श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-45
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
पैंतालीसवाँ अध्याय
भगवती दक्षिणा का उपाख्यान
दक्षिणोपाख्यानवर्णनम्

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] मैंने भगवती स्वाहा तथा स्वधा का अत्यन्त मधुर तथा कल्याणकारी उपाख्यान बता दिया। अब मैं भगवती दक्षिणा का आख्यान कह रहा हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ १ ॥

प्राचीनकाल में गोलोक में भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेयसी सुशीला नामक एक गोपी थी। परम धन्य, मान्य तथा मनोहर वह गोपी भगवती राधा की प्रधान सखी थी। वह अत्यन्त सुन्दर, लक्ष्मी के लक्षणों से सम्पन्न, सौभाग्यवती, उज्ज्वल दाँतों वाली, परम पतिव्रता, साध्वी, विद्या; गुण तथा रूप से अत्यधिक सम्पन्न थी। वह विविध कलाओं में निपुण, कोमल अंगों वाली, आकर्षक, कमलनयनी, श्यामा, सुन्दर नितम्ब तथा वक्ष:स्थल से सुशोभित होती हुई वट-वृक्षों से घिरी रहती थी । उसका मुखमण्डल मन्द मुसकान तथा प्रसन्नता से युक्त था, वह रत्नमय अलंकारों से सुशोभित थी, उसके शरीर की कान्ति श्वेत चम्पा के समान थी, उसके ओष्ठ बिम्बाफल के समान रक्तवर्ण के थे, मृग के सदृश उसके नेत्र थे, कामिनी तथा हंस के समान गतिवाली वह कामशास्त्र में निपुण थी। भगवान् श्रीकृष्ण की प्रियभामिनी वह सुशीला उनके भावों को भलीभाँति जानती थी तथा उनके भावों से सदा अनुरक्त रहती थी । रसज्ञान से परिपूर्ण, रासक्रीडा की रसिक तथा रासेश्वर श्रीकृष्ण के प्रेमरस हेतु लालायित रहने वाली वह गोपी सुशीला एक बार राधा के सामने ही भगवान् श्रीकृष्ण के वाम अंक में बैठ गयी ॥ २–७ ॥

तब मधुसूदन श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं में परम श्रेष्ठ राधा की ओर देखकर भयभीत हो अपना मुख नीचे कर लिया। उस समय कामिनी राधा का मुख लाल हो गया और उनके नेत्र रक्तकमल के समान हो गये । क्रोध से उनके अंग काँप रहे थे तथा ओठ प्रस्फुरित हो रहे थे। तब उन राधा को बड़े वेग से जाती देखकर उनके विरोध से अत्यन्त डरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये ॥ ८–१० ॥
कान्तिमान्, शान्त स्वभाव वाले, सत्त्वगुणसम्पन्न तथा सुन्दर विग्रह वाले भगवान् श्रीकृष्ण को अन्तर्हित हुआ देखकर सुशीला आदि गोपियाँ भय से काँपने लगीं। श्रीकृष्ण को अन्तर्धान हुआ देखकर वे भयभीत लाखों-करोड़ों गोपियाँ भक्तिपूर्वक कन्धा झुकाकर और दोनों हाथ जोड़कर ‘रक्षा कीजिये – रक्षा कीजिये’ – ऐसा भगवती राधा से बार-बार कहने लगीं और  उन राधा के चरणकमल में भयपूर्वक शरणागत हो गयीं । हे नारद! वहाँ के तीन लाख करोड़ सुदामा आदि गोप भी भयभीत होकर उन राधा के चरण-कमल की शरण में गये ॥ ११–१४ ॥ परमेश्वरी राधा ने अपने कान्त श्रीकृष्ण को अन्तर्धान तथा सहचरी सुशीला को पलायन करते देखकर उन्हें शाप दे दिया कि यदि गोपिका सुशीला आज से गोलोक में आयेगी, तो वह आते ही भस्मसात् हो जायगी ॥ १५-१६ ॥

