श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-137
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय
युद्धभूमि में गजानन का सिन्दूर को मारकर उसके रक्त का अपने शरीर में लेपन करना और देवताओं, ऋषियों तथा राजाओं का वहाँ आकर गजानन का पूजन-स्तवनादि करना
अथः सप्तत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः
वरेण्योपदेश

ब्रह्माजी बोले —  बालक गजानन को देखकर अहंकार से उन्मत्त सिन्दूर कहने लगा — ‘अरे मन्द ! तुझ बालक के साथ युद्ध करने में मुझे लज्जा आ रही है। बालक! तुम तत्काल घर चले जाओ और प्रीतिपूर्वक माता का स्तनपान करो। व्यर्थ में ही मेरी बाणवर्षा से इस समय क्यों मरना चाहते हो ? अरे! मुझे देखकर तो ब्रह्मा, शिव आदि देवगण भी भाग खड़े होते हैं । हे किशोर ! अगर तुम मर जाओगे तो स्नेहवश तुम्हारे माता-पिता भी मर जायँगे। मेरे तलघात से तो यह ब्रह्माण्ड भी सैकड़ों टुकड़े हो जाता है, इसलिये चले जाओ, मुझे अपना मुख मत दिखलाओ ॥ १-४ ॥

गजाननदेव बोले —  अरे दुष्ट ! तूने सत्य ही कहा है, परंतु मन में कुछ विचार नहीं किया। मेरे सामर्थ्य और नानाविध स्वरूपों को भी तू जान नहीं सका। मेरी क्रुद्ध दृष्टि के पड़ते ही सुरनायक अर्थात् ब्रह्मा, इन्द्रादि देवगण भी पदच्युत हो जाते हैं । [सत्त्वादि] तीनों भावों (गुणों) – को स्वेच्छा से ग्रहणकर मैं ही समस्त स्थावर-जंगमात्मक विश्व की रचना, [पालन] तथा संहार करता हूँ और प्रत्येक युग में नानाविध स्वरूपों को ग्रहण करके दुष्टविनाश के द्वारा अत्यन्त भीषण भूमिभार को नष्ट करता हूँ ॥ ५–७ ॥ यदि पराक्रमी व्यक्ति लघु [आकारवाला] हो, तो भी उसे लघु मानना अनुचित है, वह लघु प्रभाव वाला नहीं होता, जैसे अग्नि की चिनगारी अणुवत् हो करके भी विशाल नगर को सम्पूर्णतः जला सकती है ॥ ८ ॥ अगर तुम्हें जीने की अभिलाषा है, तो मुझे प्रणाम करो और अपने घर चले जाओ; [ क्योंकि] मानी पुरुष कभी भी प्रणत शरणागत का वध नहीं करते ॥ ९ ॥

यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुमको मेरे शस्त्रप्रहार से [मरकर] स्वर्गलोक जाना पड़ेगा। तुम्हारे मरने पर यह जो तुमसे पीड़ित जगत् है, वह सुखी हो जायगा ॥ १० ॥ दैत्यराज! ब्रह्माजी से प्राप्त वरदान के कारण अहंकार मत करो; क्योंकि [विपरीत समय के आने पर ] सब कुछ विपरीत हो जाता है और यह विपरीतता पहले भी देखी गयी है। काल के प्रभाववश विभु नृसिंह ने खम्भे से अवतीर्ण होकर हिरण्यकशिपु का संहार किया था और राम का आश्रय लेकर सुग्रीव ने अपने भाई बालि का वध किया था ॥ ११-१२ ॥ यह तो काल का ही प्रभाव है कि इस समय तुम्हारी बुद्धि भी विपरीत हो चली है । यद्यपि तुम अतिस्थूल अर्थात् बल-बुद्धि आदि से प्रबल हो तथापि मुझे अतिलघु अर्थात् नितान्त तुच्छ प्रतीत हो रहे हो । अब धैर्य धारणकर और लज्जा [- का त्याग] करके मेरे साथ तुम युद्ध करो ॥ १३१/२

