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श्रीमद्भागवतमहापुराण – दशम स्कन्ध उत्तरार्ध – अध्याय ८४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
ॐ श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
चौरासीवाँ अध्याय
वसुदेवजीका यज्ञोत्सव

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! सर्वात्मा भक्तभवहारो भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उनकी पत्नियों का कितना प्रेम हैं — यह बात कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, दूसरी राजपत्नियों और भगवान् की प्रियतमा गोपियों ने भी सुनी । सब-की-सब उनका यह अलौकिक प्रेम देखकर अत्यन्त मुग्ध, अत्यन्त विस्मित हो गयी । सबके नेत्रों में प्रेम के आँसू छलक आये ॥ १ ॥ इस प्रकार जिस समय स्त्रियों से स्त्रियाँ और पुरुषों से पुरुष बातचीत कर रहे थे, उसी समय बहुत-से ऋषि-मुनि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी का दर्शन करने के लिये वहाँ आये ॥ २ ॥ उनमें प्रधान ये थे — श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, च्यवन, देवल, असित, विश्वामित्र, शतानन्द, भरद्वाज, गौतम, अपने शिष्यों के सहित भगवान् परशुराम, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पुलस्त्य, कश्यप, अत्रि, मार्कण्डेय, बृहस्पति, द्वित, त्रित, एकत, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, अङ्गिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य और वामदेव इत्यादि ॥ ३-५ ॥ ऋषियों को देखकर पहले से बैठे हुए नरपतगण, युधिष्ठिर आदि पाण्डव, भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी सहसा उठकर खड़े हो गये और सबने उन विश्ववन्दित ऋषियों को प्रणाम किया ॥ ६ ॥

इसके बाद स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, पुष्पमाला, धूप और चन्दन आदि से सब राजाओं ने तथा बलरामजी के साथ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने उन सब ऋषियों की विधिपूर्वक पूजा की ॥ ७ ॥ जब सब ऋषि-मुनि आराम से बैठ गये, तब धर्मरक्षा के लिये अवतीर्ण भगवान् श्रीकृष्णा ने उनसे कहा । उस समय वह बहुत बड़ी सभा चुपचाप भगवान् का भाषण सुन रही थी ॥ ८ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — धन्य है ! हमलोगों का जीवन सफल हो गया, आज जन्म लेने का पूरा-पूरा फल मिल गया; क्योंकि जिन योगेश्वरों का दर्शन बड़े-बड़े देवताओं के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, उन्हीं का दर्शन हमें प्राप्त हुआ है ॥ ९ ॥ जिन्होंने बहुत थोड़ी तपस्या की है और जो लोग अपने इष्टदेव को समस्त प्राणियों के हृदय में न देखकर केवल मूर्ति-विशेष में ही उनका दर्शन करते हैं, उन्हें आपलोगों के दर्शन, स्पर्श, कुशल-प्रश्न, प्रणाम और पाद-पूजन आदि का सुअवसर भला कब मिल सकता है ? ॥ १० ॥ केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं कहलाते और केवल मिट्टी या पत्थर की प्रतिमाएँ ही देवता नहीं होती; संत पुरुष ही वास्तव में तीर्थ और देवता हैं; क्योंकि उनका बहुत समय तक सेवन किया जाय, तब वे पवित्र करते हैं; परंतु संत पुरुष तो दर्शनमात्र से ही कृतार्थ कर देते हैं ॥ ११ ॥ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, वाणी और मन के अधिष्ठातृ-देवता उपासना करने पर भी पाप का पूरा-पूरा नाश नहीं कर सकते; क्योंकि उनकी उपासना से भेद-बुद्धि का नाश नहीं होता, वह और भी बढ़ती है । परन्तु यदि घड़ी दो-घड़ी भी ज्ञानी महापुरुषों की सेवा की जाय तो वे सारे पाप-ताप मिटा देते हैं; क्योंकि वे भेद-बुद्धि के विनाशक हैं ॥ १२ ॥ महात्माओ और सभासदो ! जो मनुष्य वात, पित्त और कफ — इन तीन धातुओं से बने हुए शव-तुल्य शरीर को ही आत्मा — अपना ‘मैं’, स्त्री-पुत्र आदि को ही अपना और मिट्टी, पत्थर, काष्ठ आदि पार्थिव विकारों को ही इष्टदेव मानता है तथा जो केवल जल को ही तीर्थ समझता हैं — ज्ञानी महापुरुषों को नहीं, वह मनुष्य होने पर भी पशुओं में भी नीच गधा ही है ॥ १३ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण अखण्ड ज्ञानसम्पन्न हैं । उनका यह गूढ़ भाषण सुनकर सब-के-सब ऋषि-मुनि चुप रह गये । उनकी बुद्धि चक्कर में पड़ गयी, वे समझ न सके कि भगवान् यह क्या कह रहे हैं ॥ १४ ॥ उन्होंने बहुत देर तक विचार करने के बाद यह निश्चय किया कि भगवान् सर्वेश्वर होने पर भी जो इस प्रकार सामान्य, कर्म-परतन्त्र जीव की भाँति व्यवहार कर रहे हैं — यह केवल लोकसंग्रह के लिये ही है । ऐसा समझकर वे मुसकराते हुए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण से कहने लगे ॥ १५ ॥