ऐसा कहकर देवदेवेश्वरी रासेश्वरी राधा रोषपूर्वक रासमण्डल के मध्य रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण को पुकारने लगीं ॥ १७ ॥ श्रीकृष्ण को समक्ष न देखकर राधिकाजी विरह से व्याकुल हो गयीं । उन परम साध्वी को एक – एक क्षण करोड़ों युगों के समान प्रतीत होने लगा । उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की — हे कृष्ण ! हे प्राणनाथ ! हे ईश ! आ जाइये । हे प्राणों से अधिक प्रिय तथा प्राण के अधिष्ठाता देवेश्वर ! आपके बिना मेरे प्राण निकल रहे हैं ॥ १८-१९ ॥ पति के सौभाग्य से स्त्रियों का स्वाभिमान दिन -प्रतिदिन बढ़ता रहता है और उन्हें महान् सुख प्राप्त होता है । अतः स्त्री को सदा धर्मपूर्वक पति की सेवा करनी चाहिये ॥ २० ॥ कुलीन स्त्रियों के लिये पति ही बन्धु, अधिदेवता, आश्रय, परम सम्पत्तिस्वरूप तथा भोग प्रदान करने वाला साक्षात् विग्रह है ॥ २१ ॥ वही स्त्री के लिये धर्म, सुख, निरन्तर प्रीति, सदा शान्ति तथा सम्मान प्रदान करने वाला; आदर से देदीप्यमान होने वाला और मानभंग भी करने वाला है। पति ही स्त्री के लिये परम सार है और बन्धुओं में बन्धुभाव को बढ़ाने वाला है । समस्त बन्धु बान्धवों में पति के समान कोई बन्धु दिखायी नहीं देता ॥ २२-२३ ॥

वह स्त्री का भरण करने के कारण ‘ भर्ता’, पालन करने के कारण ‘पति’, उसके शरीर का शासक होने के कारण ‘स्वामी’ तथा उसकी कामनाएँ पूर्ण करने के कारण ‘कान्त’ कहा जाता है । वह सुख की वृद्धि करने से ‘बन्धु’, प्रीति प्रदान करने से ‘प्रिय’, ऐश्वर्य प्रदान करने से ‘ईश’, प्राण का स्वामी होने से ‘प्राणनायक’ और रतिसुख प्रदान करने से ‘रमण’ कहा गया है। स्त्रियों के लिये पति से बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। पति के शुक्र से पुत्र उत्पन्न होता है, इसलिये वह प्रिय होता है ॥ २४-२६ ॥ उत्तम कुल में उत्पन्न स्त्रियों के लिये उनका पति सदा सौ पुत्रों से भी अधिक प्रिय होता है । जो असत्- कुल में उत्पन्न स्त्री है, वह पति के महत्त्व को समझने में सर्वथा असमर्थ रहती है ॥ २७ ॥ सभी तीर्थों में स्नान, सम्पूर्ण यज्ञों में दक्षिणादान, पृथ्वी प्रदक्षिणा, सम्पूर्ण तप, सभी प्रकार के व्रत और जो महादान आदि हैं, जो-जो पुण्यप्रद उपवास आदि प्रसिद्ध हैं और गुरुसेवा, विप्रसेवा तथा देव- पूजन आदि जो भी शुभ कृत्य हैं, वे सब पति चरण की सेवा की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं ॥ २८-३० ॥ गुरु, ब्राह्मण और देवता – इन सभी की अपेक्षा स्त्री के लिये पति ही श्रेष्ठ है । जिस प्रकार पुरुषों के लिये विद्या का दान करने वाला गुरु श्रेष्ठ है; उसी प्रकार कुलीन स्त्रियों के लिये पति श्रेष्ठ है ॥ ३१ ॥ जिनके अनुग्रह से मैं लाखों-करोड़ गोपियों, गोपों, असंख्य ब्रह्माण्डों, वहाँ के निवासियों तथा अखिल ब्रह्माण्ड-गोलक की ईश्वरी बनी हूँ, अपने उन कान्त श्रीकृष्ण का रहस्य मैं नहीं जानती । स्त्रियों का स्वभाव अत्यन्त दुर्लंघ्य है ॥ ३२-३३ ॥

ऐसा कहकर श्रीराधा भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगीं । विरह से दुःखित तथा दीन वे राधिका प्रेम के कारण रो रही थीं और ‘हे नाथ ! हे रमण ! मुझे दर्शन दीजिये ‘ – ऐसा कह रही थीं ॥ ३४१/२

हे मुने! इसके बाद राधा के द्वारा गोलोक से च्युत सुशीला नामक वह गोपी दक्षिणा नाम से प्रसिद्ध हुई । दीर्घकाल तक तपस्या करके उसने भगवती लक्ष्मी विग्रह में स्थान प्राप्त कर लिया । अत्यन्त दुष्कर यज्ञ करने पर भी जब देवताओं को यज्ञफल नहीं प्राप्त हुआ, तब वे उदास होकर ब्रह्माजी के पास गये ॥ ३५-३६ ॥ देवताओं की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी ने बहुत समय तक भक्तिपूर्वक जगत्पति भगवान् श्रीहरि का ध्यान किया। अन्त में उन्हें प्रत्यादेश प्राप्त हुआ । भगवान् नारायण ने महालक्ष्मी के विग्रह से मर्त्यलक्ष्मी को प्रकट करके और उसका नाम दक्षिणा रखकर ब्रह्माजी को सौंप दिया । ब्रह्माजी ने भी यज्ञकार्यों की सम्पन्नता के लिये उन देवी दक्षिणा को यज्ञपुरुष को समर्पित कर दिया। तब यज्ञपुरुष ने प्रसन्नतापूर्वक उन देवी दक्षिणा की विधिवत् पूजा करके उनकी स्तुति की ॥ ३७–३९१/२

तप्तकाञ्चनवर्णाभां चन्द्रकोटिसमप्रभाम् ॥ ४० ॥
अतीव कमनीयां च सुन्दरीं सुमनोहराम् ।
कमलास्यां कोमलाङ्‌गीं कमलायतलोचनाम् ॥ ४१ ॥
कमलासनपूज्यां च कमलाङ्‌गसमुद्‍भवाम् ।
वह्निशुद्धांशुकाधानां बिम्बोष्ठीं सुदतीं सतीम् ॥ ४२ ॥
बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यसंयुतम् ।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां रत्‍नभूषणभूषिताम् ॥ ४३ ॥
सुवेषाढ्यां च सुस्नातां मुनिमानसमोहिनीम् ।
कस्तूरीबिन्दुभिः सार्धं सुगन्धिचन्दनेन्दुभिः ॥ ४४ ॥
सिन्दूरबिन्दुनाल्पेनाप्यलकाधःस्थलोज्ज्वलाम् ।
सुप्रशस्तनितम्बाढ्यां बृहच्छ्रोणिपयोधराम् ॥ ४५ ॥
कामदेवाधाररूपां कामबाणप्रपीडिताम् ।

उन भगवती दक्षिणा का वर्ण तपाये हुए सोने के समान था; उनके विग्रह की कान्ति करोड़ों चन्द्रों के तुल्य थी; वे अत्यन्त कमनीय, सुन्दर तथा मनोहर थीं; उनका मुख कमल के समान था; उनके अंग अत्यन्त कोमल थे; कमल के समान उनके विशाल नेत्र थे; कमल के आसन पर पूजित होने वाली वे भगवती कमला के शरीर से प्रकट हुई थीं, उन्होंने अग्नि के समान शुद्ध वस्त्र धारण कर रखे थे; उन साध्वी के ओष्ठ बिम्बाफल के समान थे; उनके दाँत अत्यन्त सुन्दर थे; उन्होंने अपने केशपाश में मालती के पुष्पों की माला धारण कर रखी थी; उनके प्रसन्नतायुक्त मुखमण्डल पर मन्द मुसकान व्याप्त थी; वे रत्नमय आभूषणों से अलंकृत थीं; उनका वेष अत्यन्त सुन्दर था; वे विधिवत् स्नान किये हुए थीं; वे मुनियों के भी मन को मोह लेती थीं; कस्तूरीमिश्रित सुगन्धित चन्दन से बिन्दी के रूप में अर्धचन्द्राकार तिलक उनके ललाट पर सुशोभित हो रहा था; केशों के नीचे का भाग (सीमन्त) सिन्दूर की छोटी-छोटी बिन्दियों से अत्यन्त प्रकाशमान था। सुन्दर नितम्ब, बृहत् श्रोणी तथा विशाल वक्ष:स्थल से वे शोभित हो रही थीं; उनका विग्रह कामदेव का आधारस्वरूप था और वे कामदेव के बाण से अत्यन्त व्यथित थीं — ऐसी उन रमणीया दक्षिणा को देखकर यज्ञपुरुष मूर्च्छित हो गये । पुनः ब्रह्माजी के कथनानुसार उन्होंने भगवती दक्षिणा को पत्नीरूप में स्वीकार कर लिया ॥ ४०–४६१/२

