श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-102
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
दैत्य कमलासुर और मयूरेश्वर के युद्ध का वर्णन
अथः द्व्युत्तरशततमोऽध्यायः
कमलासुरसङ्ग्राम

ब्रह्माजी बोले — अपनी बहुत-सी सेना के नष्ट हो जाने पर दैत्यराज कमलासुर अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और वह अश्व पर आरूढ़ होकर हाथ में तलवार लेकर मयूरेश के साथ युद्ध करने के लिये निकल पड़ा ॥ १ ॥ उसे देखकर मयूरेश अपने वाहन मयूर पर सवार हुए, तदनन्तर उन मयूरेश को शीघ्र ही अपनी ओर आता हुआ देखकर उस दैत्यराज ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य द्वारा उपदिष्ट मन्त्र का आदरपूर्वक सौ बार जपकर उस पन्नगास्त्र को मयूरेश पर चलाया। उस समय उस पन्नगास्त्र के तेज से सभी दिशाएँ जलने लगीं ॥ २-३ ॥ तदनन्तर देव मयूरेश की सेना के सैनिकों को सर्पसेना के सैनिकों ने आवेष्टित कर लिया। कुछ सैनिक मृत्यु को प्राप्त हो गये, कुछ भाग चले और कुछ सैनिक भूमि पर गिर पड़े। अत्यन्त बल तथा पराक्रम से सम्पन्न उस दैत्यराज कमलासुर की प्रशंसा करते हुए देव मयूरेश ने कहा — हे दैत्यराज! तुम बड़ी कुशलता से युद्ध कर रहे हो, मैंने इस प्रकार का कोई योद्धा देखा नहीं है ॥ ४-५ ॥

ऐसा कहकर देव मयूरेश ने शत्रु कमलासुर के ऊपर गरुडास्त्र छोड़ा, तब सर्प भाग गये और इधर मयूरेश्वर के सैनिक उठ खड़े हुए ॥ ६ ॥ तदनन्तर देव मयूरेश ने चक्रास्त्र छोड़ा, जो दैत्यसेना का संहार करने वाला था, उस चक्रास्त्र के प्रहार से कुछ दैत्य मर गये और किन्हीं के पैर तथा मस्तक कट गये ॥ ७ ॥ किन्हीं के जानु और जंघा कट गये और कुछ गुल्फ के कट जाने से भूमि पर गिर पड़े। वे ‘ भागो, भागो’ इस प्रकार से और ‘हे माता ! हे पिता ! हे भ्राता!’ इस प्रकार से चिल्ला रहे थे ॥ ८ ॥

जिन्होंने मयूरेश्वर का दर्शन करते हुए प्राणों को छोड़ा था, वे दैत्य मुक्ति को प्राप्त हो गये । इस प्रकार से दैत्य कमलासुर की सारी सेना परास्त हो गयी और तब दैत्य कमलासुर अत्यन्त क्रुद्ध होता हुआ दौड़ पड़ा ॥ ९ ॥ वह हाथ में खड्ग धारणकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गर्जना करते हुए बड़े वेग से गजानन की ओर आया। उस प्रकार के शत्रु को देखकर प्रभु मयूरेश ने हाथ में परशु धारण कर लिया। वे दैत्य की ओर दौड़ पड़े और उन्होंने अत्यन्त वेग से उस परशु को कमलासुर पर छोड़ा। उस परशु नामक आयुध ने अपने तेज से आकाश, दिशाओं तथा पक्षिसमूहों को जलाते हुए दैत्य के हाथ में विद्यमान खड्ग को बड़े वेग से काट डाला, जिससे उस खड्ग के सौ टुकड़े हो गये ॥ १०–१११/२

खड्ग के टूट जाने पर उसने एकाएक धनुष को उठा लिया और उस पर डोरी चढ़ाकर बहुत से बाणों का संधानकर उनसे बलपूर्वक असंख्य सैनिकों को बींधते हुए उन बाणों से आकाश एवं समस्त दिशाओं को आच्छादित कर डाला। फिर वह दैत्य मेघ की ध्वनि के समान गर्जना करने लगा ॥ १२-१३ ॥ उन बाणों के द्वारा अन्धकार छा जाने पर कोई भी कहीं भी दिखायी नहीं दे रहा था । तदनन्तर बलवान् मयूरेश ने अपने बाणों के आघात से दैत्य द्वारा छोड़े गये बाणों के जाल का निवारणकर शीघ्र ही उस कमलासुर के घोड़े को भूमि पर गिरा दिया। तब वह कमलासुर अन्तरिक्ष में चला गया और वहाँ से गणनायक मयूरेश से कहने लगा — ॥ १४-१५ ॥

