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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १४२
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १४२
कोटिहोम का विधान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं — महाराज ! प्राचीन काल में प्रतिष्ठान (पैठण) नामक नगर में संवरण नाम के एक महान् भाग्यशाली राजा थे । ये सभी शास्त्रों में निपुण, ब्रह्मतत्त्व के ज्ञाता, पितृभक्त तथा देव-ब्राह्मण के उपासक थे ।

एक समय की बात है, ब्रह्माजी के पुत्र महायोगी सनक राजा संवरण के पास आये । उन्हें देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनि को आसन देकर प्रणाम किया तथा अर्घ्य, पाद्य आदि से उनका सत्कार कर अपना राज्य और स्वयं को भी उनके लिये समर्पित किया ।om, ॐ मुनि ने भी राजा द्वारा किये गये अभिवादन और सत्कार को स्वीकार किया । उसके बाद ब्रह्मर्षि सनक ने अनेक राजाओं, महाराजाओं के चरित और इतिहासपुराण आदि की कथाएँ उन्हें सुनायीं । राजा कथा सुनकर आत्मविभोर हो उठे । इसी अवसर पर राजा संवरण ने जगत् के प्राणियों के हित की दृष्टि से सनकजी से प्रार्थना करते हुए कहा— देवर्षे ! भूकम्प, उपलवृष्टि, ग्रहयुद्ध, अनावृष्टि, राज्योपद्रव आदि उत्पातों की शान्ति के लिये कोई उपाय बताने की कृपा करें, जिससे कि धन-धान्य की वृद्धि, आरोग्य, सुख और स्वर्ग की प्राप्ति हो ।’ राजा संवरण की प्रार्थना को सुनकर सनकजी ने कहा — ‘राजन् ! सभी कार्यों की सिद्धि करनेवाले शान्तिप्रद कोटिहोम की विधि बता रहा हूँ, जिसके करने से ब्रह्महत्यादि पातक छूट जाते हैं । सभी उत्पात शान्त हो जाते हैं । साथ ही आरोग्य एवं सुख की भी प्राप्ति होती है । इसका विधान इस प्रकार है —

सबसे पहले शुद्ध मुहूर्त देखकर देवालय, नदी के तट पर, वन में अथवा घर में कोटिहोम करना चाहिये । सर्वप्रथम वेदवेत्ता ब्राह्मण का वरण कर गन्ध, अक्षत, पुष्प, माला, वस्त्र, आभूषण आदि से उनका पूजनकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये —

“त्वं नो गतिः पिता माता त्वं गतिस्त्वं परायणः ।
त्वत्प्रसादेन विप्रर्षे सर्वं मे स्यान्मनोगतम् ॥
आपद्विमोक्षाय च मे कुरु यज्ञमनुत्तमम् ।
कोटिहोमाख्यमतुलं शान्त्यर्थं सार्वकामिकम् ॥”
(उत्तरपर्व १४२ । १७-१८)
‘विप्रश्रेष्ठ ! आप ही हमलोगों के माता-पिता हैं, आप ही हमारे आश्रय हैं और आप ही गति हैं । आपके अनुग्रह से हमारे सभी मनोरथ परिपूर्ण हो जायँ । आपत्ति से छुटकारा प्राप्त करने के लिये तथा सार्वकामिक शान्ति प्राप्त करने के लिये आप कोटिहोम नामक उतम यज्ञ करा दें ।’

आचार्य को भी श्वेत वस्त्र आदि से अलंकृत होकर विद्वान् ब्राह्मण के साथ पुण्याहवाचन करना चाहिये । पूर्व और उत्तर की ओर ढालयुक्त समतल भूमि पर बने हुए मण्डप को ब्राह्मण सूत्र द्वारा घेर दे । मण्डप का प्रमाण इस प्रकार है — एक सौ हाथ विस्तार का मण्डप उत्तम, पचास हाथ का मध्यम तथा पचीस हाथ का मण्डप निकृष्ट है, किंतु शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार ही मण्डप बनाकर उसके बीच में आठ हाथ लम्बा-चौड़ा, तीन मेखला से युक्त, बारह अंगुल के विस्तारयुक्त योनि सहित एक चौरस कुण्ड बनाना चाहिये । कुण्ड के पूर्व दिशा में चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये, जो एक हाथ ऊँची हो । उसमें सभी देवताओं को स्थापित करे । मण्डप की भूमि को गोबर-मिट्टी से अच्छी तरह लीपकर पञ्चपल्लवों से सुसज्जित जलपूर्ण चौदह कलश को स्थापित करना चाहिये । मण्डप के ऊपर वितान और तोरण लगाने चाहिये । सब सामग्री एकत्रित कर पुण्याहवाचन, स्वस्तिवाचन, जयशब्दपूर्वक शुद्ध दिन से पुरोहित को हवन प्रारम्भ करना चाहिये । मण्डप के पूर्व में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, पश्चिम में रुद्र, उत्तर में वसु, ईशान में ग्रह, अग्निकोण में मरुत् और शेष दिशाओं में लोकपालों की (वेदियों पर) स्थापना करे । गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से वैदिक और पौराणिक मन्त्रों द्वारा सबका अलग-अलग पूजन और प्रार्थना करे ।

इसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणसहित विधानपूर्वक कुण्ड का संस्कार करे । कुण्ड में अग्नि प्रज्वलितकर उस अग्नि का नाम घृतार्चिष रखे । विद्यावृद्ध, वयोवृद्ध, गृहस्थ, जितेन्द्रिय, स्वकर्मनिष्ठ शुद्ध और ज्ञानशक्तिसम्पन्न एक सौ ब्राह्मणों को हवन के लिये नियुक्त करे अथवा जिस संख्या में उत्तम ब्राह्मण उपलब्ध हों, उनका ही वरण करना चाहिये । इसके बाद पञ्चमुख अग्नि का ध्यान करना चाहिये । नामसहित उनकी सात जिह्वाओं की पूजा करनी चाहिये । धुआँयुक्त अग्नि में हवन करना व्यर्थ होता है । इसलिये प्रज्वलित अग्नि में ही हवन करना चाहिये ।

ऋग्वेदी ब्राह्माणों को पूर्वाभिमुख, यजुर्वेदी को उत्तराभिमुख, सामवेदी को पश्चिमाभिमुख और अथर्वणवेदी ब्राह्मण को दक्षिणाभिमुख बैठकर आधार और आज्यभाग की आहुतियाँ देनी चाहिये । पहले ब्रह्मा का स्थापन कर इस कर्म को आरम्भ करना चाहिये । आदि में ‘प्रणव’ लगाकर अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण कर व्याहृतियों से हवन करना चाहिये । घी, काला तिल तथा जौ मिलाकर पलाश की समिधाओं से कोटिहोम करना चाहिये । एक हजार आहुति पूर्ण होने पर पूर्णाहुति करनी चाहिये । पुनः उसी प्रकार हवन करना चाहिये । इस विधि से कोटिहोम करना चाहिये । इसमें दस हजार बार पूर्णाहुतियाँ दी जाती हैं । इसमें सभी ब्राह्मणों और यजमान को काम, क्रोध आदि दोषों से दूर रहना चाहिये ।

कोटिहोम की विधि को सुनकर राजा संवरण ने कहा कि — महर्षे ! इस कोटिहोम में बहुत अधिक समय लगेगा, इतने दिन तक संयम से रहना बहुत ही कठिन कार्य है । इसलिये कृपाकर आप कोटिहोम की संक्षिप्त विधि बताने का कष्ट करें, जिससे कम समय में यह निर्विघ्न पूर्ण हो जाय ।

राजा के इस प्रकार के वचन को सुनकर सनक मुनि ने कहा — ‘राजन् ! कोटिहोम चार प्रकार का होता है — शतमुख, दशमुख, द्विमुख और एकमुख । समयानुसार इन चारों में से जो भी होम हो सके वहीं करना चाहिये । एक हाथ प्रमाणवाले उत्तम एक सौ कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्ड पर एक-एक ब्राह्मण को अथवा समय कम रहने पर प्रत्येक कुण्ड पर दस-दस ब्राह्मण को हवन के लिये नियुक्त करे । एक कुण्ड में अग्नि का संस्कार कर उसी अग्नि को अन्य कुण्डों में भी प्रज्वलित करना चाहिये । इस विधि द्वारा जो हवन किया जाता है, उससे एक ही कोटिहोम होता है, जो शतमुख होम कहलाता है । यदि समय का अभाव न हो तो दस कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्ड पर बीस-बीस ब्राह्मण हवन के लिये नियुक्त करने चाहिये । यह दशमुख नामक कोटिहोम है । यदि महीने-दो-महीने का समय हो तो दो कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्ड पर पचास-पचास ब्राह्मणों को हवन के लिये आमन्त्रित करना चाहिये । यह द्विमुख कोटिहोम है । अधिक-से-अधिक समय हो तो एक कुण्ड में अग्नि-स्थापन कर उत्तम कुलोत्पन्न वेदवेत्ता सदाचारी ब्राह्मणों से हवन कराना चाहिये । इस हवन में ब्राह्मणों की संख्या का कोई नियम नहीं और समय की सीमा भी निश्चित नहीं हैं । यह एकमुख कोटिहोम स्वेच्छायज्ञ कहलाता है । इस स्वेच्छायज्ञ में बहुत समय लगता है और बीच में अनेक प्रकार के विघ्न भी उत्पन्न हो जाते हैं । धन और शरीर की स्थिरता का कुछ भी भरोसा नहीं है । इसलिये संक्षेप से ही यज्ञ करना चाहिये ।

यज्ञ सम्पन्न कर अच्छी प्रकार से महोत्सव मनाना चाहिये । सभी ब्राह्मणों को कटक, कुण्डल, वस्त्र, दक्षिणा, एक सौ गाय, एक सौ घोड़े और स्वर्ण आदि प्रदान करना चाहिये तथा पुरोहित की पूजा करनी चाहिये । दीनों, अन्धों तथा कृपणों आदि को भोजन देकर अन्त में कलशों के जल से अवभृथ स्नान करे और ब्राह्मण यजमान का अभिषेक करे । इस विधि से हो राजा या व्यक्ति कोटिहोम करता है, वह आरोग्य, पुत्र, राज्यवृद्धि, ऐश्वर्य, धन-धान्य प्राप्त कर सभी प्रकार से संतुष्ट रहता है तथा उसको ग्रहपीड़ा भी नहीं भोगनी पड़ती । राज्य में अनावृष्टि, उत्पात, महामारी, दुर्भिक्ष आदि कभी नहीं होते । सभी तरह के पाप और ग्रहों की पीड़ा को दूर करनेवाला शान्तिदायक यह कोटिहोम है, इसको करनेवाला व्यक्ति इन्द्रलोक को प्राप्त कर लेता है ।
(अध्याय १४२)

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