सर्व-कार्य-सिद्धि-प्रद शाबर भैरव मन्त्र
श्री काल-भैरव बटुक प्रयोग
ॐ अस्य श्री वटुक-भैरव-स्तोत्रस्य सप्त-ऋषिः ऋषयः, मातृका छन्दः, श्रीवटुक-भैरो देवता, ममेप्सित-सिद्धयर्थ जपे विनियोगः ।
“ॐ काल-भैरौ, वटुक भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता-सर्व-सिद्धिर्भवेत् । शोक-दुःख-क्षय-करं निरञ्जनं, निराकारं नारायणं, भक्ति-पूर्ण त्वं महेशं । सर्व-काम-सिद्धिर्भवेत् । काल-भैरव, भूषण-वाहनं काल-हन्ता रुपं च, भैरव गुनी । महात्मनः योगिनां महा-देव-स्वरुपं । सर्व सिद्धयेत् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ त्वं ज्ञानं, त्वं ध्यानं, त्वं तत्त्वं, त्वं वीजं, महात्मानं त्वं शक्तिः, शक्ति-धारणं त्वं महा-देव-स्वरुपं । सर्व-सिद्धिर्भवेत् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं नागेश्वरं, नाग-हारं च त्वं, वन्दे परमेश्वरं । ब्रह्म-ज्ञानं, ब्रह्म-ध्यानं, ब्रह्म-योगं, ब्रह्म-तत्त्वं, ब्रह्म-बीजं महात्मनः । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
त्रिशूल-चक्र-गदा-पाणिं, शूल-पाणि पिनाक-धृक् ! ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं विना गन्धं, विना धूपं, विना दीपं सर्व-शत्रु-विनाशनं । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
विभूति-भूति-नाशाय, दुष्ट-क्षय-कारकं, महा-भैरवे नमः । सर्व-दुष्ट-विनाशनं सेवकं सर्व-सिद्धिं कुरु । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं महा-ज्ञानी, महा-ध्यानी, महा-योगी, महा-बली, तपेश्वर ! देहि मे सिद्धिं सर्व । त्वं भैरव भीम-नादं च नादनम् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं । अमुकं मारय मारय, उच्चाटय उच्चाटय, मोहय मोहय, वशं कुरु कुरु । सर्वार्थकस्य सिद्धि-रुपं त्वं महा-काल ! काल-भक्षणं महा-देव-स्वरुपं त्वं । सर्व-सिद्धयेत् ! ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं गोविन्द, गोकुलानन्द ! गोपालं, गोवर्द्धनं धारणं त्वं । वन्दे परमेश्वरं । नारायणं नमस्कृत्य, त्वं धाम-शिव-रुपं च । साधकं सर्व सिद्धयेत् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं राम-लक्ष्मणं, त्वं श्रीपति-सुन्दरं, त्वं गरुड़-वाहनं, त्वं शत्रु-हन्ता च, त्वं यमस्य रुपम् । सर्व-कार्य-सिद्धिं कुरु । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं ब्रह्म-विष्णु-महेश्वरं, त्वं जगत्-कारणं, सृष्टि-स्थिति-संहार-कारकं, रक्त-बीजं, महा-सैन्यं, महा-विद्या, महा-भय-विनाशनम् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं आहार मद्य, मांसं च, सर्व-दुष्ट-विनाशनं, साधकं सर्व-सिद्धि-प्रदा ।
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अघोर-अघोर, महा-अघोर, सर्व-अघोर, भैरव-काल ! ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं ह्रीं ह्रीं । ॐ आं क्लीं क्लीं क्लीं । ॐ आं क्रीं क्रीं क्रीं । ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं, रुं रुं रुं, क्रूं क्रूं क्रूं । मोहन ! सर्व-सिद्धिं कुरु कुरु । ॐ आ ह्रीं ह्रीं ह्रीं । अमुकै उच्चाटय उच्चाटय, मारय-मारय । प्रूं प्रूं, प्रें प्रें, खं खं । दुष्टान् हन-हन । अमुकं फट् स्वाहा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ बटुक-बटुक योगं च बटुकनाथ महेश्वरः । बटुकै वट-वृक्षै बटुकं प्रत्यक्ष सिद्धयेत् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव, शमशान-भैरव, काल-रुप काल-भैरव ! मेरो वैरी तेरो आहार रे । काढ़ी करेजा चखन करो कट-कट । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ नमो हंकारी वीर ज्वाला-मुखी ! तूं दुष्टन बध करो । बिना अपराध जो मोहिं सतावे, तेकर करेजा छिंदि परै, मुख-वाट लोहू आवे । को जाने ? चन्द्र, सूर्य जाने की आदि-पुरुष जाने । काम-रुप कामाक्षा देवी । त्रिवाचा सत्य, फुरो मन्त्र, ईश्वरो वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं डाकिनी, शाकिनी, भूत-पिशाचश्च । सर्व-दुष्ट-निवारणं कुरु-कुरु, साधकानां रक्ष-रक्ष । देहि मे हृदये सर्व-सिद्धिम् । त्वं भैरव-भैरवीभ्यो, त्वं महा-भय-विनाशनं कुरु । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव महा-भय-विनाशनं देवता । सर्वसिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । पच्छिम दिशा में सोने का मठ, सोने का किवाड़, सोने का ताला, सोने की कुञ्जी, सोने का घण्टा, सोने की सांकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग के बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति के बाँधों, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन के बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी के बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत के बाँधों । जरती अगिन बाँधों, जरता मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, सात समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । उत्तर दिशा में रुपे का मठ, रुपे का किवार, रुपे का ताला, रुपे की कुञ्जी, रुपे का घण्टा, रुपे की सांकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । पूरब दिशा में तामे का मठ, तामे का किवार, तामे का ताला, तामे की कुञ्जी, तामे का घण्टा, तामे की साँकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । दक्षिण दिशा में अस्थि का मठ, अस्थि का किवार, अस्थि का ताला, अस्थि की कुञ्जी, अस्थि का घण्टा, अस्थि की साँकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं आकाशं, त्वं पातालं, त्वं मृत्यु-लोकं । चतुर्भुजं, चतुर्मुखं, चतुर्बाहुं, शत्रु-हन्ता च त्वं भैरव ! भक्ति-पूर्ण कलेवरम् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! तुम जहाँ जाहु, जहाँ दुश्मन बैठ होय, तो बैठे को मारो । चलत होय, तो चलते को मारो । सोवत होय, तो सोते को मारो । पूजा करत होय, तो पूजा में मारो । जहाँ होय, तहाँ मारो । व्याघ्र लै भैरव, दुष्ट को भक्षौ । सर्प लै भैरव ! दुष्ट को डँसो । खड्ग से मारो, भैरव ! दुष्ट को शिर गिरैवान से मारो, दुष्टन करेजा फटै । त्रिशूल से मारो, शत्रु छिदि परै, मुख वाट लोहू आवे । को जाने ? चन्द्र, सूरज जाने की आदि-पुरुष जाने । काम-रुप कामाक्षा देवी । त्रि-वाचा सत्य फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव त्वं । वाचा चूकै, उमा सुखै, दुश्मन मरै अपने घर में । दुहाई काल-भैरव की । जो मोर वचन झूठा होय, तो ब्रह्मा के कपाल टूटै शिवजी के तीनों नेत्र फूटैं । मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति, फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं भूतस्य भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः । त्वं भैरव, सर्व-सिद्धिं कुरु-कुरु । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं ज्ञानी, त्वं ध्यानी, त्वं योगी, त्वं जंगम-स्थावरं, त्वं सेवित सर्व-काम-सिद्धिर्भवेत् । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ काल-भैरव ! त्वं वन्दे परमेश्वरं, ब्रह्म-रुपं, प्रसन्नो भव । गुनि, महात्मनां महा-देव-स्वरुपं सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।”

विधिः- नित्य एक पाठ करने से सर्व-कार्य-सिद्धि होती है । सिर से पाँव तक लाल धागा नाप कर उक्त मन्त्र पढ़ते हुए सात गाँठ लगाकर गले में पहनाने से रक्षा होती है ।

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