श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -030
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
तीसवाँ अध्याय
शिवाराधना के माहात्म्य में श्वेतमुनि का आख्यान
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिंशोऽध्यायः
शिवाराधनमहिमवर्णनं

नन्दिकेश्वर बोले —  तत्पश्चात् उन ब्रह्माजी के इस प्रकार कहने पर द्विजश्रेष्ठ महर्षियों ने उनसे श्वेतमुनि की पुण्यप्रद कथा पूछी — ॥ १ ॥

पितामह बोले —  समाप्त आयुवाले श्वेत नामक एक श्रीयुक्त मुनि गिरि की गुफा में शिवाराधन में रत थे । हे द्विजो ! ‘नमस्ते रुद्र मन्यवे’ इत्यादि रुद्राध्याय से भक्तिपूर्वक महेश्वर की आराधना करके श्वेतमुनि ने उन्हें प्रसन्न कर लिया ॥ २१/२

हे विप्रेन्द्रो ! तदनन्तर द्विजों में श्रेष्ठ श्वेतमुनि को समाप्त आयु वाला जानकर उन्हें ले जाने के लिये महातेजस्वी काल मुनि के पास पहुँचा ॥ ३१/२

सन्निकट मृत्यु वाले पुण्यात्मा श्वेतमुनि भी उस काल को देखकर त्रिनेत्र शिव का स्मरण करते हुए उनकी आराधना करने लगे। वे ऐसा कहते हुए ध्यानपरायण थे कि जब में सुखकर सम्बन्ध वाले तथा जगत् का पोषण करने वाले त्रिनेत्र शिव का यजन कर रहा हूँ, तो मृत्यु मेरा क्या कर लेगी; क्योंकि मैं तो काल का भी काल हूँ ॥ ४-५१/२

उन श्वेतमुनि को देखकर लोकों को भयभीत  करने वाला वह काल मुसकराकर उनसे बोला — हे श्वेत! अब तुम मेरी ओर आओ; इस पूजा-पाठ आदि से तुम्हें क्या लाभ ! हे द्विजवर ! भगवान् विष्णु, ब्रह्मा अथवा जगदीश्वर रुद्र — इनमें भला कौन मेरे द्वारा ग्रास बनाये गये जीव को बचा सकने में समर्थ है ? हे विप्र ! यह रुद्रपूजा मुझ शक्तिमान्‌ का क्या कर सकती है ? जिस किसी को भी ले जाने के लिये मैं उठ खड़ा होता हूँ, उसे क्षणभर में यमलोक पहुँचा देता हूँ । हे मुने! क्योंकि तुम समाप्त आयु वाले हो चुके हो, अत: तुम्हें ले जाने हेतु मैं यहाँ आया हूँ ॥ ६-९ ॥

उस काल का वह धर्ममिश्रित भयावह वचन सुनकर मुनिवर श्वेत ‘ हा रुद्र ! हा रुद्र ! हा रुद्र !’ कहकर विलाप करने लगे और अश्रुपूरित तथा व्याकुल नेत्रों से एवं कातर दृष्टि से शिवलिङ्ग को निहारते हुए अत्यन्त व्यग्रचित्त होकर उस काल से कहने लगे — ॥ १०-११ ॥

श्वेतमुनि बोले —  हे काल ! तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो; क्योंकि सभी देवताओं को उत्पन्न करने वाले हमारे स्वामी वृषध्वज शंकर रुद्र इस लिङ्ग में विराजमान हैं ॥ १२ ॥ विधि का विधान शिवजी के प्रति अतिशय भक्ति रखने वाले मुझ सदृश महात्माओं का क्या कर सकता है ? अतएव हे महाबाहो ! आप जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले जाइये ॥ १३ ॥

तदनन्तर श्वेतमुनि का वैसा वचन सुनकर हाथ में पाश धारण किये, तीक्ष्ण दाढ़ों वाले भयंकर काल ने कुपित होकर सिंह के सदृश घोर गर्जना करते हुए तथा पाश को बार-बार फटकारते हुए काल-प्राप्त मुनि को बाँध दिया और पुनः उनसे कहा — ॥ १४-१५ ॥

हे विप्रर्षे! तुम श्वेत को यमलोक ले जाने के निमित्त मैंने बाँध दिया है; किंतु तुम्हारे देवाधिदेव रुद्र ने इस समय तुम्हारी क्या सहायता की ? कहाँ शिव, कहाँ तुम्हारी भक्ति तथा पूजा, कहाँ पूजा का फल और कहाँ मैं एवं मेरा भय! हे श्वेत! अब तुम मेरे द्वारा बाँध दिये गये हो। हे श्वेत! तुम्हारा महेश्वर रुद्र जो इस लिङ्ग में स्थित है, वह महादेव तो निश्चेष्ट है; तो फिर तुम उस महेश्वर की पूजा क्यों करते हो ? ॥ १६-१८ ॥

