श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -077
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
सतहत्तरवाँ अध्याय
शिवमन्दिरों के निर्माण का फल, शिवक्षेत्रों तथा शिवतीर्थों के सेवन की महिमा, शिवमन्दिर के उपलेपन आदि का माहात्म्य
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
उपलेपनादिकथनं

ऋषिगण बोले —  [हे सूतजी!] हम लोगों ने आपके मुख से लिङ्ग की स्थापना, लिङ्गप्रतिष्ठा के फल तथा लिङ्गों के भेदों को सुना; अब आप मिट्टी से लेकर रत्नों तक द्रव्यों से शिवालय का निर्माण करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उस फल को कृपापूर्वक बतायें ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले — [हे ऋषियो ! ] जिन शिव का ज्ञानसम्पन्न भक्त इस लोक में पुत्र, स्त्री, घर आदि से बन्धन को प्राप्त नहीं होता, उसे गृहों से क्या प्रयोजन ? फिर भी इन्द्र तथा ब्रह्मा के द्वारा नमस्कृत परमेश्वर के भक्त ईंटों अथवा पत्थरों से उनका उत्तम मन्दिर बनवाकर दिव्य रुद्रलोक को जाते हैं ॥ ३-४ ॥

बालभाव से भी पत्थर, मिट्टी अथवा धूल से इन शम्भु का उस प्रकार का आलय (मन्दिर) बनाकर आदिदेव शिव का विधिपूर्वक पूजन करके वे रुद्रत्व प्राप्त करते हैं ॥ ५ ॥ अतः भक्तों को धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि के लिये पूर्ण प्रयत्न से भक्तिपूर्वक शिवालय का निर्माण करना चाहिये ॥ ६ ॥ केसर, नागर, द्राविड़ अथवा अन्य प्रकार का शिवालय भक्तिपूर्वक बनाकर भक्त शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ७ ॥

जो [भक्त ] कैलास नामक शिवालय का निर्माण करता है, वह कैलासशिखर के आकार वाले विमानों में सुखपूर्वक आनन्द मनाता है ॥ ८ ॥ जो मनुष्य शिव के लिये अपने सामर्थ्य के अनुसार भक्ति के साथ विधिपूर्वक उत्तम, मध्यम अथवा अधम [ श्रेणी का ] मन्दर नामक शिवालय बनाता है, वह मन्दरपर्वत के सदृश, सभी ओर मुख वाले, अप्सराओं से युक्त तथा देवदानवों के लिये दुर्लभ विमानों से रम्य शिवलोकमें जाकर अभीष्ट सुखोंका उपभोग करके ज्ञानयोग प्राप्तकर गणाधिपति पद प्राप्त करता है ॥ ९-११ ॥ जो मेरु नामक शिवालय बनाता है, वह जो फल प्राप्त करता है, वह फल सभी महायज्ञों के द्वारा भी सम्भव नहीं है; सभी प्रकार के यज्ञ, तप, दान, तीर्थ तथा वेदाध्ययन करने से जो फल होता है, उस समस्त फल को प्राप्त करके वह [ मनुष्य ] शिव की भाँति चिरकाल तक आनन्दित रहता है ॥ १२-१३ ॥ जो बुद्धिमान् [मनुष्य] भक्तिपूर्वक निषध नामक शिवालय बनाता है, वह शिवलोक प्राप्त करके शिव के समान चिरकाल तक आनन्दित रहता है ॥ १४ ॥ हे विप्रो! जो [मनुष्य] हिमशैल नामक अत्युत्तम शुभ शिवालय बनाता है, वह हिमशैल के समान विमानों से दिव्य शिवलोक पहुँचकर ज्ञानयोग प्राप्त करके गणाधिपति पद प्राप्त करता है ॥ १५१/२

जो मनुष्य अपने सामर्थ्य के अनुसार रुद्र शिव के लिये भक्तिपूर्वक नीलाद्रिशिखर नामक परम सुन्दर शिवालय बनाता है, वह जो फल प्राप्त करता है, उसे मैं बता रहा हूँ। भक्तिपूर्वक हिमशैल [नामक शिवालय]- का निर्माण करने पर जो फल पहले बताया गया है, उस सम्पूर्ण फल को प्राप्त करके वह सभी देवताओं से नमस्कृत होता हुआ रुद्रलोक प्राप्त करके रुद्रों के साथ आनन्द मनाता है ॥ १६–१८१/२