तत्पश्चात् यज्ञपुरुष उन रामेश ने रमारूपिणी भगवती दक्षिणा को निर्जन स्थान में ले जाकर उनके साथ दिव्य सौ वर्षों तक आनन्दपूर्वक रमण किया । वे देवी दक्षिणा दिव्य बारह वर्षों तक गर्भ धारण किये रहीं। तत्पश्चात् उन्होंने सभी कर्मों के फलरूप पुत्र को जन्म दिया। कर्म के परिपूर्ण होने पर वही पुत्र फल प्रदान करने वाला होता है । भगवान् यज्ञ भगवती दक्षिणा तथा अपने पुत्र फल से युक्त होने पर ही कर्म करने वालों को फल प्रदान करते हैं — ऐसा वेदवेत्ता पुरुषों ने कहा है ॥ ४७–५० ॥

हे नारद! इस प्रकार देवी दक्षिणा तथा फलदायक पुत्र को प्राप्तकर यज्ञपुरुष सभी प्राणियों को उनके कर्मों का फल प्रदान करने लगे। तदनन्तर परिपूर्ण मनोरथ वाले वे सभी देवगण प्रसन्न होकर अपने- अपने स्थान को चले गये — ऐसा मैंने धर्मदेव के मुख से सुना है ॥ ५१-५२ ॥

हे मुने ! कर्ता को चाहिये कि कर्म करके तुरंत दक्षिणा दे दे। ऐसा करने से कर्ता को उसी क्षण फल प्राप्त हो जाता है — ऐसा वेदों ने कहा है ॥ ५३ ॥ कर्म के सम्पन्न हो जाने पर यदि कर्ता दैववश या अज्ञान से उसी क्षण ब्राह्मणों को दक्षिणा नहीं दे देता, तो एक मुहूर्त बीतने पर वह दक्षिणा निश्चय ही दो गुनी हो जाती है और एक रात बीतने पर वह सौ गुनी हो जाती है। वह दक्षिणा तीन रात बीतने के बाद उसकी सौ गुनी और एक सप्ताह बीतने पर उसकी दो सौ गुनी हो जाती है । एक माह के बाद वह लाख गुनी बतायी गयी है । इस प्रकार ब्राह्मणों की दक्षिणा बढ़ती जाती है और एक वर्ष बीत जाने पर वह तीन करोड़ गुनी हो जाती है, जिससे यजमानों का सारा कर्म भी व्यर्थ हो जाता है ॥ ५४-५७ ॥ ब्राह्मण का धन हरने वाला वह मनुष्य अपवित्र हो जाता है तथा किसी भी कर्मानुष्ठान के योग्य नहीं रह जाता। उस पाप के कारण वह पापी मनुष्य रोगी तथा दरिद्र रहता है । भगवती लक्ष्मी उसे दारुण शाप देकर उसके घर से चली जाती हैं। उसके द्वारा प्रदत्त श्राद्ध तथा तर्पण को पितर ग्रहण नहीं करते। उसी प्रकार देवतागण उसकी पूजा तथा उसके द्वारा अग्नि में प्रदत्त आहुति को स्वीकार नहीं करते ॥ ५८-५९१/२

यदि यज्ञ के समय कर्ता के द्वारा संकल्पित दान नहीं दिया गया और प्रतिग्रह लेने वाले ने उसे माँगा भी नहीं, तो वे दोनों ही (यजमान और ब्राह्मण) नरक में उसी प्रकार गिरते हैं, जैसे रस्सी टूट जाने पर घड़ा ॥ ६० ॥ ब्राह्मण के याचना करने पर भी यदि यजमान उसे दक्षिणा नहीं देता, तो वह ब्राह्मण का धन हरण करने वाला कहा जाता है और वह निश्चितरूप से कुम्भीपाक नरक में पड़ता है । वहाँ यमदूतों के द्वारा पीटा जाता हुआ वह एक लाख वर्ष तक रहता है। उसके बाद वह चाण्डाल होकर सदा दरिद्र तथा रोगी बना रहता है। वह अपनी सात पीढ़ी पूर्व के तथा सात पीढ़ी बाद के पुरुषों को नरक में गिरा देता है । हे विप्र ! मैंने यह सब कह दिया। अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ६१–६३१/२

