भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय ४ से ८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — तृतीय भाग)
अध्याय – ४ से ८
अश्वत्थ, पुष्करिणी तथा जलाशय के प्रतिष्ठा की विधि

सूतजी बोले — ब्राह्मणो ! अश्वत्थ-वृक्ष की प्रतिष्ठा करनी हो तो उसकी जड़ के पास दो हाथ लम्बी-चौड़ी एक वेदी का निर्माण कर चन्दन आदि से प्रोक्षित करे । उस पर कमल की रचना कर अर्घ्य प्रदान करे । प्रथम दिन की रात्रि ‘तद्विष्णोः० ‘ (यजु० ६ । ५) इस मन्त्र द्वारा कलश-स्थापन कर गन्ध, चन्दन, दूर्वा तथा अक्षत समर्पण करे । चन्दन-लिप्त श्वेत सूत्रों से कलश को आवेष्टित करे । om, ॐप्रथम कलश के ऊपर गणेशजी का, दूसरे कलश पर ब्रह्माजी का पूजन करे । दिशाओं में दिक्पाल और वृक्ष के मूल में नवग्रहों का पूजन-अर्चन करे । वृक्ष के मूल में विष्णु, मध्य में शंकर तथा आगे ब्रह्मा की पूजा कम हवन करे । पिष्टकान्न-बलि दे । आचार्य को दक्षिणा देकर वृक्ष को जलधारा से सींचे, उसकी प्रदक्षिणा करे और भगवान् सूर्य को अर्घ्य निवेदित कर घर आ जाय ।बावली आदि की प्रतिष्ठा में प्रथम भूतशुद्धि करके सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे । तदनन्तर गणेश, गुरुपादुका, जय और भद्र का समाहित होकर पूजन करे । मण्डल के मध्य में आधारशक्ति, अनन्त तथा कुर्म की पूजा करे । चन्द्र, सूर्य आदि का भी मण्डल में पूजन करे । दूसरे पात्र में पुष्पादि उपचारों से भगवान् वरुण का पूजन करे । कमल के पूर्वादि पत्रों में इन्द्रादि दिक्पालों की, उनके आयुधों की तथा मध्य में ब्रह्मा की पूजा करे। ‘भूर्भुवः स्वः’ इन तत्वों की भी पूजा करे । मण्डल के उत्तर भाग में नागरूप अनन्त की पूजा करे । इसके बाद हवन करे । प्रथम आहुति वरूणदेव को दे फिर दिक्पालों, नारायण, शिव, दुर्गा, गणेश, ग्रहों और ब्रह्मा को प्रदान करे । स्विष्टकृत् हवन करके बलि प्रदान करे । एक अष्टदल कमल के ऊपर वरुण की रजत-प्रतिमा स्थापित करे और पुष्करिणी (बावली) की प्रतिमा स्वर्ण की बनाये और उसका पूजनकर जलाशय में छोड़ दे । जलाशय के मध्य में नौका आरोपित करें । जलाशय के बीच में ऋत्विक् होम करे । शेषनाग की मूर्ति भी जलाशय में छोड़ दे । सम्पूर्ण कार्यों को सम्पन्न कर ब्राह्मणों को दक्षिणा दे । जलाशय में मकर, ग्राह, मीन, कूर्म एवं अन्य जलचर प्राणी तथा कमल, शैवाल आदि भी छोड़े । अनन्तर जलाशय की प्रदक्षिणा करे । लावा और सीपी भी छोड़े । दूध की धारा भी दे । पुष्करिणी को चारों ओर से रक्तसूत्र से आवेष्टित करे । दीनों को संतुष्ट कर घर में प्रवेश करे ।ब्राह्मणो ! अब मैं नलिनी (जिस तालाब में कमल हो), वापी तथा ह्रद (गहरे जलाशय) की प्रतिष्ठा की सामान्य विधि बता रहा हूँ । इन सबकी प्रतिष्ठा करने के पहले दिन भगवान् वरुणदेव की सुवर्ण-प्रतिमा बनाकर ‘आपो हि ष्ठा० ‘ (यजु० ११ । ५०) इस मन्त्र से उसका जलाधिवास करे, अनन्तर एक सौ कमल-पुष्पों से प्रतिमा का पुष्पाधिवास करे । तत्पश्चात् मण्डल में आकर पूर्वमुख बैठे और कलश पर गणेश, वरुण, शंकर, ब्रह्मा, विष्णु एवं सूर्य की पूजा करे । वरुण के लिये घी और पायस की आहुति दे । अन्य देवताओं को स्रुवा द्वारा एक-एक आहुति प्रदान कर पायस-बलि दे । फिर नलिनी-वापी आदि का संकल्पपूर्वक उत्सर्जन कर दे । मध्य में यूप की स्थापना करे । तदनन्तर गोदान दे और दक्षिणा प्रदान करे । पूर्णाहुति के अनन्तर भगवान् सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे और अपने घर में प्रवेश करे ।द्विजो ! अब मैं वृक्षों के प्रतिष्ठा-विधान का वर्णन करता हूँ । वृक्ष की स्थापना कर सूत्र से परिवेष्टित करे, फिर उसके पश्चिम भाग में कलश-स्थापना करे । कलश में ब्रह्मा, सोम, विष्णु और वनस्पति का पूजन करे । अनन्तर तिल और यव से आठ-आठ आहुतियाँ दे । कदली-वृक्ष तथा यूप का उत्सर्जन को, फिर लगाये गये वृक्ष के मूल में धर्म, पृथ्वी, दिशा, दिक्पाल एवं यक्ष की पूजा करे तथा आचार्य को संतुष्ट करे । आचार्य को गोदान दे, दक्षिणा प्रदान करे । वृक्ष-पूजन के बाद भगवान् सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे ।
(अध्याय ४-८)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय १
5. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय  – अध्याय २ से ३

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