भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय २५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय २५
सौभाग्यशयन व्रत की विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! अब मैं सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले सौभाग्यशयन व्रत का वर्णन करता हूँ । जब प्रलय के पूर्वकाल में — ‘भूर्भुवः स्वः’ आदि सभी लोक दग्ध हो गये, तब सभी प्राणियों का सौभाग्य एकत्र होकर वैकुण्ठ में भगवान् विष्णु के वक्षः-स्थल में स्थित हो गया । पुनः जब सृष्टि हुई, तब आधा सौभाग्य ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति ने पान कर लिया, जिससे उनका रुप-लावण्य, बल और तेज सबसे अधिक हो गया । om, ॐशेष आधे सौभाग्य से इक्षु, स्तवराज, निष्पाव (सेम), राजिधान्य (शालि या अगहनी), गोक्षीर तथा उसका विकार, कुसुंभ-पुष्प (केसर), कुंकुम तथा लवण – ये आठ पदार्थ उत्पन्न हुए । उनका नाम सौभाग्याष्टक हैं ।
इक्षवः स्तवराजं च निष्पावा राजिधान्यकम् ।
विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुंकुमं तथा ।
लवणं चाष्टमं तत्र सौभाग्याष्टकमुच्यते ॥ (उत्तरपर्व २५ । ९)

दक्ष प्रजापति ने पूर्वकाल में जिस सौभाग्य का पान किया, उससे सती नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई । सभी लोकों में उस कन्या का सौन्दर्य अधिक था, इसीसे उसका नाम सती एवं रूप में अतिशय लालित्य होने के कारण ललिता पड़ा । त्रैलोक्य-सुन्दरी इस कन्या का विवाह भगवान् शंकर के साथ हुआ । जगन्माता ललितादेवी की आराधना से भुक्ति, मुक्ति और स्वर्ग का राज्य आदि सब प्राप्त होते हैं ।

राजा युधिष्ठिरने कहा — भगवन् ! जगद्धात्री उन भगवती की आराधना का क्या विधान है ? उसे आप बतलाये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को ललितादेवी का भगवान् शंकर के साथ विवाह हुआ । इस दिन पूर्वाह्ण में तिलमिश्रित जल से स्नान करे । पञ्चगव्य तथा चन्दनमिश्रित जल के द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखर की प्रतिमा को स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकार के फलों द्वारा उन दोनों की पूजा करे । इसके बाद इस प्रकार अंग-पूजा करे —
‘ॐ पाटलायै नमः, ॐ शम्भवे नमः’ ऐसा कहकर पार्वती और शम्भु के चरणों की, ‘ॐ त्रियुगायै नमः, ॐ शिवाय नमः’ से दोनों गुल्फों की; ‘ॐ विजयायै नमः ॐ भद्रेश्वराय नमः’ से दोनों जानुओं की, ‘ॐ ईशान्यै नमः, ॐ हरिकेशाय नमः’ से कटी प्रदेश की , ‘ॐ कोटव्यै नमः, ॐ शूलिने नमः’ से कुक्षियों की, ‘ॐ मंगलायै नमः, ॐ शर्वाय नमः’ से उदर की, ‘ॐ उमायै नमः, ॐ रुद्राय नमः’ से कुचद्वय की, ‘ॐ अनन्तायै नमः, ॐ त्रिपुराय नमः’ से दोनों हाथों की पूजा करे । ‘ॐ भवान्यै नमः, ॐ भवाय नमः’ से दोनों के कण्ठ की, ‘ॐ गौर्यै नमः, ॐ हराय नमः’ से दोनों के मुख की तथा ‘ॐ ललितायै नमः ॐ सर्वात्मने नमः’ से दोनों मस्तक की पूजा करे ।

इस प्रकार विधिवत पूजन कर शिव-पार्वती के सम्मुख सौभाग्याष्टक स्थापित कर ‘उमामहेश्वरौ प्रीयेताम’ कहकर उनकी प्रीति के लिये निवेदन करे । इस रात्रि में गोशृंगोदक का प्राशनकर भूमि पर ही शयन करना चाहिये । प्रातः द्विज दम्पति की वस्त्र-माला तथा अलंकारों से पूजाकर सुवर्णनिर्मित गौरी तथा भगवान् शंकर की प्रतिमा के साथ वह सौभाग्याष्टक ‘ललिता प्रीयताम’ ऐसा कहकर ब्राह्मणों को दे दे ।

इस प्रकार एक वर्ष तक प्रत्येक मास की तृतीया को पूजा करनी चाहिये । चैत्र आदि बारहों मासों में क्रमशः गौ के सींग का जल, गोमय, मन्दार-पुष्प, बिल्वपत्र, दही, कुशोदक, दूध, घृत, गोमूत्र, कृष्ण तिल और पंचगव्य का प्राशन करना चाहिये । ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मंगला, कमला, सती तथा उमा– इन बारह नामों का क्रमशः बारह महीनों में दान के समय –‘प्रीयताम’ कहकर उच्चारण करे । मल्लिका, अशोक, कमल, कदम्ब, उत्पल, मालती, कुड्मल, करवीर, बाण (कचनार या काश), खिला हुआ पुष्प, कुंकुम और सिंदुवार – ये बारह महीनों की पूजा के लिये क्रमशः पुष्प कहे गये हैं । जपाकुसुम, कुसुंभ, मालती तथा कुंद के पुष्प प्रशस्त माने गये हैं । करवीर का पुष्प भगवती को सदा ही प्रिय है ।

इस प्रकार एक वर्ष तक व्रत करके सभी सामग्रियों से युक्त उत्तम शय्या पर सुवर्ण की उमा-महेश्वर की तथा सुवर्णनिर्मित गौ तथा वृषभ की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा कर ब्राह्मणों को दे ।

इस व्रत के करने से सभी कामनाएँ सिद्ध होती है और निष्कामभाव से करने पर नित्यपद प्राप्त होता है । स्त्री, पुरुष अथवा कुमारी जो कोई भी इस सौभाग्यशयन नामक व्रत को भक्तिपूर्वक करते हैं वे देवी के अनुग्रह से अपनी कामनाओं को प्राप्त कर लेते हैं । जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करते हैं, वे दिव्य शरीर पाप्त कर स्वर्ग में जाते हैं । इस व्रत को कामदेव, चन्द्रमा, कुबेर तथा और भी अन्य देवताओं ने किया है । अतः सबको यह व्रत करना चाहिये ।
(अध्याय २५)

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