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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – १
सबसे अधिक पाप का भागी कौन
(पद्मावतीकथा)

सूतजी बोले — महाकालेश्वर में स्थित उस वैताल ने मन में शिवजी को स्थापित कर राजा से कहा —
राजन्, विक्रमादित्य ! मैं एक मनोरम गाथा सुना रहा हूँ, सुनो-वाराणसी (वनारस) की उस रमणीक नगरी में जिसमें महेश्वर निवास करते हैं, और जहाँ चारों वर्णों की प्रजाएँ रहती हैं, प्रताप मुकुट नामक राजा राज कर रहा था । उस धर्मज्ञ राजा की प्रधान रानी का नाम महादेवी था । om, ॐउसके पुत्र का नाम वज्रमुकुट था, जो मन्त्री के पुत्रों का परमप्रेमी था । सोलह वर्ष की अवस्था में वह घोड़े पर सवार होकर किसी जंगल में गया । मंत्री का पुत्र बुद्धिदक्ष भी समान वय होने के नाते घोड़े पर बैठकर उसके साथ चला गया । वहाँ उस मनोहर जंगल को देखकर, जो पशुओं और पक्षियों से युक्त था, राजकुमार वज्रमुकुट आनन्द विभोर हो गया, किन्तु साथ-साथ कामविवश भी हुआ। वहाँ पर एक दिव्य एवं मनोरम तालाब दिखायी पड़ा, जो पक्षियों के कलरव ध्वनि से मुखरित हो रहा था । उसके तट पर एक शिवालय को देखकर, जो महर्षियों मे अत्यन्त पूजनीय था, वे दोनों वीर परमहर्षित हुए ।
उसी समय कर्णाटक के राजा दन्तवक़ की कन्या पद्मावती ने, जो कामिनी, काम की स्त्री रति के समान थी, कामदेव को नमस्कार करके सखियों समेत उस तालाब में क्रीड़ा करना आरम्भ किया । उस समय वज्रमुकुट मन्दिर से बाहर निकलकर कुमारी पद्मावती को, जो रूप गुण में उसके अनुरूप थी, देखकर मूर्च्छित होकर भूमि में गिर गया, और वह कुमारी भी राजकुमार को देखकर मोहित हो गई । चैतन्य होने पर वज्रमुकुट ने कहा — शिव, शंकर! मेरी रक्षा करो ! पश्चात् पुनः राजकुमार ने उसे कामिनी की ओर देखा । उस समय राजकुमारी ने सिर से कमल पुष्प लेकर उसे कानों में लगाकर दाँतों से काटकर अपने दोनों चरणों के नीचे रख लिया, पुनः उसे उठाकर हृदय (चोली) के भीतर रख लिया । इस प्रकार का भाव प्रकट कर वह सखियों के साथ घर चली गई । वह इस पार्वती के जंगल में अपने पिता के साथ तीर्थ-यात्रा करने आई थी । उसके चले जाने पर वह राजकुमार अत्यन्त काम पीड़ित होने लगा । उसे इतनी अधिक मानसिक पीड़ा हुई कि वह मूर्च्छित हो गया । पश्चात् उन्मादी पुरुष की भाँति खान-पान का भी त्याग कर दिया । बोलना बन्द कर दिया । इस प्रकार उसके मौन-व्रत धारण करने से इतना महान् कोलाहल हुआ कि राजा प्रताप मुकुट से भी यह बात छिपी न रही । ‘हा’ कुमार की कैसी अवस्था प्राप्त हो गई, यही भावना चारों ओर फैल गई । तीन दिन के उपरांत मन्त्री-पुत्र बुद्धिदक्ष ने, जो कुशल व्यक्ति था, वज्रमुकुट से कहा — भूपते ! सत्य बात क्या है ? वज्रमुकुट ने तालाब के तट पर जो कुछ जिस प्रकार से हुआ था, कह सुनाया । उसे सुनकर बुद्धिदक्ष ने हँसकर वज्रमुकुट से कहा — वह देवी बड़ी कठिनाई से मित्र बन सकेगी । उसने (उसके किये हुए भाव का अर्थ भी) बताया कि कर्णाटक प्रदेश के राजा दन्तवक्र की वह कन्या है, पद्मावती उसका नाम है । तुम्हें वह चाहती है । उसके द्वारा किये गये पुष्प के भाव से मैंने यह सब कुछ समझ लिया है और उसी के अनुसार तुम्हें उसके समीप ले चल रहा हूँ । ऐसा कहकर उनके पिता प्रताप मुकुट से उसने कहा — हे। राजन् ! आप आज्ञा प्रदान करें, मैं आपके पुत्र की चिकित्सा के लिए कर्णाटक जा रहा हूँ ।
वज्रमुकुट समेत मैं शीघ्र ही वहाँ से वापस आऊँगा । यदि पुत्र को जीवनदान देना चाहते हैं, तो अविलम्ब इसे स्वीकार कीजिये । ऐसी बातें सुनकर राजा ने शीघ्रतया उसे स्वीकार कर अपने पुत्र को उसे सौंप दिया । वे दोनों युवक घोड़े पर सवार होकर राजा दन्तवक्र के नगर को चल पड़े । वहाँ पहुँचकर किसी वृद्धा स्त्री के घर ठहर गये । कार्य-निपुण बुद्धिदक्ष ने उस वृद्धा स्त्री को बहुत-सा द्रव्य देकर उसी के घर में उस घोर अन्धकार की रात्रि को व्यतीत किया । प्रातः काल जब वह वृद्धा राजा के यहाँ जाने को प्रस्तुत हुई तो मन्त्री-पुत्र (बुद्धिदक्ष) ने उससे कहा—माँ एक बात मेरी भी सुन लो ! पद्मावती के पास पहुँच कर एकान्त में उससे कहना कि — ज्येष्ठ शुक्ल पञ्चमी चन्द्रवार को जिस सुन्दर पुरुष को देखा था, वह तुम्हारे लिए आ गया है ।
