श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-नवमः स्कन्धः-अध्याय-40
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-नवमः स्कन्धः-चत्वारिंशोऽध्यायः
चालीसवाँ अध्याय
दुर्वासा के शाप से इन्द्र का श्रीहीन हो जाना
लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनम्

नारदजी बोले — [हे भगवन्!] वे श्रेष्ठ महालक्ष्मी भगवान् नारायण की प्रिया होकर वैकुण्ठ में निवास करती हैं। वे सनातनी भगवती वैकुण्ठ की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे महालक्ष्मी पूर्व काल में पृथ्वीलोक में सिन्धु की पुत्री कैसे बनीं और सर्वप्रथम किसके द्वारा उनकी स्तुति की गयी, वह सब मुझे बताइये ॥ १-२ ॥

श्रीनारायण बोले — हे नारद! पूर्व काल में दुर्वासा के शाप के कारण इन्द्र श्रीविहीन हो गये थे और सम्पूर्ण देवसमुदाय मृत्युलोक में भटकने लगा । हे नारद ! तब कुपित लक्ष्मी ने स्वर्ग का परित्याग करके अत्यन्त दुःखित हो वैकुण्ठलोक पहुँचकर वहाँ महालक्ष्मी में अपने को विलीन कर दिया ॥ ३-४ ॥ उस समय शोक से संतप्त सभी देवता ब्रह्मा की सभा में गये और वहाँ से ब्रह्माजी को आगे करके वैकुण्ठलोक को गये। वहाँ पर सभी देवताओं ने भगवान् नारायण श्रीविष्णु की शरण ग्रहण की। उस समय अत्यन्त दीनतायुक्त सभी देवताओं के कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे ॥ ५-६ ॥

तब पुराणपुरुष भगवान् श्रीहरि की आज्ञा से वे सर्वसम्पत्तिस्वरूपा लक्ष्मी अपनी कला से सिन्धु की कन्या हुई थीं । उस समय सभी देवताओं ने दैत्यों के साथ मिलकर समुद्रमन्थन करके महालक्ष्मी की प्राप्ति की थी।  भगवान् विष्णु ने महालक्ष्मी को प्रेमपूर्वक देखा । तब प्रसन्नतायुक्त मुखमण्डलवाली परम सन्तुष्ट भगवती महालक्ष्मीने देवता आदि को वर प्रदान करके क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान् श्रीविष्णु को वनमाला अर्पित कर दी ॥ ७–९ ॥ हे नारद! देवताओं ने असुरों के द्वारा अपहृत किया गया अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात् देवता उन भगवती महालक्ष्मी की भलीभाँति पूजा करके वे सब प्रकार से विपत्तिरहित हो गये ॥ १० ॥

नारदजी बोले — हे ब्रह्मन् ! पूर्वकाल में ब्रह्मनिष्ठ तथा तत्त्वज्ञानी मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ने कब, क्यों और किस अपराध के कारण इन्द्र को शाप दिया था? उन देवता आदि ने किस रूप से समुद्र का मन्थन किया, किस स्तोत्र से प्रसन्न होकर भगवती लक्ष्मी इन्द्र के समक्ष प्रकट हुईं और उन दोनों के बीच क्या संवाद हुआ? हे प्रभो ! यह सब आप मुझे बताइये ॥ ११-१२१/२

श्रीनारायण बोले — [ हे नारद!] प्राचीन काल की बात है — तीनों लोकों के अधिपति इन्द्र मधुपान से प्रमत्त और कामासक्त होकर रम्भा के साथ एकान्त में विहार कर रहे थे। उस कामुकी अप्सरा के साथ क्रीडा करने से उनका मन मोहित हो गया था । इस प्रकार कामदेव से मथित मनवाले वे इन्द्र उसी महावन में स्थित हो गये ॥ १३-१४ ॥ उसी समय इन्द्र ने वैकुण्ठधाम से कैलासपर्वत की ओर जाते हुए महर्षि दुर्वासा को देखा। उनका शरीर ब्रह्मतेज से देदीप्यमान था, ऐश्वर्यसम्पन्न वे ग्रीष्मऋतु के मध्याह्नकालीन हजारों सूर्यो की प्रभा से युक्त थे, उनका अत्यन्त स्वच्छ जटाजूट प्रतप्त सुवर्ण के समान प्रकाशमान था, वे श्वेतवर्ण का यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे, उन्होंने अपने हाथों में चीर, दण्ड तथा कमण्डलु धारण कर रखा था, वे अपने ललाट पर चन्द्रमा के समान प्रतीत होने वाला अत्यन्त उज्ज्वल तिलक धारण किये हुए थे। वेदवेदांग के पारगामी लाखों शिष्य उनके साथ विद्यमान थे ॥ १५-१८ ॥