रुद्र का अत्यन्त प्रिय महेन्द्रशैल नामक शिवालय बनाकर मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उस फल को मैं बता रहा हूँ – मुनिश्रेष्ठो ! वह [ मनुष्य ] महेन्द्रपर्वत के आकार वाले तथा वृषभों से जुते हुए विमानों से दिव्य शिवलोक में जाकर [वहाँ ] यथेष्ट सुखों को भोगकर रुद्रों से पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके विषयों को विष की भाँति त्यागकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है ॥ १९-२११/२

जो [मनुष्य ] रत्नजटित सोने का द्राविड़, नागर अथवा केसर कोटि का शिवालय विधानपूर्वक बनवाता है अथवा सम अथवा दीर्घ शिखर (चोटी) या मण्डप बनवाता है, उसके पुण्य का वर्णन सैकड़ों युगों में भी नहीं किया जा सकता है। हे द्विजो ! जो [ मनुष्य ] जीर्ण (पुराने), गिरे हुए, टूटे हुए अथवा फूटे हुए शिवालय, उसके मण्डप, चहारदीवारी, फाटक अथवा द्वार आदि को पूर्व की भाँति अत्यन्त सुन्दर करा देता है; वह [ वास्तविक ] निर्माता से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २२–२५१/२

जो मनुष्य आजीविका के लिये शिवालय में कार्य करता है, वह [अपने] बान्धवोंसहित स्वर्गलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। जो अपने सुख की सिद्धि के लिये शिवालय में एक बार भी [कुछ ] कार्य कर देता है, वह सुख प्राप्त करके प्रसन्न रहता है ॥ २६-२७१/२

अतः हे उत्तम मुनियो! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक काष्ठ, पत्थर आदि से शिवालय बनवाता है, वह शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! महेश की प्रसन्नता लिये तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के लिये पूर्ण प्रयत्न के साथ शिवालय का निर्माण करना चाहिये ॥ २८-२९१/२

श्रेष्ठ मुनियो ! यदि कोई उत्तम शिवालय बनाने में असमर्थ हो, तो वह [ शिवालय में] सम्मार्जन (बुहारना) आदि के द्वारा भी समस्त वांछित फलों को प्राप्त कर लेता है। जो [व्यक्ति ] कोमल तथा सूक्ष्म झाडू से सफाई करता है, वह महीने भर में हजार चान्द्रायण व्रत का फल प्राप्त करता है। जो [ मनुष्य ] पवित्र वस्त्र से छने हुए गन्ध तथा गोमय के जल से विधान के अनुसार आलेपन ( लीपने का कार्य ) करता है, वह वर्षपर्यन्त चान्द्रायणव्रत करने का फल प्राप्त करता है ॥ ३०-३२१/२

शिवलिङ्ग के चारों ओर आधा कोश का क्षेत्र शिवक्षेत्र होता है। जो [अपने] दुस्त्यज प्राणों को [ इस क्षेत्र में ] छोड़ता है, वह शिव – सायुज्य प्राप्त करता है । हे सुव्रतो ! यह [अर्धकोश] मान स्वयम्भू बाणलिङ्ग अर्थात् केवल ज्योतिर्लिङ्ग का है। हे द्विजोत्तमो ! अन्य स्वयम्भू लिङ्ग के लिये शिवक्षेत्र का मान उसका आधा (कोश का चतुर्थांश), ऋषिस्थापित लिङ्ग के लिये उसका आधा (कोश का आठवाँ भाग) और मनुष्य के द्वारा स्थापित लिङ्ग के लिये उसका भी आधा (कोश का सोलहवाँ ) भाग होता है। हे द्विजोत्तमो ! इसी प्रकार यतियों के निवासस्थान से कोश के सोलहवें भाग का क्षेत्र शिवक्षेत्र है । रुद्रों के अवतारस्थल, उनके शिष्यों-प्रशिष्यों के अवतारस्थल, योगाचार्यों के अवतारस्थल, उनके शिष्यों के अवतारस्थल तथा उनके भी शिष्य-प्रशिष्यों के अवतारस्थल से आधे कोश का मण्डल शिवक्षेत्र होता है ॥ ३३–३६१/२