तत्पश्चात् मुनि का प्राण हरने के निमित्त आये हुए काल का संहार करने के लिये कामदेव के शत्रु, दक्ष- यज्ञ के विध्वंसक तथा त्रिनेत्र सदाशिव महादेव शंकर अपने नन्दी, गणेश्वरों और पार्वतीसहित मुसकराते हुए शीघ्रतापूर्वक शिवलिङ्ग से साक्षात् प्रकट हुए ॥ १९-२० ॥

हे द्विजो ! शिवजी को देखते ही उसी क्षण भय के कारण वह बलवान् काल श्वेतमुनि के पास शीघ्र ही गिर पड़ा और काल का भी अन्त करने वाले शिवजी को देखकर जोर से चिल्लाया । हे उत्तम विप्रो ! मृतप्राय उस काल को शिवजी ने अपने कृपावलोकन से जीवन प्रदान कर दिया ॥ २१-२२ ॥ सभी महान् देवतागण तथा मुनिवृन्द महेश्वर एवं माता पार्वती को प्रणाम करने लगे और हर्षित होकर उच्च स्व रमें ‘जय हो-जय हो’ ऐसा बोलने लगे । नभोमण्डल में स्थित देवसमुदाय इन श्वेतमुनि तथा शंकरजी के सिर पर आकाश से अत्यन्त सुन्दर, शीतल तथा सुगन्धित पुष्पों की वर्षा करने लगे ॥ २३-२४ ॥

तत्पश्चात् शिलाद के पुत्र तथा शिवजी के अनुचर गणेश्वर नन्दीजी काल को मरा हुआ देखकर अत्यन्त विस्मित हुए और उन्होंने अविनाशी महेश्वर शिव को प्रणामकर उनसे कहा कि यह अल्पबुद्धि काल मर चुका है; अब आप इस काल और मुनि — दोनों पर अनुग्रह कीजिये ॥ २५-२६ ॥

तत्पश्चात् क्षणभर में ही मृत होकर पृथ्वी पर गिरे काल को देखकर उसके तथा द्विज श्रेष्ठ श्वेत – दोनों के ऊपर अनुग्रह करके भगवान् शंकर तत्काल गुप्त शरीर में समाविष्ट हो गये ॥ २७ ॥ अतएव हे द्विजो ! सभी को मोक्ष तथा भोग प्रदान करने वाले मृत्युंजय महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये ॥ २८ ॥ [हे मुनियो !] अधिक क्या कहूँ; संन्यासधर्म का पालन करते हुए परम श्रद्धा के साथ उन महादेव की आराधना करने से तुम सब सन्ताप रहित हो जाओगे ॥ २९ ॥

नन्दीश्वर बोले —  [हे सनत्कुमारजी!] तत्पश्चात् उन ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर ब्रह्मवेत्ता मुनिगण बोले —  हे देव! आप प्रसन्न हों और हमें बतायें कि किस तपस्या, किस यज्ञ अथवा किन व्रतों से पिनाकधारी देवेश्वर रुद्र के प्रति हम लोगों में भक्ति उत्पन्न होगी तथा हम द्विजगण शिवभक्त हो सकेंगे ? ॥ ३०-३१ ॥

ब्रह्माजी बोले —  हे मुनिवरो! दान, तप, विद्या,  यज्ञ, होम, व्रत, वेदाध्ययन, शास्त्रपारायण, योगसाधन तथा इन्द्रिय-नियन्त्रण आदि उपायों से शिव – भक्ति सम्भव नहीं है। केवल उनकी कृपा से ही जगत् के परम कारण महादेव के प्रति वह भक्ति उत्पन्न होती है ॥ ३२१/२

इसके बाद उन ब्रह्माका वचन सुनकर परिश्रान्त हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियों ने स्त्री तथा पुत्रों सहित ब्रह्माजी को प्रणाम किया ॥ ३३१/२

अतएव [हे सनत्कुमार!] यह शैवी भक्ति धर्म, काम, अर्थ तथा सभी सिद्धियाँ प्रदान करने वाली है और  सभी प्रकार की मृत्यु से विजय दिलाने वाली है। यह शिव- भक्ति मुनि दधीच के लिये विजयदायिनी सिद्ध हुई थी। पूर्व काल में दधीच मुनि ने शिव की भक्ति से ही देवताओं सहित  सर्वशक्तिमान् विष्णु को जीतकर अपने चरण से राजा क्षुप पर प्रहार किया और अपनी हड्डियों में वज्रत्व प्राप्त कर लिया था। महादेव की आराधना से मैंने भी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है और जिस प्रकार मैंने मृत्यु को जीता है, उसी प्रकार मृत्यु मुख में गये हुए मुनिवर श्वेत ने भी शिवजी की कृपा से मृत्यु को जीत लिया था ॥ ३४-३७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘शिवाराधनमहिमवर्णन’ नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥

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