श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-007
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सातवाँ अध्याय
वसिष्ठ आदि ऋषियों का बालक महोत्कट का दर्शन करने के लिये कश्यपजी के आश्रम में आना, विरजा राक्षसी द्वारा बालक महोत्कट का अपहरण, बालक का विरजा राक्षसी का उद्धार कर अपने धाम भेजना, कश्यप द्वारा अदिति को बालक की रक्षा करते रहने का आदेश देना
अथः सप्तमोऽध्यायः
विरजाराक्षसीमोक्षणं

ब्रह्माजी बोले — महोत्कट नामक पुत्र के जन्म का समाचार सुनकर वसिष्ठ, वामदेव आदि मुनिगण उसके दर्शन के लिये वहाँ आये। वे महर्षि कश्यप के घर में गये । कश्यप ने आसन, पाद्यजल तथा अर्घ्य देकर उनकी पूजा की और दक्षिणा तथा गौ प्रदान की ॥ १-२ ॥

तदनन्तर महर्षि कश्यप दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे — ‘आज मैं धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरी तपस्या सफल हो गयी, जो कि इन्द्र तथा विष्णु द्वारा पूज्य आपके चरणकमलों का मुझे दर्शन हुआ है। हे तपोधनो! क्या मैं आप लोगों के आगमन का हेतु जान सकता हूँ?’ तब उन मुनियों में सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने उन मुनि कश्यप से कहा ॥ ३-४ ॥

वसिष्ठ बोले — हे ब्रह्मन् ! हम लोगों ने देवर्षि नारदजी के मुख से सुना है कि आपको ‘महोत्कट’ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई है। उसके दर्शन के लिये ही हम लोग आपके पास आये हैं, इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा प्रयोजन नहीं है ॥ ५ ॥

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर देवी अदिति शीघ्र ही उस बालक को देखने के लिये उनके पास ले आयीं। तब वसिष्ठ उन मुनि कश्यप से बोले — ‘यह महोत्कट उत्कट कर्मों को करेगा। ये बत्तीस शुभ लक्षणों से युक्त महान् तेजस्वी परमात्मा विनायक ही तुम्हारे पुत्ररूप में अवतीर्ण हुए हैं। इसीलिये इसके दोनों चरणतल रक्तवर्ण के हैं और ध्वज तथा अंकुश के चिह्न से समन्वित हैं ॥ ६-७१/२

हे महामुने! इसके समक्ष अनेक विघ्न उपस्थित होंगे, किंतु वे सब विनष्ट हो जायँगे । तथापि इस बालक की प्रत्येक क्षण रक्षा करनी चाहिये’ ॥ ८१/२

तदनन्तर महर्षि वसिष्ठ ने उन कश्यपनन्दन गणेश की भलीभाँति पूजा की और सभी ऋषियों के साथ उनसे प्रार्थना की कि आप पृथ्वी के भार को दूर करें, हे देव! आप सज्जनों की रक्षा एवं दुष्ट दानवों का विनाश करें ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर सभी मुनिगण उसे प्रणामकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। तब वह बालक ‘कश्यपनन्दन’ इस नाम से प्रसिद्ध हो गया ॥ ११ ॥

एक दिन की बात है, प्रातःकाल के समय जब मुनि कश्यप स्नान के लिये गये तो माता अदिति ने अपने पुत्र को बाहर सुला दिया और वे अपने घर के अन्दर चली आयीं ॥ १२ ॥ वे यज्ञ के लिये सामग्रियों को एकत्र करने में लग गयीं। उसी समय एक निशाचरी वहाँ आ पहुँची । उसका नाम विरजा था। उसके मुख तथा नेत्र अत्यन्त विशाल थे, हल के समान उसके दाँत थे, गुफा के समान नासिका थी; वह अपने पैरों से पर्वतों को भी चूर-चूर बना देने वाली थी, उसके स्तन अत्यन्त दीर्घ थे, जिह्वा लपलपा रही थी। उसका भगप्रदेश गोपुर के समान विशाल था । उस सब कुछ भक्षण करने वाली उस भूखी निशाचरी ने बालक को पकड़ लिया और पके हुए केले के फल के समान शीघ्र ही उसका भक्षण कर गयी ॥ १३-१५ ॥ फिर वह धीरे से आकाश की ओर चली गयी तथा पानी पीने के लिये जमीन पर आयी। उसने बहुत सारा जल पिया, फिर वह विशाल उदरवाली निशाचरी भूमि पर गिर पड़ी। उस समय वह उसी प्रकार महान् मूर्च्छा को प्राप्त हो गयी, जैसे कि सर्प का डँसा हुआ व्यक्ति मूर्च्छित हो जाता है। वह महान् उदरपीड़ा से युक्त स्त्री की भाँति भूमि पर लोटने लगी ॥ १६-१७ ॥

