November 18, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-118 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ अठारहवाँ अध्याय कल तथा विकल नामक दैत्यों का चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, देवसेना में से सेना लेकर पुष्पदन्त तथा वृष का उन दोनों के साथ भयंकर संग्राम, वीरभद्र और षडानन द्वारा दोनों दैत्यों का वध, दैत्य सैनिकों द्वारा युद्ध का समाचार दैत्यराज सिन्धु को देना अथः अष्टादशोत्तरशततमोऽध्यायः कलविकलवध ब्रह्माजी बोले — युद्ध के लिये अत्यन्त उग्र आवेशवाला वह दैत्यराज सिन्धु एक उच्च आसन पर बैठ गया । तदनन्तर वह वहाँ विराजमान प्रधान-प्रधान वीरों से बोला ॥ १ ॥ सिन्धु बोला — तीनों लोकों को अपने पराक्रम से अधीन बना लेने वाले मेरे वे मैत्र तथा कौस्तुभ नामक दोनों प्रधान वीर मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। अब उन दोनों के समान यहाँ कोई ऐसा वीर नहीं है, जो अपने बल से शत्रु को मार डाले, उन दोनों मैत्र और कौस्तुभ के समान न तो कोई बुद्धिमान् है, न पराक्रमी है और न विजय का अभिलाषी ही है ॥ २१/२ ॥ यह सुनकर वहाँ उपस्थित वीर (कल और विकल) उस सिन्धु से बोले — हे दैत्यराज ! आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। जबतक हम लोग जीवित हैं, तबतक इस उपस्थित एक छोटे-से कार्य के लिये आप आप इतने चिन्तित क्यों होते हैं ? ॥ ३-४ ॥ हे महाभाग! आप पुष्पों के विस्तर वाली शय्या पर निश्चिन्त होकर शयन करें। जिन हम दोनों के द्वारा साक्षात् यमराज को भी पीड़ित किया गया है, उन्हें किससे भय हो सकता है — दैत्यराज सिन्धु से इस प्रकार कहने के अनन्तर उस दैत्य के कल तथा विकल नाम वाले दो साले, जो अत्यन्त बलशाली तथा युद्ध के लिये उन्मत्त थे, वे [युद्ध के लिये] निकल पड़े ॥ ५-६ ॥ वे दोनों — कल और विकल विविध प्रकार के युद्धों को करने में कुशल थे, विविध प्रकार के आयुधों को धारण करने वाले थे। अनेक प्रकार के वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित थे और नाना प्रकार की सेनाओं से समन्वित थे। उन दोनों ने विविध प्रकार की गर्जना करते हुए आकाशमण्डल को निनादित कर दिया था। वे दोनों करोड़ों देवताओं का हनन करने में समर्थ थे। उन दोनों के पास असंख्य सेना थी ॥ ७-८ ॥ उन दोनों वीरों के आगे-आगे बहुत-से वीर सैनिक चल रहे थे, जिनके मस्तक सिन्दूर के लेपन से अरुण वर्ण के थे, वे आग्नेय अस्त्र धारण किये हुए थे। उनके केशपाश खुले हुए थे तथा वे चन्दन का अनुलेप किये हुए थे। शस्त्रों के धारण करने से वे सुशोभित हो रहे थे। वे सभी वीर यमराज को भी खा जाने के लिये उद्यत थे। उन वीर सैनिकों के पीछे हाथियों का समूह चल रहा था। वे हाथी गैरिक आदि विविध प्रकार की धातुओं के अनुलेपन से चित्रित थे ॥ ९-१० ॥ उनपर महावत बैठे हुए थे । वे हाथी नाना प्रकार के आभूषणों से सुशोभित थे, उन हाथियों के मस्तक पर सिन्दूर लगाया हुआ था। उनके दाँत अत्यन्त तीक्ष्ण थे। वे घण्टा के नाद से निनादित थे ॥ ११ ॥ उन हाथियों के पीछे घुड़सवार चल रहे थे। जो धारण किये हुए कवचों से सुशोभित हो रहे थे । उन्होंने धनुष तथा बाण धारण किया हुआ था। वे सभी चमकीले शस्त्रों से विभूषित हो रहे थे ॥ १२ ॥ घुड़सवारों के पीछे युद्ध की सामग्री से समन्वित अनेक प्रकार के रथ चल रहे थे। उनमें अनेक वीर बैठे हुए थे, उन रथों पर सारथि विद्यमान थे। इस प्रकार की सेना से सुसज्जित होकर दैत्यराज सिन्धु के अत्यन्त क्रोध में भरे हुए कल तथा विकल नामक दो साले युद्धस्थल के लिये जा रहे थे । वहाँ उन्होंने विषधारी सर्प का भक्षण करने वाले मयूर पर आरूढ़ मयूरेश को देखा ॥ १३-१४ ॥ वे कार्तिकेय आदि महान् वीरों तथा अन्य वीरों से घिरे हुए थे। उन दोनों-कल तथा विकल की उस अत्यन्त भयंकर चतुरंगिणी सेना को तथा अनेक प्रकार के विचित्र-विचित्र सैनिकों से समन्वित असंख्य सैनिकों को आया हुआ देखकर उन श्रेष्ठ देवों ने नीतिशास्त्र में पारंगत एक दूत को कल-विकल के पास भेजा। वह वहाँ का सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर आया और उसने देवों को वह सब समाचार सुनाया ॥ १५-१६१/२ ॥ दूत बोला — कल तथा विकल नामक दो दैत्य वीर विविध प्रकार की सेनाओं को लेकर देवताओं पर विजय प्राप्त करने के लिये आये हुए हैं, वे दोनों विविध प्रकार की युद्धकलाओं में अत्यन्त प्रवीण हैं ॥ १७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर उन दोनों से युद्ध करने के लिये पुष्पदन्त तथा वृष गये। उन दोनों देवों ने धनुषों पर प्रत्यंचा चढ़ायी और साठ बाणों के द्वारा उन दोनों दैत्यों पर प्रहार किया, किंतु उन दोनों दैत्यों ने उन बाणों को रोककर अपनी-अपनी बाणवृष्टि के द्वारा पुष्पदन्त तथा वृष को आच्छादित कर दिया। इसी के साथ ही वे अन्य देवसैनिकों को भी बाणों के आघात से मारने लगे । [तब] उन महावृष ने कल की तलवार को अपनी तलवार से काट डाला ॥ १८- २० ॥ पुष्पदन्त ने सेना को साथ लेकर शीघ्र ही विकल की तलवार को काटकर गिरा दिया और अपने बाणों के द्वारा उसके धनुष को भी काट डाला ॥ २१ ॥ तदनन्तर पुष्पदन्त और विकल में परस्पर मल्लयुद्ध होने लगा। दोनों ओर की सेनाएँ भी एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से अनेक प्रकार के शस्त्रों, अस्त्रों तथा बाणों के द्वारा और विविध प्रकार की माया के द्वारा युद्ध करने लगीं। तब देवसेना के द्वारा प्रयुक्त शस्त्रों की मार से अत्यन्त दुखी दैत्यों की सेना वहाँ से पलायित हो गयी ॥ २२-२३ ॥ कुछ देवता भागते हुए उन दैत्यवीरों के पीछे-पीछे जाकर उनको मारने लगे। उन्होंने अपने पैर के आघात से कई दैत्य सैनिक वीरों को मार डाला । मरे हुए वीरों के रक्त से प्रवाहित होने वाली अत्यन्त भयंकर नदी वहाँ बहने लगी, जो कायरों को भयभीत करने वाली और भूतों तथा पक्षियों को आनन्द देने वाली थी ॥ २४-२५ ॥ तदनन्तर मदोन्मत्त वे दोनों कल तथा विकल अत्यन्त वेग से ऊपर उछले और वहाँ से बाणों की अत्यन्त भीषण वृष्टि करने लगे। उस बाणवृष्टि के द्वारा आहत हुई देवसेना रक्त बहाती हुई वहाँ भाग उठी । तदनन्तर वृष ने अपनी सींगों द्वारा उन दोनों कल और विकल की सेना को बहुत मारा ॥ २६-२७ ॥ उन दैत्यरक्षक वीरों को उन्होंने शीघ्र ही अपने लातों के प्रहार से मारा, कुछ को अपनी फूत्कार के द्वारा गिरा डाला और कुछ वीरों को अपनी पूँछ की मार से मार-मारकर चूर-चूर कर डाला ॥ २८ ॥ इस प्रकार उन वृष ने अनेक दैत्यों से समन्वित दैत्यसेना को मार डाला। उस समय वहाँ मरते हुए दैत्यों का महान् हाहाकार होने लगा ॥ २९ ॥ तब अत्यन्त बलवान् वीर कल तथा विकल दोनों ने रोष करते हुए अत्यन्त भीषण गर्जना की। उनकी गर्जना से दसों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ ३० ॥ उन दोनों ने वृषभ की निन्दा की और कहा — हम दोनों के सामने तुम क्यों युद्ध कर रहे हो, तुम तो घास चरने वालों में सामर्थ्य रखने वाले हो, इस समय तुम हमारी दृष्टि में एक तिनके के समान हो। ऐसा कह करके उन दोनों महान् बलशाली कल-विकल ने वृषभ के दोनों सींगों को पकड़ लिया और उन्हें खींचते हुए वे अपनी चतुरंगिणी सेना के मध्य ले गये ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर उन वृषभ को छुड़ाने के लिये अत्यन्त वेगपूर्वक सहसा पुष्पदन्त वहाँ जा पहुँचे, किंतु उस विकल ने अपने लातों के प्रहार से उन्हें जमीन पर गिरा दिया। हर्ष में भरे हुए मनवाला वह विकल वाद्यों की ध्वनि के साथ नृत्य करने लगा। पुष्पदन्त मुहूर्तभर मूर्च्छित रहने के अनन्तर स्वस्थ होकर चैतन्य हो गये ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर युद्ध करने के लिये वीरभद्र और षडानन कार्तिकेय वहाँ आये । षडानन के द्वारा किये गये पर्वत के प्रहार से दैत्य कल सौ टुकड़ों में विभक्त होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥ ३५ ॥ वीरभद्र ने अपनी हथेली के प्रहार से विकल को गिरा डाला। स्कन्द के द्वारा एक बहुत बड़े पर्वत के प्रहार से दैत्य कल को मरा हुआ देखकर वे देवगण विजयी होकर अपने शिविर में चले गये। शस्त्रों की मार से घायल हुए कुछ दैत्य सैनिक दैत्यराज सिन्धु की नगरी गण्डकीपुर को चले गये ॥ ३६-३७ ॥ वहाँ उन्होंने दैत्यराज सिन्धु को यह समाचार बताया कि वीरभद्र आदि प्रधान देवगणों ने रोष करते हुए विविध सेनाओं से समन्वित कल तथा विकल दोनों वीरों को मार डाला है और वे देवगण विजयी होकर अपने शिविर में चले गये हैं ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘कल-विकल के वध का वर्णन’ नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११८ ॥ Content is available only for registered users. 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