नारदजी बोले — हे मुने! जो कर्म बिना दक्षिणा किया जाता है, उसका फल कौन भोगता है ? साथ ही, यज्ञपुरुष के द्वारा पूर्वकाल में की गयी भगवती दक्षिणा की पूजाविधि को भी मुझे बतलाइये ॥ ६४१/२

श्रीनारायण बोले — हे मुने! दक्षिणाविहीन कर्म का फल हो ही कहाँ सकता है ? दक्षिणायुक्त कर्म में ही फल-प्रदान का सामर्थ्य होता है । हे मुने ! जो कर्म बिना दक्षिणा के सम्पन्न होता है, उसके
फल का भोग राजा बलि करते हैं । हे मुने! पूर्वकाल में भगवान् वामन राजा बलि के लिये वैसा कर्म अर्पण कर चुके हैं ॥ ६५-६६१/२

अश्रोत्रिय व्यक्ति “जो वेद और धार्मिक ज्ञान में निपुण नहीं है” के द्वारा श्रद्धाहीन होकर दिया गया श्राद्धद्रव्य तथा दान आदि, शूद्रापति ब्राह्मणों का पूजा – द्रव्य आदि, सदाचारहीन विप्रों द्वारा किया गया यज्ञ, अपवित्र व्यक्ति का पूजन और गुरुभक्ति से हीन मनुष्य के कर्मफल को राजा बलि आहार के रूप में ग्रहण करते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ६७-६८१/२

[हे नारद!] भगवती दक्षिणा का जो भी ध्यान, स्तोत्र तथा पूजाविधि का क्रम आदि है, वह सब कण्वशाखा में वर्णित है, अब मैं उसे बताऊँगा, ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ ६९१/२

पूर्वसमय में कर्म का फल प्रदान करने में दक्ष उन भगवती दक्षिणा को प्राप्त करके वे यज्ञपुरुष कामपीड़ित होकर उनके स्वरूप पर मोहित हो गये और उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७०१/२

॥ यज्ञ उवाच ॥
पुरा गोलोकगोपी त्वं गोपीनां प्रवरा वरा ॥ ७१ ॥
राधासमा तत्सखी च श्रीकृष्णप्रेयसी प्रिया ।
कार्तिकीपूर्णिमायां तु रासे राधामहोत्सवे ॥ ७२ ॥
आविर्भूता दक्षिणांसाल्लक्ष्म्याश्च तेन दक्षिणा ।
पुरा त्वं च सुशीलाख्या ख्याता शीलेन शोभने ॥ ७३ ॥
लक्ष्मीदक्षांसभागात्त्वं राधाशापाच्च दक्षिणा ।
गोलोकात्त्वं परिभ्रष्टा मम भाग्यादुपस्थिता ॥ ७४ ॥
कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु ।
कर्मिणां कर्मणां देवी त्वमेव फलदा सदा ॥ ७५ ॥
त्वया विना च सर्वेषां सर्वं कर्म च निष्फलम् ।
त्वया विना तथा कर्म कर्मिणां च न शोभते ॥ ७६ ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च दिक्पालादय एव च ।
कर्मणश्च फलं दातुं न शक्ताश्च त्वया विना ॥ ७७ ॥
कर्मरूपी स्वयं ब्रह्मा फलरूपी महेश्वरः ।
यज्ञरूपी विष्णुरहं त्वमेषां साररूपिणी ॥ ७८ ॥
फलदातृपरं ब्रह्म निर्गुणा प्रकृतिः परा ।
स्वयं कृष्णश्च भगवान् स च शक्तस्त्वया सह ॥ ७९ ॥
त्वमेव शक्तिः कान्ते मे शश्वज्जन्मनि जन्मनि ।
सर्वकर्मणि शक्तोऽहं त्वया सह वरानने ॥ ८० ॥
इत्युक्त्वा च पुरस्तस्थौ यज्ञाधिष्ठातृदेवता ।
तुष्टा बभूव सा देवी भेजे तं कमलाकला ॥ ८१ ॥
इदं च दक्षिणास्तोत्रं यज्ञकाले च यः पठेत् ।
फलं च सर्वयज्ञानां प्राप्नोति नात्र संशयः ॥ ८२ ॥
राजसूये वाजपेये गोमेधे नरमेधके ।
अश्वमेधे लाङ्‌गले च विष्णुयज्ञे यशस्करे ॥ ८३ ॥
धनदे भूमिदे पूर्ते फलदे गजमेधके ।
लोहयज्ञे स्वर्णयज्ञे रत्‍नयज्ञेऽथ ताम्रके ॥ ८४ ॥
शिवयज्ञे रुद्रयज्ञे शक्रयज्ञे च बन्धुके ।
वृष्टौ वरुणयागे च कण्डके वैरिमर्दने ॥ ८५ ॥
शुचियज्ञे धर्मयज्ञेऽध्वरे च पापमोचने ।
ब्रह्माणीकर्मयागे च योनियागे च भद्रके ॥ ८६ ॥
एतेषां च समारम्भे इदं स्तोत्रं च यः पठेत् ।
निर्विघ्नेन च तत्कर्म सर्वं भवति निश्चितम् ॥ ८७ ॥