उन्हें देखकर अति प्रमत्त इन्द्र ने सिर झुकाकर मुनि तथा शिष्यवर्ग को प्रणाम किया और प्रसन्न होकर उनकी स्तुति की। तब शिष्योंसहित मुनि दुर्वासा ने इन्द्र को शुभाशीर्वाद दिया, साथ ही उन्होंने भगवान् विष्णु द्वारा प्रदत्त परम मनोहर पारिजात पुष्प भी उन्हें समर्पित किया ॥ १९-२० ॥ तब बुढ़ापा, रोग, मृत्यु तथा शोक का नाश करने वाले और मोक्ष प्रदान करने वाले उस पुष्प को लेकर राज्यसम्पदा से मदोन्मत्त इन्द्र ने उसे ऐरावत हाथी के मस्तक पर फेंक दिया ॥ २११/२

उस पुष्प का स्पर्श होते ही वह ऐरावत हाथी रूप, गुण, तेज तथा आयु में अकस्मात् भगवान् विष्णु के तुल्य हो गया । तब इन्द्र को छोड़कर वह गजराज घोर वन में चला गया। हे मुने! अपने तेजोबल से सम्पन्न इन्द्र उस ऐरावत को रोक पाने में समर्थ नहीं हो सके ॥ २२-२३१/२

इन्द्र ने उस पुष्प का तिरस्कार किया है — ऐसा जानकर मुनीश्वर दुर्वासा अत्यन्त कुपित हो उठे और रोष में आकर उन्हें शाप देते हुए कहने लगे ॥ २४१/२

मुनि बोले — अरे ! राज्यश्री के अभिमान से प्रमत्त होकर तुम मेरा अपमान क्यों कर रहे हो ? मेरे द्वारा दिये गये पुष्प को तुमने गर्वित होकर हाथी के मस्तक पर फेंक दिया ? श्रीविष्णु को समर्पित किये हुए नैवेद्य, फल अथवा जल के प्राप्त होते ही उनका उपभोग कर लेना चाहिये, उनका त्याग करने से वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है ॥ २५-२६१/२

जो मनुष्य सौभाग्य से प्राप्त हुए भगवान् विष्णु के पावन नैवेद्य का त्याग करता है; वह श्री, बुद्धि तथा राज्य – इन सबसे वंचित हो जाता है ॥ २७१/२

जो भक्त श्रीविष्णु के लिये अर्पित किये गये नैवेद्य को पाते ही उसे ग्रहण कर लेता है, वह अपने सौ पूर्वजों का उद्धार करके स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ २८१/२

जो मनुष्य प्रतिदिन भगवान् श्रीहरि के नैवेद्य को ग्रहण करके उन्हें प्रणाम करता है तथा भक्तिपूर्वक उनका पूजन एवं स्तवन करता है, वह भगवान् विष्णु के समान हो जाता है। हे मूर्ख ! उसका स्पर्श करके चलने वाली वायु का संयोग पाकर तीर्थसमुदाय शीघ्र ही शुद्ध हो जाता है और उसकी चरणरज से पृथ्वी शीघ्र ही पवित्र हो जाती है ॥ २९-३०१/२

भगवान् श्रीहरि को भोग न लगाया हुआ अन्न व्यभिचारिणी स्त्री, पतिपुत्रहीन स्त्री तथा शूद्र के श्राद्धान्न के समान व्यर्थ होता है और वह मांस- भक्षण के समान है ॥ ३११/२

शिवलिंग के लिये अर्पण किया हुआ अन्न, शूद्रों के यहाँ यजन कराने वाले ब्राह्मण के द्वारा प्रदत्त अन्न, चिकित्सावृत्ति में लगे ब्राह्मण का अन्न; देवल, कन्याविक्रयी तथा वेश्याओं की वृत्ति पर आश्रित रहने वाले पुरुषों का अन्न; उच्छिष्ट, बासी तथा सबके भोजन कर लेने पर बचा हुआ अन्न; शूद्रापति द्विज, वृषवाही द्विज, दीक्षाहीन द्विज, शवदाही, अगम्या स्त्री के साथ गमन करने वाले द्विज, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देने वाले और तीर्थप्रतिग्राही ब्राह्मणों का अन्न ग्रहण करने वाले — ये सभी भगवान् विष्णु का नैवेद्य भक्षण करने से शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३२-३६१/२

यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णु की उपासना करता है, तो वह अपनी करोड़ों पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। भगवान् श्रीहरि की भक्ति न करने वाला मनुष्य स्वयं अपनी भी रक्षा करने में असमर्थ रहता है ॥ ३७१/२

यदि कोई मनुष्य अनजान में भी श्रीविष्णु का नैवेद्य ग्रहण कर लेता है, वह अपने सात जन्मों के अर्जित पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। जो ज्ञानपूर्वक भक्ति के साथ भगवान् विष्णु का नैवेद्य ग्रहण करता है, वह तो करोड़ों जन्मों के अर्जित पापों मुक्त हो जाता है — यह निश्चित है । हे इन्द्र ! तुमने जो अभिमानवश इस पारिजात पुष्प को हाथी के मस्तक पर फेंक दिया है, इस अपराध के कारण लक्ष्मीजी तुम लोगों का परित्याग करके भगवान् श्रीहरि के लोक में चली जायँ ॥ ३८–४०१/२

मैं नारायण का भक्त हूँ। मैं देवता, ब्रह्मा, काल, मृत्यु तथा जरा से भी भयभीत नहीं होता तो फिर अन्य किन लोगों की गिनती करूँ। हे इन्द्र ! तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप और गुरु बृहस्पति मुझ निःशंक का क्या कर लेंगे? यह पारिजात पुष्प जिसके सिर पर रहता है, उसी की पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है ॥ ४१-४३ ॥

