February 4, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[उत्तरभाग] -005 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ पाँचवाँ अध्याय विष्णुभक्त राजर्षि अम्बरीष का आख्यान, विष्णुमाया द्वारा नारद एवं पर्वत मुनि का वानरमुख होना तथा इसी का रामावतार में हेतु बनना श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पञ्चमोऽध्यायः श्रीमत्याख्यानं ऋषिगण बोले — इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न विष्णुभक्त [राजा] अम्बरीष भगवान् विष्णु की आज्ञा के अनुसार पृथ्वी का पालन करते थे — यह हमने सुना है; हे महाबुद्धे ! उनके विषय में आप सब कुछ बताइये । लोक में ऐसा सुना जाता है कि भगवान् श्रीहरि का सुदर्शन चक्र उनके शत्रु, रोग, भय आदि का सदा नाश किया करता था। अतः हे श्रेष्ठ ! आप उन धार्मिक तथा महात्मा अम्बरीष के उस सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन कीजिये। हे सूत ! हम उनके माहात्म्य, अनुभाव तथा श्रेष्ठ भक्तियोग को यथार्थतः सुनना चाहते हैं, आप हमें बतायें ॥ १-४ ॥ सूतजी बोले — हे मुनीन्द्रो ! उन बुद्धिमान् अम्बरीष के श्रेष्ठ चरित्र तथा माहात्म्य को आप लोग सुनें, जो सम्पूर्ण पापों का नाश कर देने वाला है ॥ ५ ॥ त्रिशंकु की प्रिय भार्या तथा अम्बरीष की माता, जो समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न थीं, नित्य [स्नान आदि से] शुद्ध होकर योगनिद्रा में लीन रहने वाले, शेषशय्या पर शयन करने वाले, ब्रह्माण्डरूपी कमल का प्रादुर्भाव करने वाले, तमोगुण से युक्त होने पर कालरुद्ररूप, रजोगुण से युक्त होने पर हिरण्यगर्भ ब्रह्मारूप और सत्त्वगुण से युक्त होने पर सर्वव्यापी तथा सभी देवों से नमस्कृत साक्षात् महात्मा नारायण विष्णु की निरन्तर मन-वाणी-कर्म से अर्चना करती थीं। माल्य, दान आदि सब कुछ वे स्वयं करती थीं। चन्दन आदि द्रव्यों का घिसना, धूप-दीप आदि, भूमि का लेपन आदि, हवि द्रव्य को पकाना — ये सब कार्य वे स्वयं सम्पन्न करती थीं। वे कल्याणमयी तथा पतिव्रता रानी पद्मावती प्रतिदिन वाणी से ‘नारायण’ और ‘अनन्त’ –ऐसा निरन्तर उच्चारण करती हुई उन्हीं परमात्मा में संलग्न मन से दस हजार वर्षों तक शुद्धतापूर्वक गन्ध, पुष्प आदि उपचारों से गोविन्द का पूजन किया करती थीं। वे सब प्रकार के पापों से रहित महाभाग विष्णुभक्तों को दान, मान, पूजन तथा धनों से नित्य सन्तुष्ट रखती थीं ॥ ६–१३१/२ ॥ तदनन्तर किसी समय वे महाभागा देवी द्वादशी का व्रत करके पति के साथ भगवान् श्रीहरि के [विग्रह] सम्मुख सो गयीं । वहाँ पर [ स्वप्न में] पुरुषोत्तम नारायण ने उनसे कहा — हे भद्रे ! क्या चाहती हो ? हे भामिनि ! तुम मुझसे वर माँग लो ॥ १४-१५१/२ ॥ तब भगवान् को देखकर उन्होंने यह वर माँगा — मुझे विष्णुभक्त, चक्रवर्ती सम्राट् महातेजस्वी, अपने कार्य में तत्पर रहने वाला और पवित्र मन वाला पुत्र उत्पन्न हो। तब ‘वैसा ही होगा’ — यह कहकर जनार्दन ने उन्हें एक फल प्रदान किया ॥ १६-१७ ॥ तदनन्तर वे जग गयीं और उस फल को देखकर उन्होंने सारी बात अपने पति से कही। इसके बाद उन्हीं प्रभु संलग्न चित्तवाली उन्होंने प्रसन्न होकर वह फल खा लिया ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् समय आने पर उन देवी ने कुल की वृद्धि करने वाले, सदाचारी, वासुदेवपरायण, शुभ लक्षणों से सम्पन्न तथा चक्रांकित केशों वाले पुत्र को जन्म दिया । पुत्र उत्पन्न हुआ देखकर पिता [ त्रिशंकु ] – ने उसके सभी [जातकर्म आदि ] संस्कार किये ॥ १९-२० ॥ वह ऐश्वर्यशाली बालक अम्बरीष — इस नाम से लोक में विख्यात हुआ । पिता की मृत्यु हो जाने पर उस शोभासम्पन्न महात्मा अम्बरीष का अभिषेक किया गया। तत्पश्चात् मन्त्रियों को राज्य सौंपकर उन्होंने हृदयकमल के मध्य में विराजमान, सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित, शंख- चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले, चतुर्भुज, विशुद्ध सुवर्ण के सदृश कान्ति वाले, ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूप, समस्त आभरणों से सुशोभित, पीताम्बर धारण करने वाले, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न धारण करने वाले, परम पुरुष तथा पुरुषों में श्रेष्ठ भगवान् नारायण का जप करते हुए पूरे एक हजार वर्ष तक कठोर तप किया ॥ २१-२४१/२ ॥ तब सभी देवताओं से स्तुत तथा सभी लोकों से नमस्कृत होने वाले वे विश्वात्मा गरुड़ पर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये। उन श्रीहरि ने गरुड़ को अद्भुत ऐरावत के रूप में करके स्वयं इन्द्र का रूप धारण कर उसपर आसीन हो उन नृपश्रेष्ठ से कहा — ‘मैं इन्द्र हूँ, आपका कल्याण हो; मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ ? सभी लोकों का ईश्वर मैं आपकी रक्षा करने के लिये आपके पास आया हूँ’ ॥ २५–२७१/२ ॥ अम्बरीषजी बोले — आपको उद्देश्य करके मैंने यह तप नहीं किया है। हे शक्र ! आपके द्वारा प्रदत्त वर मैं नहीं चाहता; अतः आप सुखपूर्वक लौट जाइये। मेरे स्वामी तो नारायण हैं; मैं उन्हीं जगत्पति को नमस्कार करता हूँ । हे इन्द्र ! आप चले जाइये, मेरी बुद्धि को भ्रमित मत कीजिये ॥ २८-२९१/२ ॥ तब [इन्द्ररूपधारी ] भगवान् विष्णु ने हँसकर अपना रूप प्रकट कर दिया। वे सर्वात्मा जनार्दन हाथ में शार्ङ्ग नामक धनुष-चक्र-गदा- खड्ग लिये हुए थे, गरुड़ पर आरूढ़ थे और दूसरे नीलपर्वत की भाँति सुशोभित हो रहे थे। देवताओं तथा गन्धर्वों के समूह सभी ओर से उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ ३०-३११/२ ॥ तब प्रसन्नता को प्राप्त वे [अम्बरीष] उन गरुड़ध्वज को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे — अम्बरीषकृतं विष्णुस्तोत्रम् ॥ अम्बरीष उवाच ॥ प्रसीद लोकनाथेश मम नाथ जनार्दन । कृष्ण विष्णो जगन्नाथ सर्वलोकनमस्कृत ॥ ३३ ॥ त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः । अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः ॥ ३४ ॥ महेश्वराङ्गजो मध्ये पुष्करः खगमः खगः । कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः प्रभञ्जनः ॥ ३५ ॥ आदिदेवः क्रियानन्दः परमात्मात्मनी स्थितः । त्वां प्रपन्नोस्मि गोविन्द जय देवकिनन्दन । जय देव जगन्नाथ पाहि मां पुष्करेक्षण ॥ ३६ ॥ नान्या गतिस्त्वदन्या मे त्वमेव शरणं मम । हे लोकनाथ! हे ईश! हे मेरे नाथ ! हे जनार्दन! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे जगन्नाथ! हे सर्वलोकनमस्कृत ! [ मुझपर ] प्रसन्न होइये। आप आदि हैं और आदिरहित भी हैं। आप अनन्त, परम पुरुष, प्रभुतासम्पन्न, अपरिमित, सर्वोपरि, विष्णु, गोविन्द, कमल के समान नेत्रों वाले, महेश्वर के अंग से आविर्भूत, नाभि से कमल की उत्पत्ति करने वाले, हृदयाकाश में योगियों के द्वारा प्राप्त होने वाले, खगरूप, कव्यवाह तथा भैरवरूप हैं । आप हव्यवाह, प्रभंजन, आदिदेव, क्रियानन्द, परमात्मा तथा स्वयं में स्थित हैं। हे गोविन्द ! मैं आपके शरणागत हूँ । हे देवकीनन्दन ! आपकी जय हो। हे देव ! हे जगन्नाथ ! आपकी जय हो । हे कमलनयन ! मेरी रक्षा कीजिये; आपके अतिरिक्त मेरी दूसरी गति नहीं है; आप ही मेरे शरणदाता हैं ॥ ३२–३६१/२ ॥ सूतजी बोले — भगवान् विष्णु ने उनसे कहा — आपके मन में कौन-सी अभिलाषा है; वह सब मैं आपको दूँगा। हे सुव्रत! आप मेरे भक्त हैं, मुझे भक्ति प्रिय है, अतः आपको वर प्रदान करने के लिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ ३७-३८ ॥ अम्बरीषजी बोले — हे लोकनाथ ! हे परानन्द ! मेरी सदा यही अभिलाषा रहती है कि मैं मन, वाणी तथा कर्म से नित्य वासुदेव में लीन रहूँ । हे विष्णो! हे देव ! हे जनार्दन ! जैसे आप देवाधिदेव परमात्मा शिव के [ भक्त ] हैं, वैसे ही मैं आपका [भक्त ] हो जाऊँ। मैं [ सम्पूर्ण] जगत् को विष्णुभक्त बनाकर पृथ्वी का पालन करूँगा, यज्ञ-हवन-अर्चन आदि के द्वारा श्रेष्ठ देवताओं को तृप्त करूँगा, वैष्णवजनों का पालन-पोषण करूँगा और शत्रुओं का संहार करूँगा, प्राणियों को संताप देने से मैं भयभीत रहूँ – मेरी मति ऐसी भावना को धारण करे ॥ ३९-४२ ॥ श्रीभगवान् बोले — ‘जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा। प्राचीनकाल में मैंने भगवान् रुद्र की कृपा से यह दुर्लभ सुदर्शन चक्र प्राप्त किया है। यह आपके ऋषिशाप, दुःख, शत्रु, रोग आदि का सदा नाश करेगा’ — ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये ॥ ४३-४४ ॥ सूतजी बोले — तदनन्तर भगवान् नारायण को प्रणाम करके आनन्द से युक्त राजा [ अम्बरीष ] रम्य अयोध्या नगरी में प्रवेश करके प्रजापालन करने लगे । नारायण में तत्पर रहने वाले उन राजा ने ब्राह्मण आदि वर्णों को अपने-अपने कर्म में लगाया। वे राजा अम्बरीष प्रसन्नचित्त होकर विशेष रूप से निष्पाप विष्णुभक्तों का पालन करने लगे। एक सौ अश्वमेधयज्ञ तथा एक सौ वाजपेययज्ञ करके वे सागरपर्यन्त इस पृथ्वी का पालन करने में तत्पर हो गये ॥ ४५–४७१/२ ॥ उन नृपश्रेष्ठ के राज्य शासन करते रहने पर घर-घर में विष्णु का विग्रह स्थापित किया गया; घर-घर में वेद – ध्वनि, विष्णु नाम का घोष और यज्ञघोष होने लगा। भूमि फसलरहित, तृणविहीन और दुर्भिक्ष आदि से युक्त नहीं रह गयी । सम्पूर्ण प्रजाएँ नित्य रोग तथा सभी प्रकार के विघ्नों से रहित हो गयीं। इस प्रकार महातेजस्वी अम्बरीष पृथ्वी का पालन करते थे ॥ ४८–५०१/२ ॥ इस प्रकार राज्य करते हुए उन राजा के यहाँ कमल के समान नेत्रों वाली तथा सभी शुभ लक्षणों से सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जो श्रीमती नाम से विख्यात हुई। देवकन्या के समान सुन्दर वह श्रीमती [कुछ दिनों में] कन्यादान के योग्य हो गयी। उस समय राजा अम्बरीष के यहाँ श्रीमान् नारदमुनि तथा महामति पर्वत – ये दोनों आये ॥ ५१-५३ ॥ उन दोनों ऋषियों को आया हुआ देखकर उन्हें प्रणाम करके महातेजस्वी अम्बरीष ने विधिपूर्वक उनका पूजन-सत्कार किया ॥ ५४ ॥ मेघ में विद्युत् के समान प्रतीत होने वाली उस कन्या को क्रीड़ा करती हुई देखकर भगवान् नारद ने मुसकराकर राजा से कहा — हे राजन् ! महाभाग्यशालिनी, देवकन्या के सदृश तथा सभी शुभ लक्षणों से सम्पन्न यह बाला कौन है ? हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! यह बताइये ॥ ५५-५६ ॥ राजा बोले — हे विभो ! यह मेरी पुत्री है, जो श्रीमती नाम से प्रसिद्ध । यह विवाह-काल को प्राप्त हो चुकी है, अतः यह सौभाग्यशालिनी वर का अन्वेषण कर रही है ॥ ५७ ॥ हे ऋषियो ! राजा के ऐसा कहने पर मुनिश्रेष्ठ नारद उसे प्राप्त करने की इच्छा करने लगे और हे श्रेष्ठ मुनियो ! इसी तरह पर्वतमुनि भी उसे पाने की प्रबल कामना करने लगे ॥ ५८ ॥ राजा की अनुमति प्राप्तकर धर्मात्मा नारद ने उन्हें एकान्त में बुलाकर यह बात कही — ‘अपनी इस पुत्री को मुझे दे दीजिये ।’ पर्वत मुनि ने भी राजा से एकान्त में वैसा ही कहा ॥ ५९१/२ ॥ तब भय से व्याकुल राजा ने उन दोनों को एक साथ प्रणाम करके कहा — आप दोनों ही मेरी कन्या की याचना कर रहे हैं; [ ऐसी स्थिति में] मैं क्या करूँ ? हे महाप्राज्ञ! हे नारद! आप मेरी बात सुनें और हे पर्वत ! हे प्रभो! आप भी मेरा वचन सुनें, जिसे मैं कह रहा हूँ — ‘मेरी यह सौभाग्यवती पुत्री आप दोनों में से जिस एक का वरण कर लेगी, उसे मैं अपनी कन्या दे दूँगा; इसके अतिरिक्त मेरा सामर्थ्य नहीं है ‘ ॥ ६०-६२१/२ ॥ ‘वैसा ही हो’ – यह कहने के बाद ‘हम दोनों कल पुनः आयेंगे’ – यह कहकर निरन्तर भगवान् विष्णु में अनुरक्त रहने वाले तथा ज्ञानियों में अग्रणी वे दोनों मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहाँ से चले गये ॥ ६३-६४ ॥ तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारद ने विष्णुलोक पहुँचकर भगवान् हृषीकेश को प्रणाम करके यह वचन कहा — हे भगवन्! हे नाथ! हे नारायण ! हे प्रभो ! आपको कुछ सुनना है; इसे मैं आपको एकान्त में बताऊँगा । हे भुवनेश्वर ! आपको नमस्कार ॥ ६५-६६ ॥ तदनन्तर परमात्मा गोविन्द सभी लोगों को वहाँ से हटाकर हँस करके उन मुनि से बोले — ‘कहिये ।’ तब मुनि ने केशव से कहा — ‘मेरी बात सुनिये; श्रीमान् राजा अम्बरीष आपके भक्त हैं। श्रीमती नाम से विख्यात उनकी विशाल नेत्रों वाली पुत्री है। मैं उससे विवाह करने का इच्छुक हूँ। मैं वहाँ गया था । मेरा वचन सुनिये । आपके भक्त तपोनिधि श्रीमान् ये जो पर्वतमुनि हैं, वे भी उसे चाहते हैं। हे भगवन्! महातेजस्वी राजा अम्बरीष ने हम दोनों से कहा कि यह कन्या आप दोनों में से जिस सौन्दर्यसम्पन्न का पतिरूप में वरण करेगी, उसे मैं कन्या अर्पण कर दूँगा ।’ जब राजा ने हम दोनों से ऐसा कहा, तब ‘ठीक है; हे राजन् ! मैं आपके घर कल प्रातः काल आऊँगा’ – ऐसा कहकर मैं यहाँ आ गया । ‘हे जगन्नाथ! अब मैं आपके पास आ गया हूँ; आप मेरा प्रिय कार्य कर दें । हे जगन्नाथ ! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस भी प्रकार से पर्वत का मुख वानर के मुख के समान हो जाय, वैसा आप कर दें’ ॥ ६७–७३ ॥ तब मुसकराकर भगवान् मधुसूदन ने ‘ठीक है’ – ऐसा कहकर [ मुनि नारद से] कहा — हे सौम्य ! आपने जो कहा है, उसे मैं करूँगा; अब आप जैसे आये थे, वैसे ही चले जाइये ॥ ७४ ॥ [ भगवान् के ] ऐसा कहने पर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक जनार्दन को प्रणाम करके अपने को धन्य मानते हुए वहाँ से अयोध्या चले गये ॥ ७५ ॥ तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठ के चले जाने पर महामुनि पर्वत ने भी [वहाँ पहुँचकर ] भगवान् माधव को प्रणाम करके उन [राजा अम्बरीष ] – का सारा वृत्तान्त उनके सम्मुख एकान्त में कहकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा — हे जगत्पते! नारद का मुख लंगूर के मुख की भाँति लगने लगे, वैसा आप कर दें ॥ ७६-७७ ॥ यह सुनकर भगवान् विष्णु ने कहा — ‘आपके द्वारा कही गयी बात मैं अवश्य करूँगा, अब आप शीघ्र ही अयोध्या जाइये; किंतु आपके साथ मेरे इस वार्तालाप के विषय में नारद से वहाँ मत कहियेगा । तब ‘ठीक है’ – ऐसा कहकर वे [पर्वत मुनि ] चले गये ॥ ७८१/२ ॥ तदनन्तर राजा ने उन दोनों मुनिवरों को आया हुआ जानकर अनेक प्रकार के मांगलिक पदार्थों, पुष्पों तथा लाजा (लावा) आदि के द्वारा एवं ध्वजा-तोरण आदि लगवाकर चारों ओर से सम्पूर्ण अयोध्या को सजाया । भवनों के द्वारों को जल से सिक्त करके, बाजारों तथा मार्गों पर जल का छिड़काव कराकर, नगरी को दिव्य गन्ध, रस आदि से युक्त तथा सुगन्धित धूपों से धूपित करके राजा ने सम्पूर्ण अयोध्या को मण्डित किया । तदनन्तर राजा ने उस स्वयंवर – सभा को विविध प्रकार के तथा अनेकविध मालाओं से सुशोभित एवं दिव्य गन्धों, धूपों तथा रत्नों से अलंकृत; मणिनिर्मित स्तम्भों बहुमूल्य आस्तरणों से युक्त दिव्य सिंहासनों से आवृत करने के पश्चात् सभी प्रकार के आभरणों से सुसज्जित, लक्ष्मी के समान विशाल नेत्रोंवाली, कृशोदरी, हाथ आदि पाँच अंगों में कोमलता धारण करने वाली, मनोहर मुखमण्डल वाली और अनेक स्त्रियों से घिरी तथा संश्रित (सहारा देकर ले जायी जाती हुई) कन्या श्रीमती को साथ में लेकर उस सभा में प्रवेश किया ॥ ७९-८५ ॥ राजा अम्बरीष की वह सभा वैभवमयी, अनेकविध श्रेष्ठ मणियों तथा रत्नों से चित्रित, उत्तम आसनों से सुशोभित, पुष्पमालाओं से मण्डित और सुव्यवस्थित थी, उस सभा में वे राजागण आये ॥ ८६ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र, वेदत्रयी विद्या के ज्ञाता, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा महान् आत्मा वाले महामुनि नारद पर्वत मुनि सहित वहाँ आ गये ॥ ८७ ॥ उन दोनों को आया हुआ देखकर व्याकुल-चित्तवाले राजा ने दिव्य आसन प्रदान कर उनकी पूजा की। देवर्षियों में विख्यात, ज्ञानियों में श्रेष्ठ तथा महान् आत्मावाले वे दोनों मुनिवर कन्याप्राप्ति के लिये सम्यक् रूप से आसन पर विराजमान हो गये ॥ ८८-८९ ॥ उन दोनों के सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके राजा ने मनोहर, कमल के समान नेत्रों वाली तथा यशस्विनी उस पुत्री श्रीमती से कहा — हे भद्रे ! इन दोनों में से जिस वर को तुम मन से चाहती हो, उसे प्रणाम करके यह माला विधिपूर्वक उसे पहना दो ॥ ९०-९१ ॥ राजा के ऐसा कहने पर स्त्रियों से घिरी हुई सुन्दर नेत्रों वाली वह कन्या सुवर्णमयी दिव्य माला लेकर, जहाँ वे दोनों महात्मा बैठे थे, वहीं आकर उन मुनि-श्रेष्ठों नारद तथा पर्वत को देखती हुई वहीं स्थित हो गयी ॥ ९२-९३ ॥ नारद को लंगूर के समान मुख वाला तथा पर्वत को वानर के समान मुख वाला देखकर वह कन्या कुछ डर-सी गयी । व्याकुल चित्तवाली वह कन्या वायु – प्रकम्पित कदली की भाँति [काँपती हुई ] वहाँ स्थित रही । तब उस राजा ने उससे कहा — हे वत्से ! तुम अब क्या करोगी? हे शुभे ! इन दोनों में से किसी एक को चुनकर उसे माला पहना दो ॥ ९४-९५१/२ ॥ डरी हुई उस कन्या ने पिता से कहा — ये दोनों तो नरवानर की आकृति वाले हैं; मुनिश्रेष्ठ नारद तथा पर्वत तो मुझे दिखायी ही नहीं पड़ रहे हैं । [ अपितु ] इन दोनों के मध्य में सोलह वर्ष से थोड़ी कम आयु वाले, समस्त आभरणों से सम्पन्न, अतसी – पुष्प के समान [नील] कान्ति वाले, लम्बी भुजाओं वाले, विशाल नेत्रों वाले, उन्नत तथा उत्तम वक्षःस्थल वाले, रेखायुक्त कटिप्रदेश तथा ग्रीवा वाले, रक्त प्रान्तभाग से युक्त विशाल नेत्रों वाले, झुके हुए धनुष के सदृश टेढ़ी भौहों से सुशोभित, [उदरदेश में] पृथक् पृथक् तीन वलियों से समन्वित, स्पष्ट नाभि से युक्त सुन्दर उदर वाले, पीताम्बर धारण किये हुए, उन्नत तथा रत्न की आभा से युक्त नख वाले, मनोहर कमल के आकारसदृश हाथों वाले, कमल के समान मुख तथा नेत्रों वाले, सुन्दर नासिका वाले, पद्मसदृश हृदयदेश वाले, पद्म के समान नाभि वाले, कान्तिमान्, कुन्द-कली के समान दन्त-पंक्तियों से सुशोभित, सुन्दर केशों वाले और मुझको देखकर मेरी ओर दाहिना हाथ फैलाकर हँसते हुए वहाँ पर विराजमान इस [अन्य व्यक्ति]- को देख रही हूँ ॥ ९६-१०२ ॥ तब कदली की भाँति काँपते हुए वहाँ पर खड़ी उस व्याकुल मन वाली कन्या से राजा ने कहा — हे वत्से ! अब तुम क्या करोगी ? ॥ १०३ ॥ उसके ऐसा कहने पर सन्देह में पड़े नारदमुनि ने कहा — हे कन्ये ! उसकी कितनी भुजाएँ हैं; सही-सही बताओ। तब पवित्र मुसकान वाली उस कन्या ने कहा — मैं [उसके] दो हाथ देख रही हूँ। इसके बाद पर्वत ने उससे कहा — हे शुभे ! तुम उसके वक्षःस्थल पर क्या देख रही हो और उसके [बायें] हाथ में क्या देख रही हो; मुझे बताओ। इस पर कन्या उनसे बोली — मैं उसके वक्ष:स्थल पर सर्वश्रेष्ठ पंचरूप माला तथा हाथ में धनुष-बाण देख रही हूँ ॥ १०४–१०६१/२ ॥ उसके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे दोनों उत्तम मुनिश्रेष्ठ मन में सोचते हुए परस्पर कहने लगे कि यह किसी की माया हो सकती है। लगता है मायावी तथा तस्कर स्वयं जनार्दन ही [कन्या प्राप्त करने के लिये ] निश्चितरूप से यहाँ आया हुआ है; यदि ऐसा न होता, तो मेरा यह मुख लंगूर के मुख के समान वह क्यों करता ? – ऐसा नारदजी सोचने लगे। इसी प्रकार पर्वतमुनि भी मन में चिन्ता करने लगे कि मुझे यह वानरत्व कैसे प्राप्त हो गया ? ॥ १०७–११० ॥ तदनन्तर राजा ने नारद तथा पर्वत को प्रणाम करके कहा — आप दोनों ने बुद्धि-विमोह उत्पन्न करने वाला यह क्या कर दिया ? कन्या को प्राप्त करने के लिये तत्पर आप दोनों अब शान्तचित्त होकर बैठिये ॥ ११११/२ ॥ राजा के ऐसा कहनेपर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ कुपित होकर बोले — आप ही मोह कर रहे हैं; हम दोनों बिलकुल नहीं। आपकी यह पुत्री अब हम दोनों में से किसी एक का अविलम्ब वरण कर ले ॥ ११२-११३ ॥ तत्पश्चात् अपने इष्ट देवता को प्रणाम करके माला लेकर वह उठी और उसने उन दोनों के बीच में समाहितचित्त होकर बैठे हुए, समस्त आभरणों से सुशोभित, अतसीपुष्प के समान श्याम वर्ण वाले, लम्बी भुजाओं वाले, पुष्ट अंगों वाले तथा कर्णपर्यन्त विशाल नेत्रों वाले पूर्वसदृश पुरुष को देखकर उसे माला पहना दी। इसके बाद पुनः [ वहाँ उपस्थित] मनुष्यों ने उस कन्या को नहीं देखा ॥ ११४–११६ ॥ तब वे दोनों मुनि आश्चर्यचकित हो गये कि यह क्या हुआ? इसके बाद वहाँ [ लोगों के बीच ] यह ध्वनि होने लगी कि उसे लेकर पुरुषोत्तम श्रीविष्णु अपने लोक को चले गये । पूर्वजन्म में उस सुन्दर युवती ने उन भगवान् के लिये निरन्तर तप करके [ इस जन्म में] ‘श्रीमती’ नाम वाली कन्या के रूप में जन्म लिया और फिर वह श्रीविष्णु को प्राप्त हुई ॥ ११७-११८ ॥ तत्पश्चात् [ उस श्रीमती के द्वारा ] तिरस्कृत किये गये वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वासुदेव श्रीविष्णु के प्रति अत्यन्त दुःखित होकर उन श्रीहरि के भवन पहुँचे ॥ ११९ ॥ उन दोनों को आया हुआ देखकर भगवान् श्रीहरि ने श्रीमती से कहा कि मुनिश्रेष्ठ [ नारद तथा पर्वत ] आये हैं, अतः तुम अपने को यहाँ छिपा लो ॥ १२० ॥ इस पर ‘ठीक है’ – ऐसा कहकर उस देवी ने हँसते हुए वैसा कर दिया। तब सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके नारद ने दामोदर श्रीहरि से कहा — आपने मेरा तथा पर्वत का प्रिय कार्य तो आज कर दिया; हे गोविन्द ! हे सुरश्रेष्ठ! अपनी बुद्धि से हम दोनों को धोखा देकर तथा विमोहित करके स्वयं आपने ही उस कन्या का हरण किया है ॥ १२१-१२२१/२ ॥ उनके ऐसा कहने पर परम पुरुष अच्युत भगवान् विष्णु ने दोनों हाथों से अपने कान बन्द करके कहा — आप दोनों ने यह क्या कह दिया! अहो, यह तो वासनामय भाव है, जबकि आप लोग मुनिवृत्ति वाले हैं ॥ १२३१/२ ॥ [ भगवान् के द्वारा ] इस प्रकार कहे गये उन नारद मुनि ने वासुदेव से उनके कर्णमूल में कहा — आपने मेरा मुख लंगूर के मुख के समान क्यों कर दिया? तब भगवान् उनके कर्णमूल में बोले — हे विद्वन्! मैंने ही पर्वत का मुख वानर-जैसा और आपका मुख लंगूर -जैसा कर दिया था; यह सब मैंने आपके हित के लिये ही किया था, इसके विपरीत नहीं ॥ १२४-१२६ ॥ पर्वत ने भी वही पूछा; तब उन विष्णु ने उनसे भी वैसा ही कहा। इसके बाद भगवान् दामोदर श्रवण कर रहे उन दोनों के समक्ष यह वचन बोले — मैं शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ कि मैंने आप दोनों का हित ही किया है ॥ १२७१/२ ॥ तत्पश्चात् धर्मात्मा नारद ने कहा — हम दोनों के मध्य में स्थित वह कौन धनुर्धारी पुरुष था, जो उस कन्या का हरण करके चला गया था ? ॥ १२८१/२ ॥ यह सुनकर वासुदेव ने उन मुनिवरों से कहा — ‘बहुत से श्रेष्ठ महात्मा लोग भी मायावी हैं। वहाँ निश्चित ही श्रीमती ने आप दोनों ऋषिसत्तमों को देखकर ही अन्य का वरण किया होगा। मैं हाथ में चक्र धारण किये चार भुजाओं से युक्त होकर स्थित रहता हूँ, यह तो आप दोनों को विदित ही है; मैंने उसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं की है ‘ ॥ १२९–१३१ ॥ भगवान् ने जब उनसे ऐसा कहा, तब उन दोनों ने प्रसन्न-चित्त होकर उन्हें प्रणाम करके कहा — हे विभो ! हे नारायण ! जगत्पते ! इसमें आपका क्या दोष है; इसमें उस राजा की ही धृष्टता है, उसीने यह माया रची है ॥ १३२१/२ ॥ ऐसा कहकर वे दोनों मुनि नारद तथा पर्वत वहाँ से चल पड़े। अम्बरीष के यहाँ आकर नारद तथा पर्वत ने उन्हें शाप दे दिया। हम दोनों आये थे, फिर भी उसके बाद में किसी अन्य को बुलाकर आपने माया रचकर उसे अपनी कन्या दे दी है, अतः तमोगुण आपको आक्रान्त कर लेगा; इसके परिणामस्वरूप आप अपनी आत्मा को यथार्थरूप में बिलकुल नहीं जान पायेंगे ॥ १३३–१३५१/२ ॥ [ मुनियों के द्वारा ] यह शाप दे दिये जाने पर एक अन्धकारपुंज उत्पन्न हुआ और राजा की ओर बढ़ा; तब उसी क्षण भगवान् विष्णु का चक्र प्रकट हो गया। उस चक्र द्वारा त्रस्त किया गया वह अन्धकारपुंज अब उन मुनियों की ओर चल पड़ा ॥ १३६-१३७ ॥ तत्पश्चात् सन्तप्त अंगों वाले भागते हुए वे दोनों महामुनि अपने पीछे उस चक्र तथा भयानक अन्धकार-पुंज को देखकर कहने लगे — ‘अहो, हम दोनों ने शीघ्र ही कन्यासिद्धि प्राप्त कर ली।’ भयभीत होकर लोकलोकान्तर में निरन्तर दौड़ते हुए और ‘ त्राहि-त्राहि’ – ऐसा पुकारते हुए विष्णु लोक जाकर गोविन्द से बोले — हे नारायण ! हे जगत्पते ! हे वासुदेव ! हे हृषीकेश ! हे पद्मनाभ! हे जनार्दन! हे पुण्डरीकाक्ष ! हे पुरुषोत्तम ! आप [ सबके] स्वामी हैं; हम दोनों की रक्षा कीजिये ॥ १३८-१४१ ॥ अम्बरीष मेरा भक्त है और वैसे ही ये दोनों मुनिश्रेष्ठ भी मेरे भक्त हैं, अत: इस [ अम्बरीष ] -का तथा इन दोनों [ मुनियों] का इस समय मुझे हित करना चाहिये — यह सोच करके भक्तों पर कृपा करने की अभिलाषा से ऐश्वर्यसम्पन्न वक्ष:स्थल पर श्रीवत्स चिह्न धारण करने वाले, नारायण, श्रीहरि भगवान् विष्णु ने चक्र तथा तमोराशि का निवारण करके उस अन्धकार को बुलाकर वाणी से उसे प्रसन्न करते हुए बोले — मेरी यह बात सुनो, यह ऋषि का शाप नहीं था, अपितु मेरा वरदान ही था, जिसे राजा की रक्षा के लिये मैंने उन्हें प्रदान किया था; इसके विपरीत और कुछ भी नहीं है। इन राजा अम्बरीष के पुत्र के नाती के पुत्र महायशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली ‘दशरथ’ नामक धर्मात्मा राजा होंगे। मैं उन्हीं के ‘राम’ नामक ज्येष्ठ पुत्र के रूप में अवतीर्ण होऊँगा । मेरा दाहिना हाथ उस समय भरत नाम से और बायाँ हाथ शत्रुघ्न नाम से प्रकट होंगे और ये शेषनाग लक्ष्मण के रूप में प्रसिद्ध होंगे। उस समय तुम मेरे पास आना और इस समय राजा को तथा इन मुनिवरों को छोड़कर चले जाओ — उन माधव ने [उस अन्धकार से ] ऐसा कहा । भगवान् के ऐसा कहने पर वह अन्धकार उसी क्षण नष्ट हो गया और निवारित किया गया वह विष्णुचक्र पूर्व की भाँति व्यवस्थित हो गया ॥ १४२–१४९१/२ ॥ वे मुनिश्रेष्ठ भय से मुक्त हो गये और जनार्दन को प्रणाम करके वहाँ से निकल गये । शोकसन्तप्त वे दोनों मुनि आपस में कहने लगे कि आज से मृत्युपर्यन्त हम दोनों कन्यापरिग्रह (विवाह) नहीं करेंगे। ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे दोनों ऋषि पूर्व की भाँति योगध्यानपरायण तथा शुद्धविचार वाले हो गये ॥ १५०-१५२ ॥ राजा अम्बरीष भी भलीभाँति पृथ्वी का पालन करके अपने सेवकों तथा बन्धु बान्धवों सहित विष्णुलोक चले गये ॥ १५३ ॥ भगवान् विष्णु भी अम्बरीष के मान के लिये तथा दोनों मुनिश्रेष्ठों के वचन की रक्षा के लिये दशरथ-पुत्र राम हुए और वे प्रभु अपने स्वरूप को नहीं जान सके ॥ १५४ ॥ उन श्रीहरि को देखकर सभी मुनिगण, भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ यह कहने लगे कि विद्वानों को माया नहीं रचनी चाहिये ॥ १५५ ॥ नारद तथा पर्वत भी [ अपने द्वारा किये गये ] मूर्खतापूर्ण कार्य को दीर्घकाल तक सोचकर तथा विष्णु की माया की निन्दा करके रुद्रभक्त हो गये ॥ १५६ ॥ [ हे मुनियो ! ] मैंने अम्बरीष का माहात्म्य तथा श्रीहरि का मायावी होना – यह सब आप लोगों को बता दिया। जो मनुष्य इसे पढ़ता, सुनता अथवा दूसरों को सुनाता है वह विशुद्ध आत्मा वाला होकर माया का त्याग करके रुद्रलोक को प्राप्त होता है। जो वेदों के द्वारा कहे गये इस परम पवित्र तथा पुण्यप्रद [ आख्यान ] – का प्रतिदिन प्रातः तथा सायं पाठ करता है, वह विष्णुसायुज्य प्राप्त करता है ॥ १५७–१५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत उत्तरभाग में ‘श्रीमती-आख्यान’ नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥ See Also:- 1. शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [प्रथम-सृष्टिखण्ड] – अध्याय 03 2. शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [प्रथम-सृष्टिखण्ड] – अध्याय 04 Content is available only for registered users. 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