श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -058
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
अट्ठावनवाँ अध्याय
ब्रह्मा द्वारा शिव के आदेश से ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदि के अधिपति के रूप में सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदि की प्रतिष्ठा का निरूपण
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय
सूर्याद्यभिषेककथनं

ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी ! ] सर्वात्मा प्रजापति ब्रह्माजी ने सभी प्रमुख देवताओं तथा दैत्यों को अधिपति के रूप में किस प्रकार अभिषिक्त किया, इस समय [हम लोगों को] बताइये ॥ १ ॥

सूतजी बोले —  [हे ऋषियो!] भगवान् ब्रह्मा ने ग्रहों के अधिपति के रूप में सूर्य का और नक्षत्रों तथा औषधियों के अधिपति के रूप में चन्द्रमा का अभिषेक किया ॥ २ ॥ उन पितामह ने वरुणदेव को जलों का अधिपति, यक्षों में श्रेष्ठ कुबेर को धनों का अधिपति, विष्णु को आदित्यों का अधिपति, अग्नि को वसुओं का अधिपति, दक्ष को प्रजापतियों का अधिपति, इन्द्र को मरुतों का अधिपति, दैत्य श्रेष्ठ प्रह्लाद को दैत्यों तथा दानवों का अधिपति, धर्म को पितरों का अधिपति, निर्ऋति को राक्षसों का अधिपति, रुद्र को पशुओं का अधिपति, गणों के नायक नन्दी को भूतों का अधिपति, भयंकर वीरभद्र को वीर पिशाचों का अधिपति, सभी देवताओं द्वारा नमस्कृत चामुण्डा को मातृगणों का अधिपति, देवदेवेश ईश्वर नीललोहित को रुद्रों का अधिपति, व्योम से उत्पन्न तथा हाथी के समान मुख वाले विनायक को विघ्नों का अधिपति, देवी उमा को स्त्रियों का अधिपति, देवी सरस्वती को वाणी का अधिपति, विष्णु को मायावियों का अधिपति, स्वयं अपने को सम्पूर्ण जगत् का अधिपति, हिमालय को पर्वतों का अधिपति, गंगा को नदियों का अधिपति, जलनिधि ( महासागर )-को सभी समुद्रों का अधिपति और अश्वत्थ तथा प्लक्ष को वृक्षों का अधिपति बनाया ॥ ३–१० ॥

उन्होंने चित्ररथ को गन्धर्वों-विद्याधरों तथा किन्नरों का अधिपति, उग्र तेज वाले वासुकि को नागों का अधिपति और उग्र वीर्य वाले तक्षक को सर्पों का अधिपति बनाया ॥ ११ ॥ उन्होंने उग्र पराक्रमवाले गजेन्द्र ऐरावत को दिग्गजों का स्वामी, गरुड़ को पक्षियों का स्वामी और उच्चैःश्रवा को घोड़ों का स्वामी बनाया ॥ १२ ॥ उन्होंने सिंह को मृगों का स्वामी, वृषभ को गौओं का स्वामी, शरभ को सिंहों का स्वामी, अतुलनीय गुह (कार्तिकेय)-को सेनाधिपों का स्वामी और लकुलीश को श्रुतियों तथा स्मृतियों का स्वामी बनाया ॥ १३ ॥ उन्होंने सुधर्मा, शंखपद, केतुमान् तथा हेमरोम को क्रमशः सभी दिशाओं के अधिपति के रूप में अभिषिक्त किया। उन्होंने पृथु को पृथ्वी का स्वामी, महेश्वर को सबका स्वामी और सब कुछ जानने वाले वृषभध्वज शंकर को चारों (विश्व, प्राज्ञ, तैजस, तुरीय) मूर्तियों का स्वामी बनाया ॥ १४-१५ ॥

इस प्रकार भगवान् ब्रह्मा ने शम्भु की कृपा से पूर्वकाल में [इन सभी को ] क्रम से अभिषिक्त किया । इन्हें अभिषिक्त करके लोकों के स्वामी पुण्यात्मा ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हो गये ॥ १६ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! मैंने आप लोगों को यह विस्तार से बता दिया; विश्व को उत्पन्न करने वाले ब्रह्मा ने [ इसी तरह से ] विशिष्ट गुणों से युक्त इन सबको अभिषिक्त किया था ॥ १७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘सूर्य आदि का अभिषेककथन’ नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥

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