यह सुनकर देवराज इन्द्र मुनि दुर्वासा चरण पकड़कर शोकसन्तप्त तथा भय से व्याकुल हो उच्च स्वर से रोने लगे और उनसे कहने लगे — ॥ ४४ ॥

महेन्द्र बोले — हे प्रभो ! आपने मुझे अत्यन्त उचित शाप दिया है; क्योंकि यह माया का नाश कर देने वाला है। मैं अपनी अपहृत सम्पत्ति की याचना नहीं कर रहा हूँ, आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश दीजिये । [ क्योंकि यह लौकिक ] ऐश्वर्य समस्त विपत्तियों का बीजस्वरूप है, ज्ञान का आच्छादन कर देने वाला है, मुक्तिमार्ग का कुठार है तथा भक्ति में व्यवधान उत्पन्न करनेवाला है ॥ ४५-४६ ॥

मुनि बोले — यह ऐश्वर्य जन्म, मृत्यु, जरा, शोक और रोग के बीज का महान् अंकुर है । सम्पत्ति के घोर अन्धकार से अन्धा बना हुआ मानव मुक्ति का मार्ग नहीं देख पाता है ॥ ४७ ॥ हे इन्द्र ! जो मूर्ख सम्पत्ति से उन्मत्त है, उसको वास्तव में मदिरापान से भी प्रमत्त समझना चाहिये। बन्धु-बान्धव उसे बन्धु समझकर सदा घेरे रहते हैं ॥ ४८ ॥ सम्पत्ति के मद में उन्मत्त वह व्यक्ति विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक होकर सात्त्विक मार्ग का अवलोकन नहीं कर पाता है ॥ ४९ ॥ विषयान्ध भी राजस तथा तामस भेद से दो प्रकार का बताया गया है। शास्त्रज्ञान से हीन व्यक्ति को तामस तथा शास्त्रज्ञ को राजस कहा गया है ॥ ५० ॥ हे सुरश्रेष्ठ! शास्त्र भी दो प्रकार के मार्ग दिखलाता है। एक संसृति का हेतु है तथा दूसरा निवृत्ति का कारण कहा गया है ॥ ५१ ॥ पहले प्रवृत्तिबीजरूपी दुःखमय मार्ग पर सभी प्राणी स्वच्छन्द तथा प्रसन्न होकर निर्विरोधभाव से निरन्तर चलते रहते हैं । जैसे मधु के लोभ से भौंरा अत्यन्त सुख मानकर क्लेश के साथ पुष्पों पर आता है, वैसे ही मनुष्य परिणाम में विनाश के बीजस्वरूप तथा जन्म – मृत्यु – जरा के आश्रयस्वरूप इस प्रवृत्तिमार्ग पर अग्रसर होता है ॥ ५२-५३ ॥

प्रसन्नतापूर्वक अनेक जन्मों तक अपने किये कर्म के परिणामस्वरूप नाना प्रकार की योनियों में क्रमशः भ्रमण करने के पश्चात् भगवान् ‌की कृपा से ही सैकड़ों तथा हजारों प्राणियों में से कोई बिरला ही संसारसागर से पार करने वाले सत्संग को प्राप्त कर पाता है ॥ ५४-५५ ॥ जब कोई साधु तत्त्वज्ञानरूपी दीपक से उसे मुक्तिमार्ग दिखा देता है, तब संसारबन्धन को तोड़ने के लिये जीव प्रयत्न करने लगता है । अनेक जन्मों में किये गये तप तथा उपवास से जब मानव का पुण्योदय होता है, तब वह निर्विघ्न तथा परम सुखप्रद मुक्तिमार्ग को प्राप्त कर पाता है । हे इन्द्र ! तुम जो बात पूछ रहे हो, उसे मैंने गुरु के मुख से सुना है ॥ ५६-५७१/२

हे ब्रह्मन्! मुनि दुर्वासा का यह वचन सुनकर देवराज इन्द्र रागरहित हो गये और उनके हृदय में दिनोंदिन वैराग्य की भावना बढ़ने लगी ॥ ५८१/२