यह सुनकर कर वृद्धा ने राजा के यहाँ जाकर पद्मावती से उसकी सभी बातें बतायी । क्रुद्ध होकर पद्मावती ने उससे कहा — महादुष्टे ! जा, जा (यहाँ से) ऐसा कहकर चन्दन से गीली अंगुलियों समेत हाथ के तलवे से उस वृद्धा की छाती में आघात करके उसके दोनों कपोल में अंगुलियों के स्पर्श का चिह्न अंकित कर दिया । वृद्धा ने उस समस्त वृतान्त को बुद्धिदक्ष से निवेदन किया । उसे समझकर बुद्धिदक्ष ने अपने दुःखी मित्र से कहा — मित्र ! शोक का त्यागकर राजकन्या द्वारा कही हुई उसकी प्राणप्रिय बातों को सुनो ! उसने तुम्हारे लिए इसके वक्षःस्थल को ताड़ित कर यह बतालाया कि ‘हम दोनों मित्र (अर्थात् दोनों हृदय) कब एक होंगे । मित्र ! तुम्हारी अमृतमयी वाणी सुनकर मेरे शरीर में रज उत्पन्न हो गया है । अतः रजस्वला से शुद्ध होकर मैं तुम्हारे मुख का चुम्बन मात्र करूँगी ।
उसकी कही हुई ये बातें सुनकर वह राजकुमार परमहर्षित हुआ। तीन दिन के पश्चात् वह वृद्धा पुन: पद्मावती के पास जाकर उससे बोली — तुमसे मिलने के लिए वह राजा बहुत उत्सुक है, इसीलिए वह बार-बार तुम्हारे दर्शन की लालसा प्रकट कर रहा है । अतः सुश्रोणि ! आज उसकी सेवा करके अपने जीवन को सफल करो । इसे सुनकर वह अत्यन्त प्रसन्न हुई और वृद्धा को गवाक्ष (खिड़की) के मार्ग से निकालकर उसकी पीठ में भीगी हुई अंगुलियों समेत (हाथ के) तलवे से अंकित कर दिया । पश्चात् उस वृद्धा ने मंत्रि-पुत्र (बुद्धिदक्ष) के पास जाकर उस वृत्तान्त को सुनाया ।
प्रसन्न होकर बुद्धिदक्ष ने मित्र से कहा — स्वामिन् ! पश्चिम दिशा की खिड़की तुम्हारे मार्ग के लिए निश्चित है, उसने कहा है उसी मार्ग से आधीरात के समय आकर मेरी कामपीड़ा की शान्ति के लिए मेरा आलिङ्गन करो । इसे सुन कर (अपनी) प्रिया का दर्शनाभिलाषी एवं महाकामी उस वज्र-मुकुट ने शीघ्रतया वहां पहुंचकर उस रमणी के साथ रमण किया । एक मास के उपरान्त काम से शिथिल होने पर उसने अपने मित्र के दर्शन के लिए अभिलाषा प्रकट करते हुए पद्मावती से कहा — वरानने ! मेरी एक बात सुनो ! जिस (व्यक्ति) के द्वारा मैंने तुम जैसी सुन्दर भौहों वाली स्त्री को प्राप्त किया, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानी जाती है । वह मेरा परममित्र बुद्धिदक्ष इस समय यहाँ वर्तमान है, अतः प्रिये ! मुझे आज्ञा प्रदान करो, मैं उससे मिलकर पुनः तुम्हारे पास आ जाऊँगा ।
वज्र के समान निष्ठुर इस बात को सुनकर उसने विष मिले मिष्ठान्न (मिठाई) उस मन्त्री-पुत्र के लिए उपहार दिया । बुद्धिदक्ष भी चित्रगुप्त की उपासना करता था, इसीलिए उसके कारण को समझ उसका भक्षण नहीं किया । उसी समय राजकुमार ने आवेश में आकर विवेक करते हुए अपने मित्र से क्रुद्ध होकर कहा— मित्र ! मेरी प्रिया द्वारा बनाये गये इस पकवान का भक्षण क्यों नहीं कर रहे हो !
बुद्धिदक्ष ने हँसकर उस पकवान को किसी कुत्ते के आगे डाला, जिसे खाते ही वह मर गया । उसे देखकर वज्रमुकुट को महान् आश्चर्य हुआ । उस समय स्त्रीचरित्र की ओर ध्यान देकर उसने उस (स्त्री) स्नेह के त्याग पूर्वक मित्र से कहा— मित्र ! मैंने उस पापिनी का त्याग कर दिया ! अब शीघ्र घर चलो ।
बुद्धिदक्ष ने कहा— मित्र, सुनो ! तुम अपनी उस प्रिया के पास शीघ्र जाओ । वहाँ जाकर उसके आभूषण का अपहरण करते हुए उसकी जानु (घुटने) पर त्रिशूल अंकित कर देना । मित्र ! उसके इस सुलभ मिलाप का त्याग कर मेरी इस बात को बिना विचारे ही करो । इसे स्वीकार कर वह वज्रमुकुट उस कार्य को बताये अनुसार करके लौट आया और अपने मित्र के साथ श्मशान के समीप वाले शिवालय की ओर चल दिया । वहाँ (बुद्धिदक्ष ने) अपना योगी का वेष बनाकर उस राजा को शिष्य बनाया, तत्पश्चात् उस बुद्धिमान ने उस आभूषणों को विक्रयार्थ अपने मित्र को सौंप दिया ।
वज्रमुकुट भी उस आज्ञा को शिरोधार्य कर नगर में पहुँच गया । उसी बीच राजा के रक्षक (सिपाही) उसे चोर समझ बाँधकर राजा के सामने उपस्थित किया। राजा