तुमने मेरे घोड़े को गिरा डाला है, तो अब तुम मेरे महान् कौतुक को देखो। हे गुणेश्वर ! मैं तुम्हारे देखते-देखते तुम्हारे मोर को मार डालूँगा ॥ १६ ॥

तदनन्तर दैत्य कमलासुर ने अपने दोनों तूणीरों में स्थित बाणों को नीचे भूमि में गिराया और धनुष को कानतक खींचकर उन बाणसमूहों को मयूरेश्वर की सेना की ओर चलाया। उसने मयूरेश की सेना के सभी सैनिकों को मारते हुए बाणों के जाल की इस प्रकार वर्षा की, जैसे कि वर्षाऋतु में मेघ वर्षा करते हैं ॥ १७-१८ ॥ उस शरवर्षा के द्वारा मयूरेश की सेना के कुछ गणों के शरीर के सभी अंग कट गये, कुछ देवों ने’ प्राणों का त्याग कर दिया। इस प्रकार से अपनी सेना के वीरों को विनष्ट होते देखकर मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने कमलासुर के बाणों से आविद्ध अपने वाहन मयूर को छोड़कर पाश उठाकर अपने हाथ में ले लिया ॥ १९-२० ॥ आदरपूर्वक उन्होंने आकाश को गुँजाते हुए भयंकर गर्जना की और अत्यन्त तेजस्वी उस पाश को छोड़ा। उस पाश ने दैत्य गणों को गिराते हुए शत्रु सैनिकों को जला डाला ॥ २१ ॥

तदनन्तर वह पाश दैत्यसेना के अधिपति कमलासुर के कण्ठ में जाकर लगा, जिससे उसका श्वास रुक गया । तब उस दैत्य ने अपना दूसरा रूप बना लिया ॥ २२ ॥ उसने उसी क्षण अपने सिर से सूर्यमण्डल को ढक दिया । अत्यन्त घोर अन्धकार छा जाने के कारण उस समय कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था ॥ २३ ॥ इसके बाद वह दैत्य अत्यन्त क्रोधाविष्ट होकर मयूरेश के सामने आ खड़ा हुआ और बोला — अरे बालक! तुम मेरे साथ युद्ध क्यों कर रहे हो, जाओ अपनी माता के स्तनों का पान करो ॥ २४ ॥ बालकों के साथ खेल खेलो, नहीं तो तुम मेरे सामने ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। मेरे तो चिल्लाने मात्र से तीनों लोक काँप उठते हैं ॥ २५ ॥ मेरे द्वारा पैर को भूमि में रख देने मात्र से शेषनाग भी नीचे को दबने लगता है । मेरे द्वारा किये गये मुट्ठी के प्रहारमात्र से बड़े-बड़े पर्वत चूर-चूर हो जाते हैं। मैं अपने नाखून के अग्रभाग से ही तुम्हारे सिर को काटकर रसातल में पहुँचा दूँगा ॥ २६१/२

ब्रह्माजी बोले — उस दुर्बुद्धि कमलासुर दैत्य के इस प्रकार के वचनों को सुनकर गजानन बोले — तुम पिशाच की भाँति और मद्यपान किये हुए व्यक्ति की भाँति मेरे सामने क्यों बकवास कर रहे हो, देवताओं तथा ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला कभी भी विजय प्राप्त नहीं कर सकता ॥ २७-२८ ॥ यदि मैं क्रुद्ध हो जाऊँगा तो मेरा वह क्रोध तीनों लोकों को जला डालेगा। तथापि मैं संसार में तुम्हारी कीर्ति को स्थापित करने के लिये प्रसन्नचित्त होकर तुम्हारे साथ युद्ध कर रहा हूँ। यदि ऐसा नहीं होता तो अभी तक मैंने केवल हुंकारमात्र से तुम्हें यमलोक पहुँचा दिया होता ॥ २९१/२

ब्रह्माजी बोले — बालक मयूरेश के इन वचनों को सुनकर वह दैत्य कमलासुर क्रोध की अग्नि में जलता हुआ अत्यन्त व्याकुल हो उठा और उसने सिंह के समान गर्जना की, उस गर्जना की प्रतिध्वनि से दिशाएँ तथा विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस महान् शब्द से तत्काल अनेकों स्त्रियों के गर्भ गिर पड़े ॥ ३०-३१ ॥ मयूरेश की सेना के प्रमथ आदि बहुत-से गण मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। तदनन्तर दैत्य कमलासुर ने धनुष को कान तक खींचकर छोड़ा और मयूरेश तथा उनकी सेना पर बाणों की भीषण वर्षा की ॥ ३२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘कमलासुर के साथ मयूरेश के संग्राम का वर्णन’ नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०२ ॥

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