यज्ञ बोले — [हे महाभागे ! ] तुम पूर्वकाल में गोलोक की एक गोपी थी और गोपियों में परम श्रेष्ठ थी । श्रीकृष्ण तुमसे अत्यधिक प्रेम करते थे और तुम राधा के समान ही उन श्रीकृष्ण की प्रिय सखी थी ॥ ७११/२

एक बार कार्तिकपूर्णिमा को राधामहोत्सव के अवसर पर रासलीला में तुम ‘भगवती लक्ष्मी के दक्षिणांश से प्रकट हो गयी थी, उसी कारण तुम्हारा नाम दक्षिणा पड़ गया । हे शोभने ! इससे भी पहले अपने उत्तम शील के कारण तुम सुशीला नाम से प्रसिद्ध थी । तुम भगवती राधिका के शाप से गोलोक से च्युत होकर और पुनः देवी लक्ष्मी के दक्षिणांश से आविर्भूत हो अब देवी दक्षिणा के रूप में मेरे सौभाग्य से मुझे प्राप्त हुई हो । हे महाभागे ! मुझ पर कृपा करो और मुझे ही अपना स्वामी बना लो ॥ ७२–७४१/२

तुम्हीं यज्ञ करने वालों को उनके कर्मों का सदा फल प्रदान करने वाली देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियों का सारा कर्म निष्फल हो जाता है और तुम्हारे बिना अनुष्ठानकर्ताओं का कर्म शोभा नहीं पाता है ॥ ७५-७६ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दिक्पाल आदि भी तुम्हारे बिना प्राणियों को कर्म का फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं ॥ ७७ ॥ ब्रह्मा स्वयं कर्मरूप हैं, महेश्वर फलरूप हैं और मैं विष्णु यज्ञरूप हूँ, इन सबमें तुम ही साररूपा हो ॥ ७८ ॥ फल प्रदान करने वाले परब्रह्म, गुणरहित पराप्रकृति तथा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे ही सहयोग से शक्तिमान् हैं ॥ ७९ ॥ हे कान्ते! जन्म-जन्मान्तर में तुम्हीं सदा मेरी शक्ति रही हो। हे वरानने ! तुम्हारे साथ रहकर ही मैं सारा कर्म करने में समर्थ हूँ ॥ ८० ॥