तत्पश्चात् मुनि के स्थान से अपने भवन पहुँचकर इन्द्र ने देखा कि अमरावतीपुरी दैत्यों तथा असुरों से भरी हुई है, चारों ओर भय व्याप्त है, सर्वत्र विषमता तथा उपद्रव की स्थिति है, कहीं किसी के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव नहीं थे, कहीं किसी के माता-पिता और स्त्री आदि ने उसका साथ छोड़ दिया है, चारों ओर हलचल मची हुई है तथा सम्पूर्ण नगरी शत्रुओं से पूर्णतया आक्रान्त है । उस अमरावती को इस स्थिति में देखकर इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के पास गये ॥ ५९–६१ ॥ मन्दाकिनी नदी के तट पर पहुँचकर देवराज इन्द्र ने देखा कि गुरुदेव बृहस्पति पूरब की ओर सूर्य के अभिमुख हो गंगाजल में खड़े होकर सर्वतोमुख परब्रह्म परमात्मा का ध्यान कर रहे हैं और पुलकित तथा प्रसन्नतायुक्त उनके नेत्रों से अश्रु गिर रहे हैं । परम श्रेष्ठ, आदरणीय, धर्मनिष्ठ, श्रेष्ठ जनोंद्वारा सेवित, बन्धुवर्गों में अति महान्, ज्ञानियों में श्रेष्ठ, भाई-बन्धुओं में ज्येष्ठ तथा देवशत्रुओं के लिये अनिष्टकारी गुरु बृहस्पति को जप करते हुए देखकर सुरेश्वर इन्द्र वहीं पर स्थित हो गये ॥ ६२–६५ ॥ एक प्रहर के बाद गुरु को ध्यान से उपरत देखकर इन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनके चरणकमल में मस्तक झुकाकर इन्द्र उच्च स्वर से बार – बार विलाप करने लगे। देवराज इन्द्र ने गुरु बृहस्पति से दुर्वासा के द्वारा प्रदत्त शाप आदि से सम्बन्धित सारा वृत्तान्त, वर की उपलब्धि, दुर्वासा से अत्यन्त दुर्लभ ज्ञान की प्राप्ति और शत्रुओं से आक्रान्त अपनी नगरी के विषय में सभी बातें क्रम से कहीं ॥ ६६-६७१/२

अपने शिष्य इन्द्र की बात सुनकर क्रोध से लाल नेत्रोंवाले परम बुद्धिमान् तथा वक्ताओं में श्रेष्ठ बृहस्पति इस प्रकार कहने लगे – ॥ ६८१/२

गुरु बोले — हे सुरश्रेष्ठ! मैंने सब कुछ सुन लिया, मत रोओ, मेरी बात सुनो। नीतिज्ञ पुरुष विपत्तिकाल में कभी भी घबराता नहीं; क्योंकि सम्पत्ति अथवा विपत्ति नश्वर हैं। ये दोनों ही श्रमसाध्य हैं । सम्पत्ति अथवा विपत्ति अपने पूर्व जन्म में किये गये कर्म का फल है और उन्हीं के अधीन होकर कर्ता को स्वयं फल भोगना पड़ता है । सम्पूर्ण प्राणियों के लिये प्रत्येक जन्म में यही स्थिति है, जो चक्रमण्डल की भाँति निरन्तर आती-जाती रहती है, अत: इस विषय में चिन्ता की क्या आवश्यकता है ? ॥ ६९–७११/२

ऐसा कहा गया है कि सम्पूर्ण भारत में अपने द्वारा किये गये कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। शुभ अथवा अशुभ जो कुछ भी कर्म मनुष्य करता है, वह उसे भोगता ही है। सैकड़ों करोड़ों कल्प बीत जाने के बाद भी बिना भोगे हुए कर्मों का क्षय नहीं होता ॥ ७२-७३ ॥ अपने किये हुए शुभाशुभ कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है — ऐसा परमात्मा श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी को सम्बोधित करके सामवेद की शाखा में कहा है । किये हुए सम्पूर्ण कर्मों का भोग शेष रह जाने पर उन प्राणियों का कर्मानुसार भारतवर्ष में अथवा अन्यत्र जन्म होता है ॥ ७४-७५१/२

प्राणी कर्म से ही ब्रह्मशाप, कर्म से ही शुभाशीर्वाद, कर्म से ही महालक्ष्मी और कर्म से ही दरिद्रता प्राप्त करता है। हे पुरन्दर ! करोड़ों जन्मों के संचित कर्म प्राणी के पीछे उसकी छाया की भाँति लगे रहते हैं और बिना भोगे उस प्राणी को नहीं छोड़ते ॥ ७६-७७१/२

काल, देश और पात्र के भेद से कर्मों का न्यूनाधिक भाव हुआ ही करता है । साधारण समय में दान में दी गयी वस्तुओं का साधारण फल होता है। यदि किसी विशेष पुण्य दिन में कोई वस्तु दान में दी जाती है तो उसका फल साधारण दिन की अपेक्षा करोड़ों गुना उससे भी अधिक या असंख्य गुना प्राप्त होता है ॥ ७८-७९१/२

उसी प्रकार हे इन्द्रदेव ! साधारण स्थान में दान में दी गयी वस्तु का साधारण पुण्य होता है, किंतु देशभेद के अनुसार किसी विशेष स्थान में दान का फल करोड़ गुना या उससे भी अधिक असंख्य गुना होता है ॥ ८० ॥ साधारण पात्र को दान करने पर उन वस्तुओं का दान करने वाले को उसका साधारण पुण्य मिलता है, किंतु किसी विशेष पात्र को दान देने से उसकी अपेक्षा सौ गुना या उससे अधिक असंख्य गुना पुण्य होता है ॥ ८११/२

जैसे क्षेत्रभेद से भिन्न-भिन्न खेतों में बीज बोने पर किसानों के लिये कम या अधिक धान्य उत्पन्न होते हैं, वैसे ही पात्रभेद से दान देने पर दाता न्यूनाधिक फल प्राप्त करता है ॥ ८२१/२