हे द्विजो ! महापुण्यप्रद श्रीपर्वत तथा उसके प्रान्तभाग – इस शिवक्षेत्र में जो प्राणों का त्याग करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है। जो [ मनुष्य ] वाराणसी में तथा विशेषकर वहाँ अविमुक्त क्षेत्र में, केदार में, विशेषकर महाक्षेत्र प्रयाग में तथा कुरुक्षेत्र में प्राणत्याग करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है । प्रभास, पुष्कर, अवन्ती, अमरेश्वर तथा वणीशेलाकुल में मृत प्राणी शिवात्मता को प्राप्त होता है। वाराणसी में मरने वाला प्राणी पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता है। जो [ प्राणी ] त्रिविष्टप, विमुक्त, केदारक्षेत्र, संगमेश्वर, शालक, जम्बुकेश्वर, शुक्रेश्वर, गोकर्ण, भास्करेश, गुहेश्वर, हिरण्यगर्भ तथा नन्दीशक्षेत्र में प्राण छोड़ता है, वह परम गति प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! [अपने] शरीर को नियमों से सुखाकर जो योगी मानुष (मानवस्थापित), दैविक (देवस्थापित), आर्ष (मुनि- स्थापित) या स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न ) किसी भी शिवक्षेत्र में प्राणत्याग करता है, वह शिवत्व को प्राप्त होता है। ज्योतिर्लिङ्ग क्षेत्र तथा देवक्षेत्र के विषय में सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ३७-४४१/२

शिवक्षेत्र में भलीभाँति परमेश्वर की पूजा करके आग जलाकर जो [प्राणी] अपने शरीर को उसमें होम कर देता है, वह परम गति प्राप्त करता है । हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो [मनुष्य] निराहार रहकर शिवक्षेत्र में प्राण का त्याग करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है । जो [अपने] दोनों पैरों को काटकर भी शिवक्षेत्र में निवास करता है, वह शिवत्व को प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४५–४७१/२

शिवक्षेत्र का दर्शन पुण्यदायक होता है, वहाँ पर प्रवेश करना उससे सौ गुना अधिक पुण्यदायक होता है और उसका स्पर्श तथा प्रदक्षिणा उससे भी सौ गुना पुण्यप्रद होता है। वहाँ [ मूर्ति को ] जल-स्नान कराने से उससे भी सौ गुना पुण्य होता है। हे विप्रो ! दुग्ध से स्नान कराने से उससे सौ गुना, दही से स्नान कराने से उससे हजार गुना, मधु से स्नान कराने से उससे सौ गुना, घृत से स्नान कराने से उससे अनन्त गुना और शर्करा से स्नान कराने से उससे भी सौ गुना अधिक पुण्य कहा गया है ॥ ४८–५०१/२

शिवक्षेत्र के समीप में स्थित [ किसी] नदी पर जाकर उसमें स्नान करके और अन्न का त्याग करके जो [अपना ] शरीर छोड़ता है, वह शिवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। शिवक्षेत्र के समीप में स्थित सभी सुन्दर नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ तथा तालाब शिवतीर्थ कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो ! उन तीर्थों में श्रद्धापूर्वक हो स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५१-५३१/२

श्रेष्ठ मुनियो ! शिवतीर्थों में प्रातःकाल स्नान करके वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करके रुद्रलोक को जाता है। मध्याह्नकाल में शिवतीर्थों में एक बार भी भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गंगास्नान के समान पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है । सूर्य के अस्त हो जाने पर शिवतीर्थों में स्नान करके मनुष्य पापकंचुक छोड़कर शिवपद प्राप्त करता है। हे द्विजो ! शिवतीर्थों में एक बार भी त्रिस्रवण (तीनों कालों में) स्नान करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । हे श्रेष्ठ द्विजो ! पूर्वकाल में कोई सुअर मार्ग में कुत्ते को देखकर डर के मारे संयोगवश शिवतीर्थ में गिर पड़ा और वह एक बार डुबकी लगाकर स्वयं मर गया; इससे उसने गणाधिपति पद को प्राप्त किया ॥ ५४–५९ ॥

जो प्रातःकाल लिङ्गस्वरूपी देवदेवेश्वर शिव का दर्शन करता है, वह सबसे उच्च पद प्राप्त करता है; मध्याह्न में महादेव का दर्शन करके वह यज्ञ का फल प्राप्त करता है और सायंकाल दर्शन करके सभी यज्ञों का फल प्राप्तकर मानसिक तथा वाचिक पापों, बड़े-से-बड़े शारीरिक पापों, उपपात कों और अनुपातकों से मुक्त हो जाता है। सूर्य की सभी संक्रान्तियों में लिङ्ग के आकार वाले महादेव प्रभु ईशान का दर्शन करके मनुष्य महीनेभर में किये गये पाप का त्याग करके शिवलोक को जाता है। दक्षिणायन (कर्कसंक्रान्ति) तथा उत्तरायण (मकरसंक्रान्ति) तथा विषुवत् (मेष- तुला)- संक्रान्ति में अर्धमासपर्यन्त विधिवत् शिव की पूजा करके मनुष्य परम गति प्राप्त करता है ॥ ६०-६४ ॥ पवित्रावस्था में जो मनुष्य सव्य – अपसव्य – विधि से अर्थात् सोमसूत्र का उल्लंघन किये बिना धीमी गति से चारों ओर से शिवालय की तीन प्रदक्षिणा करता है, वह प्रत्येक पद पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है । जो [मनुष्य] वाणी से नित्य परमेश्वर शिव का जप करता है, वह भी शिवलोक को जाता है; उसे पाकर [ उसके लिये] फिर क्या शेष रह जाता है ॥ ६५-६६१/२  ॥

