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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय १०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – १०
मनोरथ, कराल, मेघपुष्प और बलाहक नामक चार घोड़ों की उत्त्पति

सूत जी बोले — नवे वर्ष के आरम्भ में वह सबल कृष्णांश (उदयसिंह) राजनीति विद्या, चौंसठ कलाओं और धर्मशास्त्र में निपुणता प्राप्तकर सर्वश्रेष्ठ होने के नाते ख्याति प्राप्त हुआ । भृगुथेष्ठ ! उस समय राजा पृथ्वीराज ने कर (माल-गुजारी) ग्रहण करने के लिए अपनी सेना को महावती (महोबा) नगर में भेजा । महापराक्रमी एवं शस्त्रास्त्रधारी उन एक लाख सैनिकों ने राजा परिमल से कहा — चन्द्रकुलोत्पन्न , राजन् ! हम लोगों की बातें सुनने की कृपा करें । om, ॐभारत वर्ष के जितने बलवान् राजा हैं, सभी (अपनी आय का) छटाँ भाग कररूप में हमारे महाराजा को समर्पित करते हैं । अब आप भी उन्हें कर देने की क्षमता प्राप्त करें, अतः आज से आपको यह राजकर अर्पित करना पड़ेगा, नहीं तो, कर न देने पर पृथ्वीराज के सैनिकों के रुद्रास्त्रों द्वारा आप नष्ट कर दिये जायेंगे, क्योंकि जयचन्द्र के पक्ष वाले सभी राजागण भयभीत होकर पृथिवीराज को वह राजकर सदैव मान-सत्कार के साथ प्रदान करते आ रहे हैं । इसे सुनकर राजा (परिमल) ने छठाँ भाग राजदण्ड रूप में महाराज पृथ्वीराज को सप्रेम समर्पित किया । दश लाख द्रव्य लेकर वे सैनिकगण वहाँ से चले आये और पृथ्वीराज ने भी प्रसन्न होकर पुराने वैर का त्यागकर दिया । पश्चात् वे एक लाख के सैनिक शूरों ने कान्यकुब्ज (कन्नौज) में पहुँचकर राजा जयचन्द्र से नमस्कारपूर्वक कहा — क्षणकोविद ! महाराज पृथ्वीराज ने आपसे राजकर माँगा है, इतना कहने पर वैष्णवास्त्र के लक्षणवेत्ता उस राजा ने उन लोगों से कहा — मेरे राज्य में इस समय अनेक मण्डलीक (छत्रधारी) राजा हैं, किन्तु मेरे जीवन-काल में पृथ्वीराज मण्डलीक राजा न बने । पश्चात् क्रुद्ध होकर उसने अपने वैष्णवास्त्र का प्रयोग करना ही चाहा कि सैनिकगण उस अस्त्र की ज्वाला से भयभीत होकर भाग गये । इसे सुनकर पृथ्वीराज भी अत्यन्त भयभीत हुए ।