ब्रह्माजी बोले —  इस प्रकार कहकर गजानन ने तत्काल ही विराट्रूप धारण कर लिया। तब उनका मस्तक ब्रह्माण्ड से ऊपर चला गया, चरणयुगल सातों पातालों को भेदकर नीचे चले गये और कान दिशाओं के पार तक जा पहुँचे। जब दैत्य ने बालक गजानन को देखा तो वे उसको विश्वरूप दीख पड़े ॥ १४-१५१/२

हजारों मस्तकों और नेत्रों से युक्त, पृथिवीतल से स्वर्गपर्यन्त व्याप्त हजारों चरणों वाले, शीघ्र ही दसों दिशाओं को व्याप्त करके स्थित, दिव्य वस्त्र, गन्ध और अलंकारों से विभूषित असंख्य सूर्यों के सदृश दीप्ति वाले तथा असंख्य रूपों से युक्त उन विभु गजानन के विराट् रूप को देखकर दैत्य का हृदय काँप उठा ॥ १६-१८ ॥ तदुपरान्त धैर्य धारणकर दैत्य सिन्दूर गजाननदेव के समीप पुनः जा पहुँचा और दिशाओं-विदिशाओं तथा आकाश को निनादित करता हुआ गरजने लगा। उसने एकाएक खड्ग उठाकर गजाननदेव को मारना चाहा और क्रोध में भरकर उनकी ओर वैसे ही दौड़ा, जैसे पतिंगा अग्नि की ओर भागता है ॥ १९-२० ॥

[तब गजाननदेव ने कहा—] ‘यह मूढ़ मेरे दुर्लभ स्वरूप को नहीं जान पा रहा है, अतः मैं ही अब इसको मोक्ष प्रदान करता हूँ’ ऐसा कहकर गजाननदेव ने सिन्दूर का गला पकड़ लिया और उस बलिष्ठ दैत्य को अपने हाथों से मसल डाला। तत्पश्चात् उसके अरुण रुधिर का अपने शरीर में लेपन कर लिया। उसी समय से भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले भगवान् गजानन ‘सिन्दूरवदन, सिन्दूरप्रिय’ इत्यादि नामों से भूतल पर प्रसिद्ध हुए ॥ २१–२३ ॥

सिन्दूर का वध हो जाने पर देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक [गजाननपर] पुष्पों की वर्षा की और विजय वाद्य बजाये तथा अप्सराओं ने नृत्य किया ॥ २४ ॥ इसके पश्चात् वहाँ पर हाथों में उपहार लेकर और आपकी जय हो, आपको नमस्कार है – इत्यादि विजय- प्रणामादिसूचक शब्दों के उच्चारण से दसों दिशाओं को भरते हुए वसिष्ठ आदि मुनिगण तथा इन्द्रको आगे करके ब्रह्मा आदि सभी देवगण उपस्थित हुए ॥ २५१/२

तदुपरान्त वहाँ पर प्रसन्नतापूर्वक सभी राजागण आये और उन्होंने सभी अलंकारों से विभूषित, चार भुजाओं वाले, दिव्य गन्धवस्त्रादि से सुशोभित, ऐश्वर्यसम्पन्न उन मूषकवाहन गजानन की षोडशोपचार विधि से अर्चना की ॥ २६–२७१/२

इन्द्रादि देवताओं ने गजानन से प्रार्थना की कि [हे देव!] हम लोग आपका स्तवन करने में सक्षम नहीं हैं; क्योंकि आपका निरूपण अथवा स्तवन करने में तो चारों वेद, ब्रह्मादि देवश्रेष्ठ तथा श्रेष्ठ मुनिजन भी कुण्ठित (असमर्थ) हो जाते हैं ॥ २८१/२