हे महाभागो ! गन्ध तथा गोमय – मिश्रित जल से मण्डलाकार क्षेत्र बनाकर उसमें मोती, इन्द्रनील, पद्मराग, स्फटिक, मरकत, स्वर्ण तथा रजत ( चाँदी) के अति सुन्दर चूर्णों के द्वारा अथवा धन के अभाव में उसी वर्ण के लौकिक चूर्णों के द्वारा महादेव के समीप कर्णिकासहित दस हाथ परिमाप का शुभ कमल बनाकर वहाँ पाँच, छ, आठ तथा नौ वाम आदि शक्तियों के सहित परम इष्ट प्रदान करने वाले महादेव का आवाहन करके पुनः आठ शक्तियोंसहित ईशान का आवाहन करके दस कोणों में दस शक्तियों के सहित एवं उसके बाहर दस शक्तियों के सहित शिवजी का पूजन करके तथा उन्हें प्रणाम करके देवदेव के लिये उसे निवेदित करने से पृथ्वीदान का फल प्राप्त होता है । निर्धन [भक्त ] शालि चावल के चूर्ण आदि से भी कमल बनाकर [पूजन करके ] पूर्वोक्त समस्त पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६७-७३१/२  ॥

मण्डल में रत्नों के चूर्ण आदि से अथवा अन्य चूर्णों से बारह दलों वाला उत्तम कमल बनाकर मण्डल के मध्य में बारह मूर्तियों के साथ सूर्य को स्थापित करके ग्रहों से घिरे हुए सूर्य की पूजा करनी चाहिये; इससे वह [ भक्त] उत्तम सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है ॥ ७४-७५१/२

इसी प्रकार प्राकृत मण्डल बनाकर उसमें छः दलों वाला कमल बनाकर इसके मध्य भाग में आर्या ब्रह्मरूपिणी देवेशी प्रकृति, दाहिनी ओर सत्त्वमूर्ति, बायीं ओर रजोगुण, सामने तमोमूर्ति, मध्य में देवी अम्बिका, दक्षिण में पाँच भूतों तथा पाँच तन्मात्राओं और उत्तर में पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियों की विधिवत् पूजा करके उस षट्दलकमल में आत्मा – अन्तरात्मा इन दोनों की, बुद्धि की तथा महत् सहित अहंकार की पूजा करनी चाहिये; इससे वह समस्त यज्ञों का फल प्राप्त करता है। [हे मुनियो ! ] इस प्रकार मैंने आप लोगों को सम्पूर्ण उत्तम प्राकृत मण्डल बता दिया ॥ ७६–८०१/२

