाति के सर्पों के विष की चिकित्सा का वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘ॐ ह्रां ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा’ — इस मन्त्र… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 297 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय विषहारी मन्त्र तथा औषध विषहृन्मन्त्रौषधम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ॐ नमो भगवते रुद्राय च्छिन्द-च्छिन्द विषं ज्वलितपरशुपाणये स्वाहा।’ इस मन्त्र से और ‘ॐ नमो भगवते पक्षिरुद्राय दष्टकमुत्थापयोत्थापय, दष्टकं कम्पय कम्पय जल्पय जल्पय सर्पदष्टमुत्थापयोत्थापय लल लल… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 296 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ छियानबेवाँ अध्याय पञ्चाङ्ग-रुद्रविधान पञ्चाह्गरुद्रविधानम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘पञ्चाङ्ग रुद्र-विधान ‘का वर्णन करता हूँ। यह परम उत्तम तथा सब कुछ प्रदान करने वाला है। ‘शिवसंकल्प’ इसका हृदय, ‘पुरुष सूक्त‘ शीर्ष, ‘अद्भ्यः सम्भूतः० (यजु० ३१ ।… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 295 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय दष्ट-चिकित्सा दष्टचिकित्साः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं मन्त्र, ध्यान और ओषधि के द्वारा साँप के द्वारा डॅसे हुए मनुष्य की चिकित्सा का वर्णन करता हूँ। ‘ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय’ इस मन्त्र के जप से… Read More


अग्निपुराण – अध्याय 294 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय नाग-लक्षण [^1] नागलक्षणानिः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अब मैं नागों की उत्पत्ति, सर्पदंश में अशुभ नक्षत्र आदि, सर्पदंश के विविध भेद, देश के स्थान, मर्मस्थल, सूतक और सर्पदष्ट मनुष्य की चेष्टा — इन सात… Read More