[हे प्रभो!] आप ही कर्ता हैं और कारण, कार्य, रक्षक, पोषक तथा संहारक भी आप ही हैं। आप ही लोक को कभी मोहमुग्ध करते हैं और कभी उसे ज्ञानोपदेश से कृतकृत्य भी करते हैं । हे देव ! सरिताएँ, सागर, वृक्ष, पर्वत, समस्त पशुगण, वायु, आकाश, पृथ्वी, अग्नि तथा जल आप ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, मरुद्गण, मुनिगण, गन्धर्व, चारण, सिद्ध, यक्ष, किन्नर, राक्षस, सर्प, अप्सराएँ – यह समस्त चराचर जगत् आपका ही स्वरूप है ॥ २९-३२ ॥ हे देव! हम लोग धन्य हैं; क्योंकि हमने मोक्षाधिष्ठान आपका प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया है। इस सिन्दूर के मारे जाने से हम सभी देवगण सुखी हो गये हैं और राजागण, मुनिगण एवं समस्त प्रजाजन प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने दायित्व के सम्पादन में निरत हो गये हैं । अब स्वाहाकार,  स्वधाकार तथा वषट्कार से सम्बद्ध धर्मकृत्य सम्पन्न होंगे ॥ ३३-३४ ॥ आप नानाविध अवतार ग्रहण करके [संसार की ] रक्षा, विशेष रूप से दुष्टों का संहार एवं तत्काल ही भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करते हैं ॥ ३५ ॥

ब्रह्माजी ने कहा —  उन सभी देवताओं ने गजानन से इस प्रकार प्रार्थना करने के अनन्तर सुन्दर शिखर से युक्त एक प्रासाद (देवमन्दिर)- ) – का निर्माण कराया और उसमें गजाननदेव (-की मूर्ति ) – को स्थापित किया, जिसके दर्शनमात्र से लोग पापों से छूट जाते हैं और जिसके स्मरण के प्रभाव से मनुष्य अपनी सात पीढ़ियों का उद्धार कर देता है ॥ ३६-३७ ॥ [सर्वप्रथम] उस [गजानन – विग्रह ] -का पूजन- वन्दन करके देवताओं ने परितृप्ति का अनुभव किया। इसके उपरान्त मुनिजनों ने परम आदर के सहित उन गजानन की अर्चना की। भगवान् गजानन ने सिन्दूर दैत्य का वध किया था, इसलिये मुनिजनों ने ‘सिन्दूरहा’ (सिन्दूर को मारने वाला) – ऐसा उन गणपति का नामकरण किया और उन्हें प्रणाम करके परम सन्तुष्टिपूर्वक वे अपने-अपने आश्रमों को चले गये ॥ ३८-३९ ॥

इसके उपरान्त समस्त श्रेष्ठ नरेशों ने भक्तिभाव से गजाननदेव को प्रणाम किया और उन परमात्मा का नानाविध पूजाद्रव्यों के द्वारा अनेक बार अर्चन किया । [ उसी समय से] वह क्षेत्र ‘राजसदन ‘ [^1]  इस नाम से प्रसिद्ध हो गया। जब महाराज वरेण्य ने उन्हें (गजानन को) देखा तो वे जान गये कि यह मेरा ही पुत्र है। [ वे कहने लगे — ] हे नाथ! आपने लोक के लिये कण्टकस्वरूप इस परम दारुण दैत्य सिन्दूर का शीघ्रता से वध करके राजाओं को उनके पद [पुनः] प्रदान किये हैं, इसलिये आपका ‘दैत्यविमर्दन’ नाम प्रसिद्धि को प्राप्त करेगा ॥ ४०–४२१/२

तदुपरान्त राजा वरेण्य ने प्रकट हुए पराक्रम वाले अपने पुत्र गजानन की स्नेहपूर्वक अर्चना की। वात्सल्यवश उनके नेत्रों से अश्रुपात होने लगा। वे कुछ भी बोल पाने में समर्थ न हो सके। उनका गला भर आया और वे अत्यन्त व्यथित होकर रुदन करने लगे ॥ ४३-४४ ॥

वरेण्य ने कहा — जिन आपकी पूजा करने के लिये ब्रह्मा, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता उपस्थित हुए थे, उन आपको मूढ़तावश मुझ पापी ने विघ्नों के भय से त्याग दिया। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक आपको मैं समझ नहीं सका। जिस प्रकार कामधेनु, [दिव्य] निधि तथा कल्पवृक्ष को कोई मूढ़ व्यक्ति त्याग दे, वैसे ही आपकी माया से मोहित होकर मैंने आपको अपने भवन से बाहर फेंकवा दिया था ॥ ४५–४६१/२

