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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४० से ४५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ४० से ४५
आचरण की श्रेष्ठता का प्रतिपादन

राजा शतानीक ने कहा – मुने ! अब आप ब्राह्मण आदि के आचरण की श्रेष्ठता के विषय के बतलाने की कृपा करें ।

सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! मैं अत्यन्त संक्षेप में इस विषय को बताता हूँ, उसे आप सुने । न्याय – मार्ग का अनुसरण करनेवाले शास्त्रकारों ने कहा है कि ‘वेद आचारहीन को प्रवित्र नहीं कर सकते, भले ही वह सभी अङ्गों के साथ वेदों का अध्ययन कर ले । वेद पढ़ना तो ब्राह्मण का शिल्पमात्र है, किंतु ब्राह्मण का मुख्य लक्षण तो सदाचरण ही बतलाया गया है ।’ आचारहीनान् न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः । शिल्पं हि वेदाध्ययनं द्विजानां वृतं स्मृतं ब्राह्मलक्षणं तु ॥ (ब्राह्मपर्व ४१ । ८)चारों वेदों का अध्ययन करने पर भी यदि वह आचरण से हीन है तो उसका अध्ययन वैसे ही निष्फल होता है, जिस प्रकार नपुंसक के लिये स्त्रीरत्न निष्फल होता है ।om, ॐ

जिनके संस्कार उत्तम होते हैं, वे भी दुराचरण कर पतित हो जाते है और नरक में पड़ते हैं तथा संस्कारहीन भी उत्तम आचरण से अच्छे कहलाते हैं एवं स्वर्ग प्राप्त करते हैं । मन में दुष्टता भरी रहे, बाहर से सब संस्कार हुए हों, ऐसे वैदिक संस्कारों से संस्कृत कतिपय पुरुष आचरण में शुद्रों से भी अधिक मलिन हो जाते हैं । क्रूर कर्म करनेवाला, ब्रह्महत्या करनेवाला, गुरुदारगामी, चोर, गौओं को मारनेवाला, मद्यपायी, परस्त्रीगामी, मिथ्यावादी, नास्तिक, वेदनिन्दक, निषिद्ध कर्मों का आचरण करने वाला यदि ब्राह्मण है और सभी तरह के संस्कार से सम्पन्न भी है, वेद-वेदाङ्ग-पारङ्गत भी है, फिर भी उसकी सद्गति नहीं होती । दयाहीन, हिंसक, अतिशय दाम्भिक, कपटी, लोभी, पिशुन (चुगलखोर), अतिशय दुष्ट पुरुष वेद पढकर भी संसार को ठगते है और वेद को बेचकर अपना जीवन-यापन करते हैं, अनेक प्रकार के छल-छिद्रसे प्रजा की हिंसा कर केवल अपना सांसारिक सुख सिद्ध करते हैं । ऐसे ब्राह्मण शुद्र से भी अधम हैं ।

जो ग्राह्य – अग्राह्य के तत्त्व को जाने, अन्याय और कुमार्ग का परित्याग करे, जितेन्द्रिय, सत्यवादी और सदाचारी हो, नियमों के पालन, आचार तथा सदाचरण में स्थिर रहे, सबके हित में तत्पर रहे, वेद-वेदाङ्ग और शास्त्र का मर्मज्ञ हो, समधि मे स्थित रहे, क्रोध, मत्सर, मद तथा शोक आदि से रहित ही, वेद के पठन-पाठन में आसक्त रहे, किसी का अत्यधिक सङ्ग न करे, एकान्त और पवित्र स्थान में रहे, सुख-दुःख में समान हो, धर्मनिष्ठ हो, पापाचरण से डरे, आसक्ति-रहित, निरहंकार, दानी, शुर, ब्रह्मवेत्ता, शान्त-स्वभाव और तपस्वी हो तथा सम्पूर्ण शास्त्रों में परिनिष्ठित हो – इन गुणों से युक्त पुरुष ब्राह्मण होते हैं । ब्रह्म के भक्त होने से ब्राह्मण, क्षत से रक्षा करने के कारण क्षत्रिय, वार्ता (कृषि-विद्या आदि) का सेवन करने से वैश्य और शब्द-श्रवण मात्र से जो द्रुतगति हो जायें, वे शुद्र कहलाते हैं । क्षमा, दम, शम, दान, सत्य, शौच, धृति, दया, मृदुता, ऋजुता, संतोष, तप, निरहंकारता, अक्रोध, अनसूया, अतृष्णता, अस्तेय, अमात्सर्य, धर्मज्ञान, ब्रह्मचर्य, ध्यान, आस्तिक्य, वैराग्य, पाप-भीरुता, अद्वेष, गुरुशुश्रूषा आदि गुण जिनमें रहते हैं, उनका ब्राह्मणत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहता है ।

शम, तप, दम, शौच, क्षमा, ऋजुता, ज्ञान-विज्ञान और आस्तिक्य – ये ब्राह्मणों के सहज कर्म हैं । ज्ञानरुपी शिखा, तपोरुपी सूत्र, अर्थात् यज्ञोपवीत जिनके रहते हैं, उनको मनु ने ब्राह्मण कहा हैं । पाप-कर्मों से निवृत्त होकर उत्तम आचरण करने वाला भी बाह्मण के समान ही है । शील से युक्त शुद्र भी ब्राह्मण से प्रशस्त हो सकता हैं और आचाररहित ब्राह्मण भी शुद्र से अधम हो जाता है ।

जिस तरह दैव और पौरुष के मिलने पर कार्य सिद्ध होते हैं, वैसे ही उत्तम जाति और सत्कर्म का योग होने पर आचरण की पूर्णता सिद्ध होती है ।
(अध्याय ४०-४५)

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

15. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २२

16. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २३

17. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २४ से २६

18. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २७

19. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २८

20. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २९ से ३०

21. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३१

22. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३२

23. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३३

24. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३४

25. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३५

26. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३६ से ३८

27. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३९

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