दशवें वर्ष की अवस्था में कृष्णांश (उदयसिंह) मल्ल विद्या में भी निपुण हो गया । उस समय महावती नगरी में अनेक मल्लों (पहलवानों) का आगमन हुआ । राजा ने उन सबको आतिथ्य सत्कार प्रदान किया । मल्लों के वहाँ एकत्र होने पर सबसे अधिक बली उदयसिंह ही दिखाई देने लगा । उन मल्लों में पृथ्वीराज का पुत्र, जो सोलह वर्ष का था, अपने सौ मल्लों समेत उपस्थित था । उसने फूफा राजा परिमल से कहा — राजन् ! यह कृष्ण अधिक मदमत्त दिखाई देता है, और मेरा भी नाम अभय है, अतः नृपोत्तम ! उससे मेरा मल्ल युद्ध होना चाहिए । वज्र के समान इस बात को सुनकर राजा ने कातर होकर अपने साले से कहा — आप युद्ध कुशल हैं, मेरा यह स्निग्धपुत्र, जो मेरा प्राणप्रिय है, अभी आठ ही वर्ष का है । कहाँ वज्र की भाँति कठोर आयु और कहाँ अत्यन्त सुकोमल यह बालक ।’ मेरे यहाँ और अन्य मल्ले रहते हैं, आप उनके साथ रण-कुशलता दिखा सकते हैं ! इसको सुनकर उसने क्रुद्ध होकर कहा — ‘यह बालक अत्यन्त बलवान् है राजन् ! इसका कारण तथा मैं जिस प्रकार इस बालक को जानता हूँ, कह रहा हूँ, सुनिये ! अपने पुत्र पृथ्वीराज को अपराधी समझकर राजा तिलक ने पण्डितों को बुलवाकर उनसे मुहूर्त पूँछा । उस समय ज्योतिषशास्त्र के निपुण विद्वान् पण्डित गणेश जी ने लक्षण-फलों की व्याख्या करना आरम्भ किया – राजन् ! देशराज का वह सर्वश्रेष्ठ पुत्र इसके योग्य है, जो शिव जी से वरदान प्राप्तकर इस समय कुबेर की भॉति दिखाई पड़ता है तथा कृष्ण के अंश से उत्पन्न है । राजन् ! और दूसरा इस भूतल में कोई भी इसके योग्य नहीं है’ यह मैं बार-बार सत्य ही कह रहा हूँ । उसे सुनकर वीर लक्षण (लषन) ने पूर्व बर्हिष्मती नगरी, दक्षिण में कल्पक्षेत्र, पश्चिम में भूमिग्राम और उत्तर में नैमिषारण्य तक अपना राज्य स्थापित किया । अतः मैंने सुना कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) का राजकुमार सर्वश्रेष्ठ है । राजन् ! श्रावणमास की इस नाग-पञ्चमी के दिन कुमारों के अंग दृश्य होते ही हैं इसलिए इस योग्य बालक का मेरे साथ मल्ल-युद्ध होना ही चाहिए । इसे सुनकर वह कृष्णांश (उदयसिंह) उनके वाक् शर से अत्यन्त पीड़ित होकर अभय के दोनों बाहुओं को शीघ्रता से पकड़कर युद्ध करने लगा — क्षण में उससे युद्ध करके उसे भूमि में फेंक दिया — उस युद्ध में उसने अभय की भुजा तोड़ दी ।

राजा ने अपने पुत्र को संज्ञाहीन (मूर्छित देखकर हाथ में तलवार लिए उन मल्लों को कृष्णांश के हननार्थ भेजा । उन मल्लों को क्रुद्ध एवं रोषपूर्ण जानकर उस बलवान् कृष्णांश ने उनमें से एक-एक को भूमि में गिराकर विजय की प्राप्ति की । मल्ल सैनिकों के पराजित हो जाने पर राजा ने हाथ में तलवार लेकर उस कृष्णांश द्वारा अपने जीवन को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध होने का निश्चय किया । राजा ने उन्हें इस प्रकार मरण के लिए निश्चित तैयार जानकर अभय को आरोग्य करके उसके समेत राजा को अपने यहाँ प्रेम-पूर्वक रखा । नवें वर्ष के आरम्भ में कृष्णांश (उदय सिंह) के आह्लाद (आल्हा) आदि कुमारों समेत मृगयार्थ जंगल के लिए प्रस्थान किया। उन्होंने प्रस्थान करते समय राजा से कहा — भूपश्रेष्ठ, तात ! सम्पूर्ण आनन्द को प्रदान करने वाले आप परमकारुणिक हैं । अतः हमें उन प्रिय घोड़ों को दे दीजिये । उसे सुनकर राजा ने उसे स्वीकार करते हुए अत्यन्त हर्षमग्न होकर उन चारों कुमारों के लिए पृथिवी निवासी चार दिव्य घोड़े प्रदान किये, जो हरिणी नामक घोड़ी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे ।

ऋषियों ने कहा — मुने ! सूत ! भीष्मसिंह को देवेश इन्द्र के द्वारा वह हरिणी घोड़ी जिस प्रकार से प्राप्त हुई थी, हम लोगों ने आपके द्वारा उसे सुन लिया । अब यह सुनने की इच्छा है कि ये घोड़े, जो कुमारों को राजा द्वारा प्राप्त हुए हैं और जो दिव्यभूषणों से सुसज्जित एवं नभ (सलिल) चारी हैं, किस प्रकार उत्पन्न हुए हैं ?