मुनियों ने कहा — भगवन् ! आपकी माया से प्रजापतियों के अधीश्वर मरीचि आदि तथा बड़े-बड़े तत्त्वज्ञानी हमलोग मोहित हो रहे हैं । आप स्वयं ईश्वर होते हुए भी मनुष्यकी-सी चेष्टाओं से अपने को छिपाये रखकर जीव की भाँति आचरण करते हैं । भगवन् ! सचमुच आपकी लीला अत्यन्त विचित्र हैं । परम आश्चर्यमयी हैं ॥ १६ ॥ जैसे पृथ्वी अपने विकारों — वृक्ष, पत्थर, घट आदि के द्वारा बहुत-से नाम और रूप ग्रहण कर लेती हैं, वास्तव में वह एक ही है, वैसे ही आप एक और चेष्टाहीन होने पर भी अनेक रूप धारण कर लेते हैं और अपने-आपसे ही इस जगत् की रचना, रक्षा और संहार करते हैं । पर यह सब करते हुए भी इन कर्मों से लिप्त नहीं होते । जो सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद-शून्य एकरस अनन्त हैं, उसका यह चरित्र लीला-मात्र नहीं तो और क्या है ? धन्य हैं आपकी यह लीला ! ॥ १७ ॥ भगवन् ! यद्यपि आप प्रकृति से परे, स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं; तथापि समय-समय पर भक्तजनों की रक्षा और दुष्टों का दमन करने के लिये विशुद्ध सत्त्वमय श्रीविग्रह प्रकट करते हैं और अपनी लीला के द्वारा सनातन वैदिक मार्ग की रक्षा करते हैं; क्योंकि सभी वर्गों और आश्रमों के रूप में आप स्वयं ही प्रकट हैं ॥ १८ ॥

भगवन् ! वेद आपका विशुद्ध हृदय है; तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा उसमें आपके साकार-निराकार रूप और दोनों के अधिष्ठान-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होता हैं ॥ १९ ॥ परमात्मन् ! ब्राह्मण ही वेदों के आधारभूत आपके स्वरूप की उपलब्धि के स्थान है; इसी से आप ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं और इसी से आप ब्राह्मणभक्तों में अग्रगण्य भी हैं ॥ २० ॥ आप सर्व-विध कल्याण-साधनों की चरमसीमा हैं और संत पुरुषों की एकमात्र गति हैं । आपसे मिलकर आज हमारे जन्म, विद्या, तप और ज्ञान सफल हो गये । वास्तव में सबके परम फल आप ही हैं ॥ २१ ॥ प्रभो ! आपका ज्ञान अनन्त है, आप स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म परमात्मा भगवान् हैं । आपने अपनी अचिन्त्य शक्ति योगमाया के द्वारा अपनी महिमा छिपा रखी है, हम आपको नमस्कार करते हैं ॥ २२ ॥ ये सभा में बैठे हुए राजालोग और दूसरों की तो बात ही क्या, स्वयं आपके साथ आहार-विहार करनेवाले यदुवंशी लोग भी आपको वास्तव में नहीं जानते; क्योंकि आपने अपने स्वरूप को —जो सबका आत्मा, जगत् का आदिकारण और नियन्ता है — माया के परदे से ढक रखा है ॥ २३ ॥

