November 17, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-116 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ सोलहवाँ अध्याय देव मयूरेश द्वारा सिन्धु दैत्य पर विजय प्राप्ति करने पर मुनिगणों तथा देवी पार्वती एवं शिव का उनके दर्शन के लिये आना, युद्ध में मृत देवगणों को खोजने के लिये मयूरेश तथा मुनिगणों का जाना, देव मयूरेश द्वारा मृत देवों को अपने शरीर की वायु के स्पर्श से जीवित करना अथः षोडशाधिकशततमोऽध्यायः रणशोधनं ब्रह्माजी बोले — देव मयूरेश को जब सिन्धुदैत्य पर विजय की प्राप्ति हो गयी तो सभी मुनीश्वर उनका दर्शन करने उनके पास गये। भगवान् शिव भी देवी पार्वती को साथ लेकर उन्हें देखने गये। उस समय उत्सुकतावश पार्वती ने उनका आलिंगन किया और कहा ॥ ११/२ ॥ पार्वती बोलीं — हे पुत्र ! अत्यन्त कठोर दैत्य सिन्धु के साथं युद्ध करने से तुम बहुत थक गये हो । तुम्हारे शरीर के अंग तो अत्यन्त कोमल हैं, फिर तुमने शस्त्रों की मार को कैसे सहन किया ? वह दैत्य तो महान् बलशाली है, साक्षात् यमराज के सदृश है और अनेक प्रकार की माया को जानने वाला है। फिर कोमल अंगों वाले तुमने उसे युद्ध में कैसे जीता? ऐसा कहकर अपने बालक मयूरेश को गोद में लेकर देवी पार्वती करुण विलाप करने लगीं। तब सभी मुनिगणों ने तथा भगवान् शम्भु ने पार्वती को ऐसा करने से रोका ॥ २–४१/२ ॥ शिव बोले — [हे देवि !] तुम मयूरेश को नहीं जानती हो, वे सभी कारणों के भी कारण हैं, आदि एवं अन्त से रहित हैं, साक्षात् भगवान् हैं, वेदान्त आदि शास्त्रों के लिये भी अगोचर हैं और सर्वसमर्थ हैं । तैंतीस करोड़ देवता उनकी वन्दना किया करते हैं । वे देवताओं के शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं; सृष्टि, स्थिति तथा ज्ञान के हेतु हैं, प्रलय के कारण भी वे ही हैं । वे सभी प्रकार के विकारों से रहित हैं, वे सर्वोत्तम देव मयूरेश पृथ्वी के भार का उद्धार करने के लिये नाना प्रकार रूपों को धारण करते हैं ॥ ५-७ ॥ उनके एक-एक रोमकूप में अनेक ब्रह्माण्ड व्याप्त हैं। वे एक होने पर भी अनेकानेक स्वरूप वाले हैं। वे तपस्या के बल से समन्वित तथा योग और शास्त्र के ज्ञाता हैं। वे देव मयूरेश माया का निवारण करने वाले हैं, मायावियों को भी अपनी माया से मोहित करने वाले हैं और बाल्यावस्था होने पर भी अनेक दैत्यों का विनाश करने वाले हैं, क्या तुम उन्हें नहीं जानती हो ? ॥ ८-९ ॥ ब्रह्माजी बोले — उन मयूरेश की महिमा का श्रवणकर उस समय देवी पार्वती अत्यन्त हर्षित हो गयीं, तदनन्तर हर्ष में भरे हुए मयूरेश मुनियों से तथा शिव एवं पार्वती से बोले — ॥ १० ॥ मयूरेश बोले — हाथ में वज्र धारण करने वाले देवराज इन्द्र से भी मुझे भय नहीं है, फिर अन्य किसी और से भय कैसे हो सकता है ? हे माता ! सभी को प्रणाम करने से, मुनिजनों के आशीर्वाद से तथा भगवान् शिव के वरदान से मैंने दैत्य सिन्धु पर विजय प्राप्त की है, उस दैत्य ने तो कार्तिकेय आदि देवताओं पर भी विजय प्राप्त की है, अतः वे देवता उससे युद्ध नहीं करते ॥ ११-१२ ॥ उस दैत्य सिन्धु की सेना के सैनिक वीरों ने असंख्य देवों का वध किया है, जिससे वीरों को हर्षित करने वाली रक्त की बहुत-सी नदियाँ प्रवाहित हो चली हैं । हे मुनीश्वरो ! अब हम लोग युद्ध करते-करते युद्धभूमि में गिरे हुए देवों का अन्वेषण करते हैं ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — देव मयूरेश के इस प्रकार के वचनों को सुनकर धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ उनसे बोले — हम सभी मुनिगण चलते हैं, अन्य सभी लोग भी चलें। तदनन्तर उन मुनिजनों के साथ वे मयूरेश रणभूमि में देवों को खोजने के लिये गये ॥ १४-१५ ॥ उस युद्धस्थल में मज्जा, रक्त तथा चर्बी की दुर्गन्ध से साँस लेना मुश्किल हो रहा था। अत्यन्त भयंकर आकृति वाले, अनेक प्रकार से छिन्न-भिन्न अंगों वाले, वीभत्स रूप वाले तथा खिले हुए रक्तिम वर्ण वाले पलाश के पुष्प के समान प्रतीत होने वाले उन दैत्य वीरों को देखकर दानवद्वेषी देवों के मन घृणा से भर गये ॥ १६-१७ ॥ वहाँपर उन्होंने वीरों के ऊपर गिरे हुए वीरों के समूहों को देखा। उनमें से कुछ जीवित थे और कुछ शस्त्रों के आघात से मूर्च्छित होकर पड़े हुए थे ॥ १८ ॥ कुछ वीरों के अंग छिन्न-भिन्न हो गये थे । उस समय मयूरेश के साथ गये देवता उन देवताओं को खींचने लगे तो सहसा वे देव यह नहीं समझ पाये कि ये देवता हैं या दानव हैं। मयूरेश को देखकर कुछ वीर कहने लगे कि आपके निमित्त से हम मृत्यु को प्राप्त हुए हैं, अन्तिम समय में हमें आपका दर्शन मिल गया है, ऐसा कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये ॥ १९-२० ॥ ब्रह्माजी बोले — उनके इस प्रकार के वचनों को सुनकर मयूरेश की आँखों से आँसू निकल पड़े, उनका कण्ठ रुँध गया। युद्धभूमि में घूमते-घूमते उन्हें आगे कार्तिकेय दिखलायी पड़े, जो मूर्च्छित पड़े हुए थे ॥ २१ ॥ अपनी आँखों से आँसू बहाते हुए बड़े ही स्नेह से मयूरेश उनसे बोले — भइया! उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो, आप सामान्य व्यक्ति की भाँति क्यों लेटे हुए हैं? दैत्यों का वध करते-करते आप थक गये हैं, अब मुझे अपना आलिंगन प्रदान करें। तदनन्तर मयूरेश ने अपने हाथ से उनका संमार्जन किया, फिर वे कार्तिकेय उठकर खड़े हो गये ॥ २२-२३ ॥ उन्होंने अपने समीप में स्थित देव मयूरेश के उस चरणकमलों का दर्शन किया, जो समस्त भयों को दूर करने वाले हैं । फिर वे मयूरेश से बोले — आपके दर्शन से मेरा समस्त दुःख चला गया है, मेरा सारा श्रम दूर हो गया है, इस समय मैं अत्यन्त शान्ति का अनुभव कर रहा हूँ। तदनन्तर कार्तिकेय ने अपने बारहों हाथों से मयूरेश का आलिंगन किया ॥ २४-२५ ॥ तदनन्तर वे दोनों – मयूरेश और कार्तिकेय एक- दूसरे का हाथ पकड़कर युद्धस्थल को देखने के लिये गये। आगे उन्होंने देखा कि बाणों से क्षत-विक्षत हुए वीरभद्र युद्धभूमि में पड़े हुए हैं। वहीं पर बाणों के आघात से अत्यन्त पीड़ित बलशाली नन्दीश्वर को देखा, फिर उनके आगे भूतराज को देखा, जिनका मस्तक कटा हुआ था ॥ २६-२७ ॥ फिर उन्होंने विलाप करते हुए विकट, अत्यन्त कष्ट में पड़े हुए पुष्पदन्त और दृढ़तापूर्वक विद्ध किये गये मस्तक वाले हिरण्यगर्भ को देखा ॥ २८ ॥ ऐसे ही मृतप्राय चपल को तथा मृत्यु को प्राप्त श्यामल को देखा। उस युद्ध में बुद्धि में भ्रम हो जाने के कारण लम्बकर्ण किसी को पहचान नहीं पा रहे थे ॥ २९ ॥ उस समय सुमुख उदानवायुसे आक्रान्त होकर पड़े हुए थे। इसी प्रकार सोम तथा रक्तलोचन अत्यन्त कष्ट पा रहे थे। मूर्च्छित हो जाने के कारण भृंगी सोये हुए-से थे । पंचास्य मृत्यु की अभिलाषा कर रहे थे। शंख प्रेतत्व को प्राप्तकर सभी वीरों को भयभीत कर थे ॥ ३०-३१ ॥ इस प्रकार से सभी वीरों को मृतप्राय तथा मृत्यु को प्राप्त देखकर वे मयूरेश अत्यन्त चिन्तित हो उठे और उन्होंने उन षडानन से पूछा ॥ ३२ ॥ मयूरेश बोले — अपने पक्ष के अथवा असुर पक्ष के जो भी महावीर युद्ध में मारे गये हैं, वे सभी मेरे निज धाम को प्राप्त हो गये हैं, किंतु जो अभी घायल हैं, उनकी कौन-सी गति होगी ? ॥ ३३ ॥ स्कन्द बोले — हे गुणेश्वर ! आप अनन्तानन्त कोटि ब्रह्माण्डों के एकमात्र स्वामी हैं, आप ही सभी चौदह विद्याओं तथा कलाओं में निधान हैं, फिर मुझसे आप ऐसा प्रश्न क्यों कर रहे हैं ? न मैं कोई मन्त्र जानता हूँ और न कोई देवता ही जानते हैं, आप ही वह सब जानने वाले हैं ॥ ३४-३५ ॥ आप ही अनेकों दैत्यों का वध करने से अपनी कीर्ति का विस्तार कर रहे हैं, तथापि मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये अपनी स्मृति के बल पर यथामति कुछ कहता हूँ ॥ ३६ ॥ प्राचीन समय की बात है, त्रिपुरासुर वध के समय भगवान् शिव ने अद्भुत युद्ध किया था, उस युद्ध में मृत्यु को प्राप्त देवताओं के क्षत-विक्षत अंगों में द्रोण पर्वत में उत्पन्न होने वाली लता के रस को लगाकर उन्हें तत्क्षण ही जीवित कर दिया था ॥ ३७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — कार्तिकेय के द्वारा कहे गये इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे मयूरेश उन कार्तिकेय से बोले — हे षडानन! अभी अत्यन्त बलवान् करोड़ों दैत्य युद्ध के लिये यहाँ आयेंगे, तब कौन उनके साथ युद्ध करेगा ? और कौन है, जो द्रोणपर्वतपर उस लता के श्रेष्ठ रस को लाने के लिये वहाँ जायगा ? ॥ ३८-३९१/२ ॥ ऐसा कहते हुए उस समय देव मयूरेश ने अपनी मायाशक्ति को प्रकट किया। तब उन्होंने अपने शरीर को स्पर्शकर आने वाली वायु के द्वारा उन सभी देवताओं को जीवित कर डाला। तब वे देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर उन गुणेश्वर को प्रणाम करने लगे। उन्होंने देव मयूरेश्वर का आलिंगन किया और उनसे यह निवेदन किया कि वे पुनः युद्ध करेंगे। साथ ही यह भी कहा कि आपके दृष्टिपातमात्र ने हमारे बल को दुगुना कर दिया है ॥ ४०–४२ ॥ गुणेश्वर बोले — ब्रह्मा आदि देवता आप सभी के बल-पराक्रम की महिमा का गान करते हैं । आप लोगों ने तारकासुर आदि प्रधान-प्रधान दैत्य एवं दानवों का वध किया है ॥ ४३ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर उन सभी देवताओं के साथ देव मयूरेश भगवान् शिव के समीप गये और भगवान् शिव तथा देवी पार्वती को प्रणाम करके युद्ध में जाने के लिये उद्यत हुए ॥ ४४ ॥ प्रसन्न होकर माता पार्वती तथा शंकर ने उन गुणेश्वर का आलिंगन किया । तदनन्तर कार्तिकेय आदि उन सभी ने प्रसन्नतापूर्वक शिव का आलिंगन किया [ और कहा —] हे शंकर! हम युद्ध में निष्प्राण होकर गिर पड़े थे, तब अद्भुत कार्य करने वाले मयूरेश के शरीर से स्पर्श हुई वायु के संयोग से हम पुनः जीवित कर दिये गये । अब हम इनके साथ पुनः युद्ध करने के लिये जायँगे। हे भगवन्! हम सभी आपके कृपाप्रसाद से युद्ध में सभी असुरों पर विजय प्राप्त कर लेंगे ॥ ४५-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘रणशोधन’ नामक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११६ ॥ Content is available only for registered users. 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