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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व तृतीय – अध्याय २१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय २१

ऋषि बोले — विप्रेन्द्र ! घर पहुँचकर उन वीरों ने जो कुछ चरित किया है, उसे सुनाने की कृपा करें, हमलोगों के समक्ष आप सर्वज्ञ हैं ।
सूत जी बोले — उन वीरों ने घर पहुँचने पर राजा (परिमल) की सभा को चारों ओर से अलंकृत करते हुए जिस प्रकार वहाँ युद्ध आदि हुआ था । सभी का वर्णन करके राजा को सुनाया । उन बातों को राजा परिमल ने सुना कि वहाँ की रणस्थली में घोड़ों का अधिक ध्वंस हुआ है, उन्होंने उदयसिंह को बुलाकर नम्रतापूर्वक कहा — सिन्धु प्रदेश में जाकर तुम पाँच लाख घोड़ों का क्रय करके शीघ्र चले आओ । om, ॐइसे सुनकर उदयसिंह ने देवसिंह को साथ लेकर एक सहस्र भार सुवर्ण ऊँटों पर रखकर और दश सहस्र सेना समेत वहाँ के लिए प्रस्थान किया । वहाँ की मयूर नामक नगरी में पहुँचकर, जो चारो वर्णों के मनुष्यों से सुशोभित हो रही थी, प्रातःकाल के समय देखा, एक माली की कन्या, जिसका नाम पुष्पा था, पुष्प के लिए जा रही है । देवांश उदयसिंह भी पूजा के उपरान्त प्रसन्न मुखमुद्रा में उसी उपवन में पहुँचे, जहाँ ऋतुराज बसंत की छत्रछाया में विकसित कलियाँ आश्चर्य प्रकट कर रही थीं और मतवाले होकर भौरें उन पर गूंज रहे थे । उस उपवन की छटा देखकर उदयसिंह मोहित हो गये । उसी बीच वह पुष्पा भी पुष्प संचय के लिए वहाँ आ गई । उसने देखा — यह पुरुष देवता की भाँति सर्वाङ्ग सुन्दर सोलह वर्ष की अवस्था सम्पन्न, प्रसन्नमुख, शान्त और इन्द्रनील मणि की भाँति इसके देह की आभा है ।

उदयसिंह ने भी उस कल्याणमुखी को देखकर विस्मित हो उठे। उन्होंने उससे पूँछा कि — सुर सुन्दरी की भाँति यह स्त्री किसकी प्रिया है, जो स्वर्गलोक से यहाँ आई है, अथवा स्वयं पन्नगी ही है ? इसे सुनकर उस माली की कन्या ने कहा — महाबाहो ! मैं शूद्र कुल में उत्पन्न हूँ, यहाँ पुष्प संचय करने आई हूँ । नृप इसी पुण्य द्वारा वह राजकुमारी तुलित (तौली) की जायगी, जिसका नाम पुष्पावती देवी है, और जो गुण समूहों से सुशोभित राधा की भाँति ख्याति प्राप्तकर चुकी है । उस रूप-यौवन सम्पन्न कुमारी के लिए लालायित होकर देवगण प्रार्थी रहते हैं । मकरन्द के भय से देवगण कोई बल प्रयोग नहीं करते हैं, राजन् ! मैं उस कारण को बता रही हूँ, सुनो ! राजा मयूरध्वज ने स्कन्द से वरदान प्राप्त किया है कि — उदयसिंह के अतिरिक्त और सभी के लिए तुम इस भूतल में अजेय हो ।’ तथा उनके मित्र राजा पृथ्वीराज हैं, जो राजाधिराज और शिव के अनन्य भक्त हैं । एक बार राजा ने भगवान् विष्णु के प्रसन्नार्थ धर्ममेध नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया । उस समय प्रसन्न होकर भगवान् यज्ञेश ने अग्नि द्वारा सुन्दर मुख वाले मिथुन (जुड़वाँ) सन्तान की उत्पत्ति की जिसमें एक मकरन्द नामक पुत्र और दूसरी पुष्पवती नाम की कन्या हुई । पाँच वर्ष की अवस्था में महाबलवान् मकरन्द ने, जो वेद धर्म का परायण करने वाले थे, अपने तप द्वारा धर्म को प्रसन्न करना आरम्भ किया । पुनः मकरन्द की बारहवर्ष की अवस्था में भगवान् धर्मदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें एक महान् अश्व प्रदान किया, जो पाषाणमय, महावेगवान् एवं शत्रु की सेना का विध्वंस करने वाला था । उस घोड़े को अपनाने के कारण वे सभी के पूज्य तथा सब भाँति से सुखी हुए । यह सुन्दर उपवन उन्हीं की है, जो दिव्य और देवपूजित हैं । पश्चात् उसने यह भी कहा कि-‘पुष्पवती (फुलवा) का रूप सौन्दर्य आपके ही योग्य है।