जब मनुष्य स्वप्न देखने लगता है, उस समय स्वप्न मिथ्या पदार्थों को ही सत्य समझ लेता है और नाममात्र की इन्द्रियों से प्रतीत होनेवाले अपने स्वप्न-शरीर को ही वास्तविक शरीर मान बैठता है । उसे उतनी देर के लिये इस बात का बिल्कुल ही पता नहीं रहता कि स्वप्न-शरीर के अतिरिक्त एक जाग्रत्-अवस्था का शरीर भी है ॥ २४ ॥ ठीक इसी प्रकार, जाग्रत्-अवस्था में भी इन्द्रियों की प्रवृत्तिरूप माया से चित मोहित होकर नाममात्र के विषयों में भटकने लगता है । उस समय भी चित्त के चक्कर से विवेक-शक्ति ढक जाती है और जीव यह नहीं जान पाता कि आप इस जाग्रत् संसार से परे हैं ॥ २५ ॥ प्रभो ! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि अत्यन्त परिपक्व योग-साधना के द्वारा आपके उन चरणकमलों को हृदय में धारण करते हैं, जो समस्त पाप-राशि को नष्ट करनेवाले गङ्गाजल के भी आश्रयस्थान हैं । यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आज हमें उन्हीं का दर्शन हुआ है । प्रभो ! हम आपके भक्त हैं, आप हम पर अनुग्रह कीजिये; क्योंकि आपके परम पद की प्राप्ति उन्हीं लोगों को होती है, जिनका लिङ्गशरीर रूप जीव-कोश आपकी उत्कृष्ट भक्ति के द्वारा नष्ट हो जाता है ॥ २६ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — राजर्षे ! भगवान् की इस प्रकार स्तुति करके और उनसे, राजा धृतराष्ट्र से तथा धर्मराज युधिष्ठिरजी से अनुमति लेकर उन लोगों ने अपने-अपने आश्रम पर जाने का विचार किया ॥ २७ ॥ परम यशस्वी वसुदेवजी उनका जाने का विचार देखकर उनके पास आये और उन्हें प्रणाम किया और उनके चरण पकड़कर बड़ी नम्रता से निवेदन करने लगे ॥ २८ ॥

वसुदेवजी ने कहा — ऋषियो ! आपलोग सर्वदेवस्वरूप हैं । मैं आपलोगों को नमस्कार करता हूँ । आपलोग कृपा करके मेरी एक प्रार्थना सुन लीजिये । वह यह कि जिन कर्मों के अनुष्ठान से कर्मों और कर्मवासनाओं का आत्यन्तिक नाश — मोक्ष हो जाय, उनका आप मुझे उपदेश कीजिये ॥ २९ ॥

नारदजी ने कहा — ऋषियो ! यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वसुदेवजी श्रीकृष्ण को अपना बालक समझकर शुद्ध जिज्ञासा के भाव से अपने कल्याण का साधन हमलोगों से पूछ रहे हैं ॥ ३० ॥ संसार में बहुत पास रहना मनुष्यों के अनादर का कारण हुआ करता है । देखते हैं, गङ्गातट पर रहनेवाला पुरुष गङ्गाजल छोड़कर अपनी शुद्धि के लिये दूसरे तीर्थ में जाता है ॥ ३१ ॥ श्रीकृष्ण की अनुभूति समय के फेर से होनेवाली जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय से मिटनेवाली नहीं है । वह स्वतः किसी दूसरे निमित्त से, गुणों से और किसी से भी क्षीण नहीं होती ॥ ३२ ॥ उनका ज्ञानमय स्वरूप अविद्या, राग-द्वेष आदि क्लेश, पुण्य-पापमय कर्म, सुख-दुःखादि कर्मफल तथा सत्त्व आदि गुणों के प्रवाह से खण्डित नहीं है । वे स्वयं अद्वितीय परमात्मा हैं । जब वे अपने को अपनी ही शक्तियों — प्राण आदि से ढक लेते हैं, तब मूर्खलोग ऐसा समझते हैं कि वे ढक गये, जैसे बादल, कुहरा या ग्रहण के द्वारा अपने नेत्रों के ढक जाने पर सूर्य को ढका हुआ मान लेते हैं ॥ ३३ ॥

