October 2, 2019 | aspundir | Leave a comment ॥ हिमालयराज कृत शैलपुत्री स्तुति ॥ ॥ हिमालय उवाच ॥ मातस्त्वं कृपयागृहे मम सुता जातासि नित्यापि यद्भाग्यं मे बहुजन्मजन्मजनितं मन्ये महत्पुण्यदम् । दृष्टं रूपमिदं परात्परतरां मूर्तिं भवान्या अपि माहेशी प्रति दर्शयाशु कृपया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ १ ॥ ॥ श्रीदेव्युवाच ॥ ददामि चक्षुस्ते दिव्यं पश्य मे रूपमैश्वरम् । छिन्धि हृत्संशयं विद्धि सर्वदेवमयीं पितः ॥ ॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ इत्युक्त्वा तं गिरिश्रेष्ठं दत्त्वा विज्ञानमुत्तमम् । स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं माहेश्वरं तदा ॥ शशिकोटिप्रभं चारुचन्द्रार्धकृतशेखरम् । त्रिशूलवर हस्तं च जटामण्डितमस्तकम् ॥ भयानकं घोररूपं कालानलसहस्रभम् । पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं च नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ द्वीपिचर्माम्बरधरं नागेन्द्रकृतभूषणम् । एवं विलोक्य तद्रूपं विस्मितो हिमवान् पुनः ॥ प्रोवाच वचनं माता रूपमन्यत्प्रदर्शय । ततः संहृत्य तद्रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ रूपमन्यन्मुनिश्रेष्ठ विश्वरूपा सनातनी । शरच्चन्द्रनिभं चारुमुकुटोज्ज्वलमस्तकम् ॥ शङ्खचक्रगदापद्महस्तं नेत्रत्रयोज्ज्वलम् । दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ॥ योगीन्द्रवृन्दसंवन्द्यं सुचारुचरणाम्बुजम् । सर्वतः पाणिपादं च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥ दृष्ट्वा तदेतत्परमं रूपं स हिमवान् पुनः । प्रणम्य तनयां प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ ॥ हिमालय उवाच ॥ मातस्तवेदं परमं रूपमैश्वरमुत्तमम् । विस्मितोऽस्मि समालोक्य रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ त्वं यस्य सो ह्यशोच्यो हि धन्यश्च परमेश्वरि । अनुगृह्णीष्व मार्तां कृपया त्वां नमो नमः ॥ ॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ इत्युक्ता सा तदा पित्रा शैलराजेन पार्वती । तद्रूपमपि संहृत्य दिव्यं रूपं समादधे ॥ नीलोत्पलदलश्यामं वनमालाविभूषितम् । शङ्खचक्रगदापद्ममभिव्यक्तं चतुर्भुजम् ॥ एवं विलोक्य तद्रूपं शैलानामधिपस्ततः । कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा हर्षेण महता युतः ॥ स्तोत्रेणानेन तां देवीं तुष्टाव परमेश्वरीम् । सर्वदेवमयीमाद्यां ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ॥ ॥ हिमालय उवाच ॥ मातः सर्वमयि प्रसीद परमे विश्वेशि विश्वाश्रये, त्वं सर्वं नहि किंचिदस्ति भुवने तत्त्वं त्वदन्यच्छिवे । त्वं विष्णुर्गिरिशस्त्वमेव नितरां धातासि शक्तिः परा, किं वर्ण्यं चरितं त्वचिन्त्यचरिते ब्रह्माद्यगम्यं मया ॥ त्वं स्वाहाखिलदेवतृप्तिजननी विश्वेशि त्वं वै स्वधा, पितॄणामपि तृप्तिकारणमसि त्वं देवदेवात्मिका । हव्यं कव्यमपि त्वमेव नियमो यज्ञस्तपो दक्षिणा, त्वं स्वर्गादिफलं समस्तफलदे देवेशि तुभ्यं नमः ॥ रूपं सूक्ष्मतमं परात्परतरं यद्योगिनो विद्यया, शुद्धं ब्रह्ममयं वदन्ति परमं मातः सुदृप्तं तव । वाचा दुर्विषयं मनोऽतिगमपि त्रैलोक्यबीजं शिवे, भक्त्याहं प्रणमामि देवि वरदे विश्वेश्वरि त्राहिमाम् ॥ उद्यत्सूर्यसहस्रभां मम गृहे जातां स्वयं लीलया, देवीमष्टभुजां विशालनयनां बालेन्दुमौलिं शिवाम् ॥ उद्यत्कोटिशशाङ्ककान्तिनयनां बालां त्रिनेत्रां परां भक्त्या त्वां प्रणमामि विश्वजननीं देवि प्रसीदाम्बिके ॥ रूपं ते रजताद्रिकान्तिविमलं नागेन्द्रभूषोज्ज्वलं, घोरं पञ्चमुखाम्बुजत्रिनयनीमैः समुद्भासितम् । चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकं धृतजटाजूटं शरण्ये शिवे, भक्त्याहं प्रणमामि विश्वजननि त्वां त्वं प्रसीदाम्बिके । रूपं ते शारदचन्द्रकोटिसदृशं दिव्याम्बरं शोभनं, दिव्यैराभरणैर्विराजितमलं कान्त्या जगन्मोहनम् । दिव्यैर्बाहचतुष्टयैर्युतमहं वन्दे शिवे भक्तितः, पादाब्जं जननि प्रसीद निखिलब्रह्मादिदेवस्तुते ॥ रूपं ते नवनीरदद्युतिरुचिफुल्लाब्जनेत्रोज्ज्वलं, कान्त्या विश्वविमोहनं स्मितमुखं रत्नाङ्गदैर्भूषितम् । विभ्राजद्वनमालयाविलसितोरस्कं जगत्तारिणि, भक्त्याहं प्रणतोऽस्मि देवि कृपया दुर्गे प्रसीदाम्बिके ॥ मातः कः परिवर्णितुं तव गुणं रूपं च विश्वात्मकं शक्तो देवि जगत्रये बहुगुणैर्देवोऽथवा मानुषः । तत् किं स्वल्पमतिब्रवीमि करुणां कृत्वा स्वकीयैर्गुणै ! मां मोहय मायया परमया विश्वेशि तुभ्यं नमः ॥ अद्य मे सफलं जन्म तपश्च सफलं मम । यत्त्वं त्रिजगतां माता मत्पुत्रीत्वमुपागता ॥ धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं मातस्त्वं निजलीलया । नित्यापि मद्गृहे जाता पुत्रीभावेन वै यतः ॥ किं ब्रुवे मेनकायाश्च भाग्यं जन्मशतार्जितम् । यतस्त्रिजगतां मातुरपि माता भवेत्तव ॥ ॥ श्रीमहाभागवते महापुराणे श्रीभगवतीगीतासूपनिषत्सु ब्रहविद्यायां योगशास्त्रे श्रीपार्वतीहिमालयसंवादे विज्ञानयोगोपदेशवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ हिमालय बोले — माता ! आपने नित्या होकर भी कृपापूर्वक मेरे घर में पुत्री रूप से जन्म लिया है, यह मेरे अनेक जन्मों में किये पुण्यों का ही फल है तथा इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ । मैंने आपका यह रूप देख लिया । अब आप परात्पर भगवती का दिव्य शिवप्रियारूप मुझे कृपापूर्वक शीघ्र ही दिखायें । विश्वेश्वरी ! आपको नमस्कार है ॥ २० ॥ श्रीदेवी बोलीं — पिताजी ! मैं आपको दिव्य चक्षु प्रदान करती हूँ, जिनसे मेरे ऐश्वर्यशाली रूप के दर्शन कर आप अपने हृदय का संशय मिटा लीजिए और मुझे ही सर्वदेवमयी समझिए ॥ २१ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — ऐसा कहकर गिरिराज हिमवान् को दिव्य दृष्टि प्रदान कर जगदम्बा ने अपने अलौकिक माहेश्वर स्वरूप के दर्शन कराये ॥ २२ ॥ उनका वह ज्योतिर्मय रूप करोड़ों चन्द्रमाओं की प्रभा से युक्त था, उनके मस्तक पर अर्ध-चन्द्र की सुन्दर लेखा विराजमान थी । उनके हाथ में श्रेष्ठ त्रिशूल और मस्तक पर जटाएँ सुशोभित हो रही थीं । हजारों कालाग्नि की आभा के समान उनका रूप भयानक और उग्र था । उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे तथा उन्होंने सर्प का यज्ञोपवीत धारण कर रखा था । इस प्रकार व्याघ्रचर्म को धारण किए हुए तथा श्रेष्ठ सर्पों के आभूषण से सुशोभित उनके उस रूप को देखकर हिमवान् बड़े चकित हुए ॥ २३-२५ ॥ तब उनकी माँ मेना ने कहा कि मुझे अपना दूसरा रूप दिखाइए, तब जगदम्बा ने अपने उस माहेश्वर रूप को तिरोहित करके तत्क्षण ही दूसरा रूप प्रकट किया ॥ २६ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! उन सनातनी विश्वरूपा जगदम्बा की आभा शरत्काल के चन्द्रमा के समान थी, सुन्दर मुकुट से उनका मस्तक प्रकाशमान था । वे हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किए हुए थीं । उनके तीन सुन्दर नेत्र थे । उन्होंने दिव्य वस्त्र, माला और गन्धानुलेप धारण कर रखा था । वे योगीन्द्रवृन्द से वन्दनीय थीं, उनके चरणकमल अति सुन्दर थे तथा अपने हाथ, पैर, आँख, मुख, सिर आदि दिव्य विग्रह से वे सभी दिशाओं को व्याप्त किए हुए थीं ॥ २७-२९ ॥ इस प्रकार के परम अद्भुत उस रूप को देखकर हिमवान् ने अपनी कन्या को पुनः प्रणाम किया और विस्मयपूर्ण विकसित नेत्रों से उन्हें देखते हुए वे बोले — ॥ ३० ॥ हिमालय बोले — माता ! आपका यह श्रेष्ठ रूप भी परम ऐश्वर्य से सम्पन्न है, जिसे देखकर मैं चकित हूँ । मुझे तो कोई अन्य ही रूप दिखाइये । परमेश्वरी ! आप जिसकी आश्रय हैं, वह व्यक्ति निश्चय ही अशोच्य और धन्य है । माँ ! कृपापूर्वक मुझ पर अनुग्रह करें, आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ३१-३२ ॥ श्रीमहादेवजी बोले — अपने पिता पर्वतराज के द्वारा ऐसा कहने पर जगदम्बा पार्वती ने अपने उस रूप को भी समेटकर एक दिव्य रूप धारण किया । नीलकमल के समान सुन्दर श्यामवर्ण एवं वनमाला से विभूषित उस रूप की चारों भुजाओं में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे ॥ ३३-३४ ॥ उनके उस रूप को देखकर शैलराज हाथ जोड़कर अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूपा सर्वदेवमयी उन आदिशक्ति जगदम्बा का इस स्तोत्र से स्तवन करने लगे — ॥ ३५-३६ ॥ हिमालय बोले — माता ! आप प्रसन्न हों, आप परम शक्ति हैं, आपमें सब कुछ सन्निहित है, आप ही इस चराचर जगत् की अधिष्ठात्री और परम आश्रय हैं । शिवे ! आप ही सब कुछ हैं, इस त्रिभुवन में आपके अतिरिक्त अन्य कोई तत्त्व विद्यमान नहीं है । आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा आप ही पराशक्ति हैं । आपकी अचिन्त्य लीला का वर्णन मैं कैसे करूँ? जिसका ब्रह्मादि भी पार नहीं पा सकते ॥ ३७ ॥ विश्वेश्वरी ! आप ही स्वाहा रूप से सभी देवताओं की तृप्तिकारिका, स्वधा रूप से पितरों की तृप्ति का कारण और महादेवप्रिया हैं । आप ही हव्य और कव्य हैं । आप ही नियम, यज्ञ, तप और दक्षिणा हैं । आप ही स्वर्गादि लोकों को प्रदान करने वाली हैं तथा समस्त कर्मों का फल प्रदान करने में आप ही समर्थ हैं । महादेवी ! आपको प्रणाम है ॥ ३८ ॥ माता ! जिस आपके पर से भी परतर सूक्ष्मतम रूप का योगिजन शुद्ध ब्रह्म के रूप में वर्णन हैं, शिवे ! वह आपका मोहक रूप मन और वाणी के लिए अगम्य तथा त्रैलोक्य का मूल कारण है । वरदायिनी भगवती ! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ । विश्वेश्वरी ! मेरी रक्षा करें ॥ ३९ ॥ जगदम्बे ! आप सहस्रों उदीयमान सूर्यों के समान आभा वाली, आठ भुजाओं से युक्त, विशाल नेत्रों वाली एवं मस्तक पर चन्द्र रेखा से सुशोभित हैं तथा आप कल्याणकारिणी ने लीलापूर्वक स्वयं ही मेरे घर में जन्म लिया है । उदीयमान करोड़ों चन्द्रमाओं की शीतल कान्ति से युक्त नयनों वाली, त्रिनेत्रा, बालस्वरुपा आप भगवती जगन्माता को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, आप प्रसन्न हों ॥ ४० ॥ शिवे ! आपका रूप चाँदी के पर्वत की कान्ति के समान उज्जवल है, आपने सर्पराज का सुन्दर आभूषण धारण किया है । दुर्जनों के लिए भय उत्पन्न करने वाले पाँच मुखकमलों और भयानक तीन नयनों से आप सुशोभित हैं । अर्धचन्द्र सहित जटाजूट को आपने मस्तक पर धारण कर रखा है । शरणदात्री विश्वजननी ! आपको भक्तिपूर्वक मैं प्रणाम करता हूँ । अम्बिके ! आप प्रसन्न हों ॥ ४१ ॥ भवानी ! कोटिशरच्चन्द्र के समान उज्जवल रूप और दिव्य वस्त्राभरणों से आप सुशोभित हैं । आपका जगन्मोहन रूप चार दिव्य भुजाओं से युक्त है, ब्रह्मादि समस्त देवगण आपकी स्तुति करते हैं । माता ! आपके चरणकमलों में मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, आप प्रसन्न हों ॥ ४२ ॥ दुर्गे ! जलधर की आभायुक्त नवीन और खिले हुए कमल के समान उज्जवल नेत्रवाला आपका रूप अपनी कान्ति से विश्व को विमोहित करने वाला है । आपके मुख पर मुसकान सुशोभित है, आपके गले में वनमाला और अङ्गों पर रत्नजटित अंगद आदि आभूषण सुशोभित हो रहे हैं । जगत् का उद्धार करने वाली देवी ! मैं आपको भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ, अम्बिके ! कृपा करके आप प्रसन्न हों ॥ ४३ ॥ जगदम्बे ! आपके विश्वात्मक रूप और गुण को सर्वात्मना वर्णन करने में तीनों लोकों में देवता अथवा मनुष्य कोई भी सक्षम नहीं है । फिर भी अल्पमति उसका कैसे वर्णन करूँ? आप अपने स्वाभाविक गुणों से मुझ पर दया करते हुए अपनी परम माया से मुझे मोहित न करें । विश्वेश्वरी! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ आज मेरा जन्म और तप सफल हुआ, जो त्रिलोकजननी आप मेरी पुत्री के रूप में आयीं । माँ मैं धन्य और कृतार्थ हुआ, जो कि आपने नित्या प्रकृति होकर भी अपनी लीला से पुत्री भाव से मेरे घर में जन्म लिया । मैं मेना के भी भाग्य की क्या सराहना करूँ, जिन्हें अपने सैकड़ों जन्मों के अर्जित पुण्य के प्रभाव से त्रिलोक जननी की भी जननी होने का सौभाग्य मिला है ॥ ४५-४७ ॥ ॥ श्रीमहाभागवत महापुराण [देवीपुराण] के अन्तर्गत श्रीभगवतीगीतोपनिषद में ब्रह्मविद्या-योगशास्त्र के अन्तर्गत श्रीपार्वती-हिमालय-संवाद में “विज्ञानयोगोपदेशवर्णन” नामक पन्द्रहवाँ अध्याय ॥ १५ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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