दन्तवक्त्र उससे बोले— हे मनुष्य ! यह सुन्दर आभूषण तुम्हें कहाँ से, कैसे प्राप्त हुआ, सब बातें मुझसे कहो !

उस जटाधारी ने कहा— राजन् ! श्मशान स्थान में मेरे गुरु रहते हैं, सुवर्ण से आच्छन्न इस आभूषण को विक्रयार्थ उन्होंने ही मुझे दिया है। इसे सुनकर राजा ने शीघ्र उस गुरु को बुलाकर उस भूषण प्राप्ति के विषय में पूछा । तब योगी ने कहा— (मैं बता रहा हूँ) आप लोग सुनिये ! मैं योगी का वेष धारण कर श्मशान में मंत्र सिद्धि कर रहा था, उसी बीच कोई पिशाचिनी वहाँ आई । मैंने अपने त्रिशूल से उसके घुटने में चिह्न बना दिया है, उसी ने यह आभूषण प्रदान किया । राजा उसके कारण को समझ कर अपनी पुत्री को घर से निकाल दिया । पश्चात् बुद्धिदक्ष वज्रमुकुट समेत उस राजकुमारी को साथ लेकर अपने घर आया ।

इतनी बातें कहने के उपरान्त बैताल ने हँसकर विक्रमादित्य से कहा-राजन् सुनो ! इन चारों में किसको अधिक पाप का भागी होना पड़ा !

सूतजी बोले — इसे सुनकर राजा विक्रमादित्य ने हँसकर कहा कि पाप का भागी राजा हुआ; क्योंकि मंत्री ने मित्रकार्य, सेवकों ने स्वामी का कार्य और राजकुमार ने अपना स्वार्थ सम्पन्न किया । अतः महापापी राजा ही हुआ जिसके नाते उसे नरक की प्राप्ति हुई । जो मनुष्य अपनी कन्या का विवाह उसके रजस्वला होने की जानकारी रखते हुए भी नहीं करता है, उस पापी को साठ सहस्र वर्ष तक नरक का अनुभव करना पड़ता है । अपने गान्धर्व विवाह के लिए कन्या के तैयार होने पर जो कोई उसमें बाधक होता है, वह पापी यमराज द्वारा दण्डित होता है, विवेकहीन होकर उसके परित्याग करने पर उसको एक लक्ष वर्ष तक नरक-यातना का अनुभव करना पड़ता है।
(अध्याय १)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७

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