सामान्य दिन में ब्राह्मण को दिये गये दान का सामान्य फल होता है, किंतु अमावास्या तथा सूर्यसंक्रान्ति को दान देने से सौ गुना फल होता है और चातुर्मास्य तथा पूर्णिमा तिथि को दिये गये दान का अनन्त फल होता है । चन्द्रग्रहण के अवसर पर दान देने से करोड़ गुना फल प्राप्त होता है तथा सूर्यग्रहण के समय पर दिये गये दान का फल उससे भी दस गुना अधिक होता है। अक्षय तृतीया को दिया गया दान अक्षय होता है और उसका अनन्त फल कहा गया है । इसी प्रकार अन्य पर्वदिनों में भी फलों की अधिकता हो जाती है । जिस प्रकार दान के फल में आधिक्य हो जाता है, उसी प्रकार स्नान, जप तथा अन्य पुण्यकार्यों में भी होता है । मनुष्यों के लिये कर्मफल के विषय में इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये ॥ ८३-८७ ॥ जिस प्रकार पृथ्वीलोक में कुम्भकार दण्ड, चक्र, शराव और भ्रमण के द्वारा मिट्टी से कुम्भ का निर्माण करता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्र से प्राणियों को फल प्रदान करते हैं ॥ ८८ ॥

[ अतः हे देवराज !] जिनकी आज्ञा से इस जगत् की सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायण की आप आराधना कीजिये । वे भगवान् नारायण त्रिलोकी में विधाता के भी विधाता, पालन करने वाले के भी पालक, सृष्टि करने वाले के भी स्रष्टा, संहार करने वाले के भी संहारक और काल के भी काल हैं ॥ ८९-९० ॥ जो मनुष्य इस संसार में घोर विपत्ति के समय में भगवान् मधुसूदन का स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्ति में भी सम्पत्ति उत्पन्न हो जाती है — ऐसा भगवान् शंकर ने कहा है ॥ ॥ ९१ ॥

हे नारद! ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पति ने देवराज इन्द्र को हृदय से लगाकर और शुभाशीर्वाद देकर उन्हें अभीष्ट बात समझा दी ॥ ९२ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत नौवें स्कन्ध का ‘लक्ष्मी की उत्पत्ति का वर्णन’ नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥

श्रीमद्‌देवीभागवत महापुराण
नवमः स्कन्धः चत्वारिंशोऽध्यायः
लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनम्