श्रेष्ठ विप्रो ! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओं को सिद्ध करने वाले साधन का वर्णन करूँगा । मन्त्र को जानने वाला [भक्त] विधानपूर्वक गाय के गोबर से गोचर्म 1 के बराबर चौकोर मण्डल बनाकर जल से अभ्युक्षण (छिड़काव) करके उसे वितान आदि अथवा मनोहर छत्रों से, स्वर्णनिर्मित अर्धचन्द्राकार बुद्बुदों से, सुवर्णमय पीपल की पत्तियों से, खिले हुए श्वेत कमलों तथा लाल कमलों और नीलकमलों से, वितान के किनारे लटकती हुई मोतियों की मालाओं से, श्वेत ध्वजों से, श्वेत मिट्टी के पात्रों से, मनोहर जलपूरित घड़ों से, अंशुकों (रेशमी फल-पल्लव-मालाओं से, वैजयन्तियों से, वस्त्र) – से, पचास दीप मालाओं से तथा पाँच प्रकार के [सुगन्धित] धूपों से अलंकृत करके पचास दलों से युक्त उत्तम कमल बनाये। इस प्रकार विविध रंग के चूर्णों से अथवा सफेद चूर्णों से विधानपूर्वक एक हाथ परिमाप का कमल बनाकर [उसकी ] कर्णिका में देवीसहित देवेश्वर शिव की स्थापना करे। हे सुव्रतो ! [कमलके] पत्रों में पूर्व दिशा आदि के क्रम से रुद्रों के साथ [ अकार आदि ] वर्णों को स्थापित करे, जो आदि में प्रणव (ॐ) तथा अन्त में नमः से युक्त हों । श्रेष्ठ मुनियो ! इस प्रकार [भक्त ] क्रम से गन्ध, पुष्प आदि से पूजन करके वहाँ विधिपूर्वक पचास ब्राह्मणों को भोजन कराये । तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को जपमाला, यज्ञोपवीत, कुण्डल, कमण्डलु, आसन, छड़ी, पगड़ी तथा वस्त्र प्रदान करके देवदेव शम्भु को महाचरु निवेदित करके एक काली गाय तथा काला वृषभ प्रदान करे; अन्त में चूर्णनिर्मित मण्डल तथा पूजन के उपयोग के द्रव्यों को देवदेव शिव को समर्पित कर दे और आदि में ‘ओम्’ लगाकर बुद्धिमान् [ भक्त] प्रत्येक वर्ण को अनुक्रम से जपे ॥ ८१–९३ ॥

[ हे विप्रो ! ] इस प्रकार जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उत्तम सम्पूर्ण मण्डल बनाकर जिस फल को प्राप्त करता है, उसे मैं संक्षेप में बता रहा हूँ। समुचित रूप से विधिपूर्वक अंगोंसहित वेदों का अध्ययन करके विधान के अनुसार क्रम से ज्योतिष्टोम आदि से लेकर विश्वजित् तक सभी यज्ञों को करके अपने सदृश पुत्रों को उत्पन्न करके पत्नीसहित वानप्रस्थ-आश्रम में प्रविष्ट होकर अग्निकर्म करके; पुनः हे द्विजो ! चान्द्रायण आदि सभी व्रत सम्पन्न करके और इसके बाद सभी क्रियाओं का त्याग करके ब्रह्मविद्या का अध्ययनकर यत्नपूर्वक ज्ञान प्राप्तकर पुनः उस ज्ञान के द्वारा ज्ञेय का दर्शन करके वह योगी जो फल पाता है, उस फल को वह सम्पूर्ण वर्णमण्डल के दर्शनमात्र से प्राप्त कर लेता है ॥ ९४-९८ ॥

हे श्रेष्ठ द्विजो ! जिस किसी भी प्रकार शिवालय को लीपकर सामने, पीछे, उत्तर में तथा दक्षिण में चतुष्कोण मण्डल बनाकर उसे चारों ओर से चूर्णों से सजाकर पुष्प, अक्षत आदि से पूजन करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। जो [मनुष्य ] एक बार भी भक्तिपूर्वक गर्भगृह को चन्दन आदि तथा कपूरसहित गन्धद्रव्यों से चारों ओर से लीपकर सभी ओर सुगन्धित पुष्प बिखेरकर चार प्रकार के धूपों से उसे धूपित करके भगवान् ईशान (शिव) – की प्रार्थना करता है, वह शिवलोक को जाता है। वह मनुष्य वहाँ सौ करोड़ कल्पों तक महान् सुखों को भोगकर अपने देहरूपी सुगन्धित पुष्पों से शिवमन्दिर को पूरित करता हुआ क्रम से गन्धर्वलोक पहुँचकर वहाँ गन्धर्वों से भलीभाँति पूजित होता है, [पुनः] क्रम से इस लोक में आकर पराक्रमी राजा होता है ॥ ९९-१०४ ॥

वे सदाशिव आदिदेव, महादेव, सृष्टि- पालन-संहार करने वाले, जगत् के स्वामी तथा सर्वव्यापी हैं। शिवरूपी ब्रह्म से [ मोक्षसुखरूपी] अमृत को ग्रहण करना चाहिये और मोक्ष के साधनस्वरूप उत्तम, व्यक्त, अव्यक्त, नित्य तथा अचिन्त्य प्रभु का सदा अर्चन करना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘उपलेपनादिकथन’ नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥

1 जितने स्थान पर एक हजार गौएँ और दस बैल बिना बाँधे इधर-उधर स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण कर सकें, उतना स्थान गोचर्म कहलाता है —
गवां शतं सैकवृषं यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितम् ।
तत्क्षेत्रं दशगुणितं गोचर्म परिकीर्तितम् ॥
(पराशरस्मृति १२ । ४६ )

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