ब्रह्माजी बोले — राजा की ऐसी शोकपूर्ण वाणी को सुनकर कृपापरवश हुए परमेश्वर गजानन ने अपनी चारों भुजाओं से आदरपूर्वक उन वरेण्य का आलिंगन किया और परम भक्तिभाव से सम्पन्न राजा वरेण्य से वे विभु कहने लगे —  ॥ ४७-४८ ॥

गजाननदेव ने कहा —  पूर्वकल्प की बात है, किसी सघन वन में आप दोनों (पति-पत्नी) – ने बरगद के सूखे पत्ते खाकर दिव्य सहस्र वर्षपर्यन्त घनघोर तपस्या की थी। तब मैं प्रसन्न हो गया [ और आपके समक्ष आकर कहने लगा — वर माँगो । उस समय ] आप लोगों ने मोहवश मोक्ष न माँगकर, पुत्र की याचना की ॥ ४९-५० ॥ इसीलिये मैं आपके पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुआ ।  मैं स्वरूपतः आकाररहित, साक्षी, अन्तरात्मस्वरूप हूँ, अतः मेरा शरीर धारण किस प्रकार सम्भव है? मुझे सिन्दूर का वध, सत्पुरुषों का रक्षण तथा भूभार का हरण [आपको दिये गये अपने] वचन को सत्य सिद्ध किया करना था, इसी कारण से मैंने शरीर धारण किया था। मैंने और [सिन्दूर आदि दैत्यों को मारकर ] त्रिलोकी को सन्तुष्ट भी कर दिया। अब मैं स्वधामगमन करूँगा, तुम्हें मन में शोक नहीं करना चाहिये ॥ ५१-५२१/२

वरेण्य बोले — हे दु:खहन् ! संसार में बहुत-से दुःख दीखते हैं, जो सहन करने योग्य नहीं हैं। अतएव इस समय आप कृपापूर्वक मुझे मोक्षमार्ग का उपदेश कीजिये। हे द्विरदानन ! आपका साक्षात्कार हो जाने के बाद बन्धन कैसे हो सकता है? आप मुझको उस योग का उपदेश कीजिये, जिसके माध्यम से मैं काम, क्रोध, मरण-भय आदि से परे हो सकूँ और मोक्ष की प्राप्ति कर सकूँ ॥ ५३–५५ ॥

ब्रह्माजी बोले — राजा की ऐसी बात सुनकर भगवान् गजानन ने कृपापूर्वक उनको अपने आसन पर बैठा लिया और [राजा के] मस्तक पर अपना हाथ रखा ॥ ५६ ॥ गजानन ने राजा के समस्त संशयों को विनष्टकर उन्हें अपना विश्वरूप दिखलाया और गणेशगीता का उपदेश किया । ‘भगवान् गणपति के उपदेश के प्रभाव से राजा ने गणेशगीता के वास्तविक तात्पर्य को अधिगत किया और मन्त्रियों के ऊपर राज्यशासन का भार रखकर तपस्या के लिये वन चले आये ॥ ५७-५८ ॥ परम वैराग्य से संयुक्त महाभाग वरेण्य अन्य विषयों से चित्त को हटाकर निरन्तर गणेशगीता का ही पारायण तथा उन गजानन का ध्यान करते रहते थे। जिस प्रकार जल में डाला गया जल जल ही हो जाता है, वैसे ही गजानन का ध्यान करते-करते वे भी तद्रूप अर्थात् गणपतिस्वरूप बन गये थे ॥ ५९-६० ॥

मुनि बोले — हे देवेश ! हे चतुरानन! समस्त अज्ञान का ध्वंस करने वाली उस गणेशगीता का उपदेश परम कृपापूर्वक मुझे भी कीजिये ॥ ६१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड के अन्तर्गत ‘वरेण्योपदेश’ नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥

[^1]: यह स्थान महाराष्ट्र प्रान्त के जालना जिले में स्थित है। भगवान् गणपति का यह पूर्ण पीठ माना जाता है। इन्हें यहाँ ‘वरेण्यपुत्र गणपति’ कहा जाता है।

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