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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ९८ से ९९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ९८ से ९९
अपराजिता-सप्तमी एवं महाजया-सप्तमी-व्रतका वर्णन

ब्रह्माजी बोले — गणाधिप ! भाद्रपद मासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथि अपराजिता-सप्तमी नामसे विख्यात है । यह महापातकों का नाश करती है । इस व्रतमें चतुर्थी तिथि को एकभुक्त और पञ्चमी तिथि में नक्तव्रत करनेका विधान है । षष्ठी तिथि को उपवास करके सप्तमी तिथि में पारणा करनेका विधान है । विद्वानों ने इसमें भी चार पारणाएँ बतायी हैं । om, ॐसूर्यदेवको पूजा करवीर-पुष्प, रक्तचन्दन, गुग्गुल से बने हुए धूप, गुड़ से बने अपूप से करनी चाहिये । भाद्रपद आदि तीन मासों में श्वेत पुष्प, श्वेत चन्दन, घृत का धूप तथा पायस नैवेद्यसे सूर्यदेवका पूजन करना चाहिये । मार्गशीर्ष आदि तीन महीनों में अगस्त्य-पुष्प, कुंकुमका विलेपन, सिह्लक-धूप, शालिचावल के नैवेद्य आदिसे पूजा करनी चाहिये । फाल्गुन आदि तीन मासों में रक्त कमल के पुष्य, अगरु, चन्दन, ‘अनन्त’ नामक धूप श्रीखण्डं ग्रन्थिसहितमगुरुः सिह्लकं तथा । मुस्ता तथेन्द्रं भूतेश शर्करा गृह्यते त्र्यहम् ॥ इत्येष धूपोऽनन्नन्तस्तु कथितो देवसत्तम । (ब्राह्मपर्व ९८ । ९-१०) श्रीखण्ड, अगरु, सिह्लक, नागरमोथा, ग्रन्थिपर्णी, इन्द्रायण तथा शर्करा मिलाकर जो धूप बनाया जाता है, उसे अनन्त नामक धूप कहा गया है , शर्करा या मिश्रीखण्डसे बने हुए अपूपों के नैवेद्यसे सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये । विद्वानोंने ज्येष्ठ आदिके महीनों में सूर्यदेवको पूजा करनेके लिये इस विधिको कहा है । चारों पारणाओं में क्रमशः भगवान् सूर्यदेवके नाम इस प्रकार हैं—सुधांशु, अर्यमा, सविता और त्रिपुरान्तक । सभी पारणाओं में क्रमशः ‘सुधांशुः प्रीयताम्’ इत्यादि कहे । गोमूत्र, पञ्चगव्य, घृत, गरम दूध–ये व्रत के क्रमशः प्राशनपदार्थ हैं ।जो मनुष्य इस विधिसे इस सप्तमी-व्रत को करता है, वह युद्ध में शत्रुओं से पराजित नहीं होता । वह शत्रुको जीतकर धर्म, अर्थ तथा काम— इस त्रिवर्ग को प्राप्त करके वह सूर्य-लोकको प्राप्त होता है ।

जो मनुष्य इस प्रकार सदा प्रयत्नपूर्वक सप्तमी-व्रतको करता है, वह शत्रुको पराजित करके सूर्यलोकको प्राप्त करता है और श्वेत अश्वों से युक्त एवं स्वर्णिम ध्वज-पताका से समन्वित यान के द्वारा भगवान् वरुणदेवके समीपमें जाकर उनका प्रिय हो जाता है ।
ब्रह्माजी बोले— शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथि में जब सूर्य संक्रमण करते हैं, तब वह सप्तमी महाजया कहलाती है, जो भगवान् भास्कर को अत्यन्त प्रिय है । इस अवसरपर किये गये स्नान, दान, जप, होम और पितृ-देव-पूजन-ये सब कार्य कोटि-गुना फल देते हैं — ऐसा भगवान् भास्कर ने स्वयं कहा है ।
(अध्याय ९८-९९)

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