सूत जी बोले — धार्मिक राजा देशराज ने पहले समय में लगातार बारह वर्ष तक सूर्य की सेवा की थी । जिससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य ने उनसे कहा — वर की याचना करो । उन्होंने कहा — देव! तुम्हें नमस्कार है, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मुझे आकाश-गंगा के जल में चलने वाले उस घोड़े को प्रदान करने की कृपा कीजिये । इसे स्वीकार कर सूर्य ने उसे ‘पपीहा’ (लोक की रक्षा करने वाला) नामक घोड़ा प्रदान किया । पश्चात् लोक पालन करने वाला यह पपीहा नामक अश्व मदोन्मत्त होने के नाते काम को रोकने में असमर्थ होकर उस दिव्य इरिणी नामक घोड़ी के साथ मैथुन किया, जिसके गर्भ से ये — पीले वर्ण का मनोरथ (मनोहर) और कृष्ण वर्ण का कराल (भीषणाकार) ये दोनों एक ही गर्भ से उत्पन्न हुए, उन्हें शैव्य और सुग्रीव का कला अंश बताया जाता है । पश्चात् जिष्णु और विष्णु कला के अंश हरिणी के गर्भ से मेघपुष्प और बलाहक उत्पन्न हुए, जिन्हें सुवर्ण के समान अंगवाले को विन्दुल (वेंदुल) और श्वेतवर्ण वाले को हरिनागर कहा गया है । प्रथम दिव्य अंग वाले ये महाबली चार घोड़े उत्पन्न हुए, अनन्तर इन्हीं अश्वों के अंश से अनेक की उत्पत्ति हुई है ।

विप्र ! इस प्रकार इनकी उत्पत्ति कथा तुम्हें बता दी गई। अब आगे समाचार बता रहा हूँ, सुनो ! इन चारों घोड़ों के भूमि पर प्राप्त होने पर मनोरथ नामक अश्व बलवान देवसिंह को दिया गया, आह्लाद (आल्हा) के लिए कराल, उदयसिंह को विन्दुल, और पुत्र व्रह्मानन्द को हरिनागर नामक अश्व दिया गया। ये चारों राजकुमार अपने घोड़ों पर सवार होकर मृगया के लिए किसी जंगल की ओर चल पड़े । उस समय उन सबके पीछे बलखान (मलखान) भी अपनी हरिणी घोड़ी पर बैठकर जा रहा था । वहाँ वे सब सिंह के जंगल में पहुँचकर, आह्लाद (आल्हा) ने एक बाघ का शिकार किया, जो प्राणियों के लिए भयंकर होता है । उसी प्रकार देवसिंह ने सिंह, बलखान ने शूकर और ब्रह्मानन्द ने हरिण का शिकार किया । इस प्रकार उन कुमारों ने उस जंगल में सैकड़ों जंगली जीवों का शिकार करके उन्हें साथ लेते हुए अपने घर को प्रस्थान किया । उसी बीच कल्याणमुखी देवी शारदा ने सुवर्ण की मृगी का रूप धारणकर उनके सम्मुख दौड़ना आरम्भ किया । उसे देखकर मोहित होकर कुमारों ने अपने-अपने बाणों से उस पर प्रहार किया किन्तु, उनके वे भीषण बाण, उस मृगी के अंगों में प्रविष्ट होकर भी नष्ट हो जाया करते थे । उसे देखकर आलाद आदि कुमार अत्यन्त आश्चर्यचकित होने लगे । उस समय उदयसिंह ने अपने बाण से उस पर आघात किया । उस बाण से पीड़ित एवं भयभीत होकर देवी दूसरे जंगल में चली गई। पश्चात् कृष्णांश (उदयसिंह) भी क्रुद्ध होने के नाते अपने नेत्र को ताँबे की भाँति रक्तवर्ण करते हुए उसके पीछे चल पड़ा । वहाँ दूसरे जंगल में पहुँचकर देवी ने अपने स्वरूप को धारण करके प्रसन्न मुख मुद्रा करती हुई उससे कहा — मैंने तुम्हारी परीक्षा ली है, अतः जब कभी तुम्हें कहीं किसी प्रकार का भय दिखाई पड़े, उस समय सदैव मेरा स्मरण करते रहना, मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध करूंगी, क्योंकि आप विभु (व्यापक) एवं कृष्ण के अंश से अवतरित हैं । इतना कहकर वह सर्वमंगला शारदा देवी अन्तर्हित हो गई और उदयसिंह उन कुमारों के साथ प्रसन्नतापूर्ण होते हुए घर पहुँचे । उस समय राजा उन कुमारों के पराक्रम को देखकर अत्यन्त सुखी हुए और वहाँ उसी समय से लक्ष्मी देवी ने भी प्रत्येक घरों में निवास करना आरम्भ किया ।
(अध्याय १०)

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