इस बात को सुनकर उदयसिंह अत्यन्त मोहित होकर कामपीड़ित हुए, अनन्तर उसे बहुत-सा धन देकर उसके घर आये । कालदर्शी देवसिंह ने उदयसिंह को उस कुमारी के प्रति मोहित जानकर सांख्यमत के उपदेश द्वारा उन्हें ज्ञान प्रदान किया । तदुपरान्त देवसिंह के साथ उदयसिंह ने सिन्धु देश में पहुँचकर घोड़ों का क्रय करके मास की समाप्ति तक घर पहुँच कर राजा को निवेदनपूर्वक सौंप दिया । एक दिन पुष्पा द्वारा वर्णन किये गये पुष्पवती के शुभरूप का ध्यान करके मोहित हो जाने पर उदयसिंह ने जगदम्बिका की आराधना की ।
“देवमाणे महामाये नित्यशुद्धस्वरूपिणि ।
पाहि मां कामदेवते पुष्पवत्यै बोध ॥
मधुकैटभसम्मोहे महिषासुरघातिनि ।
पाहि मां कामदेवार्तं पुष्पवयै प्रबोधय ॥
धूम्रलोचनसन्दाहे चण्डमुण्डविनाशिनि ।
पाहि मां कामदेवात्तं पुष्पवत्यै प्रबोधव ॥
रक्तबीजासृदकपीते सर्वदैत्यभयङ्करे ।
पाहि मां कामदेवार्तं पुष्पवत्यै प्रबोध ॥
निशुम्भदैत्यसंहारे शुम्भदैत्यविनाशिनि ।
पाहि मां कामदेवार्तं पुष्पवत्यै प्रबोधय ॥”

उदयसिंह ने कहा — हे देवमाये, महामाये एवं नित्यशुद्ध स्वरूप धारण करने वाली देवि ! कामदेव द्वारा मैं अत्यन्त पीड़ित हो रहा हूँ, मेरी रक्षा कीजिये और पुष्पवती को मेरे प्रति सचेष्ट करने की कृपा कीजिये । मधु कैटभ को सम्मोहित करने वाली तथा महिषासुर का उन्मूलन करने वाली देवि ! मुझ कामपीड़ित की रक्षा करते हुए पुष्पवती को प्रबोधित कीजिये । धूम्रलोचन को भस्म करनेवाली एवं चण्ड-मुण्ड की विनाशिनी देवि ! आपने रक्तबीज के रक्त का पान करके समस्त दैत्यों को भयभीत किया है । निशुंभ और शुभ दैत्य का वध करने वाली देवि ! मुझ कामपीड़ित की रक्षा करते हुए आप उस पुष्पवती को मेरे प्रति अनुरागपूर्ण कीजिये ।