परीक्षित् ! इसके बाद ऋषियों ने भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी और अन्यान्य राजाओं के सामने ही वसुदेवजी को सम्बोधित करके कहा — ॥ ३४ ॥ ‘कर्मों के द्वारा कर्मवासनाओं और कर्मफलों का आत्यन्तिक नाश करने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि यज्ञ आदि के द्वारा समस्त यज्ञों के अधिपति भगवान् विष्णु को श्रद्धापूर्वक आराधना करे ॥ ३५ ॥ त्रिकालदर्शी ज्ञानियों ने शास्त्रदृष्टि से यही चित की शान्ति का उपाय, सुगम मोक्षसाधन और चित्त में आनन्द का उल्लास करनेवाला धर्म बतलाया है ॥ ३६ ॥ अपने न्यायार्जित धन से श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तम भगवान् की आराधना करना ही द्विजाति ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य गृहस्थ के लिये परम कल्याण का मार्ग है ॥ ३७ ॥ वसुदेवजी ! विचारवान् पुरुष को चाहिये कि यज्ञ, दान आदि के द्वारा धन की इच्छा को, गृहस्थोचित भोगों द्वारा स्त्री-पुत्र की इच्छा को और कालक्रम से स्वर्गादि भोग भी नष्ट हो जाते हैं इस विचार से लोकैषणा को त्याग दे । इस प्रकार धीर पुरुष घर में रहते हुए ही तीनों प्रकार की एषणाओं — इच्छाओं का परित्याग करके तपोवन का रास्ता लिया करते थे ॥ ३८ ॥ समर्थ वसुदेवजी ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीनों देवता, ऋषि और पितरों का ऋण लेकर ही पैदा होते हैं । इनके ऋणों से छुटकारा मिलता है यज्ञ, अध्ययन और सन्तानोत्पत्ति से । इनसे उऋण हुए बिना ही जो संसार को त्याग करता है, उसका पतन हो जाता हैं ॥ ३९ ॥ परम बुद्धिमान् वसुदेवजी ! आप अब तक ऋषि और पितरों के ऋण से तो मुक्त हो चुके हैं । अब यज्ञों के द्वारा देवताओं का ऋण चुका दीजिये; और इस प्रकार सबसे उऋण होकर गृहत्याग कीजिये, भगवान् की शरण हो जाइये ॥ ४ ॥ वसुदेवजी ! आपने अवश्य ही परम भक्ति से जगदीश्वर भगवान् की आराधना की है, तभी तो वे आप दोनों के पुत्र हुए हैं ॥ ४१ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — परीक्षित् ! परम मनस्वी वसुदेवजी ने ऋषियों की यह बात सुनकर, उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया, उन्हें प्रसन्न किया और यज्ञ के लिये ऋत्विजों के रूप में उनका वरण कर लिया ॥ ४२ ॥ राजन् ! जब इस प्रकार वसुदेवजी ने धर्मपूर्वक ऋषियों को वरण कर लिया, तब उन्होंने पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्र में परम धार्मिक वसुदेवजी के द्वारा उत्तमोत्तम सामग्री से युक्त यज्ञ करवाये ॥ ४३ ॥ परीक्षित् ! जब वसुदेवजी ने यज्ञ की दीक्षा ले लीं, तब यदुवंशियों ने स्नान करके सुन्दर वस्त्र और कमलों की मालाएँ धारण कर लीं, राजालोग वस्त्राभूषणों से खूब सुसज्जित हो गये ॥ ४४ ॥ वसुदेवजी की पत्नियों ने सुन्दर वस्त्र, अङ्गराग और सोने के हारों से अपने को सजा लिया और फिर वे सब बड़े आनन्द से अपने-अपने हाथों में माङ्गलिक सामग्री लेकर यज्ञशाला में आयीं ॥ ४५ ॥ उस समय मृदङ्ग, पखावज, शङ्ख, ढोल और नगारे आदि बाजे बजने लगे । नट और नर्तकियाँ नाचने लगीं । सूत और मागध स्तुतिगान करने लगे । गन्धर्वों के साथ सुरीले गलेवाली गन्धर्वपत्नियाँ गान करने लगी ॥ ४६ ॥