‘छोड़ो-छोड़ो’ इस प्रकार से कहती हुई वह निशाचरी एक पग चलने में भी असमर्थ हो गयी। हाहाकार करती हुई वह अपनी छाती, सिर तथा मुख पीटने लगी ॥ १८ ॥ तदनन्तर कश्यपनन्दन वह बालक गणेश उसके शरीर के अन्दर रहकर ही बढ़ने लगा और उसके उदर को चीरकर उसके वक्ष पर बैठ गया ॥ १९ ॥ जिस प्रकार जाल को फाड़कर महान् मत्स्य बाहर निकल आता है, उसी प्रकार बालक गणेश उस निशाचरी के उदर को चीरकर बाहर निकला। तब उस दुष्ट निशाचरी ने महान् चीत्कार करते हुए प्राणों का परित्याग कर दिया। गिरते हुए उसके शरीर ने पाँच योजन दूर तक के वृक्षों को धराशायी कर दिया। उस विरजा निशाचरी को बालक गणेश ने पवित्र बनाकर अपने धाम भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ ज्ञान देनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले कृपासिन्धु जगदीश्वर के द्वारा दर्शन दिये जाने पर तथा उनके द्वारा स्पर्श किये जाने पर मनुष्यों का इस संसार सागर में पुनरागमन कैसे हो सकता है? ॥ २२ ॥

इधर अपने घर के कार्यों को पूरा करके जब अदिति बाहर आयीं तो उन्होंने बालक को नहीं देखा, तब वे अत्यन्त रुदन करने लगीं। उन्होंने घर-घर में जाकर देखा, लेकिन कहीं भी बालक को नहीं पाया। तब वे हाहाकार करती हुई भूमि पर गिर पड़ीं ॥ २३-२४ ॥ उनके उच्च स्वर के रुदन को सुनकर अन्य स्त्रियाँ भी रोने लगीं। सभी लोग आश्चर्यचकित और भयभीत हो गये। अदिति का मुख सूख गया, दीन होकर वे बार-बार विलाप करने लगीं। वे अपने मुख तथा आँसुओं से पूरित काजल लगे हुए अपने नेत्रों को पोंछने लगीं ॥ २५-२६ ॥

[वे बोल उठीं—] कल्पवृक्ष के समान [मुझे] प्राप्त हुए मेरे बालक का किसने हरण कर लिया है, क्या जगदीश्वर का दिया गया वरदान कभी व्यर्थ हो सकता है? भगवान् गणेशजी द्वारा दी गयी मेरी निधि को किस दुरात्मा ने चुरा लिया, विज्ञानरूपी समुद्र को पाकर भी मैं आज कैसे अत्यन्त मूर्ख हो गयी हूँ?  सुवर्ण के पर्वत को पाकर भी आज मैं कैसी दरिद्र हो गयी हूँ? ॥ २७-२८१/२

इस प्रकार विलाप करती हुई वे अदिति अपनी छाती, सिर तथा मुख को पीटने लगीं ॥ २९ ॥ वे अपने आश्रम से बाहर आ गयीं तथा एक कोश की दूरी पर उन्होंने एक निशाचरी को भूमि पर पड़ी हुई देखा और यह भी देखा कि उस निशाचरी के वक्ष पर वह बालक बैठा हुआ है ॥ ३० ॥ वह क्रीडा कर रहा था, उसके मुख-मण्डल पर मुसकान छायी थी, वह जगे हुए [दुग्ध] कामी [शिशु]-की भाँति प्रतीत हो रहा था, अदिति ने दौड़कर उस बालक को उठाया और उसको अपनी छाती से लगाकर उसे चूमने लगीं। आनन्द में निमग्न होकर वे बोल पड़ीं   ‘आज मेरा महान् सौभाग्य है, जो दैवयोग से इस राक्षसी के भय से यह बालक मुक्त हो गया’ ॥ ३१-३२ ॥

उस बालकसहित स्वयं भी स्नान करके वे अपने आश्रम-परिसर में आयीं और सम्पूर्ण वृत्तान्त कश्यपजी को बतलाया, वह सब सुनकर वे मुनि बोले ॥ ३३ ॥

हे प्रिये ! भूत और भविष्य की विशेष जानकारी रखने वाले मुनियों ने जो भी कहा है, उनके आशीर्वादपूर्ण वचनों से वह सब आज सत्य हुआ है। सब कुछ भक्षण कर जाने वाली उस निशाचरी से यह बालक किसी जन्मान्तरीय पुण्य के फलस्वरूप ही जीवित बचा है ॥ ३४१/२

तदुपरान्त इस निमित्त कश्यपमुनि ने बालक का रक्षाविधान किया और अनेक प्रकार के दान दिये ॥ ३५ ॥ बालक के निमित्त स्वस्तिवाचनपूर्वक शान्ति-पाठ करवाया और अदिति को यह भी बताया कि क्षणभरके लिये भी इस बालक को अकेला नहीं छोड़ना ॥ ३६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘विरजा राक्षसी-मोक्षण’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

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