ऐसा कहकर यज्ञ के अधिष्ठातृदेवता भगवान् यज्ञपुरुष दक्षिणा के समक्ष स्थित हो गये । तब भगवती कमला की कलास्वरूपिणी देवी दक्षिणा प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने यज्ञपुरुष का वरण कर लिया ॥ ८१ ॥ जो मनुष्य यज्ञ के अवसर पर भगवती दक्षिणा के इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ८२ ॥ राजसूय, वाजपेय, गोमेध, नरमेध, अश्वमेध, लांगलयज्ञ, यश बढ़ाने वाला विष्णुयज्ञ, धनदायक और भूमि देने वाला पूर्तयज्ञ, फल प्रदान करने वाला गजमेध, लोहयज्ञ, स्वर्णयज्ञ, रत्नयज्ञ, ताम्रयज्ञ, शिवयज्ञ, रुद्रयज्ञ, इन्द्रयज्ञ, बन्धुकयज्ञ, वृष्टिकारक वरुणयज्ञ, वैरिमर्दन कण्डकयज्ञ, शुचियज्ञ, धर्मयज्ञ, पापमोचनयज्ञ, ब्रह्माणीकर्मयज्ञ और कल्याणकारी अम्बायज्ञ — इन सभीके आरम्भमें जो व्यक्ति इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसका सारा यज्ञकर्म निर्विघ्नरूप से अवश्य ही सम्पन्न हो जाता है ॥ ८३–८७ ॥

यह स्तोत्र मैंने कह दिया, अब ध्यान और पूजा-विधि सुनो। शालग्राम में अथवा कलश पर भगवती दक्षिणा का आवाहन करके विद्वान् ‌को उनकी पूजा करनी चाहिये ॥ ८८ ॥

[उनका ध्यान इस प्रकार करना चाहिये ]

लक्ष्मीदक्षांससम्भूतां दक्षिणां कमलाकलाम् ।
सर्वकर्मसुदक्षां च फलदां सर्वकर्मणाम् ॥ ८९ ॥
विष्णोः शक्तिस्वरूपां च पूजितां वन्दितां शुभाम् ।
शुद्धिदां शुद्धिरूपां च सुशीलां शुभदां भजे ॥ ९० ॥

भगवती लक्ष्मी के दाहिने स्कन्ध से आविर्भूत होने के कारण दक्षिणा नाम से विख्यात ये देवी साक्षात् कमला की कला हैं, सभी कर्मों में अत्यन्त प्रवीण हैं, सम्पूर्ण कर्मों का फल प्रदान करने वाली हैं, भगवान् विष्णु की शक्तिस्वरूपा हैं, सबकी वन्दनीय तथा पूजनीय, मंगलमयी, शुद्धिदायिनी शुद्धिस्वरूपिणी, शोभनशीलवाली और शुभदायिनी हैं — ऐसी देवी की मैं आराधना करता हूँ ॥ ८९-९० ॥

हे नारद! इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष को मूलमन्त्र से इन वरदायिनी देवी की पूजा करनी चाहिये। वेदोक्त मन्त्र के द्वारा देवी दक्षिणा को पाद्य आदि अर्पण करके ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दक्षिणायै स्वाहा’ – इस मूल मन्त्र से बुद्धिमान् व्यक्ति को सभी प्राणियों द्वारा पूजित भगवती दक्षिणा की भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा करनी चाहिये ॥ ९१-९२ ॥

हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने भगवती दक्षिणा का यह आख्यान आपसे कह दिया; यह सुख, प्रीति तथा सम्पूर्ण कर्मों का फल प्रदान करने वाला है ॥ ९३ ॥ पृथ्वीतल पर भारतवर्ष में जो मनुष्य सावधान होकर देवी दक्षिणा के इस आख्यान का श्रवण करता है, उसका कोई भी कार्य अपूर्ण नहीं रहता । पुत्रहीन व्यक्ति गुणी पुत्र तथा भार्याहीन पुरुष परम सुन्दर तथा सुशील पत्नी प्राप्त कर लेता है; साथ ही वह सुन्दर, पुत्रवती, विनम्र, प्रियभाषिणी, पतिव्रता, पवित्र तथा कुलीन श्रेष्ठ पुत्रवधू भी प्राप्त कर लेता है और विद्याहीन विद्या प्राप्त कर लेता है तथा धनहीन धन पा जाता है । भूमिहीन व्यक्ति को भूमि उपलब्ध

हो जाती है और सन्तानहीन व्यक्ति सन्तान प्राप्त कर लेता है। संकट, बन्धुविच्छेद, विपत्ति तथा बन्धन की स्थिति में एक महीने तक इस आख्यान का श्रवण करके मनुष्य इनसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९४–९८ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘नारायण-नारद- संवाद में दक्षिणोपाख्यानवर्णन’ नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.