॥ नारद उवाच ॥
नारायणप्रिया सा च परा वैकुण्ठवासिनी ।
वैकुण्ठाधिष्ठातृदेवी महालक्ष्मीः सनातनी ॥ १ ॥
कथं बभूव सा देवी पृथिव्यां सिन्धुकन्यका ।
पुरा केन स्तुताऽऽदौ सा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
श्रीनारायण उवाच
पुरा दुर्वाससः शापाद्‌ भ्रष्टश्रीश्च पुरन्दरः ।
बभूव देवसङ्‌घश्च मर्त्यलोके हि नारद ॥ ३ ॥
लक्ष्मीः स्वर्गादिकं त्यक्त्वा रुष्टा परमदुःखिता ।
गत्वा लीना तु वैकुण्ठे महालक्ष्मीश्च नारद ॥ ४ ॥
तदा शोकाद्ययुः सर्वे दुःखिता ब्रह्मणः सभाम् ।
ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य ययुर्वैकुण्ठमेव च ॥ ५ ॥
वैकुण्ठे शरणापन्ना देवा नारायणे परे ।
अतीव दैन्ययुक्ताश्च शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ॥ ६ ॥
तदा लक्ष्मीश्च कलया पुराणपुरुषाज्ञया ।
बभूव सिन्धुकन्या सा सर्वसम्पत्स्वरूपिणी ॥ ७ ॥
तथा मथित्वा क्षीरोदं देवा दैत्यगणैः सह ।
सम्प्राप्ताश्च महालक्ष्मीं विष्णुस्तां च ददर्श ह ॥ ८ ॥
सुरादिभ्यो वरं दत्त्वा वनमालां च विष्णवे ।
ददौ प्रसन्नवदना तुष्टा क्षीरोदशायिने ॥ ९ ॥
देवाश्चाप्यसुरग्रस्तं राज्यं प्रापुश्च नारद ।
तां सम्पूज्य च सम्भूय सर्वत्र च निरापदः ॥ १० ॥
नारद उवाच
कथं शशाप दुर्वासा मुनिश्रेष्ठः कदाचन ।
केन दोषेण वा ब्रह्मन् ब्रह्मिष्ठस्तत्त्ववित्पुरा ॥ ११ ॥
ममन्थुः केनरूपेण जलधिं ते सुरादयः ।
केन स्तोत्रेण वा देवी शक्रं साक्षाद्‌बभूव सा ॥ १२ ॥
को वा तयोश्च संवादो बभूव तद्वद प्रभो ।
श्रीनारायण उवाच
मधुपानप्रमत्तश्च त्रैलोक्याधिपतिः पुरा ॥ १३ ॥
क्रीडां चकार रहसि रम्भया सह कामुकः ।
कृत्वा क्रीडां तया सार्धं कामुक्या हृतमानसः ॥ १४ ॥
तस्थौ तत्र महारण्ये कामोन्मथितमानसः ।
कैलासशिखरे यान्तं वैकुण्ठादृषिसत्तमम् ॥ १५ ॥
दुर्वाससं ददर्शेन्द्रो ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा ।
ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डसहस्रप्रभमीश्वरम् ॥ १६ ॥
प्रतप्तकाञ्चनाकारं जटाभारमहोज्ज्वलम् ।
शुक्लयज्ञोपवीतं च चीरदण्डौ कमण्डलुम् ॥ १७ ॥
महोज्ज्वलं च तिलकं बिभ्रन्तं चेन्दुसन्निभम् ।
समन्वितं शिष्यलक्षैर्वेदवेदाङ्‌गपारगैः ॥ १८ ॥
दृष्ट्वा ननाम शिरसा सम्प्रमत्तः पुरन्दरः ।
शिष्यवर्गं तदा भक्त्या तुष्टाव च मुदान्वितम् ॥ १९ ॥
मुनिना च सशिष्येण दत्तास्तस्मै शुभाशिषः ।
विष्णुदत्तं पारिजातपुष्पं च सुमनोहरम् ॥ २० ॥
तज्जरारोगमृत्युघ्नं शोकजं मोक्षकारकम् ।
शक्रः पुष्पं गहीत्वा च प्रमत्तो राज्यसम्पदा ॥ २१ ॥
पुष्पं स न्यस्तयामास तदैव करिमस्तके ।
हस्ती तत्स्पर्शमात्रेण रूपेण च गुणेन च ॥ २२ ॥
तेजसा वयसाकस्माद्विष्णुतुल्यो बभूव ह ।
त्यक्त्वा शक्रं गजेन्द्रश्च जगाम घोरकाननम् ॥ २३ ॥
न शशाक महेन्द्रस्तं रक्षितुं तेजसा मुने ।
तत्पुण्यं त्यक्तवन्तं च दृष्ट्वा शक्रं मुनीश्वरः ॥ २४ ॥
तमुवाच महारुष्टः शशाप च रुषान्वितः ।
मुनिरुवाच
अरे श्रिया प्रमत्तस्त्वं कथं मामवमन्यसे ॥ २५ ॥
मद्दत्तपुष्पं दत्तं च गर्वेण करिमस्तके ।
विष्णोर्निवेदितं चैव नैवेद्यं वा फलं जलम् ॥ २६ ॥
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं त्यागेन ब्रह्महा भवेत् ।
भ्रष्टश्रीर्भ्रष्टबुद्धिश्च पुरभ्रष्टो भवेत्तु सः ॥ २७ ॥
यस्त्यजेद्विष्णुनैवेद्यं भाग्येनोपस्थितं शुभम् ।
प्राप्तिमात्रेण यो भुङ्‌क्ते भक्तो विष्णुनिवेदितम् ॥ २८ ॥
पुंसां शतं समुद्धृत्य जीवन्मुक्तः स्वयं भवेत् ।
नैवेद्यं भोजनं कृत्वा नित्यं यः प्रणमेद्धरिम् ॥ २९ ॥
पूजयेत्स्तौति वा भक्त्या स विष्णुसदृशो भवेत् ।
तत्स्पर्शवायुना सद्यस्तीर्थौघश्च विशुध्यति ॥ ३० ॥
तत्पादरजसा मूढ सद्यः पूता वसुन्धरा ।
पुंश्चल्यन्नमवीरान्नं शूद्रश्राद्धान्तमेव च ॥ ३१ ॥
यद्धरेरनिवेद्यं च वृथा मांसस्य भक्षणम् ।
शिवलिङ्‌गप्रदानं च यद्दत्तं शूद्रयाजिना ॥ ३२ ॥
चिकित्सकद्विजान्नं च देवलान्नं तथैव च ।
कन्याविक्रयिणामन्नं यदन्नं योनिजीविनाम् ॥ ३३ ॥
उच्छिष्टान्नं पर्युषितं सर्वभक्षावशेषितम् ।
शूद्रापतिद्विजानां च भूषवाहद्विजान्नकम् ॥ ३४ ॥
अदीक्षितद्विजानां च यदन्नं शवदाहिनाम् ।
अगम्यागामिनां चैव द्विजानामन्नमेव च ॥ ३५ ॥
मित्रद्रुहां कृतज्जानामन्नं विश्वासघातिनाम् ।
मिथ्यासाक्ष्यप्रदान्नं च ब्राह्मणान्नं तथैव च ॥ ३६ ॥
एते सर्वे विशुध्यन्ति विष्णोनैवेद्यभक्षणात् ।
श्वपचश्चेद्विष्णुसेवी वंशानां कोटिमुद्धरेत् ॥ ३७ ॥
हरेरभक्तो मनुजः स्वं च रक्षितुमक्षमः ।
अज्ञानाद्यदि गृह्णाति विष्णोर्निर्माल्यमेव च ॥ ३८ ॥
सप्तजन्मार्जितात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ।
ज्ञात्वा भक्त्या च गृह्णाति विष्णोनैवेद्यमेव च ॥ ३९ ॥
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुच्यते निश्चितं हरे ।
यस्मात्संस्थापितं पुष्पं गर्वेण करिमस्तके ॥ ४० ॥
तस्माद्युष्मान्परित्यज्य यातु लक्ष्मीर्हरेः पदम् ।
नारायणस्य भक्तोऽहं न बिभेमि सुराद्विधेः ॥ ४१ ॥
कालान्मृत्योर्जरातश्च कानन्यान् गणयामि च ।
किं करिष्यति ते तातः कश्यपश्च प्रजापतिः ॥ ४२ ॥
बृहस्पतिर्गुरुश्चैव निःशङ्‌कस्य च मे हरे ।
इदं पुष्पं यस्य मूर्ध्नि तस्यैव पूजनं परम् ॥ ४३ ॥
इति श्रुत्वा महेन्द्रश्च धृत्वा स चरणं मुनेः ।
उच्चै रुरोद शोकार्तस्तमुवाच भयाकुलः ॥ ४४ ॥
महेन्द्र उवाच
दत्तः समुचितः शापो मह्यं मायापहः प्रभो ।
हृतां न याचे सम्पत्तिं किञ्चिज्ज्ञानं च देहि मे ॥ ४५ ॥
ऐश्वर्यं विपदां बीजं ज्ञानप्रच्छन्नकारणम् ।
मुक्तिमार्गकुठारश्च भक्तेश्च व्यवधायकम् ॥ ४६ ॥
मुनिरुवाच
जन्ममृत्युजराशोकरोगबीजाङ्‌कुरं परम् ।
सम्पत्तितिमिरान्धश्च मुक्तिमार्गं न पश्यति ॥ ४७ ॥
सम्पन्मत्तो विमूढश्च सुरामत्तः स एव च ।
बान्धवैर्वेष्टितः सोऽपि बन्धुत्वेनैव हे हरे ॥ ४८ ॥
सम्पत्तिमदमत्तश्च विषयान्धश्च विह्वलः ।
महाकामी राजसिकः सत्त्वमार्गं न पश्यति ॥ ४९ ॥
द्विविधो विषयान्धश्च राजसस्तामसः स्मृतः ।
अशास्त्रज्ञस्तामसश्च शास्त्रज्ञो राजसः स्मृतः ॥ ५० ॥
शास्त्रं च द्विविधं मार्गं दर्शयेत्सुरपुङ्‌गव ।
प्रवृत्तिबीजमेकं च निवृत्तेः कारणं परम् ॥ ५१ ॥
चरन्ति जीविनश्चादौ प्रवृत्तेर्दुःखवर्त्मनि ।
स्वच्छन्दं च प्रसन्नं च निर्विरोधं च सन्ततम् ॥ ५२ ॥
आयाति मधुनो लोभात्क्लेशेन सुखमानितः ।
परिणामे नाशबीजे जन्ममृत्युजराकरे ॥ ५३ ॥
अनेकजन्मपर्यन्तं कृत्वा च भ्रमणं मुदा ।
स्वकर्मविहितायां च नानायोन्यां क्रमेण च ॥ ५४ ॥
ततश्चेशानुगहाग्रच्च सत्सङ्‌गं लभते च सः ।
सहस्रेषु शतेष्वेको भवाब्धिपारकारणम् ॥ ५५ ॥
साधुस्तत्त्वप्रदीपेन मुक्तिमार्गं प्रदर्शयेत् ।
तदा करोति यत्‍नं च जीवो बन्धनखण्डने ॥ ५६ ॥
अनेकजन्मयोगेन तपसानशनेन च ।
तदा लभेन्मुक्तिमार्गं निर्विघ्नं सुखदं परम् ॥ ५७ ॥
इदं श्रुतं गुरोर्वक्याद्यत् पृच्छसि पुरन्दर ।
मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा वीतरागो बभूव सः ॥ ५८ ॥
वैराग्यं वर्धयामास तस्य ब्रह्मन् दिने दिने ।
मुनेः स्थानाद्‌ गृहं गत्वा स ददर्शामरावतीम् ॥ ५९ ॥
दैत्यैरसुरसङ्‌घैश्च समाकीर्णां भयाकुलाम् ।
विषमोपप्लवां पुत्रबन्धुहीनां च कुत्रचित् ॥ ६० ॥
पितृमातृकलत्रादिविहीनामतिचञ्चलाम् ।
शत्रुग्रस्तां च तां दृष्ट्वा जगाम वाक्पतिं प्रति ॥ ६१ ॥
शक्रो मन्दाकिनीतीरे ददर्श गुरुमीश्वरम् ।
ध्यायमानं परं ब्रह्म गङ्‌गातोये स्थितं परम् ॥ ६२ ॥
सूर्याभिसम्मुखं पूर्वमुखं च विश्वतोमुखम् ।
साश्रुनेत्रं पुलकिनं परमानन्दसंयुतम् ॥ ६३ ॥
वरिष्ठं च गरिष्ठं च धर्मिष्ठं श्रेष्ठसेवितम् ।
प्रेष्ठं च बन्धुवर्गाणामतिश्रेष्ठं च ज्ञानिनाम् ॥ ६४ ॥
ज्येष्ठं च भ्रातृवर्गाणामनिष्टं सुरवैरिणाम् ।
दृष्ट्वा गुरुं जपन्तं च तत्र तस्थौ सुरेश्वरः ॥ ६५ ॥
प्रहरान्ते गुरुं दृष्ट्वा चोत्थितं प्रणनाम सः ।
प्रणम्य चरणाम्भोजे रुरोदोच्चैर्मुहुर्मुहुः ॥ ६६ ॥
वृत्तान्तं कथयामास ब्रह्मशापादिकं तथा ।
पुनर्वरोपलब्धिं च ज्ञानप्राप्तिं सुदुर्लभाम् ॥ ६७ ॥
वैरिग्रस्तां च स्वपुरीं क्रमेणैव सुरेश्वरः ।
शिष्यस्य वचनं श्रुत्वा सुबुद्धिर्वदतां वरः ॥ ६८ ॥
बृहस्पतिरुवाचेदं कोपसंरक्तलोचनः ।
गुरुरुवाच
श्रुतं सर्वं सुरश्रेष्ठ मा रोदीर्वचनं शृणु ॥ ६९ ॥
न कातरो हि नीतिज्ञो विपत्तौ च कदाचन ।
सम्पत्तिर्वा विपत्तिर्वा नश्वरा श्रमरूपिणी ॥ ७० ॥
पूर्वस्य कर्मायत्ता च स्वयं कर्ता तयोरपि ।
सर्वेषां च भवत्येव शश्वज्जन्मनि जन्मनि ॥ ७१ ॥
चक्रनेमिक्रमेणैव तत्र का परिदेवना ।
उक्तं हि स्वकृतं कर्म भुज्यतेऽखिलभारते ॥ ७२ ॥
शुभाशुभं च यत्किञ्चित्स्वकर्मफलभुक् पुमान् ।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥ ७३ ॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
इत्येवमुक्तं वेदे च कृष्णेन परमात्मना ॥ ७४ ॥
सामवेदोक्तशाखायां सम्बोध्य कमलोद्‍भवम् ।
जन्मभोगावशेषे च सर्वेषां कृतकर्मणाम् ॥ ७५ ॥
अनुरूपं हि तेषां च भारतेऽन्यत्र चैव हि ।
कर्मणा ब्रह्मशापं च कर्मणा च शुभाशिषम् ॥ ७६ ॥
कर्मणा च महालक्ष्मीं लभेद्दैन्यं च कर्मणा ।
कोटिजन्मार्जितं कर्म जीविनामनुगच्छति ॥ ७७ ॥
न हि त्यजेद्विना भोगं तच्छायेव पुरन्दर ।
कालभेदे देशभेदे पात्रभेदे च कर्मणाम् ॥ ७८ ॥
न्यूनताधिकभावोऽपि भवेदेव हि कर्मणा ।
वस्तुदानेन वस्तूनां समं पुण्यं दिने दिने ॥ ७९ ॥
दिनभेदे कोटिगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम् ।
समे देशे च वस्तूनां दाने पुण्यं समं सुर ॥ ८० ॥
देशभेदे कोटिगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम् ।
समे पात्रे समं पुण्यं वस्तूनां कर्तुरेव च ॥ ८१ ॥
पात्रभेदे शतगुणमसंख्यं वा ततोऽधिकम् ।
यथा फलन्ति सस्यानि न्यूनान्यप्यधिकानि च ॥ ८२ ॥
कर्षकाणां क्षेत्रभेदे पात्रभेदे फलं तथा ।
सामान्यदिवसे विप्रदानं समफलं भवेत् ॥ ८३ ॥
अमायां रविसंक्रान्त्यां फलं शतगुणं भवेत् ।
चातुर्मास्यां पौर्णमास्यामनन्तं फलमेव च ॥ ८४ ॥
ग्रहणे शशिनः कोटिगुणं च फलमेव च ।
सूर्यस्य ग्रहणे वापि ततो दशगुणं भवेत् ॥ ८५ ॥
अक्षयायामक्षयं तदसंख्यं फलमुच्यते ।
एवमन्यत्र पुण्याहे फलाधिक्यं भवेदिति ॥ ८६ ॥
यथा दाने तथा स्नाने जपेऽन्यपुण्यकर्मसु ।
एवं सर्वत्र बोद्धव्यं नराणां कर्मणां फलम् ॥ ८७ ॥
यथा दण्डेन चक्रेण शरावेण भ्रमेण च ।
कुम्भं निर्माति निर्माता कुम्भकारो मृदा भुवि ॥ ८८ ॥
तथैव कर्मसूत्रेण फलं धाता ददाति च ।
यस्याज्ञया सृष्टमिदं तं च नारायणं भज ॥ ८९ ॥
स विधाता विधातुश्च पातुः पाता जगत्त्रये ।
स्रष्टुः स्रष्टा च संहर्तुः संहर्ता कालकालकः ॥ ९० ॥
महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम् ।
विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्‌करः ॥ ९१ ॥
इत्येवमुक्त्वा तत्त्वज्ञः समालिङ्‌ग्य सुरेश्वरम् ।
दत्त्वा शुभाशिषं चेष्टं बोधयामास नारद ॥ ९२ ॥
॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

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