इस प्रकार देवी की आराधना करते हुए वे अपने उत्तमासन पर निद्रित हो गये । उस समय स्वप्न में शारदा देवी ने दर्शन दिया । इसी प्रकार वरदहस्ता भगवती ने प्रतिदिन उन्हें दर्शन देकर वर्षाकाल के चार मास व्यतीत करा दिया । मुने ! उस समय उदयसिंह की तेइस वर्ष की अवस्था आरम्भ थी । कार्तिकमास के आरम्भ में देवसिंह को साथ लेकर उदयसिंह ने मकरन्द रक्षित उस मयूर नगर को प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचकर उसी पुष्पा मालिनी के घर में रहने लगे । एक बार उदयसिंह द्वारा गुंथे गये एक सुन्दर हार को लेकर जिसमें पुष्पों के बीच-बीच में मोतियों और मणियों को लगाकर उसे अत्यन्त मनमोहक बनाया गया था, पुष्पा ने पुष्पवती के भवन में जाकर उसे प्रदान किया । उस अनुमप हार को देखकर, जो त्वष्ट्रा की भाँति रचित एवं अत्यन्त प्रिय था, रति के समान सुन्दरी उस कामिनी ने मोहित होकर उसे हृदय में धारण कर लिया (पहन लिया) । पश्चात् उससे कहा — अये सखि ! महामाये । मेरे समक्ष सत्य कहना, मेरे मन को हरण करने वाले इस सुन्दर हार को तूने कहाँ से प्राप्त किया है । इस बात को सुनकर मकरन्द के भय से भयभीत होकर पुष्पा ने अपनी अञ्जलि में पुष्प रखकर उससे कहा — आप मुझे जीवन-दान प्रदान करने की कृपा करें तो मैं सभी कुछ बता सकती हूँ ।

कुमारी के अभय दान देने पर उसने कहना आरम्भ किया — शुभे ! कृष्णा नाम की मेरी एक भगिनी है, जो अत्यन्त सुन्दरी एवं समस्त लोक को मोहित करने वाली है, उसका घर महावती (महोबा) राजधानी में है, इस समय मेरे यहाँ आई हुई है । शुभ्रे ! उसी ने इस मनोहर हार को गूंथा है ।
इसे सुनकर देवी पुष्पवती ने मालिनी से कहा — मुझे उसे शीघ्र दिखाओ । तुम जानती हो कि इस भूतल में मकरन्द के भय से देव अथवा कोई भी मनुष्य मेरे पास तक पहुँच नहीं सकता है, मैं यह सत्य कह रही हूँ ।
इस दारुण वाणी को सुनकर भयभीत होकर पुष्पा उस समय कुछ भी न कह सकी, यद्यपि उसने बार-बार पूछा भी ।
पुष्पवती ने उसकी ओर देखकर कहा — तुझे किसी बात का भय हो रहा है क्या ?
उसने कहा-वह मेरी भगिनी परम सुन्दरी है, उसके यहाँ आने पर मोहित होकर किसी पुरुष ने बल प्रयोग द्वारा उसके साथ उपभोग कर लिया तो उस समय निश्चित मेरा मरण हो जायगा । आपसे इसलिए कहा कि आप कुल धर्म का सतत पालन करती हैं ।
इसे सुनकर धर्ममूर्ति पुष्पवती ने फिर कहा—तुम भली भाँति जानती हो कि मेरे पिता मयूरध्वज अत्यन्त नीतिज्ञ पुरुष हैं इस प्रकार का अयोग्य कार्य जो पुरुष करेगा, उसे यमराज के यहाँ प्रस्थान करना पड़ेगा । इसलिए तू उसके डोले को शीघ्र लाकर उस सुन्दरी को मुझे दिखाने के पश्चात् पुनः अपने घर चली जाना ।
उसे स्वीकार कर उसे शूद्र जाति की स्त्री ने घर आकर उदयसिंह से उन सभी बातों को बताया । मुने ! इस सुन्दर वाणी को सुनकर बलवान् उदयसिंह ने अपने नासिका को स्वयं छेदकर आभूषण धारण किया । अपना परमसुन्दरी स्त्री का वेष बनाकर वह पराक्रमी डोले में बैठकर पुष्पा के साथ चल दिया । उस परम सुन्दरी कृष्णा को देखकर पुष्पवती ने पुष्पा से कहा — सखे ! मेरी एक बात सुनो ! जिस प्रकार इस सुन्दरी का रूप रङ्ग है, इसी भाँति के पुरुष को मैं नित्य स्वप्न में देखती हूँ, जो आकर मेरे साथ रमण करता है । उसे सुनकर उदयसिंह ने कहा — देशराज के श्रेष्ठपुत्र, जिनका उदयसिंह नाम है, मैं उनकी ललिता (प्रिय) सखी हूँ । मैं उनके पूजन के लिए नित्य हार गूंथती हूँ, जिसे ग्रहणकर वे पूजन के उपरान्त देवी को समर्पित करते हैं । एक बार उपवन के पुष्पों के बीच धीरे-धीरे जा रहे थे, उस समय उनका मुख कुछ मलीन था, मैंने वहाँ पहुँचकर उनकी उदासीनता को देखकर कहा — आज आप चिन्तित क्यों हैं, मुझसे शीघ्र बताइये । इसे सुनकर मुझसे उन्होंने कहा — ‘सखि ! मैं एक रूप यौवन सम्पन्न परम सुन्दरी स्त्री को नित्य स्वप्न में देखता हूँ, उसके वियोग दुःख से मेरा चित्त बहुत म्लान हो रहा है ।

