November 27, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-136 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय गजानन का सिन्दूर के साथ युद्धार्थ प्रस्थान, सिन्दूर के दूतों से गजानन का संवाद एवं सिन्दूर का युद्ध हेतु आगमन अथः षट्त्रिंशोत्तरशततमोऽध्यायः बालचरिते सिन्दूरनिर्गम ब्रह्माजी बोले — एक दिन की बात है, जनता के दुखों का अनुभव करते हुए गजाननदेव ने महाभाग मुनिश्रेष्ठ पराशरजी से कहा — ॥ १ ॥ गजानन बोले — [हे तात!] सम्पूर्ण जगत् को दुष्ट सिन्दूर ने पीड़ित कर दिया है, जिसके कारण स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा वेदघोष शून्य हो गया है। ऋषिगण तथा देवगण अपने-अपने स्थानों से च्युत हो गये हैं। [अतः इस ] गजानन स्वरूप के द्वारा मैं दुष्टवध, सत्पुरुषरक्षण, भूभारहरण, समस्त देवताओं का उनके पदों में पुनर्नियोजन तथा विश्व का आनन्द-सम्पादन करूँगा ॥ २-४ ॥ हे तात! मेरे मस्तक पर आप अपना अभयप्रद तथा मंगलमय हाथ रखिये, आपके कृपाप्रसाद से मैं [निश्चय ही] उस दुष्ट मन वाले सिन्दूर का वध कर सकूँगा ॥ ५ ॥ मुनि ने कहा — हे बाल ! यह तो आश्चर्य की बात है, जो कि तुम बचपने के कारण कह रहे हो। जैसे कोई बालक कौतूहलवश [अपने माता-पिता आदि से] चन्द्रमा पाने का हठ करता है, वैसे ही जो कार्य समस्त देवताओं के लिये भी कर पाना असम्भव है, उसे तुम करना चाह रहे हो। जिसके निःश्वासमात्र से पर्वत भूमि पर गिरकर चूर-चूर हो जाते हैं और जिसके चरणों के आघातमात्र से तत्काल तीनों लोक काँप उठते हैं, [ऐसे] उस सिन्दूरासुर से मृणाल सदृश देह वाले तुम कैसे युद्ध कर सकोगे ? ॥ ६-८ ॥ अभीतक तो तुम्हारी आयु के चार वर्ष भी पूर्ण नहीं हो सके हैं, इसपर भी यदि तुम [ऐसा मानते हो कि] मेरे अनुग्रहमात्र से ही [ उसे मार पाने में] सक्षम हो जाओगे, तो मैं [इसी क्षण ] अपना यह अभयप्रद हाथ तुम्हारे मस्तक पर रख रहा हूँ ॥ ९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदुपरान्त (पराशरजी के द्वारा उनके मस्तक पर श्रीहस्त रखे जाने के बाद) हर्षित हुए गजाननदेव ने मुनिवर पराशर, जननी ( मुनिपत्नी अथवा पार्वतीजी), भगवती दुर्गा, श्रीहरि तथा भगवान् शंकर को नमस्कार किया और उस मूषक पर आरूढ़ होकर वे युद्ध के लिये चल पड़े ॥ १०-११ ॥ वे अपने चारों हाथों में अंकुश, परशु, पाश एवं कमल धारण किये थे और अपनी तीव्र गर्जना के द्वारा तीनों लोकों को कम्पित कर रहे थे। अपने तेज से प्रलयकालीन अग्नि के समान उद्दीप्त होते हुए वे गजाननदेव क्षणभर में सिन्दूर की राजधानी जा पहुँचे ॥ १२-१३ ॥ घुसृणेश्वर नामक [शैव] स्थान के समीप ही ‘सिद्धसिन्दूरवाडक’ नामक स्थान था, जहाँ रहकर वह सिन्दूर तीनों लोकों पर शासन करता था ॥ १४ ॥ उस (-के आवास स्थान) – से उत्तर की ओर स्थित हो गजाननदेव दिशाओं को गुँजाते हुए गरजने लगे, जिसके कारण सातों समुद्र क्षुब्ध हो गये और पर्वत भी फटने लगे। गजाननदेव के उस तीव्र गर्जन को सुनकर सभी दैत्य काँप उठे। उस समय कायर लोग मूर्च्छित हो गये तथा उनमें से कुछ-की मृत्यु भी हो गयी ॥ १५-१६ ॥ गर्जन के कारण सिन्दूर भी तत्काल मूर्च्छित हो गया, किन्तु क्षणभर में ही वह पुनः चैतन्य हो उठा और सभी सेवकों से कहने लगा कि जरा देखो! यह कौन गरज रहा है? ॥ १७ ॥ जिसके गर्जनमात्र से मैं सहसा मूर्च्छित हो गया, उसके समक्ष कैसे जा सकूँगा और ऐसा कौन होगा, जिसमें उसके सामने टिक पाने की शक्ति हो ? ॥ १८ ॥ तदुपरान्त सिन्दूर के सेवक उन बालरूप गजानन के समीप जा पहुँचे और उनके रूप को देखकर वे वैसे ही विचलित तथा भयभीत हो उठे, जैसे सिंह को देखकर हाथी भयाकुल हो उठते हैं। उनमें कुछ सेवकों ने धैर्य धारण करके गजानन से पूछा कि तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, किसलिये आये हो और तुम्हारा नाम क्या है ? विश्व के संहार में रस लेने वाला अर्थात् विश्वसंहारक सिन्दूर [ तुम्हारे गर्जन के कारण ] क्रोधित है। तुम्हारे गर्जनघोष से तो सिन्दूर के साथ- साथ सम्पूर्ण विश्व काँप उठा है। तुम चार-पाँच वर्ष की आयु वाले बालक होकर भी बलवान् प्रतीत होते हो और ये भी दीखता है कि क्षणभर में ही तुम विश्व का संहार करने में समर्थ हो ॥ १९-२२ ॥ सेवकों के ऐसे कथन को सुनकर विभु गजानन ने उनसे कहा — ‘मैं शिव के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हूँ तथा पराशरमुनि के भवन में निवास करता हुआ दुष्टों के संहार एवं भक्तों के पालन में तत्पर रहता हूँ। मैं [वस्तुतः ] ब्रह्मा आदि देवताओं के लिये भी अगोचर हूँ [ तथापि प्रयोजनवश ] विविध अवतार धारण करता हूँ। मेरा नाम ‘गजानन’ है और मैं युद्ध करने के लिये यहाँ आया हूँ। तुम लोग अपने स्वामी के पास जाओ और उसको सारी बात बता दो कि मेरा मन उस दुर्जय के मारे जाने पर ही सन्तुष्ट होगा। यह सुनने के बाद वे सेवक वहाँ से तत्काल चल पड़े और सिन्दूर के पास पहुँचकर कहने लगे—॥ २३–२६ ॥ दूतों ने कहा — [हे स्वामिन्!] आपकी आज्ञा से हम लोग तत्काल उस (गजानन) – के पास गये और यमराज के समान (भयावह) उसको देखकर [ पहले तो] हम सभी काँप उठे, फिर आपके प्रताप का अनुभव करके उसके सामने [जाकर] हमने वार्तालाप किया। तब उसने भी अपना समग्र परिचय संक्षेप में दिया ॥ २७-२८ ॥ [बालक के कथनानुसार] उसका नाम गजानन है तथा वह शिव का पुत्र है। दुष्ट दैत्यों का विनाश एवं सत्पुरुषों की रक्षा के लिये [ अवतीर्ण वह बालक] इस समय आपसे युद्ध करने आया है। वह वैसे तो चार साल की आयुवाला है, किंतु बड़ी-बड़ी डींगें हाँकता है ॥ २९-३० ॥ आप अपने प्रभाव के द्वारा अपने उस छोटे-से शत्रु को अभी मार डालिये। आपके तो केवल निःश्वास से भी वह दूर चला जायगा । हे स्वामिन्! जिसके दृष्टि- निक्षेपमात्र से शिव, ब्रह्मा आदि काँप उठते हैं, उन आपके समक्ष वह अल्पबुद्धि बालक किस गिनती में हो सकेगा ? ॥ ३१-३२ ॥ ब्रह्माजी बोले — दूतों की ऐसी बातें सुनकर सिन्दूर चिन्ता से विह्वल हो उठा, उसकी मुखकान्ति मलिन हो गयी और नेत्र क्रोध के कारण अरुण हो गये । वह अपनी आँखों से प्रलयकालीन अग्नि के समान अग्निज्वालाएँ उगलता हुआ तथा हर्ष और क्रोध के मिश्रित मनोभावों से युक्त हो दूतों से कहने लगा — ॥ ३३-३४ ॥ सिन्दूर बोला — हे दूतो! आप लोगों की बातों से मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। अरे ! सिंह के साथ युद्ध करने के लिये मच्छर कैसे आया है? क्या चार साल का बालक मेरे साथ युद्ध करेगा और मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि किस कारण से तुम लोग उससे डर गये हो; क्योंकि यदि मैं क्रोधित हो जाऊँ तो यह संसार नष्ट हो जाय, तब उस बालक की गणना ही क्या है ? [ऐसा कहकर सिन्दूर] दिशा-विदिशाओं तथा आकाशमण्डल को निनादित करता हुआ गरजने लगा और युद्ध की इच्छा से अस्त्र-शस्त्रों को धारणकर निकल पड़ा ॥ ३५-३७१/२ ॥ तब (युद्ध के लिये उसको गमनोद्यत जानकर) अमात्यों ने असुरराज सिन्दूर को प्रणाम करके कहा — हे दैत्यपालक ! सैनिकों और अमात्यों के रहते हुए आप कैसे युद्ध के लिये प्रस्थान कर रहे हैं? आपके प्रताप से तो हम लोग ही उसका वध कर देंगे। जिसके लिये विशाल सेना संरक्षित की जाती है, वह अवसर आ पहुँचा है । हे महाप्रभो ! हम लोग तो आपके लिये प्राणों को भी त्याग सकते हैं । अब आप हमें आज्ञा दीजिये, हम आपके शत्रु उस बालक का वध करने के लिये जा रहे हैं ॥ ३८-४०१/२ ॥ सिन्दूर बोला — मैं [ अकेला ही] जा रहा हूँ। [आप लोग और] सभी सैनिक मेरे पराक्रम का अवलोकन करें। ऐसा कहकर बालक का वध करने के लिये उत्सुक होकर वह तत्काल चल पड़ा और जहाँ बालरूप गजानन स्थित थे, वहाँ क्षणभर में जा पहुँचा ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘सिन्दूरनिर्गम’ नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३६ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe