श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-14
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-चतुर्दशोऽध्यायः
चौदहवाँ अध्याय
लोकालोक पर्वत का वर्णन
सूर्यगतिवर्णनम्

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] उसके आगे लोकालोक नामक पर्वत है, जो प्रकाशित तथा अप्रकाशित — दो प्रकार के लोकों का विभाग करने के लिये उनके मध्य में स्थित है ॥ १ ॥ हे देवर्षे! मानसोत्तर पर्वत से लेकर सुमेरु पर्वत तक जितना अन्तर है, उतनी भूमि सुवर्णमयी तथा दर्पण के समान स्वच्छ है। वह भूमि सर्वसाधारण प्राणियों से रहित है। इसमें गिरी हुई कोई वस्तु फिर नहीं मिलती। अतः हे नारद! वह भूमि [ देवताओं के अतिरिक्त] सभी प्राणि समुदाय से रहित है। इस पर्वत को लोकालोक जो कहा गया है, वह इसीलिये; क्योंकि यह सूर्य से प्रकाशित तथा अप्रकाशित दो भागों के मध्य स्थित है ॥ २-४१/२

भगवान् ने त्रिलोकी की सीमा निर्धारित करने के लिये उस पर्वत का निर्माण किया है । हे नारद! सूर्य आदि से लेकर ध्रुवपर्यन्त सभी ग्रहों की किरणें उसके अधीन होने के कारण उसके एक ओर से तीनों लोकों को प्रकाशित करती हैं और दूसरी ओर के लोक प्रकाशित नहीं हो पाते ॥ ५-६१/२

यह अति विशाल पर्वतराज जितना ऊँचा है, उतना ही विस्तृत है। लोकों का विस्तार इतना ही है गणितशास्त्र विद्वानों ने स्थिति, मान और लक्षण के अनुसार सम्पूर्ण भूगोल का परिमाण पचास करोड़ योजन निश्चित किया है। हे मुने! उस भूगोल का चौथाई भाग (साढ़े बारह करोड़ योजन) केवल यह लोकालोक पर्वत ही है । उसके ऊपर चारों दिशाओं में स्वयम्भू ब्रह्माजी ने जिन चार दिग्गजों को नियुक्त किया है, उनके नाम हैं — ऋषभ, पुष्पचूड, वामन और अपराजित । इन दिग्गजों को समस्त लोकों की स्थिति का कारण कहा गया है ॥ ७–१०१/२

भगवान् श्रीहरि उन दिग्गजों तथा अपनी विभूतिस्वरूप इन्द्र आदि लोकपालों की विविध शक्तियों के विकास और उनमें विशुद्ध गुण तथा ऐश्वर्य की वृद्धि करने के उद्देश्य से आठों सिद्धियोंसहित विष्वक्सेन आदि पार्षदों से घिरे हुए सदा उस लोकालोक पर्वत पर विराजमान रहते हैं। सम्पूर्ण लोक के कल्याण के लिये चारों भुजाओं में अपने शंख, चक्र, गदा तथा पद्म — इन आयुधों से सुशोभित होते हुए भगवान् श्रीहरि वहाँ सर्वत्र विराजमान हैं। अपने मायारचित इस जगत् की रक्षा के लिये स्वयं साधनस्वरूप वे सनातन भगवान् अपने लीलामयरूप से ऐसे वेष को धारण किये वहाँ कल्पपर्यन्त प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ११-१४ ॥ लोकालोक पर्वत के अन्तर्वर्ती भाग का जो विस्तार कहा गया है, इसी से उसके दूसरी ओर के अलोक प्रदेश के परिमाण की व्याख्या समझ लेनी चाहिये । विद्वान् लोग कहते हैं कि उसके आगे योगेश्वरों की ही विशुद्ध गति सम्भव है। पृथ्वी तथा स्वर्ग के बीच में जो ब्रह्माण्ड का केन्द्र है, वही सूर्य की स्थिति है। सूर्य तथा ब्रह्माण्ड गोलक के बीच सभी ओर पचीस करोड़ योजन की दूरी है। इस मृत ब्रह्माण्ड में सूर्य के विराजमान रहने के कारण इनका नाम ‘मार्तण्ड’ पड़ा और हिरण्यमय ब्रह्माण्ड से उत्पन्न होने के कारण इन्हें ‘हिरण्यगर्भ’ कहा जाता है ॥ १५–१७१/२

दिशा, आकाश, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, स्वर्ग, अपवर्ग, नरक और पाताल — इन सभी का भलीभाँति विभाजन सूर्य के ही द्वारा किया जाता है । देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य, रेंगकर चलने वाले जन्तुओं, वृक्ष तथा अन्य सभी प्रकार के जीव समूहों की आत्मा सूर्य ही हैं । ये नेत्रेन्द्रिय के स्वामी हैं । हे नारद! भूमण्डल का इतना ही विस्तार कहा गया है। इस विषय के जानकार लोग इसी के द्वारा स्वर्गलोक का भी विस्तार बतलाते हैं, जैसे कि चना मटर आदि के दो दलों में से एक का स्वरूप जान लेने पर दूसरे का अनुमान कर लिया जाता है ॥ १८–२१ ॥ उन द्युलोक तथा पृथ्वीलोक के मध्य में अन्तरिक्ष स्थित है । अन्तरिक्ष उन दोनों का सन्धिस्थान है । इसके मध्य में स्थित रहकर तपने वाले ग्रहों में श्रेष्ठ भगवान् सूर्य चमकते हुए अपनी ऊष्मा से तीनों लोकों को प्रतप्त करते हैं ॥ २२१/२

उत्तरायण होने पर सूर्य मन्दगति से चलने लगते हैं। उत्तरायण उनका आरोहण स्थान है, जहाँ पहुँचने पर दिन में वृद्धि होने लगती है । दक्षिणायन की स्थिति प्राप्त करके वे तीव्र गति धारण कर लेते हैं । दक्षिणायन उनका अवरोह स्थान है, जिस पर सूर्य के चलने पर दिन छोटा होने लगता है ॥ २३-२४१/२

विषुवत् नामक स्थान पर पहुँचने पर सूर्य की गति में समानता आ जाती है। इस समस्थान पर सूर्य के आने पर दिन के परिमाण में समानता आ जाती है। जब वेदस्वरूप भगवान् सूर्य मेष और तुला राशि पर संचरण करते हैं, तब दिन और रात समान होने लगते हैं। जब सूर्य वृष आदि पाँच राशियों पर होते हैं, तब दिन बढ़ने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं । इसी प्रकार जब सूर्य वृश्चिक आदि पाँच राशियों पर गति करते हैं, तब दिन और रात में इसके विपरीत परिवर्तन होते हैं ॥ २५–२९ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिताके अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘सूर्यगतिवर्णन’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥

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