इसे सुनकर पुष्पवती ने उस सुन्दरी से कहा— शुभानने! जिस समय मेरा शुभविवाह उनके साथ सुसम्पन्न होगा, उस समय मैं तुम्हें अनेक भाँति के द्रव्यों से तृप्त कर दूँगी । इसलिए तुम उनके पास शीघ्र जाकर मेरा उनसे निवेदन करना । इसे सुनकर प्रेम गद्गद होकर पुष्पा कृष्णा को डोला में बैठाकर अपने घर चल दी । भार्गव ! दुर्ग के दरवाजे पर उस डोला के आने पर महापराक्रमी मकरन्द ने, जिसकी आयु उस समय बारह वर्ष की थी, उस डोले के समीप आकर उस सुन्दरमुखी कृष्णा को देखा, जो नील कमल की भाँति श्यामल वर्ण, विशाल सुन्दर नेत्र एवं मन को हरण करने वाली थी । गोवर्द्धन की कला से उत्पन्न वह वीर उसी समय मुग्ध हो गया ।
प्रेम से गद्गद होकर उसने कहा — ‘प्रिये ! मेरी एक बात स्वीकार करो ! मैं चाहता हूँ कि इसी समय मेरे भवन में चलकर मेरी पत्नी होना शीघ्र स्वीकार करो ।
इसे सुनकर कृष्णा ने मन्द मुस्कान करते हुए राजकुमार से कहा — महावीर ! आप कुलीन एवं अग्निकुण्ड से उत्पन्न हुए हैं, आपकी सोलह वर्ष की अवस्था दिखाई देती है (अर्थात् विवाह के योग्य हैं) और तरकस, तलवार एवं भाले आदि अस्त्र से युक्त भी हैं । आपके इस रूप के अनुरूप सोमवंशी या सूर्यवंशी राजा की कोई कन्या ही हो सकती है । मैं शुद्र कुल में उत्पन्न हूँ, जो छोटी जाति की कही जाती है, इसलिए आपके योग्य मैं कैसे हो सकती हूँ । मैं शूद्रकुल में उत्पन्न होकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रही हूँ ।
इसे सुनकर राजकुमार मकरन्द ने बलात् उसे पकड़कर अपने हृदय (छाती) से लगा लिया । उस समय उदयसिंह उसके हृदय में एक पीड़ा उत्पन्न करते हुए उसे मोहित कर चले गये, पश्चात् देवसिंह के साथ अपने घर पहुँचे । उधर मकरन्द चेतना प्राप्त करने पर काम की अग्नि से संतप्त होने लगा और उसी समय पुष्पा के घर जाकर उससे सभी वृतान्त कहा ।
कृष्णा के स्नेह में निमग्न उस महाबली मकरन्द को देखकर पुष्पा ने नम्रतापूर्वक कहा — श्रेष्ठराजन् ! आप मेरी बातें सुने ! महावती (महोबा) राजधानी में कृष्णा का घर है, आपसे भयभीत होकर वह मेरी सखी उदयसिंह के घर चली गई वह अत्यन्त रुदन करती हुई आपकी निन्दा कर रही थी । जिस महाबली ने आपके पितृव्य (चाचा) लहर को पराजित कर उनकी पुत्री का विवाह अपने भाई के साथ कर लिया, वीर उदयसिंह अवश्य आयेंगे अतः आप भी अपनी सेना को सुसज्जित करें । इस भीषण बात को सुनकर राजा मकरन्द ने अपने दुर्ग के दरवाजों पर तोपों को रखाकर खड्गधारी अपने तीन लाख सैनिकों को भी राष्ट्र के रक्षार्थ उसी स्थान में नियुक्त किया ।

