December 7, 2025 | aspundir | Leave a comment एकाक्षरगणपति-मन्त्र के जप का विधान स्नान-संध्या-वन्दन आदि से निवृत्त हो, शुद्ध आसन पर आसीन साधक जप प्रारम्भ करने से पूर्व आचमन और प्राणायाम करके निम्नांकितरूप से संकल्प करे — संकल्प — ओमद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे अमुकजनपदे नगरे ग्रामे वा कलियुगे प्रथमचरणे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथावमुक- वासरान्वितायाममुकामुकराशिस्थितेषु सूर्यादिषु नवग्रहेषु सत्सु — एवं विधग्रहगुणविशेषण विशिष्टायां शुभपुण्य – तिथौ — अमुकगोत्रः अमुकशर्मा (वर्मा गुप्तो वा ) श्रीचिन्तामणिगणपतिदेवताप्रीत्यर्थं मम सकलपुरुषार्थ- सिद्ध्यर्थमेकाक्षरगणपतिमन्त्रजपमहं करिष्ये । संकल्प पढ़कर हाथ का जल धरती पर गिरा दे । तत्पश्चात् शरीर शुद्धि के लिये आसन-विधि, भूशुद्धि, भूतशुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा करके अन्तर्मातृका-न्यास करे । तदनन्तर शिखा बाँधकर सिद्धासन पर बैठकर ध्यान करे। इन सबकी विधि इस प्रकार है — निम्नांकित विनियोग और मन्त्र पढ़कर आसन ग्रहण करे — विनियोग — ‘पृथ्वीतिमन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः कूर्मो देवता सुतलं छन्दः (अनुष्टुप्छन्दः) आसने विनियोगः।’ मन्त्र — ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥ ‘सिद्धासनाय नमः ‘ — इस मन्त्र से आसन को नमस्कार करे । फिर प्रस्तुत कार्य में निर्विघ्नतापूर्ण सफलता के लिये विघ्नों का अपसारण करे। पहले निम्नांकित मन्त्र पढ़कर भैरव से आज्ञा ले — मन्त्र तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्तदहनोपम । भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमर्हसि ॥ फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर विघ्नकारी भूतों को भगाये — अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूतले स्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥ ॐ नमः शिवाय। शिवोऽहम्, शिवोऽहम् । इस प्रकार उच्चारण करने के पश्चात् गुरुचतुष्टय को नमस्कार करे — ‘ॐ गं गुरुभ्यो नमः । ॐ पं परमगुरुभ्यो नमः । ॐ पं परमेष्ठिगुरुभ्यो नमः । ॐ पं परात्परगुरुभ्यो ‘नमः ।’ तदनन्तर निम्नांकित चार मन्त्र पढ़कर आचमन करे और हाथ धो ले — १- ॐ गं आत्मतत्त्वाय नमः स्वाहा । २- ॐ गं विद्यातत्त्वाय नमः स्वाहा । ३- ॐ गं शिवतत्त्वाय नमः स्वाहा । ४- ॐ गं सर्वतत्त्वाय नमः स्वाहा । मूलमन्त्र से दोनों हाथों का संशोधन करे। हाथों के अग्रभाग से लेकर कोहनीपर्यन्त भाग का स्पर्श कर ले। ऐसा करने से जप में सिद्धि प्राप्त होती है । तदनन्तर मूलमन्त्र का विनियोग करे। विनियोग वाक्य इस प्रकार है — विनियोग — ॐ अस्य श्रीएकाक्षरगणपतिमन्त्रस्य गणक ऋषिः, निचृद् गायत्रीच्छन्दः, एकाक्षरगणपतिर्देवता, ॐ गं बीजम्, ॐ आं अः शक्तिः, ॐ ग्लौं कीलकम्, मम श्रीगणपतिप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास — ॐ गणकर्षये नमः शिरसि । ॐ निचृद् गायत्रीच्छन्दसे नमः मुखे । ॐ एकाक्षरगणपतिदेवतायै नमः हृदि । ॐ गं बीजाय नमः मूलाधारे । ॐ आं अः शक्तये नमः पादयोः । ॐ ग्लौं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे । करन्यास — ॐ गां अड्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ गीं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ गूं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ गैं अनामिकाभ्यां नमः । ॐ गौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ गः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । हृदयादिन्यास — ॐ गां हृदयाय नमः । ॐ गीं शिरसे स्वाहा । ॐ गूं शिखायै वषट् । ॐ गैं कवचाय हुम् । ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ गः अस्त्राय फट् । इसके बाद ‘भूर्भुवः स्वरोम्’ बोलकर दिग्बन्ध करे। (सब दिशाओं की ओर चुटकी बजाये ।) शापविमोचन-क्रिया ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं हूं गं ऐं क्रों कीलय कीलय स्वाहा’ — इस मन्त्र का अपने मस्तक पर हाथ रखकर तीन बार उच्चारण करे। इससे शापविमोचन होता है। शापोद्धार शापोद्धार के लिये निम्नांकित मन्त्र पढ़कर यथास्थान न्यास करना चाहिये — ॐ गं ह्रूं गूं ह्रीं फट् कल्पाद्याय नमः स्वाहा । ॐ गं गणपतये नमः। ॐ सेतवे नमः मुखे । ॐ ह्रीं गं महासेतवे नमः कण्ठे । ॐ अं गं ऐं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृ ॡं एं ऐं ओं औं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं ज्ञं ॐ निर्वाणाय नमः नाभौ । ॐ कामराजाय नमः लिङ्गे । ॐ गं महाकुण्डलिन्यै नमः आधारे । ॐ रां रीं रूं रैं रौं रः शाकिन्यै नमः मूर्ध्नि । ॐ ग्लौं गजानन मन्त्रशापं मोचय मोचय गं स्वाहा । तत्पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो ध्यान करे — ध्यान— रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुणसरोजाधिरूढं त्रिनेत्रं पाशं चैवाङ्कुशं वैरदनमभयदं बाहुभिर्धारयन्तम् । शक्त्या युक्तं गजास्यं पृथुतरजठरं नागयज्ञोपवीतं देवं चन्द्रार्कचूडं सकलभयहरं विघ्नराजं नमामि ॥ ‘लाल सागर के भीतर एक विशाल नौका है। उसपर खिले हुए लाल कमल का आसन है। उसके ऊपर श्रीगणपति विराज रहे हैं । उनके तीन नेत्र हैं। वे अपनी चार भुजाओं द्वारा पाश, अंकुश, भग्नदन्त और अभयद मुद्रा धारण करते हैं। उनके साथ उनकी शक्ति (सिद्धिलक्ष्मी) भी हैं । वे गजमुख और लम्बोदर हैं। उन्होंने सर्प को यज्ञोपवीत के रूप में धारण कर रखा है तथा चन्द्रमा और सूर्य उनके मस्तक के मुकुट हैं। ऐसे सकलभयहारी देवता विघ्नराज गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ।’ मानसोपचारपूजन — ध्यान के पश्चात् एकाक्षरगणपति का मानसोपचार द्वारा पूजन करे। उसकी विधि यों है — ‘ॐ लं पृथिव्यात्मकम् एकाक्षरगणपतये गन्धं परिकल्पयामि नमः । ॐ हं आकाशात्मकम् एकाक्षरगणपतये शब्दपुष्पं परिकल्पयामि नमः । ॐ यं वाय्वात्मकम् एकाक्षरगणपतये स्पर्शधूपं परिकल्पयामि नमः । ॐ रं अग्न्यात्मकम् एकाक्षरगणपतये रूपदीपं परिकल्पयामि नमः । ॐ वं अमृतात्मकम् एकाक्षरगणपतये रसनैवेद्यं परिकल्पयामि नमः । ॐ सं सर्वरसतन्मात्रप्रकृत्यानन्दात्मकम् एकाक्षरगणपतये ताम्बूलं परिकल्पयामि नमः ।’ शुद्ध चित्त से मूलाधारचक्र में गणेश का चिन्तन करते हुए उनके सम्मुख सात मुद्राएँ दिखाये । दन्त, पाश, अंकुश, विघ्नपरशु, लड्डूक, अभयवरद तथा बीजपूर — ये सात मुद्राएँ हैं । इन मुद्राओं के प्रदर्शन से सम्पूर्णतः सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद श्रीगणपति का स्वागत करे; उनसे संनिकट रहने के लिये विनती करे — स्वागत-विनय स्वागतं देवदेवेश गणेश संनिधो भव । गृहाण मानसीं पूजां यथार्थभावितामिति ॥ इसके बाद मन को गणेशजी में लगाकर माला की प्रार्थना करे — माला-प्रार्थना — ॐ ऐं ह्रीं अक्षरमालायै नमः । ॐ ह्रीं सिद्धयै नमः । ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि । चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥ शुभं कुरुष्व मे भद्रे यशो वीर्यं च सर्वदा ॥ ‘अक्षमाले! तुम महामाया हो, सर्वशक्तिस्वरूपिणी हो। चारों पुरुषार्थ तुममें ही निहित हैं; अतः तुम मेरे लिये सिद्धिदायिनी होओ। भद्रे ! तुम मेरा सर्वदा शुभ करो। मुझे यश और बल दो।’ बीजमन्त्र — प्रार्थना माला को नमस्कार करके बीजमन्त्र की प्रार्थना करे — त्वं बीजं सर्वमन्त्राणां त्वं माला सर्वदायिनी । त्वं दाता सर्वसिद्धीनामेकाक्षर नमोऽस्तु ते ॥ ‘हे एकाक्षर ! तुम सब मन्त्रों के बीज हो। तुम सब कुछ देने वाली माला हो। तुम सम्पूर्ण सिद्धियों के दाता हो। तुम्हें नमस्कार है।’ इस प्रकार प्रार्थना करके मन्त्रदेवता गणपति का ध्यान करते हुए स्वच्छ, स्पष्ट एवं मन्द स्वर में मध्याह्नपर्यन्त जप करे । मन्त्र है — ‘ॐ गं गणपतये नमः ।’ अपने इच्छानुसार १०८ बार या इससे अधिक भी जप करे। जप के अन्त में माला को मस्तक पर रखकर इस प्रकार प्रार्थना करे — त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव । शुभं कुरुष्व मे भद्रे यशो वीर्यं च सर्वदे ॥ ‘हे माले! तुम सम्पूर्ण देवताओं को प्रसन्न करने वाली और शुभदायिनी बनो। सब कुछ देने वाली कल्याणमयी माले ! तुम मुझे यश और बल प्रदान करो।’ तदनन्तर उत्तरन्यास करे। आरम्भ में जैसे किया था, उसी प्रकार करन्यास, हृदयादिन्यास करे। फिर मानस-पूजा भी पूर्ववत् करे । अन्त में प्रार्थना गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादाद् गणेश्वर ॥ ‘गणेश्वर! आप गुह्य और अतिगुह्य साधना के संरक्षक हैं; मेरे द्वारा किये गये इस जप को ग्रहण कीजिये। देव! आपके कृपा-प्रसाद से मुझे सिद्धि प्राप्त हो ।’ इस मन्त्र को पढ़कर भावना द्वारा इष्टदेवता के दाहिने हाथ में जप समर्पित करे । फिर — यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥ ‘जिनके स्मरण और नाम – कीर्तन से तप, यज्ञकर्म आदि में न्यूनता की सद्य: पूर्ति होती है, उन अच्युत (श्रीहरि या गणपति)-की मैं वन्दना करता हूँ ।’ — यह श्लोक पढ़कर न्यूनता की पूर्ति के लिये प्रार्थना करे। तत्पश्चात् निम्नांकित वाक्य बोलकर देवता की प्रसन्नता के लिये अपना जपकर्म उन्हें समर्पित करे — ‘अनेन यथाज्ञानेन यथाशक्त्यनुष्ठितेन एकाक्षरमूलमन्त्रामुकसंख्याकजपाख्येन कर्मणा श्रीचिन्तामणिदेवता प्रीयतां न मम। ॐ तत्सद् गजाननार्पणमस्तु ।’ ‘इस यथाज्ञान, यथाशक्ति कृत एकाक्षर मूलमन्त्र के अमुकसंख्याक जप कर्म के द्वारा श्रीचिन्तामणिदेवता गणपति प्रसन्न हों। इसपर मेरा कोई स्वत्व नहीं है। यह जप श्रीगजानन को अर्पित हो ।’ जहाँ जप करे, उस स्थान की मृत्तिका को जल में मिलाकर उसके द्वारा ललाट में तिलक लगाये। इससे जपकर्म फलदायक होता है। जैसा कि कहा है — यत्र स्थले जपं कुर्यात्तत्र सम्प्रोक्ष्य वारिणा । तद्रेणुतिलकं कुर्यात् तस्मात्तत्फलदं भवेत् ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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