वसुदेवजी ने पहले नेत्रों में अंजन और शरीर में मक्खन लगा लिया; फिर उनकी देवकी आदि अठारह पत्नियों के साथ उन्हें ऋत्विजों ने महाभिषेक की विधि से वैसे ही अभिषेक कराया, जिस प्रकार प्राचीन काल में नक्षत्रों के साथ चन्द्रमा का अभिषेक हुआ था ॥ ४७ ॥ उस समय यज्ञ में दीक्षित होने के कारण वसुदेवजी तो मृगचर्म धारण किये हुए थे, परन्तु उनकी पत्नियाँ सुन्दर-सुन्दर साड़ी, कंगन, हार, पायजेब और कर्णफूल आदि आभूषणों से खूब सजी हुई थीं । वे अपनी पत्नियों के साथ भली-भाँति शोभायमान हुए ॥ ४८ ॥ महाराज ! वसुदेवजी के ऋत्विज् और सदस्य रत्नजटित आभूषण तथा रेशमी वस्त्र धारण करके वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पहले इन्द्र के यज्ञ में हुए थे ॥ ४९ ॥ उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी अपने-अपने भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्रों के साथ इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे अपनी शक्तियों के साथ समस्त जीवों के ईश्वर स्वयं भगवान् समष्टि जीवों के अभिमानी श्रीसंकर्षण तथा अपने विशुद्ध नारायणस्वरूप में शोभायमान होते हैं ॥ ५० ॥

वसुदेवजी ने प्रत्येक यज्ञ में ज्योतिष्टोम, दर्श, पूर्णमास आदि प्राकृत यज्ञों, सौरसत्रादि वैकृत यज्ञों और अग्निहोत्र आदि अन्यान्य यज्ञों के द्वारा द्रव्य, क्रिया और उनके ज्ञान के — मन्त्रों के स्वामी विष्णुभगवान् की आराधना की ॥ ५१ ॥ इसके बाद उन्होंने उचित समय पर ऋत्विजों को वस्त्रालङ्कारों से सुसज्जित किया और शास्त्र के अनुसार बहुत-सी दक्षिणा तथा प्रचुर धन के साथ अलङ्कृत गौएँ, पृथ्वी और सुन्दरी कन्याएँ दी ॥ ५२ ॥ इसके बाद महर्षियों ने पत्नीसंयाज नामक यज्ञाङ्ग और अवभृथस्नान अर्थात् यज्ञान्त-स्नान-सम्बन्धी अवशेष कर्म कराकर वसुदेवजी को आगे करके परशुरामजी के बनाये हृद में — रामह्रद में स्नान किया ॥ ५३ ॥ स्नान करने के बाद वसुदेवजी और उनकी पत्नियों ने वंदीजनों को अपने सारे वस्त्राभूषण दे दिये तथा स्वयं नये वस्त्राभूषण से सुसजित होकर उन्होंने ब्राह्मणों से लेकर कुत्तों तक को भोजन कराया ॥ ५४ ॥ तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओं, उनके स्त्री-पुत्रों तथा विदर्भ, कोसल, कुरु, काशी, केकय और सृञ्जय आदि देशों के राजाओं, सदस्यों, ऋत्विजों, देवताओं, मनुष्यों, भूतों, पितरों और चारणों को विदाई के रूप में बहुत-सी भेंट देकर सम्मानित किया । वे लोग लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण की अनुमति लेकर यज्ञ की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने घर चले गये ॥ ५५-५६ ॥

परीक्षित् ! उस समय राजा धृतराष्ट्र विदुर, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, भीष्म-पितामह, द्रोणाचार्य, कुन्ती, नकुल, सहदेव, नारद, भगवान् व्यासदेव तथा दूसरे स्वजन, सम्बन्धी और बान्धव अपने हितैषी बन्धु यादवों को छोड़कर जाने में अत्यन्त विरह-व्यथा का अनुभव करने लगे । उन्होंने अत्यन्त स्नेहाई चित्त से यदुवंशियों का आलिङ्गन किया और बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार अपने-अपने देश को गये । दूसरे लोग भी इनके साथ ही वहाँ से रवाना हो गये ॥ ५७-५८ ॥ परीक्षित् ! भगवान् श्रीकृष्ण, बलरामजी तथा उग्रसेन आदि ने नन्दबाबा एवं अन्य सब गोपों की बहुत बड़ी-बड़ी सामग्रियों से अर्चा-पूजा की, उनका सत्कार किया; और ये प्रेम-परवश होकर बहुत दिनों तक वहीं रहे ॥ ५९ ॥ वसुदेवजी अनायास ही अपने बहुत बड़े मनोरथ का महासागर पार कर गये थे । उनके आनन्द की सीमा न थी । सभी आत्मीय स्वजन उनके साथ थे । उन्होंने नन्दबाबा का हाथ पकड़कर कहा ॥ ६० ॥

