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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — प्रथम भाग)
अध्याय – ७
महाराज विक्रमादित्य के चरित्र का उपक्रम

सूतजी बोले — शौनक ! चित्रकूट पर्वत के आस-पास के क्षेत्र (प्राय: आज के पुरे बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड) में परिहार नामका एक राजा हुआ । उसने रमणीय कलिंजर नगर में रहकर अपने पराक्रम से बौद्धों को परास्त कर पूरी प्रतिष्ठा प्राप्त की । राजपूताने के क्षेत्र (दिल्ली नगर) में चपह्यानि –चौहान नामक राजा हुआ । उसने अति सुन्दर अजमेर नगर में रहकर सुखपूर्वक राज्य किया । उसके राज्य में चारों वर्ण स्थित थे । आनर्त (गुजरात) देश में शुक्ल नामक राजा हुआ, उसने द्वारका को राजधानी बनाया ।om, ॐशौनकजी ने कहा — हे महाभाग ! अब आप अग्निवंशी राजाओं का वर्णन करे ।

सूतजी बोले – ब्राह्मणों ! इससमय मैं योगनिद्रा के वश में हो गया हूँ । अब आप लोग भी भगवान् का ध्यान करें । अब मैं थोडा विश्राम करूँगा । यह सुनकर मुनिगण भगवान् विष्णु के ध्यान में लीन हो गये । लम्बे अन्तराल के बाद ध्यान से उठकर सूतजी पुनः बोले – महामुने ! कलियुग के सैतीस सौ दस वर्ष व्यतीत होनेपर प्रमर नामक राजा ने राज्य करना प्रारम्भ किया । उन्हें महामद (मुहम्मद) नामक पुत्र हुआ, जिसने पिता के शासन-काल के आधे समय तक राज्य किया । उसे देवापि नामक पुत्र हुआ, उसने भी पिताके ही तुल्य वर्षों तक राज्य किया । उसे देवदूत नामक पुत्र हुआ, उसके गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ, जिसने पचास वर्ष तक राज्य किया । वह अपने पुत्र शङ्ख का अभिषेक कर वन चला गया । शङ्ख ने तीस वर्ष तक राज्यभार सँभाला । उसी समय देवराज इन्द्र ने वीरमती नामक एक देवाङ्गना को पृथ्वी पर भेजा । शङ्ख ने वीरमती से गन्धर्वसेन नामक पुत्ररत्न को प्राप्त किया । पुत्र के जन्म-समय मे आकाश से पुष्पवृष्टि हुई और देवताओं ने दुन्दुभी बजायी । सुखप्रद शीतल-मन्द वायु बहने लगी । इसीसमय अपने शिष्यों सहित शिवदृष्टि नाम के एक ब्राह्मण तपस्या के लिये वनमें गये और शिव की आराधना से वे शिवस्वरूप हो गये ।तीन हजार वर्ष पूर्ण होने पर जब कलियुग का आगमन हुआ, अब शकों के विनाश और आर्यधर्म की अभिवृद्धि के लिये वे ही शिवदृष्टि गुह्यको की निवासभूमि कैलास से भगवान् शंकर की आज्ञा पाकर पृथ्वी पर विक्रमादित्य नाम से प्रसिद्ध हुए । ये अपने माता-पिताको आनन्द देनेवाले थे । वे बचपन से ही महान बुद्धिमान् थे । बुद्धिविशारद विक्रमादित्य पाँच वर्ष की ही बाल्यावस्था में तप करने वनमें चले गये । बारह वर्षों तक प्रयत्नपूर्वक तपस्या कर वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हो गये । उन्होंने अम्बावती नामक दिव्य नगरी में आकर बत्तीस मूर्तियों से समन्वित, भगवान् शिव द्वारा अभिरक्षित रमणीय और दिव्य सिंहासन को सुशोभित किया । भगवती पार्वती के द्वारा प्रेषित एक वैताल उनकी रक्षा में सदा तत्पर रहता था । उस वीर राजा ने महाकालेश्वर में जाकर देवाधिदेव महादेव की पूजा की और अनेक व्यूहों से पूरिपूर्ण धर्म-सभा का निर्माण किया । जिसमें विविध मणियों से विभूषित अनेक धातुओं के स्तम्भ थे । शौनकजी ! उसने अनेक लताओं से पूर्ण, पुष्पान्वीत स्थान पर अपने दिव्य सिंहासन को स्थापित किया । उसने वेद-वेदाङ्ग पारंगत मुख्य ब्राह्मणों को बुलाकर विधिवत् उनकी पूजाकर उनसे अनेक धर्म-गाथाएँ सुनी । इसी समय वैताल नामक देवता ब्राह्मण का रूप धारण कर ‘आपकी जय हो’, इस प्रकार कहता हुआ वहाँ आया और उनका अभिवादन कर आसनपर बैठ गया । उस वैताल ने राजा से कहा –‘राजन ! यदि आपको सुनने की इच्छा हो तो मैं आपको इतिहास से परिपूर्ण एक रोचक आख्यान सुनाता हूँ, भारतवर्ष में विक्रमादित्य अत्यन्त प्रसिद्ध दानी, परोपकारी और सर्वाङ्ग-सदाचारी राजा हुए हैं ।स्कन्द आदि पुराणों, बृहत्कथा और द्वात्रिंशत्युत्तलिका, सिंहासनबत्तीसी, कथासरित्सागर, पुरुषपरीक्षा आदि ग्रन्थों में इनका चरित्र वर्णित है । अब इधर कैम्ब्रिज के इतिहास के दूसरे भागमें इनका चरित्र आया है । वैसे स्मिथ और रिफिन्सटन आदिने अनेक विक्रमादित्यों की चर्चा की है, पर ये महाराज विक्रमादित्य उज्जयिनी के राजा थे और कालिदास, अमरसिंह, वराहमिहिर, वैद्यराज धन्वन्तरि, घटकर्पर आदि नवरत्न इनकी ही राजसभा की दिव्य विद्वद्विभूतियाँ थे जिनकी आगे-पीछे कोई उपमा नहीं है । राजा भोज से लेकर बादशाह अकबर तक सभी ने अपनी सभा को वैसे ही नवरत्नों से अलंकृत करनेका प्रयत्न किया था । इसे आप सुनें ।
(अध्याय ७)

॥ ॐ तत्सत् प्रतिसर्गपर्व प्रथम खण्ड शुभं भूयात् ॥

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय १
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय २
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ३
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ४ से ५
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ६

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