उदयसिंह ने अपने गृह पहुँचने पर बलखानि (मलखान) से सभी वृतान्त कहा । उस बलशाली ने उसे सुनकर अपने भाई एवं मित्रों समेत पाँच लाख सैनिकों को साथ लेकर मयूर नगर के लिए प्रस्थान किया । उनकी सेना में पाँच सहस्र तोपें, दश सहस्र हाथी, एक लाख घोड़े और शेष पदाति (पैदल) सेना थी । उसके साथ वे पन्द्रह दिन की यात्रा करके पंजाब प्रान्त के उस मयूर नगर में पहुँच गये । यह आगमन सुनकर मकरन्द ने स्वयं तलवार और भाले को हाथ में लेकर रणाङ्गण में पहुँचकर सेनाओं को आदेश दिया कि-इन महाबली सैनिकों का विध्वंस करो । इसे सुनकर उसके एक लाख के पैदल सैनिकों ने तोपों में अग्नि (पलीता) लगाना आरम्भ किया जिससे उस सात सहस्र सैनिकों द्वारा शत्रु-सेना का विध्वंस होने लगा । दुर्ग के दक्षिण द्वार पर बलखानि (मलखान) के एक लाख अश्वारोहियों के साथ, जो भुशुंडी शक्ति और खड्ग द्वारा युद्ध करने में अत्यन्त कुशल थे, मकरन्द के एक लाख अश्वारोही सैनिकों ने घोर युद्ध आरम्भ किया। वहाँ पर दोनों अश्वारोही दलों का आपस में भीषण एवं रोमाञ्चकारी महान् युद्ध हो रहा था । पश्चिम दरवाजे पर बीस सहस्र की सेना दश सहस्र शत्रु-सैनिकों से युद्ध कर रही थी, उसी प्रकार चालीस सहस्र ऊँट की सेना बलखानि (मलखान) आदि वीरों के साथ उत्तर दरवाजे पर घोर युद्ध कर रही थी। यह रोमाञ्चकारी युद्ध अविरल गति से दिन-रात चल रहा था । पश्चात् बलखानि (मलखान) के सैनिक पराजित होकर रणस्थल छोड़कर चारों ओर भागने लगे। उस समय विन्दुले (बेन्दुल) पर बैठकर उदयसिंह, कपोत (कबूतर) पर बलखानि (मलखान), मनोरथ (मनोहर) पर देवसिंह (डेबा) और गज पर आह्लाद (आल्हा) सवार होकर क्रमशः पूर्व आदि दरवाजों पर पहुँचकर अपने तीक्ष्ण खड्ग द्वारा शत्रुओं का वध करने लगे । उनके, अस्त्रों के आघात को सहन न कर सकने के कारण वे शूरवीर रणस्थल से भागकर मकरन्द के पास पहुँचे । अग्नि-पुत्र मकरन्द ने अपने सैनिकों को पलायन करते हुए देखकर अपने शिलामय अश्व पर बैठकर तलवार और भाले को सँभालकर रण के लिए प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचते ही उदयसिंह आदि वीरों ने उसे चारों ओर से घेर लिया, उपरान्त महावली बलखानि (मलखान) ने खड्ग द्वारा वाण्ट में प्रहार किया, उसी भाँति देवसिंह ने भाले, आह्लाद ने बाण द्वारा वक्षस्थल में और उदयसिंह ने खड्ग का प्रहार किया, किन्तु उस पाषण के घोड़े पर बैठने के नाते उन वीरों के सभी प्रहार निष्फल हो गये । पश्चात् उन्हें निष्फल देखकर उस वीर ने भीषण गर्जना की । और उस भाले द्वारा सभी वीरों को मूर्छित किया । उस पत्थर घोड़े के वेग से उनके घोड़े भी मूर्छित हो गये थे ।