वसुदेवजी ने कहा — भाईजी ! भगवान् ने मनुष्यों के लिये एक बहुत बड़ा बन्धन बना दिया है । उस बन्धन का नाम है स्नेह, प्रेमपाश । मैं तो ऐसा समझता हूँ कि बड़े-बड़े शूरवीर और योगी-यति भी उसे तोड़ने में असमर्थ है ॥ ६१ ॥ आपने हम अकृतज्ञों के प्रति अनुपम मित्रता का व्यवहार किया है । क्यों न हो, आप-सरीखे संत शिरोमणियों का तो ऐसा स्वभाव ही होता है । हम इसका कभी बदला नहीं चुका सकते, आपको इसका कोई फल नहीं दे सकते । फिर भी हमारा यह मैत्री-सम्बन्ध कभी टूटनेवाला नहीं है । आप इसको सदा निभाते रहेंगे ॥ ६२ ॥ भाईजी ! पहले तो बंदीगृह में बंद होने के कारण हम आपको कुछ भी प्रिय और हित न कर सके । अब हमारी यह दशा हो रही है कि हम धन-सम्पत्ति के नशे से — श्रीमद से अंधे हो रहे हैं, आप हमारे सामने हैं तो भी हम आपकी ओर नहीं देख पाते ॥ ६३ ॥ दूसरों को सम्मान देकर स्वयं सम्मान न चाहनेवाले भाईजी ! जो कल्याणकामी है उसे राज्यलक्ष्मी न मिले — इसमें उसका भला है; क्योंकि मनुष्य राज्यलक्ष्मी से अंधा हो जाता हैं । और अपने भाई-बन्धु, स्वजनों तक को नहीं देख पाता ॥ ६४ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं —
परीक्षित् ! इस प्रकार कहते-कहते वसुदेवजी का हृदय प्रेम से गद्गद हो गया । उन्हें नन्दबाबा की मित्रता और उपकार स्मरण हो आये । उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु उमड़ आये, वे रोने लगे ॥ ६५ ॥ नन्दजी अपने सखा वसुदेवजी को प्रसन्न करने के लिये एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी के प्रेमपाश में बँधकर आज-कल करते-करते तीन महीने तक वहीं रह गये । यदुवंशियों ने जीभर उनका सम्मान किया ॥ ६६ ॥ इसके बाद बहुमुल्य आभूषण, रेशमी वस्त्र, नाना प्रकार की उत्तमोत्तम सामग्रियों और भोगों से नन्दबाबा को, उनके व्रजवासी साथियों को और बन्धु-बान्धवों को खूब तृप्त किया ॥ ६७ ॥ वसुदेवजी, उग्रसेन, श्रीकृष्ण, बलराम उद्धव आदि यदुवंशियों ने अलग-अलग उन्हें अनेकों प्रकार की भेटें दीं । उनके विदा करने पर उन सब सामग्रियों को लेकर नन्दबाबा, अपने व्रज के लिये रवाना हुए ॥ ६८ ॥ नन्दबाबा, गोपों और गोपियों का चित्त भगवान् श्रीकृष्ण के चरण-कमलों में इस प्रकार लग गया कि वे फिर प्रयत्न करने पर भी उसे वहाँ से लौटा न सके । सुतरां बिना ही मन के उन्होंने मथुरा की यात्रा की ॥ ६९ ॥

जब सब बन्धु-बान्धव वहाँ से विदा हो चुके, तब भगवान् श्रीकृष्ण को ही एकमात्र इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियों ने यह देखकर कि अब वर्षा ऋतु आ पहुँची है, द्वारका के लिये प्रस्थान किया ॥ ७० ॥ वहाँ जाकर उन्होंने सब लोगों से वसुदेवजी के यज्ञमहोत्सव, स्वजन सम्बन्धियों के दर्शन-मिलन आदि तीर्थयात्रा के प्रसङ्गों को कह सुनाया ॥ ७१ ॥

॥ श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे चतुरशीतित्तमोऽध्यायः ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

 

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