बलवान मकरन्द ने उन दुःसहवीरों को उसी अवस्था में बांधकर अपने पिता के सामने लाकर उनसे निवेदन किया । वीरों को पराजित देखकर भयभीत होकर रूपन ने शीघ्र महावती (महोबा) आकर राजा से सब वृत्तान्त कहा । उसे सुनकर ब्रह्मानन्द ने इन्दुल को साथ लेकर एक लाख सैनिक समेत मयूर नगर को प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचने पर एक दिन निर्मम पत्र लिखकर राजा के पास भेजा । नृपवर ! मैं पृथ्वीराज की पुत्री का पति (जमाई) हूँ, मेरा नाम ब्रह्मानन्द है। आप अपनी पुष्पवती नामक कन्या उदयसिंह के लिए सौंप दीजिये, अन्यथा मेरे कठिन बाण प्रहारों द्वारा आपकी सेना नष्ट हो जायगी । नृपश्रेष्ठ राजा मयूरध्वज ने उसे सुनकर मकरन्द को साथ लेकर दो लाख सैनिकों समेत रणस्थल में पहुँचकर शत्रुओं से दिन-रात का भीषण युद्ध आरम्भ कर दिया । बलवान् ब्रह्मानन्द बाण युद्ध कर रहे थे । उसी समय मकरन्द के भाले से मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर गये।

स्वर्णवती (सोना) के पुत्र शक्रसम्भव जयन्त ने शीघ्र वहाँ पहुँचकर बुद्धिमान् मकरन्द को अपनी विद्या की चमत्कृति दिखाई-अपने वैष्णवास्त्र द्वारा उसके शिला अश्व को भस्म करके ब्रह्मास्त्र द्वारा शनि-भाला से उनके हाथ भूमि पर गिरा दिया । भृगुश्रेष्ठ ! उस महाबली मकरन्द को नागपाश में बांधकर उदयसिंह के साथ उसकी भगिनी का विवाह सुसम्पन्न कराते हुए उस बली ने अपनी ओर की सभी सेनाओ को जीवित किया । तदुपरान्त मकरन्द ने अपनी राजधानी के प्रत्येक घरों में गहान् माङ्गलिक उत्सव बड़े समारोह के साथ सुसम्पन्न कराया । उस असवर पर राजा मयूरध्वज ने अनेक भाँति के द्रव्यों समेत अपनी पुत्री का दान किया। कई दिन के पश्चात् स्नेह विभोर उस राजा की आज्ञा प्राप्तकर ये वीरगण अपनी महावती (महोबा) राजधानी लौट आये ।
(अध्याय २१)

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